24 जून 2014
संपादकीय
उत्तराखंड में एक फर्जी मुठभेड़ में बेकसूर को मार डालने के जुर्म में अभी कुछ हफ्ते पहले वहां के डेढ़ दर्जन से अधिक पुलिसवालों को उम्रकैद सुनाई गई है। और आज पटना में कई पुलिसवालों को उम्रकैद दी गई है, एक को फांसी भी सुनाई गई है जिन्होंने शहर के भीतर तीन छात्रों को डकैत बताते हुए फर्जी मुठभेड़ में मार डाला था। देश भर में बहुत से राज्यों में मुठभेड़ हत्याएं होती हैं, और नक्सल प्रभावित बस्तर जैसे कई इलाकों में बरसों से ऐसी शिकायतों पर अदालती सुनवाई चल रही है। ऐसे कोई मामले निचली अदालत में भी दस-दस बरस से अधिक तक चलते दिखते हैं, और सजा पाए हुए लोग ऊपर की अदालतों में जाकर रिहाई या रियायत पाने के लिए आजाद भी रहते हैं। ऐसे में देश में वर्दीधारी पुलिस या सुरक्षा बल की हिंसा फिक्र की हद तक बढ़ी हुई हैं। ऊपर जिन दो मामलों का हमने जिक्र किया है वे तो बिना किसी तनाव और खतरे वाले आम इलाकों के थे। उत्तराखंड और पटना में तो बस्तर या कश्मीर, उत्तरपूर्वी राज्य या गढ़चिरौली जैसा तनाव भी नहीं रहता जहां पर कि सुरक्षा बलों को रात-दिन बमों के धमाकों के खतरे तले सिर पर टंगी हुई मौत के साथ जीना पड़ता है। इसलिए जहां पर पुलिस जान पर खतरे के बिना काम करती है, वहां पर उसकी हिंसा अधिक फिक्र की बात है।
मानवाधिकार संगठनों, और मानवाधिकार आयोगों की बात सुनें, तो मुठभेड़ हत्याओं से नीचे के दर्जे की हिंसा पूरे हिंदुस्तान में थानों में खूब बिखरी हुई है। अब तक तो उत्तरप्रदेश के थाने बलात्कार के लिए कुख्यात बने हुए हैं ही, अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के एक थाने पर भी एक महिला ने यौन-शोषण के आरोपियों के साथ उसे जबर्दस्ती भेज देने, और उसके ही परिवार के लोगों को बंद कर देने का आरोप लगाया है। यह तो जांच से सामने आएगा कि हकीकत क्या है, लेकिन जहां पर मुठभेड़ हत्याएं नहीं होती हैं, उन इलाकों में भी पुलिस की मनमानी और गुंडागर्दी कम नहीं रहती है। एक बड़ी दिक्कत यह रहती है कि मानवाधिकार आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को तेजी से जितनी असरदार कार्रवाई ऐसे मामलों में करनी चाहिए, वैसी कोई बात इसलिए सामने नहीं आ पाती क्योंकि इन आयोगों में मनोनीत करने वाली पार्टी की सरकार ही पुलिस ज्यादती में बदनाम हो जाएगी। इसलिए पुलिस भी बेफिक्र होकर कभी सत्ता की मर्जी से, तो कभी अपनी मर्जी से मनमानी करती हैं, और राज्य के संवैधानिक आयोग अपने एयरकंडीशंड कमरों या कारों में आंखें बंद किए बैठे रहते हैं।
पुलिस ज्यादती के सबसे अधिक शिकार, सबसे गरीब तबके, सबसे कमजोर जातियां, अल्पसंख्यक, और बेजुबान तबके होते हैं। देश में आज गैरसरकारी संगठनों के खिलाफ एक भारी अविश्वास का माहौल खड़ा किया गया है, जिसका कुछ हिस्सा सच भी हो सकता है, लेकिन ऐसे संगठनों और सामाजिक आंदोलन की जुबान अगर बंद करवाई जाएगी तो उससे पूरे देश में सरकारी ज्यादती और जुल्म बढऩे लगेंगे। आज जरूरत इस बात की है कि 21वीं सदी की सभ्यता और दुनिया को समझते हुए भारत की सरकार और खासकर राज्यों की सरकारें अपनी जिम्मेदारी समझें, और पुलिस को यह समझाईश दें कि आजकल का जमाना वीडियो सुबूतों का है, और वर्दी का जुर्म किसी तरह बच नहीं पाएगा। खुद वर्दीधारियों को अपने पर खतरे को समझना चाहिए, और अपने मिजाज, अपनी मनमानी पर काबू रखना चाहिए।

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