27 जून 2014
संपादकीय
भारत के नए स्वास्थ्य मंत्री, भाजपा के डॉ. हर्षवर्धन ने कुछ दिनों के भीतर दूसरी बार विवाद छेड़ा है, जब उन्होंने अपने ब्लॉग पर नई शिक्षा नीति की अपनी सोच बताते हुए उसमें से स्कूलों से 'तथाकथितÓ यौन-शिक्षा को हटाने की वकालत की है। अभी दो-चार दिन ही हुए हैं जब उन्होंने कंडोम के खिलाफ यह तर्क दिया था कि इसकी वजह से लोग लापरवाह सेक्स-संबंध बनाते हैं और इसके बजाय भारतीय संस्कृति के मुताबिक संबंधों में ईमानदारी अधिक कारगर होगी।
हिंदुस्तान जैसे विशाल, और सेक्स-बीमारियों का खतरा झेलने वाले देश में ऐसी बात सिवाय एक शुद्धतावादी, अव्यवहारिक, दकियानूसी, अवैज्ञानिक बात है, और इससे सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को बचना चाहिए। खासकर देश का स्वास्थ्य मंत्री अगर लोगों के स्वास्थ्य के बजाय देश की एक ऐसी पुरानी और काल्पनिक संस्कृति की फिक्र करने में लग जाता है, जो कि कभी रही ही नहीं, तो वह पूरे देश की सेहत के लिए बहुत खतरनाक है। हिंदुस्तान बहुत सी पत्नियों और बहुत सी पे्रमिकाओं की परंपरा वाला देश रहा है। यहां पर नगरवधुओं के नाम से वेश्याओं का पेशा सैकड़ों या हजारों बरस से चलते आ रहा है, और जब तक धरती रहेगी, तब तक चलता रहेगा। आज अगर लोगों से यह उम्मीद की जाए कि वे अपने जीवनसाथी से सेक्स, या किसी बाहरी साथी से सेक्स करते हुए कंडोम के बजाय ऐसी सुझाई गई काल्पनिक संस्कृति का इस्तेमाल करें, तो यह देश को एक भयानक खतरे की तरफ धकेलने का काम है, और डॉक्टरी पेशे से आए हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को एक झूठी और काल्पनिक संस्कृति के प्रचार से बचना चाहिए, और अपनी वैज्ञानिक जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए।
सामाजिक हकीकत, और जीवन मूल्यों को लेकर लोगों की सोच के बीच बहुत सी जगहों पर, बहुत से वक्त पर बड़ा सा फासला हो सकता है। और लोगों को याद होगा कि किस तरह कुछ बरस पहले तक ईसाईयों का सबसे बड़ा धर्मस्थान, वैटिकन, अपने धर्मगुरू पोप की सोच की शक्ल में कंडोम के इस्तेमाल का विरोधी था क्योंकि इससे जन्म की संभावना खत्म होती थी। लेकिन जब चर्च ने देखा कि अफ्रीका के देशों में सेक्स से फैलने वाली बीमारियों से अनगिनत मौतें हो रही हैं, और पूरी की पूरी आबादी के खत्म हो जाने का खतरा रहेगा, तो उसने कंडोम के बारे में अपनी नीति बदली। भारत जैसे देश में पिछले कई बरसों से सरकार ने भी कंडोम को लेकर समाज की अतिसंवेदनशीलता को कम करने का काम किया, इसकी तरफ जागरूकता बढ़ाई, और लोगों को बीमारी और अनचाहे गर्भ से बचने की राह सुझाई। विज्ञान के इस सामाजिक योगदान को पूरी तरह खारिज करते हुए, इन तमाम खतरों को सिर्फ एक सांस्कृतिक-सोच से निपटाने की डॉ. हर्षवर्धन की सोच बहुत ही अवैज्ञानिक है, और खतरनाक है। केंद्र सरकार को विज्ञान और समाज का काम एक प्रगतिशील, आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से ही करना चाहिए, देश में भारतीय संस्कृति के एक काल्पनिक इतिहास को रोड-रोलर की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

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