26 जून 2014
संपादकीय
महंगाई एक बार फिर खबरों में है। जिन लोगों को यह उम्मीद थी कि मोदी के आने के बाद सिर्फ अच्छे दिन ही आएंगे, उनको यह याद रखना चाहिए था कि चुनाव के वायदे रातों-रात हकीकत में तब्दील नहीं होते। दूसरी बात यह कि चाहे यूपीए की सरकार रही हो, या एनडीए की मौजूदा सरकार, महंगाई को किसी छड़ी को घुमाकर गायब नहीं किया जा सकता। तीसरी बात यह कि लोगों की जिंदगी में आज महंगाई से जो फर्क पड़ रहा है, उसे कुछ अलग-अलग पैमानों पर देखने की जरूरत भी है। खासकर इसलिए कि कई बार जहां पर लोगों को पैसों की तंगी रहती है, उस पूरी तंगी को भी महंगाई से जोड़ दिया जाता है। और न सिर्फ एक गलत तस्वीर बनती है, बल्कि एक गलतफहमी भी हो जाती है कि महंगाई की मार लोगों पर बहुत अधिक है, और उसके लिए सरकार जिम्मेदार है।
अब हम यहां पर यूपीए या एनडीए में फर्क किए बिना ऐसी कुछ बातों को छूना चाहते हैं, जो कि लोगों को महंगाई बढऩे का अहसास कराती है। पेट्रोलियम पदार्थों का दाम बढऩा तो सीधे-सीधे महंगाई बढऩा है, और रेल टिकट-मालभाड़ा बढऩा भी महंगाई बढऩा है, लेकिन लोगों को अगर घर चलाना मुश्किल पड़ रहा है, तो उसके पीछे ऐसी महंगाई भी कुछ या अधिक हद तक जिम्मेदार तो रहती ही है, उसके पीछे लोगों की बढ़ती हुई जरूरतें भी जिम्मेदार रहती हैं। लोग अब अपने घर पर, बिजली पर, टीवी या केबल पर, मोबाइल फोन पर, दुपहियों पर, इलाज और पढ़ाई पर इस तरह का नया खर्च करने लगे हैं, जैसा खर्च एक पीढ़ी पहले शायद उनका परिवार नहीं करता था। ऐसे मामलों में कमाई तो एक सीमा तक बढ़ी है, लेकिन लोगों का जीवन स्तर उससे अधिक ऊपर जाने की चाह के साथ कई नए किस्म के खर्च जोड़ चुका है, जिससे कि तंगहाली रहती है, और वह सारी की सारी तंगहाली महंगाई नहीं रहती।
देश की अर्थव्यवस्था के सीमित साधनों को देखते हुए यह तय करना भी जरूरी रहता है कि किस तबके को कितनी रियायत देना जरूरी है, और वह रियायत किस तरह मुमकिन है। लोगों को याद होगा कि यूपीए सरकार सोनिया गांधी की अगुवाई में, या छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार गरीबों को सीधे रियायत देने की कई किस्म की योजनाओं के लिए जानी जाती हैं, और उनको लेकर इन सरकारों पर, या ऐसी और सरकारों पर यह तोहमत भी लगती रही है कि जरूरत से ज्यादा रियायत पाकर गरीब जाहिल होते चले जा रहे हैं। हम सबसे गरीब तबके की रियायतों को लेकर ऐसी तोहमत से सहमत नहीं हैं। लेकिन कुछ ऐसी रियायतें हो सकती हैं, जिनको बड़े लोगों से छीना जाना चाहिए, जैसे कि बड़ी निजी गाडिय़ों पर से डीजल की रियायत।
महंगाई के कुछ पहलू केन्द्र और राज्य सरकारों के काबू से परे के भी हो सकते हैं, जैसे कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम का दाम बढऩा, या कि देश में आलू-प्याज की फसल कम होना, या कि मानसून कम होने से अनाज कम होना। लेकिन इससे परे के बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें राज्य सरकारों की हिस्सेदारी कुछ सामानों की महंगाई को कम करने में हो सकती है, और कई ऐसे मामले हैं जिनमें केन्द्र सरकार से आती हुई रियायत राज्यों में लुटती चली जाती है, और राज्य उसे रोक नहीं पाते, या केन्द्रीय रियायत होने की वजह से रोकने की फिक्र ही नहीं करते। इसमें मिट्टीतेल, और रसोई गैस की रियायत शामिल है, जिनमें बड़े पैमाने पर जुर्म छत्तीसगढ़ में ही पकड़ाते आया है, यहां पर सैकड़ों करोड़ की गैस-रियायत चोरी होती है, लेकिन राज्य सरकार उसे पहाड़ तक हो जाने के पहले पकड़ नहीं पाती, और उसके बाद पुलिस और अदालती कार्रवाई के अलावा कुछ नहीं बचता। हमारा मानना है कि केन्द्र सरकार की रियायत हो या राज्य की, उसकी चोरी को डकैती मानकर उस पर समय रहते कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे डकैतों को सजा मिल जाने से भी सरकार की जेब से निकल गई रियायत तो खत्म नहीं होती। आज अगर गैस या मिट्टी तेल की रियायत का बड़ा हिस्सा चोरी में जाता है, तो कुल मिलाकर इन चीजों के दाम तो आखिर में बढ़ेंगे ही।
जहां तक केन्द्र और राज्य सरकारों के अधिकारों और जिम्मेदारी के तहत जमाखोरी और महंगाई को रोकना मुमकिन है, वहां पर इन दोनों को जमकर काम करना चाहिए, ताकि गरीबों को राहत मिल सके। दूसरी तरफ गरीबों और दूसरे तबकों को इस बात के फर्क को समझने की जरूरत है कि अपनी तंगहाली और देश की महंगाई, ये दो अलग-अलग चीजें हैं, और लोगों को अपने स्तर पर भी एक किफायत बरतने की जरूरत है। निजी गरीबी का कोई इलाज किसी देश-प्रदेश की सरकार नहीं कर सकतीं।

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