रायबहादुरों का अन्नाकरण

4 जुलाई 2011
लोकपाल बिल को लेकर राजनीतिक दलों में एक बात को लेकर सहमति नजर आती है कि कोई भी नया कानून सिर्फ संसद बनाए। अब तक किसी ने भी सरकार को इस बात के लिए नहीं कोसा है कि उसने अन्ना हजारे की टोली की बात अनसुनी की है। कल खुद अन्ना हजारे यह कहते दिखे कि एक बार विधेयक संसद पहुंच जाए तो फिर उन्हें कुछ नहीं कहना रहेगा।
दरअसल अन्ना हजारे या उनकी तरह के बहुत से सलाहकारों के साथ एक सी ही दिक्कत रही है। जब उनकी बात पूरी तरह से नहीं सुनी जाती तो वे विचलित हो जाते हैं। फिर कुछ तो ऐसे सलाहकारों का अहंकार होता है, जैसा कि अन्ना के मामले में है, और कुछ लोगों की कमसमझी होती है, जैसे कि अन्ना के मामले में है, वे अपनी राय को ही अंतिम सच मान लेते हैं। अपने खुद के किए दावों के घेरे में ऐसे बहुत से लोग उलझ जाते हैं। ये तो ठीक है कि अन्ना के बहाने बीजेपी और एनडीए के बाकी दल कांग्रेस और यूपीए की फजीहत का मजा ले रहे हैं, और अन्ना के बहाने ये मौका भी उन्हें मिला हुआ है, लेकिन आज दिख ये रहा है कि 16 अगस्त से एक और अनशन की मुनादी करने वाले अन्ना हजारे के हाथों में आज कोई मुद्दा दिख नहीं रहा है। जब लोकपाल बिल पर संसद में ही चर्चा होनी है, इस पर सभी दल सहमत हैं, तो फिर संसद के अंगने में अन्ना का क्या काम।
लेकिन अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की इंजन अपनी भाप खो चुकी है, और मीडिया को समझ आ गया है कि इनके चेहरे देखते ही लोग अब चैनल बदलने लगे हैं, इसलिए ये दोनों अब हाशिये की तरफ बढ़ चुके हैं। संविधान की इन दोनों की समझ बहुत ही सीमित है, और लोकतंत्र के लिए सम्मान भी इनके मन में बहुत कम है, इसलिए इनका आत्मकेंद्रित, स्वमोहित अभियान ऐसे ही अंत का हकदार था। लेकिन हम इस बहाने सलाहकारों की ऐसी सोच के बारे में चर्चा करना चाहते हैं।
बहुत से अखबारनवीसों या सत्ता तक पहुंच वाले लोगों को रायबहादुर बनने का शौक रहता है। लोकतंत्र में यह वैसे तो हर इंसान का हक भी है और जिम्मा भी, कि वे समझदारी की सलाह दें, लेकिन जब ऐसी सलाह जन कल्याण से अधिक उनके अपने अहंकार से जुड़ जाती है, तो मामला गड़बड़ाने लगता है। हमने ऐसे कई सलाहकार, और अक्सर बिन मांगी सलाह देने वाले लोग, देखते हैं जो पहले तो एक हमले के अंदाज में ताकत की कुर्सियों को सलाह देते हैं, और फिर अपनी बात पूरी की पूरी मांग न लिए जाने पर अन्ना बन जाते हैं। कुछ लोग ऐसे नेताओं और अफसरों के खिलाफ एक अभियान ही छेड़ देते हैं जो उनकी कोई बात पूरी तरह न माने। ऐसे बहुत से लोग भड़ास में जीने लगते हैं और उनकी बातों में उनके लिए नफरत भर जाती है जो कि पूरी सलाह नहीं मानते। उनके लिखने में या भाषणों में, ये नफरत झलकने लगती है। हमारा मानना रहता है कि बिन मांगे सलाह देने वालों को अपना रुख उस वक्त की तरह रखना चाहिए जो मंदिर जाकर ईश्वर से सब कुछ मांग तो लेता है, लेकिन मांगों की फेहरिस्त पूरी न होने पर ईश्वर को गालियां देना शुरू नहीं कर देता। इतना हक सिर्फ फिल्म दीवार के अमिताभ बच्चन को मिलना चाहिए। बाकी इंसानों को समझदारों की तरह रहना चाहिए।
कुछ लोगों का यह भी मानना रहता है कि जो उन्हें पता है, वही पूरा सच है। अपनी सीमित जानकारी को ही वे पूरा सच मान लेते हैं। और अपनी इसी खुशफहमी के शिकार होकर वे अपने शहर, अपने प्रदेश के अन्ना या बाबा बन जाते हैं। ऐसे लोग अपने नारों पर खुद ही इस कदर फिदा हो जाते हैं, कि उन्हें अपनी तर्कों में कोई खामी नहीं दिखती। उन्हें लगता है कि उनकी नीयत(?) तर्कों का विकल्प है। किसी की सोच अच्छी हो सकती है, लेकिन वह सोच जब तक देश और दुनिया की बाकी सोच के साथ बहस के लिए तैयार न हो, तक तक उस सोच का कोई वजन नहीं होता। एक दूसरी दिक्कत यह आती है कि जिन लोगों को लोकतंत्र की पूरी समझ नहीं होती वे उसके अपने हाथ आए पहलू को ही पूरा लोकतंत्र मान बैठते हैं। जैसे देख न पाने वालों को जब एक हाथी के इर्द-गिर्द खड़ा किया गया, तो किसी ने पैर छूकर कहा कि हाथी ऐसा है, किसी ने सूड़ को छूकर कहा कि नहीं, हाथी तो बिल्कुल अलग है। किसी के हाथ दुम आई...एक बड़ी दिक्कत बहुत से लोगों के साथ यह है कि वे लोकतंत्र की अपनी बहुत जरा सी समझ को पूरा लोकतंत्र मान लेते हैं।
समाज में मीडिया या ऐसे जो दूसरे तबके जमात तैयार करने में काम आते हैं, उनका ये जिम्मा होता है कि लोगों के अधूरे तर्कों के साथ लोकतंत्र के बाकी हिस्सों को भी लोगों के सामने रखें। लेकिन टीवी समाचारों से पहले जानकारी मिलने के इस जमाने में बहुत से लोग इस पहली सूचनाओं को पूरी खबर मान लेते हैं, और उनके आधार पर अपनी सोच बनाने लगते हैं। तकलीफ की एक बात यह भी है कि पेशेवर नेताओं और पेशेवर पत्रकारों से परे, समाज के बहुत से बाकी समझदार तबकों में से बहुत कम लोग अन्ना-बाबा जैसे मुद्दों पर मुंह खोलते हैं। पढ़े-लिखे या समझदार ऐसे लोगों का पढऩा या उनकी समझ के अधिक काम की नहीं होती अगर उबलते हुए देश में भी उनका पेन न खुले या उनका मुंह न खुले।
इसलिए सलाहकार, खासकर बिना बुलाए सलाहकार अपने को कुछ कम समझें, और समाज के बाकी समझदार तबके अपने बोलने की जिम्मेदारी को कुछ अधिक समझें, बिना कोई खुशफहमी पाले।
 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें