25 जून 2014
संपादकीय
बिहार में राजधानी एक्सपे्रस कल रात पटरी से उतरी, और कई डिब्बों के पलट जाने के बाद भी, नई डिजाइन के अधिक सुरक्षित डिब्बों की वजह से जिंदगियां अधिक बच पाईं। फिर भी चार लोग मारे गए, और कई घायल हो गए। अभी यह साफ नहीं है कि वहां पर नक्सलियों, या माओवादी, जो भी कहें, उन्होंने उस इलाके में बंद रखा था, और यह दुर्घटना उनकी आतंकी कार्रवाई का नतीजा है या फिर एक आम रेल दुर्घटना है। लेकिन पहला शक नक्सलियों पर जा रहा है, और इस हादसे या हमले से चार बरस पहले के एक नक्सल हमले की याद ताजा होती है जिसमें हावड़ा से छत्तीसगढ़ होकर मुंबई जाने वाली ज्ञानेश्वरी एक्सपे्रस की पटरियों को नक्सलियों ने उड़ाया था, और उसमें करीब पैंसठ मुसाफिर मारे गए थे।
भारतीय रेल दुनिया की सबसे बड़ी रेल सेवा है, और एशिया का सबसे बड़ा उद्योग भी है। इस पर करोड़ों लोग रोज चलते हैं, और रेलवे का पूरा ढांचा किसी इमारत के बाहर, खुले में बिछा हुआ है। ऐसे में अगर कोई नुकसान पहुंचाना चाहे, तो वह बहुत आसान हो सकता है। और रेलगाड़ी पलटने से होने वाली मौतें बहुत अधिक भी हो सकती हैं। ऐसे में यह एक बहुत बड़ी फिक्र की बात है कि बिना किसी हथियारबंद मोर्चे के, बिना किसी उकसावे या भड़कावे के, बिना किसी मजबूरी के, और आत्मरक्षा की किसी नौबत के बिना अगर आतंकी समूह इस तरह का हमला करते हैं, तो ऐसे दर्जन भर समूह पूरे देश में तबाही फैला सकते हैं। हिंदुस्तान में नक्सलियों की तरह के कई और समूह हैं, और क्षेत्रीयता, जाति, धर्म, और कुछ मामलों में सिर्फ विदेशी आकाओं के कहे हुए आतंकी हमले करते हैं। ऐसे में पूरे देश की रेल लाईनों की हिफाजत मुमकिन नहीं हो सकती, और मुसाफिरों की हिफाजत के लिए देश में अमन-चैन का माहौल जरूरी है। और बात सिर्फ रेलगाड़ी के मुसाफिरों की नहीं है, हिंदुस्तान में शहरी भीड़ के बीच भी बहुत सी जगहों पर हमले हुए हैं, और आतंकी चाहें तो और अधिक बर्बादी भी कर सकते हैं।
लेकिन सरकारें, केंद्र और राज्यों की सरकारें, अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा नहीं पा सकतीं, और दुनिया के किसी भी देश में हर आतंकी संगठन की मर्जी को मानना मुमकिन भी नहीं होता। इसलिए बातचीत से रास्ता निकलना एक तरीका है, और आतंकियों पर कार्रवाई उसके साथ-साथ ही चलनी चाहिए। टे्रन या सड़क के रास्ते सफर करते लोग, शहरों में रोजमर्रा की जिंदगी जीते लोग, इन सब पर अगर आतंकी हमले कभी-कभी और कहीं-कहीं भी होते हैं, तो उससे भी सरकार और लोकतंत्र पर से लोगों का भरोसा उठता है। और ऐसे अविश्वास के माहौल में देश की जनता आशंकाओं में जीती है। ऐसी नौबत में सरकार को भी अपना काम करना ही चाहिए, आतंकी संगठनों के जो गैरहिंसक दोस्त हैं, उन सबको भी हथियारबंद आतंकियों को समझाना चाहिए कि किसी हथियारबंद मोर्चे के बिना आम लोगों पर होने वाले ऐसे हमलों से आतंकियों के मुद्दे भी बदनाम होते हैं, जो कि कभी-कभी अपने-आपमें सही भी होते हैं। हिंदुस्तान में अगर नक्सल असर वाले इलाकों को देखें, तो शायद आधी रेलगाडिय़ां इन इलाकों से होकर गुजरती हैं। ऐसे हमले अगर होते हैं, और उनके बढऩे का खतरा भी है, तो फिर ऐसे आतंकी संगठनों पर सरकार अगर जरूरत से अधिक कड़ी कार्रवाई करेगी तो भी जनता उसे अधिक कड़ी नहीं मानेगी। जो हम लिख रहे हैं वह इस खतरे का किसी तरह का इलाज नहीं है, लेकिन यह खतरा और अधिक बड़ा हो सकता है, यह मानकर इसका इलाज ढूंढना जरूरी है।

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