1 जुलाई
पिछले ओलंपिक में भारत को एक मैडल दिलाने वाले मुक्केबाज विजेन्द्र के खिलाफ भारत के राजचिन्ह के बेजा इस्तेमाल को लेकर एक मामला दर्ज हो गया है। इस मुक्केबाज ने अशोक स्तंभ को अपनी शादी के कार्ड पर छपवा लिया था और देश में इसके खिलाफ एक कड़ा कानून है जिसके तहत अब हरियाणा की पुलिस ने यह मामला दर्ज कर लिया है। इसके पहले भी कुछ ऐसे मौके रहे हैं जिन पर राष्ट्रीय झंडे की तरफ अनजाने में पैर करके बैठे किसी खिलाड़ी की तस्वीर को देखकर उसके खिलाफ कुछ लोग अदालत चले गए और वहां पर मामला चलने लगा।
देश के प्रतीक चिन्हों का लेकर भारत कुछ अधिक संवेदनशील दिखता है। यहां के प्रतीक चिन्ह छुईमुई पौधे की पत्तियों से दिखते हैं जिनका बात-बात में अपमान होता है। विजेन्द्र वाले मामले को देखें तो जिस नियम के तहत उन्हें अपराधी साबित करने की कार्रवाई शुरू हुई है उसी नियम के तहत इस देश में राजा से लेकर कलमाड़ी तक और भैया राजा से लेकर फूलन तक किस्म-किस्म के अपराधी अलग-अलग समय पर ऐसे राजचिन्हों के इस्तेमाल के हकदार रहे क्योंकि वे सांसद थे। अभी हो सकता है कि तिहाड़ जेल से कलमाड़ी और राजा ने लोकसभा अध्यक्ष को संसद सत्र में आने के लिए जो अर्जी भेजी है वह भी राज चिन्ह वाले सांसद के लैटरपैड पर आई हो। वे चाहे जेल में हों, लेकिन वे सांसद तो हैं ही और हो सकता है कि वे अभी भी वहां अपनी संसद भवन वाली स्टेशनरी का इस्तेमाल कर रहे हों। हम इस नौबत को शर्मनाक मानते हैं कि नियमों को लेकर इस देश के एक होनहार खिलाड़ी पर तो मुकदमा दर्ज हो जाए और नामी-गिरामी अभियुक्त जेल के भीतर भी उसके हकदार रहें, या उसके हकदार लोग बाहर रहते हुए भी अपनी तमाम बदनामी के बावजूद राज चिन्हों का इस्तेमाल करते रहें, पुलिस से सलामी लेते रहें, झंडे फहराते रहें।
राज चिन्हों और राष्ट्रीय प्रतीकों, देश के झंडे इन सबको लेकर भारत को कुछ दरियादिली दिखानी चाहिए। दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां पर खिलाड़ी अपने देश के झंडे के बने कपड़े पहनकर खेलते हैं, झंडे जैसे बनाए गए केक काटते हैं और इसके साथ-साथ उनके मन में अपने देश के लिए न तो सम्मान में कोई कमी होती है और न ही वे भारत के मुकाबले कोई छोटे राष्ट्रभक्त होते हैं। भारत में भावनाओं की जगह प्रतीकों ने ले ली है और हम तस्वीरों, प्रतिमाओं और तारीखों में उलझ गए हैं। राजघाट के सम्मान और अपमान की बात खड़ी हो जाती है या फिर किसी एक तारीख पर किसी महान को याद करके फिर साल भर उसे अलमारी में बंद कर दिया जाता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। झंडा या राष्ट्रगान एक दहशत पैदा करने लगे वह ठीक नहीं है। ऐसी पवित्रतावादी सोच किसी काम की नहीं होती और इतने सारे नियम-कायदे रहने के बाद भी लोग इस देश की वैसी फिक्र करते नहीं दिखते जैसी कि जापान या दुनिया के दूसरे कई देशों में देखने को मिलती है। एक तरफ छत्तीसगढ़ की राजधानी में म्युनिसिपल की नई बनी बिल्डिंग में शायद झंडा फहराने लगेगा लेकिन वहां नई सफेद दीवारों पर लोगों का पान खाकर थूकना इस तरह से शुरू हो गया है कि अधिक साफ-सुथरी दीवार के चलते इमारत को नजर न लग जाए।
जब हम देशपे्रम की बात करें तो इन दिनों कम से कम यह बात बहुत तल्खी से लगती है कि देश में कोई पे्ररणास्रोत न रह जाने से लोगों के मन में तमाम बातों के लिए एक हेठी सी हो गई है। लोगों को बात-बात में यह लगता है कि क्या नियम-कायदे सिर्फ छोटे, गरीब और कमजोर लोगों के लिए हैं या फिर बड़े लोग भी कोई नियम मानेंगे? हवाई अड्डों पर जब चुनिंदा बड़े नेताओं और अफसरों की एक लंबी लिस्ट को, जजों और दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को सुरक्षा जांच से छूट मिलती है तो साधारण मुसाफिरों को यह लगता है कि इनमें से तो लगभग तमाम पदों पर बैठे कोई न कोई लोग अपराधों से घिरे हुए साबित हो चुके हैं। बहुत से लोग इन पदों पर रहते-रहते गिरफ्तार करके जेल भेजे गए हैं और अदालती कटघरों में खड़े हैं। ऐसे अपराधी या अभियुक्त एक दिन पहले तक तो सुरक्षा जांच से छूट पाते रहे हैं। ऐसे लोगों को छूट देने से बाकी मुसाफिरों की जिंदगी तो खतरे में पड़ती है क्योंकि पैसों के लिए हो सकता है कि एक राजा या एक कलमाड़ी छुपाकर कोई सामान भीतर ले आएं और फिर वह पूरा हवाई जहाज खतरे में पड़े।
कुल मिलाकर हम यह कहना चाहते हैं कि संदिग्ध तबके के लोगों के राजकीय विशेषाधिकार कम होने चाहिए और ओलंपिक में पदक दिलाने वाले खिलाड़ी जैसे लोगों की ऐसी कोई चूक अगर होती है तो उसे भुला देने का इंतजाम भी हमारे कानून में होना चाहिए वरना राज चिन्ह और राष्ट्रगान एक अलग तनाव की वजह रहेंगे जिससे कि जनता के मन में उनका कोई सम्मान नहीं हो सकेगा। लोकतंत्र का कू्ररतंत्र बनना जरूरी नहीं है।
पिछले ओलंपिक में भारत को एक मैडल दिलाने वाले मुक्केबाज विजेन्द्र के खिलाफ भारत के राजचिन्ह के बेजा इस्तेमाल को लेकर एक मामला दर्ज हो गया है। इस मुक्केबाज ने अशोक स्तंभ को अपनी शादी के कार्ड पर छपवा लिया था और देश में इसके खिलाफ एक कड़ा कानून है जिसके तहत अब हरियाणा की पुलिस ने यह मामला दर्ज कर लिया है। इसके पहले भी कुछ ऐसे मौके रहे हैं जिन पर राष्ट्रीय झंडे की तरफ अनजाने में पैर करके बैठे किसी खिलाड़ी की तस्वीर को देखकर उसके खिलाफ कुछ लोग अदालत चले गए और वहां पर मामला चलने लगा।
देश के प्रतीक चिन्हों का लेकर भारत कुछ अधिक संवेदनशील दिखता है। यहां के प्रतीक चिन्ह छुईमुई पौधे की पत्तियों से दिखते हैं जिनका बात-बात में अपमान होता है। विजेन्द्र वाले मामले को देखें तो जिस नियम के तहत उन्हें अपराधी साबित करने की कार्रवाई शुरू हुई है उसी नियम के तहत इस देश में राजा से लेकर कलमाड़ी तक और भैया राजा से लेकर फूलन तक किस्म-किस्म के अपराधी अलग-अलग समय पर ऐसे राजचिन्हों के इस्तेमाल के हकदार रहे क्योंकि वे सांसद थे। अभी हो सकता है कि तिहाड़ जेल से कलमाड़ी और राजा ने लोकसभा अध्यक्ष को संसद सत्र में आने के लिए जो अर्जी भेजी है वह भी राज चिन्ह वाले सांसद के लैटरपैड पर आई हो। वे चाहे जेल में हों, लेकिन वे सांसद तो हैं ही और हो सकता है कि वे अभी भी वहां अपनी संसद भवन वाली स्टेशनरी का इस्तेमाल कर रहे हों। हम इस नौबत को शर्मनाक मानते हैं कि नियमों को लेकर इस देश के एक होनहार खिलाड़ी पर तो मुकदमा दर्ज हो जाए और नामी-गिरामी अभियुक्त जेल के भीतर भी उसके हकदार रहें, या उसके हकदार लोग बाहर रहते हुए भी अपनी तमाम बदनामी के बावजूद राज चिन्हों का इस्तेमाल करते रहें, पुलिस से सलामी लेते रहें, झंडे फहराते रहें।
राज चिन्हों और राष्ट्रीय प्रतीकों, देश के झंडे इन सबको लेकर भारत को कुछ दरियादिली दिखानी चाहिए। दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां पर खिलाड़ी अपने देश के झंडे के बने कपड़े पहनकर खेलते हैं, झंडे जैसे बनाए गए केक काटते हैं और इसके साथ-साथ उनके मन में अपने देश के लिए न तो सम्मान में कोई कमी होती है और न ही वे भारत के मुकाबले कोई छोटे राष्ट्रभक्त होते हैं। भारत में भावनाओं की जगह प्रतीकों ने ले ली है और हम तस्वीरों, प्रतिमाओं और तारीखों में उलझ गए हैं। राजघाट के सम्मान और अपमान की बात खड़ी हो जाती है या फिर किसी एक तारीख पर किसी महान को याद करके फिर साल भर उसे अलमारी में बंद कर दिया जाता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। झंडा या राष्ट्रगान एक दहशत पैदा करने लगे वह ठीक नहीं है। ऐसी पवित्रतावादी सोच किसी काम की नहीं होती और इतने सारे नियम-कायदे रहने के बाद भी लोग इस देश की वैसी फिक्र करते नहीं दिखते जैसी कि जापान या दुनिया के दूसरे कई देशों में देखने को मिलती है। एक तरफ छत्तीसगढ़ की राजधानी में म्युनिसिपल की नई बनी बिल्डिंग में शायद झंडा फहराने लगेगा लेकिन वहां नई सफेद दीवारों पर लोगों का पान खाकर थूकना इस तरह से शुरू हो गया है कि अधिक साफ-सुथरी दीवार के चलते इमारत को नजर न लग जाए।
जब हम देशपे्रम की बात करें तो इन दिनों कम से कम यह बात बहुत तल्खी से लगती है कि देश में कोई पे्ररणास्रोत न रह जाने से लोगों के मन में तमाम बातों के लिए एक हेठी सी हो गई है। लोगों को बात-बात में यह लगता है कि क्या नियम-कायदे सिर्फ छोटे, गरीब और कमजोर लोगों के लिए हैं या फिर बड़े लोग भी कोई नियम मानेंगे? हवाई अड्डों पर जब चुनिंदा बड़े नेताओं और अफसरों की एक लंबी लिस्ट को, जजों और दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को सुरक्षा जांच से छूट मिलती है तो साधारण मुसाफिरों को यह लगता है कि इनमें से तो लगभग तमाम पदों पर बैठे कोई न कोई लोग अपराधों से घिरे हुए साबित हो चुके हैं। बहुत से लोग इन पदों पर रहते-रहते गिरफ्तार करके जेल भेजे गए हैं और अदालती कटघरों में खड़े हैं। ऐसे अपराधी या अभियुक्त एक दिन पहले तक तो सुरक्षा जांच से छूट पाते रहे हैं। ऐसे लोगों को छूट देने से बाकी मुसाफिरों की जिंदगी तो खतरे में पड़ती है क्योंकि पैसों के लिए हो सकता है कि एक राजा या एक कलमाड़ी छुपाकर कोई सामान भीतर ले आएं और फिर वह पूरा हवाई जहाज खतरे में पड़े।
कुल मिलाकर हम यह कहना चाहते हैं कि संदिग्ध तबके के लोगों के राजकीय विशेषाधिकार कम होने चाहिए और ओलंपिक में पदक दिलाने वाले खिलाड़ी जैसे लोगों की ऐसी कोई चूक अगर होती है तो उसे भुला देने का इंतजाम भी हमारे कानून में होना चाहिए वरना राज चिन्ह और राष्ट्रगान एक अलग तनाव की वजह रहेंगे जिससे कि जनता के मन में उनका कोई सम्मान नहीं हो सकेगा। लोकतंत्र का कू्ररतंत्र बनना जरूरी नहीं है।
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