हिंसक मर्दानगी वाली सोच और बयान खारिज करने की जरूरत

2 जुलाई 2014
संपादकीय
महिलाओं और विपक्षियों के खिलाफ हिंसक बयान को लेकर कल ही इस जगह हमने बंगाल के तृणमूल कांग्रेस सांसद के खिलाफ लंबा सा लिखा है, लेकिन लोगों की हिंसा खत्म होते नहीं दिख रही है। बंगाल से ही इसी पार्टी के हिंसक बयानों के दो नए नमूने सामने आए हैं, और महाराष्ट्र में शिवसेना के एक विधायक ने अपने इलाके की एक अधेड़ महिला को कपड़े उतारकर पीटने की धमकी दी है। इसी महाराष्ट्र से लगे हुए भारत के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केन्द्रों में से एक गोवा में वहां का एक मंत्री पिछले दो दिनों से लगातार महिलाओं के कपड़ों को लेकर भड़काने वाले हिंसक बयान दे रहा है, और तंग या छोटे कपड़े पहनने वाली महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक बातें करते हुए कुछ ऐसा जाहिर कर रहा है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के लिए उनके अपने कपड़े जिम्मेदार है। 
दरअसल देश एक दकियानूसी सैलाब से गुजर रहा है। देश भर में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने जो अभूतपूर्व और ऐतिहासिक जीत हासिल की है, उसे बहुत से लोग एक आक्रामक हिन्दुत्व को मिला जनमत मान बैठे हैं, तो कुछ दूसरे लोग अब देश भर में भारतीय संस्कृति का एक काल्पनिक रूप लागू करने पर उतारू हो गए हैं। गोवा के जिस भाजपाई मंत्री ने महिलाओं के कपड़ों को लेकर पहले दिन बयान दिया, और अगले दिन उस पर टिके रहने की बात कही, उसे शायद यह याद नहीं है कि गुजरात में हिन्दू धर्म के सबसे बड़े त्योहार नवरात्रि के मौके पर खूबसूरत लड़कियों की अनगिनत ऐसी तस्वीरें बाहर आती हैं, जिनमें वे अपने बदन पर तरह-तरह की रंगीन साज-सज्जा करवाकर वहां के पारंपरिक-धार्मिक गरबा नृत्य में शामिल होती हैं। उनका फैशन भी देखते ही बनता है, और रात-रात भर चलने वाले इस सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान नौजवान पीढ़ी के बीच अंतरंग संबंधों की कहानियां हर बरस वहां से निकलकर बाहर आती हैं। इनमें से किसी भी युवती के साथ बलात्कार के मामले इन 9 दिनों में सामने आए हों, ऐसा याद नहीं पड़ता। वहां पर हिन्दू धर्म, भारतीय संस्कृति, नौजवान पीढ़ी का उत्साह, और फैशन की सीमा में देह प्रदर्शन, ये सब कुछ साथ-साथ चलते हैं, और सहअस्तित्व की गुंजाइश भी बताते हैं। 
आज भारत में कुछ नेता और कुछ दूसरे कट्टरपंथी लोग लगातार यह माहौल बनाने में लगे हैं कि बलात्कार और सेक्स हिंसा या अपराध के पीछे महिलाओं के कम कपड़े जिम्मेदार हैं। ऐसे बदनीयत लोगों से यह सवाल किया जाना चाहिए कि जिस समाज में मर्द दो-तीन बरस की बच्चियों तक से बलात्कार करते हैं, और साठ बरस की बूढ़ी महिला से भी, तो वहां पर उनके कपड़े क्या मायने रखते हैं? और जिन लड़कियों या महिलाओं से बलात्कार होता है, उनमें से अधिकतर तो फैशन से दूर की, आम लड़कियां-महिलाएं होती हैं, गरीब होती हैं, दलित या आदिवासी होती हैं, उनके लिए कोई फैशन मुमकिन भी नहीं होता। आज तृणमूल कांग्रेस या भाजपा जैसी पार्टियों को अपने घर बैठकर यह सोचना चाहिए कि उसके नेता अगर इसी तरह की हिंसक बातें करेंगे, तो आने वाले वक्त की नौजवान वोटर पीढ़ी ऐसी पार्टियों को खारिज ही कर देंगी। और बात सिर्फ नौजवान पीढ़ी की नहीं है, जब कोई मंत्री श्रीराम सेना जैसे हमलावर संगठन के नेता के तौर-तरीकों का समर्थन करता है, तो उस मंत्री की पार्टी को इसके बारे में सोचना चाहिए कि वह देश को किस तरफ ले जाना चाहती है। 
आज हिन्दुस्तान में बहस का मुद्दा मर्दानगी की हिंसा साबित करने के लिए किए जाने वाले सेक्स अपराधों से हटाकर महिलाओं के कपड़ों, उनके अकेले कहीं आने-जाने की तरफ मोड़ दिया जा रहा है। सरकार से लेकर राजनीति तक, और मीडिया से लेकर समाज के दूसरे तबकों तक एक मर्द-सोच जिस तरह हावी है, वह ममता बैनर्जी जैसी महिला नेताओं के सिर पर भी चढ़ी हुई है। लोगों को ऐसी सोच के खिलाफ जमकर लिखना चाहिए, जमकर बोलना चाहिए, और चुनावों में ऐसी पार्टियों को खारिज भी करना चाहिए। जब तक जनता मुंह नहीं खोलेगी, तब तक राजनीतिक दल नहीं सम्हलेंगे।

ममता बैनर्जी की बलात्कारवादी राजनीति का ताजा हिंसक हमला

1 जुलाई 2014
संपादकीय
पश्चिम बंगाल को भारत में माना जाता है कि वह बड़ा भावनाओं वाला प्रदेश है, और जवानी के दिनों में लोग वहां मोहब्बत भी करते हैं, और नक्सली भी बनते हैं। बंगाल को संगीत और कला के लिए जाना जाता है, बहुत सी अच्छी मिठाइयों के लिए जाना जाता है, फुटबॉल की दीवानगी के लिए, हिन्दुस्तान की सबसे अच्छी फिल्मों के लिए, ऐसी कई अच्छी बातों के लिए बंगाल को जाना जाता है। लेकिन हाल के बरसों में तृणमूल कांग्रेस की ममता बैनर्जी का राज आने के बाद बंगाल को बलात्कार के हिमायती राज्य के रूप में जाना जाने लगा है। खुद ममता बैनर्जी से शुरू होकर उनकी पार्टी के कई मंत्री, और कई सांसद बलात्कारवादी दिखाई पड़ते हैं। उनके बयान ऐसे दर्ज होते आए हैं कि अगर हिन्दुस्तान में लोकतंत्र असरदार होता, यहां की अदालतें अपना जिम्मा पूरा करतीं, तो मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी सहित उनके कई मंत्री-सांसद कम से कम कुछ दिनों की जेल तो भुगतते ही। 
तृणमूल कांग्रेस के बलात्कार प्रोत्साहनवाद की ताजा मिसाल सामने है। कुछ हफ्ते हो गए थे और इस महिला प्रधान पार्टी की तरफ से बलात्कार को बढ़ावा देने वाला कुछ कहा नहीं गया था, तो कल इसके एक सांसद ने वह कसर पूरी कर दी। खुद को चंदननगर का गुंडा बताते हुए तृणमूल सांसद तापश पाल वीडियो में यह बोलते हुए दिखाए गए- आप जानते नहीं हैं कि  उन्होंने (सीपीएम) ने क्या किया। मैं वहां था। उन्होंने उन लड़कियों पर हमला किया, जिनके पिता तृणमूल काँग्रेस में थे। विपक्षियों को ज्यादा उडऩे की जरूरत नहीं है। मैं कोलकाता का नहीं हूं। मैं चंदननगर का रहने वाला हूं। पाल यहीं पर नहीं रुके। सी ग्रेड की किसी फिल्म के हीरो की तरह उन्होंने कहा कि वह हमेशा अपने साथ माल लेकर चलते हैं। माल समझते हैं ना रिवाल्वर। अगर किसी ने गांव में तृणमूल के लोगों की लड़कियों को हाथ भी लगाने की कोशिश की, तो वह अपने रिवाल्वर से उनको शूट कर देंगे। उनके घर की महिलाओं के साथ दुष्कर्म कर उनके घरों को बर्बाद करने के लिए लड़कों को भेजा जाएगा। 
इसके पहले भी तृणमूल कांग्रेस के बहुत से नेता वामपंथियों के खिलाफ न सिर्फ भारी हिंसा के बयान देते आए हैं, बल्कि हिंसा करते भी आए हैं, और महिलाओं के खिलाफ खासकर बलात्कार जैसे मामलों में उनका रूख संवेदनाशून्य रहते आया है। इसके पहले भी बलात्कार के किसी मामले में ममता बैनर्जी और उनके मंत्री शिकायत करने वाली महिला के चाल-चलन को खराब बताने वाले बयान देते आए हैं, और खुद ममता की पुलिस ने उनके ऐसे बयानों के खिलाफ अपनी जांच रिपोर्ट में शिकायतों को सही करार दिया है। यह नौबत बहुत भयानक है क्योंकि लोकतंत्र में यह माना जा रहा है कि राजनीति और सरकार में महिलाओं की हिस्सेदारी अगर बढ़ती चलेगी, तो देश में महिलाओं पर जुल्म घटेंगे। अब राज्य सरकार की मुखिया ही अगर एक महिला है, तो उससे अधिक हिस्सेदारी और क्या हो सकती है? और वह मुखिया ही पार्टी की भी मुखिया है, और सबसे अधिक गैरजिम्मेदारी के हिंसक बयान देने के मामलों में भी वह अपनी पार्टी के बकवासी नेताओं की मुखिया है, और सवाल पूछने वालों से लेकर कार्टून बनाने वालों तक को जेल भेजने के मामले में भी वह तानाशाह की तरह काम करती है। 
भारत की न्यायव्यवस्था शर्मनाक है। ऐसे हिंसक बयान के बाद ऐसे नेताओं को सीधे जेल भेजना चाहिए, ये लोग न सिर्फ महिलाओं का अपमान करते हैं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में हिंसा और जुर्म की सीधी धमकी देते हैं। ममता बैनर्जी ने ऐसी बददिमागी के रिकॉर्ड कायम किए हैं, और इस देश में किसी भी दूसरे मुख्यमंत्री ने बलात्कार को लेकर महिलाओं के खिलाफ इतने बुरे बयान देने का काम नहीं किया है। ममता की टक्कर में उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेता जरूर खड़े हैं, लेकिन वहां पर विदेश से पढ़कर आए हुए नौजवान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हिंसक और अपमानजनक बयानों में ममता से कुछ पीछे ही हैं। 
महिलाओं को राजनीति और सरकार में आगे बढ़ाने को लेकर जो कोशिश चल रही है, वह अपनी जगह सही है। महिला आरक्षण से भी हमको उम्मीद है कि नौबत सुधरेगी। लेकिन जिस तरह के शर्मनाक बयान एक तानाशाह औरत की निजी जागीर जैसी पार्टी के नेता लगातार दे रहे हैं, उनको लेकर किसी को अदालत में जनहित याचिका दायर करने की जरूरत है। डरे सहमे जज शायद खुद होकर इन बयानों पर नोटिस जारी नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह लोकतंत्र को कुचलने से कम कुछ नहीं है। 

अंतरिक्ष पर भारत की फतह, देश की धरती पर शिकस्त...

30 जून 14
संपादकीय
भारत ने अपने शानदार और गौरवशाली अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत आज फिर एक रॉकेट से कई देशों के उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे हैं। ये देश दुनिया के सबसे विकसित देश हैं, और उनमें से कोई भी तकनीकी क्षमता में, वैज्ञानिक विकास में भारत से पीछे नहीं है। इस पर भी अगर वे भारत के रॉकेट से अंतरिक्ष में अपने उपग्रह भेज रहे हैं, और ऐसा करते हुए भारत की अंतरिक्ष संस्था इसरो को कुछ समय हो भी चुका है, तो यह भारत के लिए गर्व की बात तो है ही, इससे यह सोचने की एक मजबूरी भी सामने आती है कि अंतरिक्ष तक पहुंचा हुआ हिन्दुस्तान आज पखानों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है, नालियों और गटरों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है? यह हिन्दुस्तान क्या अंतरिक्ष में पहुंचकर वहां से इस देश में हर प्रदेश में बिखरी हुई तरह-तरह की सरकारी खामियों और कमियों को क्यों नहीं देख पा रहा है? 
बोलचाल की भाषा में किसी आसान काम के बारे में कहा जाता है कि उसे करने के लिए परमाणु बम बनाने के फार्मूले की जरूरत नहीं है। भारत में भी सरकारी काम में सुधार के लिए, शहरों और गांवों की रोज की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए किसी कठिन और जटिल फार्मूले की जरूरत नहीं है, इस देश के भीतर विज्ञान से लेकर तकनीक तक, और मैनेजमेंट से लेकर मार्केटिंग तक इतने किस्म की कामयाब मिसालें हैं, कि उनकी नकल करके भी यह देश आगे बढ़ सकता है। गुजरात में अमूल नाम का देश का एक सबसे कामयाब प्रोजेक्ट चल रहा है, जो दशकों से इसी भ्रष्ट देश के भीतर भी पूरी कामयाबी से अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम कर रहा है। इस सफलता से सीख कर देश के भीतर सौ दूसरी जगहों पर अमूल की डेयरी, और दूध उत्पादक लोग क्यों तैयार नहीं किए जा सकते? गुजरात में जिस जगह पर यह है, वहां जैसी हवा-पानी और बाकी सहूलियतें देश में जगह-जगह हो सकती हैं, लेकिन एक के बाद दूसरा अमूल इस देश में नहीं हो सका। इस देश में दिल्ली की एक मेट्रो के बाद कई दूसरे शहरों में मेट्रो बन रही है, और चल रही है। इस सामूहिक यातायात सुविधा ने महानगरों को एक नई जिंदगी दी है। और एक के बाद दूसरा शहर मेट्रो की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन अमूल डेयरी जैसे सफल प्रयोग बाकी देश में कहीं नहीं दुहराए जा सके। 
अंतरिक्ष के मोर्चे पर भारत की कामयाबी को देखकर यह भी लगता है कि लोगों की जिंदगी में कई तरह की सुविधाओं को लेकर, सरकार के कामकाज को लेकर उत्कृष्टता के इसरो जैसे पैमाने क्यों नहीं गढ़े जा सकते? आज अगर दुनिया के दर्जनों देश अपने महंगे उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए भारत के कामयाब रॉकेटों पर भरोसा करते हैं, तो यह तकनीकी उत्कृष्टता इसी देश की जिंदगी की छोटी-छोटी बातों को क्यों नहीं लाई जा सकती? जब इसी देश के नौजवान दुनिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों तक पहुंचकर, वहां रिकॉर्ड कायम करते हैं, और दुनिया की सबसे बड़ी-बड़ी कंपनियों के मुखिया भी बनाए जाते हैं, तो फिर वह उत्कृष्टता भारत में क्यों नहीं लाई जा सकती? अभी चार दिन पहले ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भोपाल में एक भाषण में इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि भारत के विश्वविद्यालयों का स्तर अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर कहीं नहीं टिकता। और भारत के ही छात्र-छात्रा दूसरे देशों में जाकर किसी भी दूसरे देश के नौजवानों के मुकाबले आसानी से खड़े रहते हैं। इस हकीकत के पीछे हमको भारतीय शिक्षा व्यवस्था में उत्कृष्टता की कमी साफ-साफ जिम्मेदार दिखती है। 
आज जब यह देश इसरो की कामयाबी पर खुशी मना रहा है, तो करीब-करीब हर नागरिक की जिंदगी में कोई न कोई खामी या कमी उसकी जिंदगी से खुशियां छीन भी रही हैं। लोगों को सरकारी दफ्तरों से लेकर सार्वजनिक जगहों तक, कारोबार से लेकर सामाजिक व्यवहार तक उत्कृष्टता की कमी झेलनी पड़ती है, और अंतरिक्ष में सफलता के बाद जब इस धरती पर असफलता कदम-कदम पर दर्ज होती है, तो वह और अधिक चुभती है। भारत को अपने हर पहलू में बेहतर पैमाने लागू करने, और उन पर ऊपर जाने की कोशिश करनी चाहिए।

बरसों के पे्रम और देह-संबंधों के बाद अचानक बलात्कार!

29 जून 2014
संपादकीय
कल रात एक टीवी सीरियल जोधा-अकबर में एक साजिश के तहत एक धूर्त महिला एक भले बुजुर्ग पर बलात्कार की कोशिश का आरोप लगाती है, और तकरीबन सभी लोग उस पर भरोसा भी करते हैं, जबकि आरोप पूरी तरह झूठा रहता है। कल ही सुबह यह खबर आई थी कि सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल खड़ा किया है कि असफल पे्रम संबंधों के तुरंत बाद अगर उन्हें लेकर बलात्कार की कोई रिपोर्ट लिखाई जाती है, तो उनको कितना भरोसेमंद माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया कि क्या दो बालिगों के बीच सहमति से चल रहा प्रेम संबंध टूटने के बाद दुष्कर्म का मामला बनता है? इसी तरह का मामला पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट में आया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि दुष्कर्म के केस को महिलाएं हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। पुरुष को बदनाम करने के अलावा उसे शादी के लिए मजबूर करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कोई आदेश नहीं दिया पर हाल में इस तरह से तेजी से बढ़े मामलों पर चिंता जरूर जताई। अदालत ने कहा कि प्रेम संबंधों के टूटने के बाद पुरुष पर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगा देती हैं। दिल्ली की एक खबर है कि वहां अब पुलिस बलात्कार की ऐसी रिपोर्ट तो लिख लेगी जो कि साथ रहने के बाद कोई एक महिला अपने कल तक के साथी के खिलाफ लिखाने आएगी, लेकिन ऐसी शिकायतों पर साथी आदमी की गिरफ्तारी तुरंत नहीं की जाएगी, और पुलिस के बड़े अफसर से इजाजत लेकर ही ऐसी गिरफ्तारी होगी। अब तक वहां रिपोर्ट होते ही आरोपी को गिरफ्तार कर लिया जाता है। 
इन दोनों-तीनों बातों की चर्चा करने से महिलाओं के हक के लिए लडऩे वाले कई लोग हम पर नाराज होंगे कि हम भी आदमियों की ज्यादती, जुल्म और जुर्म की शिकार औरतों की बात पर शक खड़ा कर रहे हैं, और ऐसे शक को बढ़ावा दे रहे हैं। हमारी ऐसी कोई नीयत नहीं है, लेकिन कानून के तहत महिला की शिकायत को, उसके बयान को काफी वजन मिला हुआ है, और अगर महिलाओं के हक के मामले में कोई कमी है, तो वह कानून पर अमल की कमी है, न कि कानून में कड़ाई की। ऐसे में इंसाफ का तकाजा यही है कि लोगों को सुनवाई का, जांच में अपनी बात को कहने का एक हक मिलना चाहिए, और पहली शिकायत की बुनियाद पर गिरफ्तारी के पहले यह भी सोचने की जरूरत है कि बरसों लंबे पे्रम-संबंधों और साथ रहने की समझ-बूझ पर अगर ऐसा कानूनी खतरा टंगा रहेगा, तो उससे इंसानी रिश्तों पर पडऩे वाला बुरा असर क्या अधिक नुकसानदेह नहीं होगा? 
हम यहां पर महिलाओं की शिकायत पर अब तक आम बनी हुई पुलिस कार्रवाई के सिर्फ एक छोटे पहलू पर बात करना चाहते हैं। जब शिकायत किसी आदमी के साथ लंबे पे्रम-संबंधों, लंबे लिव-इन रिलेशनशिप के बाद सामने आती हो, तो उसे इतने लंबे रिश्तों की पृष्ठभूमि में भी देखना चाहिए। आज न सिर्फ पश्चिमी देशों में, बल्कि दुनिया के अधिकतर देशों में वयस्क जोड़ों के बीच पे्रम-संबंधों के दौरान आपसी सहमति से सेक्स एक आम बात है। ऐसे में अगर महीनों या बरसों के बाद रिश्ते खराब होते हैं, शादी का वायदा पूरा नहीं हो पाता है, नौकरी दिलाने का वायदा पूरा नहीं हो पाता है, तो कल तक का सहमति का सेक्स आज का बलात्कार एकदम से ही मान लेना हो सकता है कि इंसाफ के खिलाफ जाए। बलात्कार के मामलों में महिलाओं के बयान को आदमी के बयान से अधिक वजन देना तो ठीक है, लेकिन इंसाफ के तराजू में कम से कम दो पलड़े होना भी जरूरी है, और आदमी की सफाई के वजन को चाहे कम भी आंका जाए, लेकिन उसे सुनना, और हालातों को देखना, यह भी जरूरी है।
हमारी बात कुछ लोगों को मर्दानगी वाले जुल्म और जुर्म का साथ देने वाली लग सकती है, लेकिन हम उस इंसाफ को बचाने के लिए इस गुंजाइश पर चर्चा कर रहे हैं, जिस इंसाफ की नीयत औरत को कुछ अधिक हद तक रियायत देने की है। उस नीयत की हिमायत करते हुए भी हम बयान से परे के बाकी हालात को भी एक नजर देखने की सलाह देने की हिमाकत कर रहे हैं। ऐसा न होने पर जितने भी मामलों में झूठी रिपोर्ट होती है, अदालत में झूठी साबित होती है, उतनी ही हद तक सचमुच जुर्म की शिकार महिलाओं की विश्वसनीयता भी घटेगी। इसलिए इंसाफ का तकाजा आदमी और औरत की बातों को सिर्फ बयान से कुछ अधिक दूर तक देखने का है। कानून अंधा कानून बनकर किसी को राह नहीं दिखा सकता। इसलिए बरस-दर-बरस चले आ रहे पे्रम और देह-संबंधों के बाद अचानक बलात्कार की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट के माथे पर जो बल पड़े हैं, उन्हें देखते हुए इस बारे में चर्चा होनी चाहिए। 

बात की बात, Bat ke bat,

28 june 2014

घटिया बीज से होता नुकसान सिर्फ बीज की लागत का नहीं

28 जून 2014
संपादकीय
हिन्दुस्तान में मानसून कमजोर दिख रहा है इसलिए पूरे देश में जगह-जगह फिक्र खड़ी हो रही है। अभी जब हम यह लिख रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जिलों के साथ खेती-किसानी पर बात कर रहे हैं कि कैसे इस हालत से निपटा जा सकता है। बारिश तो हाथ में नहीं है, लेकिन बीज, खाद और खेती की दवा सही समय पर और सही किस्म की लोगों को मिल जाए इतना तो जरूरी है। और इस वीडियो कांफ्रेंस के दौरान ही यह बात सामने आई कि कई बीज कंपनियों ने घटिया बीज सप्लाई किए और उसकी वजह से फसल तबाह हुई। इन कंपनियों को काली सूची में डालने का आदेश दिया गया, लेकिन पिछले बरसों में इस भ्रष्टाचार के चलते जो फसल तबाह हुई है, उसकी कोई भरपाई मुमकिन नहीं है। पिछले पांच बरसों में जगह-जगह यह बात सामने आई थी कि कृषि विभाग ने, और बीज निगम ने जो बीज दिए थे, वे घटिया थे। इसके अलावा इस विभाग में भ्रष्टाचार की बहुत सी खबरें सामने आई थीं। दूसरे विभागों से अलग कृषि विभाग में बीज, खाद, और दवा के घटिया होने का नुकसान महीनों बाद जाकर गरीब किसान को पता लगता है। इसलिए यह धोखाधड़ी सिर्फ बीज की लागत के नुकसान की नहीं रहती, यह धोखाधड़ी उससे कई गुना अधिक, किसान की जिंदगी के पूरे एक बरस की रहती है। 
छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने कुछ विभागों के कामकाज पर कसावट से वहां सुधार लाया है। ऐसे में दूसरे विभागों में सुधार क्यों नहीं हो सकता, यह हैरानी की बात है। फिर बहुत से विभागों से जुड़े हुए ऐसे निगम और मंडल हैं, जहां पर सरकार नेताओं को मनोनीत करती है, और फिर मानो उन नेताओं के खर्च निकालने के लिए, या फिर उनके चुनाव के लिए, इन निगम मंडलों में भारी गड़बड़ी चलती है। ऐसा अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से लगातार देखने में आया है, और जो निगम मंडल अपनी स्वायत्तता से बेहतर काम कर सकते हैं, वे भ्रष्टाचार से घिरे, राजनीतिक पुनर्वास केन्द्र, या शिविर बनकर रह जाते हैं। खेती-किसानी से जुड़े हुए निगम मंडलों का हाल ऐसा ही रहा, और वे राजनीतिक खर्च का सामान बनता रह गया। 
छत्तीसगढ़ में एक तरफ तो धान की खरीदी, और रियायती अनाज को पहुंचाने के मामले में राज्य सरकार की कामयाबी को देखकर पड़ोस के ओडिशा से सरकारी लोगों के यहां आने की खबर आज ही आई है। लेकिन बाकी कई मामलों में छत्तीसगढ़ को अपनी ही कुछ कामयाब मिसालों से सीखने की जरूरत है। मुख्यमंत्री ने जनता की शिकायतों के तेजी से असरदार निपटारे में कड़ाई बरतना शुरू किया है, लेकिन इसका असर कितना होता है यह आने वाले दिन बताएंगे, और उसकी एक मिसाल खेतों में बीज की कामयाबी भी हो सकती है, जिसके बिना किसान कर्ज से लद सकते हैं। 

हर्षवर्धन भारतीय संस्कृति का एक काल्पनिक रोड-रोलर चला रहे हैं...

27 जून 2014
संपादकीय

भारत के नए स्वास्थ्य मंत्री, भाजपा के डॉ. हर्षवर्धन ने कुछ दिनों के भीतर दूसरी बार विवाद छेड़ा है, जब उन्होंने अपने ब्लॉग पर नई शिक्षा नीति की अपनी सोच बताते हुए उसमें से स्कूलों से 'तथाकथितÓ यौन-शिक्षा को हटाने की वकालत की है। अभी दो-चार दिन ही हुए हैं जब उन्होंने कंडोम के खिलाफ यह तर्क दिया था कि इसकी वजह से लोग लापरवाह सेक्स-संबंध बनाते हैं और इसके बजाय भारतीय संस्कृति के मुताबिक संबंधों में ईमानदारी अधिक कारगर होगी। 
हिंदुस्तान जैसे विशाल, और सेक्स-बीमारियों का खतरा झेलने वाले देश में ऐसी बात सिवाय एक शुद्धतावादी, अव्यवहारिक, दकियानूसी, अवैज्ञानिक बात है, और इससे सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को बचना चाहिए। खासकर देश का स्वास्थ्य मंत्री अगर लोगों के स्वास्थ्य के बजाय देश की एक ऐसी पुरानी और काल्पनिक संस्कृति की फिक्र करने में लग जाता है, जो कि कभी रही ही नहीं, तो वह पूरे देश की सेहत के लिए बहुत खतरनाक है। हिंदुस्तान बहुत सी पत्नियों और बहुत सी पे्रमिकाओं की परंपरा वाला देश रहा है। यहां पर नगरवधुओं के नाम से वेश्याओं का पेशा सैकड़ों या हजारों बरस से चलते आ रहा है, और जब तक धरती रहेगी, तब तक चलता रहेगा। आज अगर लोगों से यह उम्मीद की जाए कि वे अपने जीवनसाथी से सेक्स, या किसी बाहरी साथी से सेक्स करते हुए कंडोम के बजाय ऐसी सुझाई गई काल्पनिक संस्कृति का इस्तेमाल करें, तो यह देश को एक भयानक खतरे की तरफ धकेलने का काम है, और डॉक्टरी पेशे से आए हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को एक झूठी और काल्पनिक संस्कृति के प्रचार से बचना चाहिए, और अपनी वैज्ञानिक जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए।
सामाजिक हकीकत, और जीवन मूल्यों को लेकर लोगों की सोच के बीच बहुत सी जगहों पर, बहुत से वक्त पर बड़ा सा फासला हो सकता है। और लोगों को याद होगा कि किस तरह कुछ बरस पहले तक ईसाईयों का सबसे बड़ा धर्मस्थान, वैटिकन, अपने धर्मगुरू पोप की सोच की शक्ल में कंडोम के इस्तेमाल का विरोधी था क्योंकि इससे जन्म की संभावना खत्म होती थी। लेकिन जब चर्च ने देखा कि अफ्रीका के देशों में सेक्स से फैलने वाली बीमारियों से अनगिनत मौतें हो रही हैं, और पूरी की पूरी आबादी के खत्म हो जाने का खतरा रहेगा, तो उसने कंडोम के बारे में अपनी नीति बदली। भारत जैसे देश में पिछले कई बरसों से सरकार ने भी कंडोम को लेकर समाज की अतिसंवेदनशीलता को कम करने का काम किया, इसकी तरफ जागरूकता बढ़ाई, और लोगों को बीमारी और अनचाहे गर्भ से बचने की राह सुझाई। विज्ञान के इस सामाजिक योगदान को पूरी तरह खारिज करते हुए, इन तमाम खतरों को सिर्फ एक सांस्कृतिक-सोच से निपटाने की डॉ. हर्षवर्धन की सोच बहुत ही अवैज्ञानिक है, और खतरनाक है। केंद्र सरकार को विज्ञान और समाज का काम एक प्रगतिशील, आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से ही करना चाहिए, देश में भारतीय संस्कृति के एक काल्पनिक इतिहास को रोड-रोलर की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 

देश की महंगाई और खुद की तंगहाली का फर्क भी समझें...

26 जून 2014
संपादकीय

महंगाई एक बार फिर खबरों में है। जिन लोगों को यह उम्मीद थी कि मोदी के आने के बाद सिर्फ अच्छे दिन ही आएंगे, उनको यह याद रखना चाहिए था कि चुनाव के वायदे रातों-रात हकीकत में तब्दील नहीं होते। दूसरी बात यह कि चाहे यूपीए की सरकार रही हो, या एनडीए की मौजूदा सरकार, महंगाई को किसी छड़ी को घुमाकर गायब नहीं किया जा सकता। तीसरी बात यह कि लोगों की जिंदगी में आज महंगाई से जो फर्क पड़ रहा है, उसे कुछ अलग-अलग पैमानों पर देखने की जरूरत भी है। खासकर इसलिए कि कई बार जहां पर लोगों को पैसों की तंगी रहती है, उस पूरी तंगी को भी महंगाई से जोड़ दिया जाता है। और न सिर्फ एक गलत तस्वीर बनती है, बल्कि एक गलतफहमी भी हो जाती है कि महंगाई की मार लोगों पर बहुत अधिक है, और उसके लिए सरकार जिम्मेदार है। 
अब हम यहां पर यूपीए या एनडीए में फर्क किए बिना ऐसी कुछ बातों को छूना चाहते हैं, जो कि लोगों को महंगाई बढऩे का अहसास कराती है। पेट्रोलियम पदार्थों का दाम बढऩा तो सीधे-सीधे महंगाई बढऩा है, और रेल टिकट-मालभाड़ा बढऩा भी महंगाई बढऩा है, लेकिन लोगों को अगर घर चलाना मुश्किल पड़ रहा है, तो उसके पीछे ऐसी महंगाई भी कुछ या अधिक हद तक जिम्मेदार तो रहती ही है, उसके पीछे लोगों की बढ़ती हुई जरूरतें भी जिम्मेदार रहती हैं। लोग अब अपने घर पर, बिजली पर, टीवी या केबल पर, मोबाइल फोन पर, दुपहियों पर, इलाज और पढ़ाई पर इस तरह का नया खर्च करने लगे हैं, जैसा खर्च एक पीढ़ी पहले शायद उनका परिवार नहीं करता था। ऐसे मामलों में कमाई तो एक सीमा तक बढ़ी है, लेकिन लोगों का जीवन स्तर उससे अधिक ऊपर जाने की चाह के साथ कई नए किस्म के खर्च जोड़ चुका है, जिससे कि तंगहाली रहती है, और वह सारी की सारी तंगहाली महंगाई नहीं रहती।
देश की अर्थव्यवस्था के सीमित साधनों को देखते हुए यह तय करना भी जरूरी रहता है कि किस तबके को कितनी रियायत देना जरूरी है, और वह रियायत किस तरह मुमकिन है। लोगों को याद होगा कि यूपीए सरकार सोनिया गांधी की अगुवाई में, या छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार गरीबों को सीधे रियायत देने की कई किस्म की योजनाओं के लिए जानी जाती हैं, और उनको लेकर इन सरकारों पर, या ऐसी और सरकारों पर यह तोहमत भी लगती रही है कि जरूरत से ज्यादा रियायत पाकर गरीब जाहिल होते चले जा रहे हैं। हम सबसे गरीब तबके की रियायतों को लेकर ऐसी तोहमत से सहमत नहीं हैं। लेकिन कुछ ऐसी रियायतें हो सकती हैं, जिनको बड़े लोगों से छीना जाना चाहिए, जैसे कि बड़ी निजी गाडिय़ों पर से डीजल की रियायत। 
महंगाई के कुछ पहलू केन्द्र और राज्य सरकारों के काबू से परे के भी हो सकते हैं, जैसे कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम का दाम बढऩा, या कि देश में आलू-प्याज की फसल कम होना, या कि मानसून कम होने से अनाज कम होना। लेकिन इससे परे के बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें राज्य सरकारों की हिस्सेदारी कुछ सामानों की महंगाई को कम करने में हो सकती है, और कई ऐसे मामले हैं जिनमें केन्द्र सरकार से आती हुई रियायत राज्यों में लुटती चली जाती है, और राज्य उसे रोक नहीं पाते, या केन्द्रीय रियायत होने की वजह से रोकने की फिक्र ही नहीं करते। इसमें  मिट्टीतेल, और रसोई गैस की रियायत शामिल है, जिनमें बड़े पैमाने पर जुर्म छत्तीसगढ़ में ही पकड़ाते आया है, यहां पर सैकड़ों करोड़ की गैस-रियायत चोरी होती है, लेकिन राज्य सरकार उसे पहाड़ तक हो जाने के पहले पकड़ नहीं पाती, और उसके बाद पुलिस और अदालती कार्रवाई के अलावा कुछ नहीं बचता। हमारा मानना है कि केन्द्र सरकार की रियायत हो या राज्य की, उसकी चोरी को डकैती मानकर उस पर समय रहते कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे डकैतों को सजा मिल जाने से भी सरकार की जेब से निकल गई रियायत तो खत्म नहीं होती। आज अगर गैस या मिट्टी तेल की रियायत का बड़ा हिस्सा चोरी में जाता है, तो कुल मिलाकर इन चीजों के दाम तो आखिर में बढ़ेंगे ही। 
जहां तक केन्द्र और राज्य सरकारों के अधिकारों और जिम्मेदारी के तहत जमाखोरी और महंगाई को रोकना मुमकिन है, वहां पर इन दोनों को जमकर काम करना चाहिए, ताकि गरीबों को राहत मिल सके। दूसरी तरफ गरीबों और दूसरे तबकों को इस बात के फर्क को समझने की जरूरत है कि अपनी तंगहाली और देश की महंगाई, ये दो अलग-अलग चीजें हैं, और लोगों को अपने स्तर पर भी एक किफायत बरतने की जरूरत है। निजी गरीबी का कोई इलाज किसी देश-प्रदेश की सरकार नहीं कर सकतीं।

देश की आधी ट्रेनें तो नक्सल इलाकों से होकर ही गुजरती हैं...

25 जून 2014
संपादकीय
बिहार में राजधानी एक्सपे्रस कल रात पटरी से उतरी, और कई डिब्बों के पलट जाने के बाद भी, नई डिजाइन के अधिक सुरक्षित डिब्बों की वजह से जिंदगियां अधिक बच पाईं। फिर भी चार लोग मारे गए, और कई घायल हो गए। अभी यह साफ नहीं है कि वहां पर नक्सलियों, या माओवादी, जो भी कहें, उन्होंने उस इलाके में बंद रखा था, और यह दुर्घटना उनकी आतंकी कार्रवाई का नतीजा है या फिर एक आम रेल दुर्घटना है। लेकिन पहला शक नक्सलियों पर जा रहा है, और इस हादसे या हमले से चार बरस पहले के एक नक्सल हमले की याद ताजा होती है जिसमें हावड़ा से छत्तीसगढ़ होकर मुंबई जाने वाली ज्ञानेश्वरी एक्सपे्रस की पटरियों को नक्सलियों ने उड़ाया था, और उसमें करीब पैंसठ मुसाफिर मारे गए थे। 
भारतीय रेल दुनिया की सबसे बड़ी रेल सेवा है, और एशिया का सबसे बड़ा उद्योग भी है। इस पर करोड़ों लोग रोज चलते हैं, और रेलवे का पूरा ढांचा किसी इमारत के बाहर, खुले में बिछा हुआ है। ऐसे में अगर कोई नुकसान पहुंचाना चाहे, तो वह बहुत आसान हो सकता है। और रेलगाड़ी पलटने से होने वाली मौतें बहुत अधिक भी हो सकती हैं। ऐसे में यह एक बहुत बड़ी फिक्र की बात है कि बिना किसी हथियारबंद मोर्चे के, बिना किसी उकसावे या भड़कावे के, बिना किसी मजबूरी के, और आत्मरक्षा की किसी नौबत के बिना अगर आतंकी समूह इस तरह का हमला करते हैं, तो ऐसे दर्जन भर समूह पूरे देश में तबाही फैला सकते हैं। हिंदुस्तान में नक्सलियों की तरह के कई और समूह हैं, और क्षेत्रीयता, जाति, धर्म, और कुछ मामलों में सिर्फ विदेशी आकाओं के कहे हुए आतंकी हमले करते हैं। ऐसे में पूरे देश की रेल लाईनों की हिफाजत मुमकिन नहीं हो सकती, और मुसाफिरों की हिफाजत के लिए  देश में अमन-चैन का माहौल जरूरी है। और बात सिर्फ रेलगाड़ी के मुसाफिरों की नहीं है, हिंदुस्तान में शहरी भीड़ के बीच भी बहुत सी जगहों पर हमले हुए हैं, और आतंकी चाहें तो और अधिक बर्बादी भी कर सकते हैं।
लेकिन सरकारें, केंद्र और राज्यों की सरकारें, अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा नहीं पा सकतीं, और दुनिया के किसी भी देश में हर आतंकी संगठन की मर्जी को मानना मुमकिन भी नहीं होता। इसलिए बातचीत से रास्ता निकलना एक तरीका है, और आतंकियों पर कार्रवाई उसके साथ-साथ ही चलनी चाहिए। टे्रन या सड़क के रास्ते सफर करते लोग, शहरों में रोजमर्रा की जिंदगी जीते लोग, इन सब पर अगर आतंकी हमले कभी-कभी और कहीं-कहीं भी होते हैं, तो उससे भी सरकार और लोकतंत्र पर से लोगों का भरोसा उठता है। और ऐसे अविश्वास के माहौल में देश की जनता आशंकाओं में जीती है। ऐसी नौबत में सरकार को भी अपना काम करना ही चाहिए, आतंकी संगठनों के जो गैरहिंसक दोस्त हैं, उन सबको भी हथियारबंद आतंकियों को समझाना चाहिए कि किसी हथियारबंद मोर्चे के बिना आम लोगों पर होने वाले ऐसे हमलों से आतंकियों के मुद्दे भी बदनाम होते हैं, जो कि कभी-कभी अपने-आपमें सही भी होते हैं। हिंदुस्तान में अगर नक्सल असर वाले इलाकों को देखें, तो शायद आधी रेलगाडिय़ां इन इलाकों से होकर गुजरती हैं। ऐसे हमले अगर होते हैं, और उनके बढऩे का खतरा भी है, तो फिर ऐसे आतंकी संगठनों पर सरकार अगर जरूरत से अधिक कड़ी कार्रवाई करेगी तो भी जनता उसे अधिक कड़ी नहीं मानेगी। जो हम लिख रहे हैं वह इस खतरे का किसी तरह का इलाज नहीं है, लेकिन यह खतरा और अधिक बड़ा हो सकता है, यह मानकर इसका इलाज ढूंढना जरूरी है।

वर्दीधारी कातिलों को सजा से सबक लेने की जरूरत

24 जून 2014
संपादकीय
उत्तराखंड में एक फर्जी मुठभेड़ में बेकसूर को मार डालने के जुर्म में  अभी कुछ हफ्ते पहले वहां के डेढ़ दर्जन से अधिक पुलिसवालों को उम्रकैद सुनाई गई है। और आज पटना में कई पुलिसवालों को उम्रकैद दी गई है, एक को फांसी भी सुनाई गई है जिन्होंने शहर के भीतर तीन छात्रों को डकैत बताते हुए फर्जी मुठभेड़ में मार डाला था। देश भर में बहुत से राज्यों में मुठभेड़ हत्याएं होती हैं, और नक्सल प्रभावित बस्तर जैसे कई इलाकों में बरसों से ऐसी शिकायतों पर अदालती सुनवाई चल रही है। ऐसे कोई मामले निचली अदालत में भी दस-दस बरस से अधिक तक चलते दिखते हैं, और सजा पाए हुए लोग ऊपर की अदालतों में जाकर रिहाई या रियायत पाने के लिए आजाद भी रहते हैं। ऐसे में देश में वर्दीधारी पुलिस या सुरक्षा बल की हिंसा फिक्र की हद तक बढ़ी हुई हैं। ऊपर जिन दो मामलों का हमने जिक्र किया है वे तो बिना किसी तनाव और खतरे वाले आम इलाकों के थे। उत्तराखंड और पटना में तो बस्तर या कश्मीर, उत्तरपूर्वी राज्य या गढ़चिरौली जैसा तनाव भी नहीं रहता जहां पर कि सुरक्षा बलों को रात-दिन बमों के धमाकों के खतरे तले सिर पर टंगी हुई मौत के साथ जीना पड़ता है। इसलिए जहां पर पुलिस जान पर खतरे के बिना काम करती है, वहां पर उसकी हिंसा अधिक फिक्र की बात है। 
मानवाधिकार संगठनों, और मानवाधिकार आयोगों की बात सुनें, तो मुठभेड़ हत्याओं से नीचे के दर्जे की हिंसा पूरे हिंदुस्तान में थानों में खूब बिखरी हुई है। अब तक तो उत्तरप्रदेश के थाने बलात्कार के लिए कुख्यात बने हुए हैं ही, अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के एक थाने पर भी एक महिला ने यौन-शोषण के आरोपियों के साथ उसे जबर्दस्ती भेज देने, और उसके ही परिवार के लोगों को बंद कर देने का आरोप लगाया है। यह तो जांच से सामने आएगा कि हकीकत क्या है, लेकिन जहां पर मुठभेड़ हत्याएं नहीं होती हैं, उन इलाकों में भी पुलिस की मनमानी और गुंडागर्दी कम नहीं रहती है। एक बड़ी दिक्कत यह रहती है कि मानवाधिकार आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को तेजी से जितनी असरदार कार्रवाई ऐसे मामलों में करनी चाहिए, वैसी कोई बात इसलिए सामने नहीं आ पाती क्योंकि इन आयोगों में मनोनीत करने वाली पार्टी की सरकार ही पुलिस ज्यादती में बदनाम हो जाएगी। इसलिए पुलिस भी बेफिक्र होकर कभी सत्ता की मर्जी से, तो कभी अपनी मर्जी से मनमानी करती हैं, और राज्य के संवैधानिक आयोग अपने एयरकंडीशंड कमरों या कारों में आंखें बंद किए बैठे रहते हैं।
पुलिस ज्यादती के सबसे अधिक शिकार, सबसे गरीब तबके, सबसे कमजोर जातियां, अल्पसंख्यक, और बेजुबान तबके होते हैं। देश में आज गैरसरकारी संगठनों के खिलाफ एक भारी अविश्वास का माहौल खड़ा किया गया है, जिसका कुछ हिस्सा सच भी हो सकता है, लेकिन ऐसे संगठनों और सामाजिक आंदोलन की जुबान अगर बंद करवाई जाएगी तो उससे पूरे देश में सरकारी ज्यादती और जुल्म बढऩे लगेंगे। आज जरूरत इस बात की है कि 21वीं सदी की सभ्यता और दुनिया को समझते हुए भारत की सरकार और खासकर राज्यों की सरकारें अपनी जिम्मेदारी समझें, और पुलिस को यह समझाईश दें कि आजकल का जमाना वीडियो सुबूतों का है, और वर्दी का जुर्म किसी तरह बच नहीं पाएगा। खुद वर्दीधारियों को अपने पर खतरे को समझना चाहिए, और अपने मिजाज, अपनी मनमानी पर काबू रखना चाहिए।