हिंसक मर्दानगी वाली सोच और बयान खारिज करने की जरूरत

2 जुलाई 2014
संपादकीय
महिलाओं और विपक्षियों के खिलाफ हिंसक बयान को लेकर कल ही इस जगह हमने बंगाल के तृणमूल कांग्रेस सांसद के खिलाफ लंबा सा लिखा है, लेकिन लोगों की हिंसा खत्म होते नहीं दिख रही है। बंगाल से ही इसी पार्टी के हिंसक बयानों के दो नए नमूने सामने आए हैं, और महाराष्ट्र में शिवसेना के एक विधायक ने अपने इलाके की एक अधेड़ महिला को कपड़े उतारकर पीटने की धमकी दी है। इसी महाराष्ट्र से लगे हुए भारत के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केन्द्रों में से एक गोवा में वहां का एक मंत्री पिछले दो दिनों से लगातार महिलाओं के कपड़ों को लेकर भड़काने वाले हिंसक बयान दे रहा है, और तंग या छोटे कपड़े पहनने वाली महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक बातें करते हुए कुछ ऐसा जाहिर कर रहा है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के लिए उनके अपने कपड़े जिम्मेदार है। 
दरअसल देश एक दकियानूसी सैलाब से गुजर रहा है। देश भर में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने जो अभूतपूर्व और ऐतिहासिक जीत हासिल की है, उसे बहुत से लोग एक आक्रामक हिन्दुत्व को मिला जनमत मान बैठे हैं, तो कुछ दूसरे लोग अब देश भर में भारतीय संस्कृति का एक काल्पनिक रूप लागू करने पर उतारू हो गए हैं। गोवा के जिस भाजपाई मंत्री ने महिलाओं के कपड़ों को लेकर पहले दिन बयान दिया, और अगले दिन उस पर टिके रहने की बात कही, उसे शायद यह याद नहीं है कि गुजरात में हिन्दू धर्म के सबसे बड़े त्योहार नवरात्रि के मौके पर खूबसूरत लड़कियों की अनगिनत ऐसी तस्वीरें बाहर आती हैं, जिनमें वे अपने बदन पर तरह-तरह की रंगीन साज-सज्जा करवाकर वहां के पारंपरिक-धार्मिक गरबा नृत्य में शामिल होती हैं। उनका फैशन भी देखते ही बनता है, और रात-रात भर चलने वाले इस सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान नौजवान पीढ़ी के बीच अंतरंग संबंधों की कहानियां हर बरस वहां से निकलकर बाहर आती हैं। इनमें से किसी भी युवती के साथ बलात्कार के मामले इन 9 दिनों में सामने आए हों, ऐसा याद नहीं पड़ता। वहां पर हिन्दू धर्म, भारतीय संस्कृति, नौजवान पीढ़ी का उत्साह, और फैशन की सीमा में देह प्रदर्शन, ये सब कुछ साथ-साथ चलते हैं, और सहअस्तित्व की गुंजाइश भी बताते हैं। 
आज भारत में कुछ नेता और कुछ दूसरे कट्टरपंथी लोग लगातार यह माहौल बनाने में लगे हैं कि बलात्कार और सेक्स हिंसा या अपराध के पीछे महिलाओं के कम कपड़े जिम्मेदार हैं। ऐसे बदनीयत लोगों से यह सवाल किया जाना चाहिए कि जिस समाज में मर्द दो-तीन बरस की बच्चियों तक से बलात्कार करते हैं, और साठ बरस की बूढ़ी महिला से भी, तो वहां पर उनके कपड़े क्या मायने रखते हैं? और जिन लड़कियों या महिलाओं से बलात्कार होता है, उनमें से अधिकतर तो फैशन से दूर की, आम लड़कियां-महिलाएं होती हैं, गरीब होती हैं, दलित या आदिवासी होती हैं, उनके लिए कोई फैशन मुमकिन भी नहीं होता। आज तृणमूल कांग्रेस या भाजपा जैसी पार्टियों को अपने घर बैठकर यह सोचना चाहिए कि उसके नेता अगर इसी तरह की हिंसक बातें करेंगे, तो आने वाले वक्त की नौजवान वोटर पीढ़ी ऐसी पार्टियों को खारिज ही कर देंगी। और बात सिर्फ नौजवान पीढ़ी की नहीं है, जब कोई मंत्री श्रीराम सेना जैसे हमलावर संगठन के नेता के तौर-तरीकों का समर्थन करता है, तो उस मंत्री की पार्टी को इसके बारे में सोचना चाहिए कि वह देश को किस तरफ ले जाना चाहती है। 
आज हिन्दुस्तान में बहस का मुद्दा मर्दानगी की हिंसा साबित करने के लिए किए जाने वाले सेक्स अपराधों से हटाकर महिलाओं के कपड़ों, उनके अकेले कहीं आने-जाने की तरफ मोड़ दिया जा रहा है। सरकार से लेकर राजनीति तक, और मीडिया से लेकर समाज के दूसरे तबकों तक एक मर्द-सोच जिस तरह हावी है, वह ममता बैनर्जी जैसी महिला नेताओं के सिर पर भी चढ़ी हुई है। लोगों को ऐसी सोच के खिलाफ जमकर लिखना चाहिए, जमकर बोलना चाहिए, और चुनावों में ऐसी पार्टियों को खारिज भी करना चाहिए। जब तक जनता मुंह नहीं खोलेगी, तब तक राजनीतिक दल नहीं सम्हलेंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें