बच्चों के देह शोषण पर यह देश तो चर्चा तक नहीं करता

21 जुलाई 2014
संपादकीय

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में छह बरस की एक बच्ची के साथ स्कूल में बलात्कार के बाद वहीं का एक खेल प्रशिक्षक-शिक्षक पकड़ाया है, जिसके लैपटॉप पर बच्चों से बलात्कार के बहुत से वीडियो निकले हैं। बड़े शहरों में होने वाले जुर्म पर चर्चा जल्दी शुरू होती है लेकिन हम हमेशा से बच्चों के देह शोषण के खतरे के बारे में लिखते आ रहे हैं। हम इस बारे में जितनी बार लिखते हैं, और लोगों को जितना सावधान करते हैं, उसको लेकर कुछ लोगों को यह भी लगता है कि इस मुद्दे पर इतनी चर्चा की क्या जरूरत है। लेकिन हमारा यह मानना है कि इस पर चर्चा की अधिक जरूरत इसलिए भी है कि ऐसे शोषण के शिकार बच्चों की खुद की जुबान की आवाज सुनने वाले लोग नहीं रहते। स्कूल में या मैदान में कोई शिक्षक-प्रशिक्षक ऐसा करे, तो उसकी शिकायत स्कूल नहीं सुनता, घर या पड़ोस में कोई ऐसा करें, तो उस बात को परिवार अनसुना कर देता है, और जब कभी बच्चे की कोई शिकायत भरोसेमंद भी लगे, तो उसे बात को न बढ़ाने की बात कहते हुए, उसे रफा-दफा करने की कोशिश होती है। नतीजा यह होता है कि बच्चों के यौन शोषण के मुजरिम अमूमन हर मामले में बच निकलते हैं, और वे आखिर तक दूसरे बच्चों के लिए खतरा बने रहते हैं।
दूसरी बात यह भी है कि हिन्दुस्तान में बलात्कार की वजहों को लेकर सत्ता पर बैठे हुए बेवकूफ और बदमिजाज लोग जिस तरह की बातें करते हैं, उनको लेकर सेक्स-अपराध पर बहस एक गलत तरफ मुड़ जाती है। कोई महिलाओं के कपड़ों को बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहरा देता है, कोई उनके देर रात तक बाहर रहने को, और कोई उनके शराब पीने को। अब बात कुछ आगे तक बढ़ गई है, और लोग मांसाहार को और मोबाइल फोन को भी बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहराने लगे हैं। इस बहस के बीच यह बात धरी रह जाती है कि जब चार-छह बरस की बच्चियों से बलात्कार होता है, तो न तो वे कम कपड़े पहनी रहतीं, न वे शराब पीती रहतीं, न वे देर रात तक घर के बाहर रहतीं, और न वे मोबाइल फोन की वजह से बलात्कार का शिकार होती हैं। दरअसल हिन्दुस्तानी सोच का पूरा ढांचा महिला के खिलाफ है, और वह अपने लड़कों के बारे में खुलकर यह कहता है कि लड़कों से तो गलतियां हो ही जाती हैं, लड़कियों को ही सावधान रहना चाहिए। मतलब यह कि लड़कों का हिंसक जुर्म माफी के लायक है, और लड़कियों का अपनी तरह से रहना माफी के लायक नहीं है। यह वही देश है जो कि अजन्मी लड़कियों को मारने के मामले में दुनिया में सबसे आगे है, और शायद दुनिया में ऐसी कोई दूसरी मिसाल भी नहीं है। जिन मुस्लिम देशों को भी अनपढ़ और जाहिल, कट्टर और धर्मान्ध, पिछड़ा और आतंकी करार दिया जाता है, वहां भी अजन्मी बच्चियों को मारने की कोई सामाजिक प्रथा नहीं है।
हम फिर बच्चों के यौन शोषण की बात पर लौटें, तो भारत में कानून से परे जमीन पर कुछ बातों को करने की बहुत जरूरत है। एक तो यह कि स्कूल और कॉलेज में कोई भी कमरे ऐसे नहीं होने चाहिए जिनमें कि बाहर से भीतर देखा न जा सके। इसके अलावा बच्चों को सेक्स हिंसा के खतरों के बारे में स्कूल के परामर्शदाता उन बच्चों के मां-बाप की मौजूदगी में उन्हें बताएं, ताकि बच्चे भी सावधान रह सकें, और स्कूल से परे भी उनके मां-बाप बच्चों के लिए ऐसे खतरों से वाकिफ रह सकें। अभी तक हम उन बच्चों की बात कर रहे हैं जिनको स्कूल नसीब है, और मां-बाप नसीब हैं, एक घर नसीब है। लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसे करोड़ों बच्चे हैं जिनके लिए महज फुटपाथ और रेलवे प्लेटफार्म हैं। ऐसे बच्चे सेक्स हिंसा और देह शोषण को बहुत बुरी तरह झेलते हैं, और उनको बचाने वाला भी कोई नहीं होता। हमने ही पहले कई बार यह लिखा है कि इस देश में दसियों लाख बच्चे ऐसे हैं जिनको ठंड में एक कम्बल में सोने की जगह देकर लोग उनका देह शोषण कर लेते हैं। यह सिलसिला इस देश को एक ऐसी जख्मी और तकलीफजदा पीढ़ी दे रहा है, जो कि किसी भी सेहतमंद देश के लिए बहुत खतरनाक है। लेकिन हमने छत्तीसगढ़ में पिछली आधी सदी में बच्चों के देह शोषण के खतरों पर चर्चा के लिए एक बैठक भी होते आज तक देखी नहीं है। ऐसे में इस देश-प्रदेश में कोई जागरूकता आ भी कैसे सकती है? 

दान की नीयत तो अच्छी है, सुपात्र की शिनाख्त भी जरूरी

20 जुलाई 2014
संपादकीय

शहर की एक तस्वीर देखने मिली जिसमें आज सुबह की एक समाज के लोग गरीब बच्चों को कॉपी-किताब बांटते दिखे। कतार में दर्जनों बच्चे लगे थे, और सभी ने ठीक-ठाक कपड़े पहन रखे थे। वे संपन्न परिवारों के चाहे न हों, वे कम से कम खाते-पीते घरों के तो थे ही, क्योंकि पैरों में चप्पलें भी थीं, कुछ पैरों में पायजेब भी थे, और शायद ही किसी के कपड़े खराब थे।
शहरों में दानदाताओं का उत्साह कई मौकों पर सामने आता है। जब किसी जाति या धर्म का त्यौहार आता है, तो उसके लोग सड़क किनारे कहीं भंडारा खोल लेते हैं, कहीं शरबत बांटते हैं, और कहीं किसी और शक्ल में प्रसाद बांटते हैं। ऐसी जगहों पर रास्ता जाम हो जाने की हद तक भीड़ लग जाती है, रिक्शे-ठेले से लेकर आटो रिक्शा और मोटरसाइकिलों तक को खड़ा करके लोग खाने-पीने में जुट जाते हैं। दानदाताओं को यह तसल्ली रहती है कि उन्होंने धर्म का काम किया है, और गरीबों का पेट भी भरा है। 
दरअसल शहरी गरीब शायद ही भूखे रहते हैं। उनका पेट भी भरा होता है, और उनके पास आमतौर पर काम भी होता है। भंडारों में कतार में लगे हुए लोगों से परे भिखारी, बीमार, बूढ़े, और विचलित लोग अलग होते हैं, जिनको खाने की जरूरत होती है। लेकिन प्रसाद और दान की दूसरी शक्लों में पेट भरने के सामान पाने वाले तकरीबन सारे लोग बहती गंगा में हाथ धोने के अंदाज में अपनी आस्था भी पूरी कर लेते हैं, और पेट भी भर लेते हैं। 
हम इस पूरे सिलसिले में गलती किसी की नहीं मानते, लेकिन दान के बेहतर इस्तेमाल की संभावना जरूर देखते हैं। जब कभी भूखों के नाम पर दानदाताओं की जेब से रकम निकलती है, तो उसका सबसे अच्छा इस्तेमाल ही होना चाहिए। यह दान सबसे गरीब तक जाना चाहिए। लेकिन सबसे गरीब से परे बाकी लोगों तक यह न जाए, ऐसा कोई जरिया सड़क किनारे के भंडारों में निकलना नामुमकिन है। सबसे गरीब और सबसे जरूरतमंद की तलाश, शिनाख्त, और उस तक पहुंच के लिए खासी जांच-पड़ताल की जरूरत पड़ती है, जो कि सड़क किनारे के मौजूदा दान-धर्म के मुकाबले खासी अधिक मशक्कत का काम होगी। इसलिए लोग अपने मन की तसल्ली के लिए आसपास कतार में जुटने वाले लोगों को भक्त, आस्तिक, या गरीब मानकर काम चला लेते हैं। 
समाज में जो पैसा लोगों की जेब से निकलता है, उसके बेहतर इस्तेमाल के लिए एक सामाजिक ढांचा रहना चाहिए। इसके बिना सबसे अधिक जरूरतमंद, नजरों से दूर, कहीं अस्पतालों के पिछवाड़े में, तो कहीं कुष्ठ रोगियों की बस्तियों में, तो कहीं दूर के गांवों में पड़े रह जाते हैं। एक बार कोई भरोसेमंद संस्था या तरीका ऐसा निकल जाए, जो कि यह दिखा भी सके कि दान का सबसे अच्छा इस्तेमाल किया गया है, तो उससे फिर दानदाताओं का उत्साह बढ़ भी सकता है। लोग अपने आसपास के थोड़े से जरूरतमंद लोगों को ही दान का सुपात्र समझ लेते हैं, और ऐसे में उनका सामाजिक योगदान अधिक उत्पादक योगदान नहीं बन पाता। आज धर्म के नाम पर, आध्यात्म या जातियों के संगठनों के नाम पर, त्यौहारों पर लोगों की जेब से पैसे निकलते हैं, और इसके विश्वसनीय उपयोग का तरीका लोगों को सोचना चाहिए। ऐसा काम करने में वे लोग भी लग सकते हैं, जिनके पास खुद तो दान के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन कुछ करने का उत्साह है, ईमानदारी है, और साख है। ऐसे दो तबकों के मेल से समाज का भला हो सकता है।

फिलीस्तीनियों के मानवसंहार पर शर्मनाक हिन्दुस्तानी चुप्पी

19 जुलाई 2014
संपादकीय
संसद में मोदी सरकार फिलीस्तीन पर इजराईली हमले की चर्चा से जिस तरह बचते दिख रही है, वह एक शर्मनाक हालत है। इन दोनों देशों के बीच कोई संघर्ष चल रहा है ऐसा मानने वालों को यह देखने की जरूरत है कि किस तरह सरहद के आरपार के हमलों में मरने वाले इजराईलियों से सैकड़ों गुना मौतें फिलीस्तीन में हो रही हैं, जहां पर कि इजराईली फौजी विमान अस्पतालों तक बमबारी कर रहे हैं। यह पूरा टकराव एक लंबा इतिहास है, और शायद बड़ा लंबा भविष्य भी है क्योंकि इजराईल की पीठ पर अमरीका का हाथ है, और संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय पंचायत पूरी तरह बेअसर और बेकाम पड़ी हुई है। लेकिन भारत को दुनिया के मामलों में अपनी गौरवशाली दखल को याद रखकर आज इजराईली हैवानियत पर अपनी संसद में जो बात करनी थी, उससे बचते हुए मोदी सरकार का तर्क यह है कि इन दोनों देशों से भारत के दोस्ताना तालुकात है, और संसद में इस पर चर्चा से ऐसे रिश्ते खराब हो सकते हैं। 
आजादी के पहले से भारत के गांधी और नेहरू जैसे नेताओं का पूरी दुनिया के मामलों में एक गौरवशाली हस्तक्षेप रहते आया है। इन दोनों ही नेताओं ने अपने देश के लोगों को अंतरराष्ट्रीय मामलों पर शिक्षित और जागरूक करने का काम अपनी आखिरी सांस तक किया था, और दक्षिण अफ्रीका से लेकर फिलीस्तीन तक, और गुटनिरपेक्ष देशों से लेकर चीन तक, गांधी और नेहरू ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, दूसरे देशों से दोस्ती की, दोस्ती निभाई, धोखा भी खाया, लेकिन दरियादिली कम नहीं की। आज भारत का इजराईल के साथ संबंध यही है कि इजराईल के पूरे निर्यात का आधे से अधिक, भारत आयात करता है। भारत इजराईल का सबसे बड़ा ग्राहक है, और इन दोनों के बीच अगर किसी किस्म की रियायत होनी चाहिए, तो वह इजराईल की तरफ से भारत के लिए होनी चाहिए, न कि फिलीस्तीन के साथ चल रहे ऐतिहासिक जुल्म पर भारत की तरफ से इजराईल के लिए किसी रियायत की शक्ल में। लेकिन भारत के कारोबारी इजराईल के साथ धंधा करके इतनी बड़ी एक लॉबी दिल्ली में खड़ी कर चुके हैं, कि भारत की सरकार एक शर्मनाक चुप्पी मुंह पर टांगे हुए इतिहास में अपना नाम खराब कर रही है। 
हम मुस्लिम और यहूदी समुदायों की बात नहीं कर रहे, हम इंसाफ की बात कर रहे हैं, और भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को और कुछ नहीं करना है, आजादी के पहले से गांधी फिलीस्तीनियों के हक के बारे में जो लिखते आ रहे थे, उनको उठाकर पढऩा भर है। उस वक्त गांधी ने जो लिखा वह इंसानियत के हक में एक ईमानदार बात थी, और एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय सोच से उपजी हुई थी। गांधी ने अपने अखबारों में गांव-गांव से आई चि_ियों के जवाब में जनशिक्षण के लिए जितने खुलासे से फिलीस्तीनियों के बारे में लिखा था, उसे अगर आज की मोदी सरकार पढ़ भी ले, तो वह संसद में मुंह चुराने से बचेगी। 
लेकिन आज इस देश की सरकार कारोबारियों के असर में है, और हकीकत तो यह है कि इंदिरा गांधी शायद आखिरी ऐसी प्रधानमंत्री थीं, जिनका यह हौसला था कि वे फिलीस्तीनियों के साथ खड़ी रहीं। अमरीका और इजराईल इन दोनों का दुनिया के कारोबार पर बड़ा दबदबा है, और कारोबार से परे भी फौजी दबदबा काफी है। लेकिन इंदिरा गांधी में वह हौसला था कि उन्होंने इसकी परवाह किए बिना फिलीस्तीनी नेता यासिर अराफात को अपना भाई बनाया था, और फिलीस्तीनियों को हिन्दुस्तान का दोस्त माना था। इंदिरा ही फिलीस्तीनियों के जख्मों पर मरहम रखने वाली हमदर्द भी थीं। आज हिन्दुस्तान की विदेश नीति, और देशनीति दोनों ही कारोबार तले दबी हुई हैं, और दुनिया का इतिहास इतने बड़े देश, ऐसे गौरवशाली इतिहास वाले लोकतंत्र का नाम बड़े अफसोस के साथ दर्ज कर रहा है। हमारा मानना है कि भारत के लोगों को संसद के बाहर एक जनसंसद लगाकर दुनिया की इस सबसे बड़ी मौजूदा बेइंसाफी पर बात करनी चाहिए, और वही सरकारी चुप्पी के मुंह पर तमाचा होगा। 

मेहरबानियां लुटाने का जरिया नहीं संवैधानिक संस्थाएं

18 जुलाई 2014
संपादकीय
पिछले चौबीस घंटों में 6 साल की बच्ची से लेकर युवती और परिपक्व महिलाओं के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में ज्यादतियां होने की खबरें मिलीं। लखनऊ में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मुलाकात के मौके पर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद, शहर के करीब एक युवती के साथ निर्भया कांड जैसी दरिंदगी की खबर है, तो बंगलौर के पास एक गांव में, मिड डे मील के खराब स्तर की शिकायत करने पर एक महिला डॉक्टर और उसकी सहायिका के कपड़े गांव के सरपंच की मौजूदगी में दबंगों ने उतार लिए। उधर  बिहार में एक राजनीतिक दल की महिला नेता को दबंगों ने सड़क पर कपड़े उतार कर पीटा और कोई बचाने तक नहीं आया। बेंगलौर के एक बड़े स्कूल में पहली कक्षा में पढ़ती 6 साल की बच्ची के साथ स्कूल के खेल शिक्षक और जिम टीचर द्वारा कथित सामूहिक बलात्कार की खबर अभी ताजा ही है। निर्भया कांड के बाद बलात्कार कानून को व्यापक और सख्त बनाने के बावजूद, महिलाओं के साथ देश में ऐसा सुलूक थमते कहीं नहीं दिख रहा है, जैसे लोगों को इस व्यवस्था की नाकामी का पूरा इत्मीनान हो।
इन सबके बीच नई सरकार की महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बने महिला आयोग को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग जैसे अधिकार और दोषियों को सजा देने की सत्ता की मांग कर रही है। एक अंग्रेजी अखबार के साथ बातचीत में मेनका ने बताया है कि कैसे आज की तारीख में महिला आयोग को कोई गंभीरता से नहीं लेता, जिनके खिलाफ शिकायतें हों वह बुलाए जाने पर आयोग के सामने पेश  होना तक जरूरी नहीं समझते, और महिला आयोग में जाने वाली महिलाएं अपने पैसे और वक्त गंवाने के बावजूद कुछ हासिल नहीं कर पातीं। ऐसी हालत के लिए महिलाओं के अधिकारों के प्रति सत्ता पर बैठे लोगों की नीयत सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। निर्भया फंड  बनाकर उसमें रखे गए एक हजार करोड़ रुपये में से एक साल में एक भी रुपया खर्च नहीं किया जाना इसकी एक मिसाल है, जबकि इस दौरान औरतों पर जुल्म के बहुत से मामले हुए। खुद मेनका गांधी ने कहा है कि महिला आयोग राजनीतिक  मेहरबानियां लुटाने का जरिया बन चुके हंै। महिला आयोग ही नहीं, ज्यादातर संवैधानिक ,वैधानिक संस्थाओं, समितियों, पदों पर इस तरह की नियुक्तियां किए जाने के मामले देखने मिलते हंै। बहुत बार यह भी देखा जाता है कि नौकरी जारी रहते हुए अफसर अपने रिटायर होने के बाद इस तरह के संवैधानिक पद पाने का जुगाड़ करने, सत्ता में बैठे राजनीतिक दल के मनमाफिक काम करते हैं, या अपने मनमाफिक अफसरों से अपनी मर्जी के हिसाब से संवैधानिक संस्थाएं चलाने, सत्ता में आई राजनीतिक पार्टियों द्वारा उन्हें ऐसे पद दे दिए जाते हंै। ऐसा होने से न केवल जनता के पैसों का बेजा इस्तेमाल होता है,इन ओहदों और  सुविधाओं के बदले ऐसे लोगों का इस्तेमाल सत्ता के स्वार्थ और हित साधने के लिए भी किए जाने की गुंजाईश भी रहती है। इस तरह संवैधानिक संस्थाएं वह  काम  भी  नहीं कर पातीं, जिनके लिए यह बनाई जाती हैं।
यही नहीं इस तरह संवैधानिक संस्थाओं में ओहदा पा जाने वालों और इन संस्थाओं के फर्ज के बीच हितों के टकराव की भी पूरी गुंजाईश रहती है। मिसालन किसी एक राज्य में लंबी सेवा बजा चुके अफसर को रिटायर हो जाने के बाद जब कोई संवैधानिक पद मिल जाता है, तो उससे जिनके खिलाफ सुनवाई की उम्मीद की जाती है उनमें ज्यादातर लोग ऐसे होते हंै, जिनके साथ या जिनके हित में, उसने नौकरी में रहते हुए काम किया है। अब ऐसी व्यवस्था के अहसान तले दबा ऐसा पूर्व अफसर किसी संवैधानिक संस्था में जगह पाकर उसके मकसद कैसे पूरे कर पाएगा? बात सिर्फ किसी अफसर की व्यक्तिगत निष्ठा की ही नहीं रह जाती। हो सकता है  ऐसे ओहदे पर बिठाए पूर्व अफसर बहुत काबिल हों, उनमें काम करने का जज़्बा भी हो, लेकिन नौकरी के दिनों के उनके अनुभव उनके हाथ रोके, इसकी गुंजाईश से इंकार नहीं किया जा सकता। हमने इस जगह कई बार संवैधानिक पदों को इस तरह रिटायर अफसरों और मनपसंद नेताओं में बांटने का विरोध किया है।
हमारा कहना है कि अगर सरकार को लगता है कि कोई अफसर, या उससे करीब से जुड़ा कोई नेता किस संवैधानिक पद के लिए बहुत अच्छा है, तो उसे उसके राज्य के अलावा दूसरे राज्य में ओहदा दिया जाए। हालांकि सारे संवैधानिक ओहदों के साथ ऐसा इंसाफ कर पाना तब तक मुमकिन नहीं होगा, जब तक कि उन पर रिटायर अफसरों या करीबी नेताओं को ही बैठाने की नीयत रखी जाएगी। राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष पद की तरफ लौटें तो पेशेवर काबीलियत के हिसाब  से भी इस पद की कोई जरूरत होती है। हम मानते हंै कि अगर सरकार महिलाओं के अधिकारों को लेकर इतनी संजीदा है, कि उसे देश में एक राष्ट्रीय महिला आयोग रखना है, तो उसकी कप्तानी वह किसी ऐसी महिला को दे, जो अपनी काबीलियत से इस ओहदे के लिए इज्जत पैदा कर सके। मेनका गांधी ने इस इंटरव्यू में जिक्र किया है कि कैसे सरकारी महकमे के एक आला अफसर ने, महिला आयोग के बुलावे पर आना भी जरूरी नहीं समझा। जाहिर था सरकार के रवैये से उसे यहां संदेश मिला हुआ है कि महिला आयोग के दांत  दिखाने भर के हैं, इनमें काटने लायक पैनापन नहीं है। जब तक संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सरकार का ऐसा रवैया कायम रहेगा, वह असरदार होने की बजाय बोगस और दिखावे भर की बनी रहेगी, तथा जनता, और उसके  संवैधानिक अधिकारों के बीच रोड़ा बनी रहेगी।
हमारा मानना है कि इस बारे में किसी सामाजिक कार्यकर्ता को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की पहल करनी  चाहिए कि तमाम आयोगों, समितियों, संवैधानिक संस्थाओं के ओहदों पर नियुक्तियां करते समय , इनमें  ओहदे पाने वालों के सियासी रुझान, और वफादारी पर भी इस तरह गौर किया जाए कि हितों के टकराव की नौबत ना आए, पारदर्शिता बनी रहे और उस ओहदे से जुड़ी पेशेवर काबीलियत से समझौता ना किया जाए। इतना तय करके ही सरकार राष्ट्रीय महिला आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं के लिए अपनी संजीदगी दिखा सकती है।

तकलीफ की जिंदगी ढोने के बजाय मरने का हक बेहतर

17 जुलाई 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और देशभर के लोगों से राय जाननी चाही है कि लोग अपनी मर्जी से मरना चाहें, तो उन्हें इसकी कानूनी इजाजत मिलनी चाहिए, या नहीं। आज भारत में अंग्रेजों के बनाए हुए कानून के तहत आत्महत्या की कोशिश एक सजा वाला जुर्म है। खुदकुशी में कोई कामयाब हो जाते हैं, तो मामला वहीं खत्म हो जाता है, लेकिन कोशिश के बाद कोई बच जाए, जो उसके लिए सजा का इंतजाम है। 
यह भारत में संस्कृति, धर्म, सामाजिक मूल्यों, और कानून से जुड़ी हुई बात है कि लोगों को अपनी जान देने का हक रहना चाहिए या नहीं? इससे इंसानी जिंदगी का यह बुनियादी सवाल भी जुड़ा हुआ है कि जिंदगी पर हक किसका है? जिसका बदन है,  जान पर उसी का हक है, या परिवार का हक है, या समाज और सरकार का हक है? और यह बहस सिर्फ हिन्दुस्तान की नहीं है, दुनिया के कई देशों की है। ऐसे में स्विटजरलैंड में जब डॉक्टरी मदद से आत्महत्या का हक दिया गया, तो दुनिया के कई देशों से लोग वहां मरने के लिए पहुंचते हैं। लेकिन बात सिर्फ यूरोप के इस विकसित और संपन्न देश में निजी आजादी की सोच के एक अलग दर्जे की नहीं है, खुद भारत के भीतर जैन समाज में कई बार संथारा लेने की खबर आती है जो कि एक धार्मिक और सामाजिक परंपरा है। इसके तहत जब कोई प्राण छोड़ देने की सोचते हैं, तो वे खाना-पीना बंद कर देते हैं, और परिवार-समाज उनकी मौत तक उनका साथ देते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट जो राय चाह रहा है, उसके तहत यह बात भी सामने आ रही है कि गांधी ने भी कुछ हालात में लोगों के जान देने के हक की वकालत की थी। 
चूंकि आज देश में इस मुद्दे पर रायशुमारी हो रही है, इसलिए हम यहां पर अपनी बात भी कहना जरूरी समझते हैं। लोगों को कुछ खास स्थितियों में अपनी जान देने का हक होना चाहिए। जब लोग बिल्कुल लाइलाज हो जाएं, और उनकी बची हुई धड़कनों में दर्द के सिवाय उनके पास कुछ न बचे, तो उनको अपनी जान देने का फैसला लेने की छूट रहनी चाहिए। इसके लिए सरकार और अदालत मिलकर एक ऐसा पुख्ता ढांचा बनाएं, जो कि यह जांच करे कि जमीन-जायदाद की वजह से, या किसी और जुर्म की नीयत से तो किसी को मरने के लिए प्रेरित नहीं किया जा रहा है? ऐसे इंतजाम के बाद लोगों को छूट मिलनी चाहिए। लंबे समय से यह परंपरा पूरी दुनिया में चली आ रही है कि जानवरों को भी इलाज से परे हो जाने पर बिना दर्द की मौत देने के लिए जहर की इंजेक्शन लगाए जाते हैं। ऐसे में इंसानों को बहुत खराब हालत होने पर जबर्दस्ती जिंदा रखना ठीक नहीं है। यह न तो ऐसे इंसानों के बदन के लिए ठीक है, और न ही उनके परिवार के लिए। जहां पर लोग ऐसी नौबत आ जाने पर खुद होकर जान देने की सोचें, तो उनकी बची हुई जिंदगी में लगातार तकलीफ और अपमान देने के बजाय, उन्हें जान देने का हक देना चाहिए। 
भारत बहुत सारे मामलों में अंग्रेजों के वक्त के कानून को ढोते चल रहा है। खुद अंग्रेजों ने अपने देश में जिन कानूनों को खत्म कर दिया है, उनको भी भारत गोरों की खड़ाऊ की तरह माथे पर चढ़ाकर इक्कीसवीं सदी में जी रहा है। समलैंगिकता इनमें से एक है, और भी ऐसे कई कानून हैं। भारतीय संस्कृति में समलैंगिकता की घोषित जगह थी, और स्वैच्छिक मृत्यु भी भारतीय संस्कृति और भारत के धर्मों में हमेशा से रही है। इसलिए मौजूदा कानून को एक अंधे कानून की तरह ढोते चलना ठीक नहीं है। हम कुछ खास हालात में जान देने के हक को सही मानते हैं, और इसका बेजा इस्तेमाल न हो उसके लिए एक पुख्ता जांच-पड़ताल का इंतजाम किया जाना चाहिए।

चारों तरफ इतना बुरा हो रहा है कि अच्छे-बुरे की चर्चा जरूरी

16 जुलाई 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के भिलाई से एक दर्दनाक खबर आई है कि किस तरह कर्ज चुकाने के बजाय एक आदमी ने दोस्तों के साथ मिलकर, कर्ज देने वाले के परिवार को बंधक बनाने का नाटक किया, और किस तरह लूट की घटना पेश करते हुए कर्ज से बचने की कोशिश की। उसमें तो तमाम पढ़े-लिखे दोस्त गिरफ्तार हो ही गए, अभी खबर यह आई है कि इस कर्जदार की पत्नी ने आत्महत्या कर ली। इस तरह के कोई न कोई मामले छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों से रोज आ रहे हैं, और जुर्म के आंकड़ों को बढ़ाने के अलावा ये एक सामाजिक फिक्र भी खड़ी करते हैं। आपसी संबंधों में, मां-बाप, बेटा-बेटी के रिश्तों में, पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिका में, बहुत पुराने दोस्तों में जिस तरह के जुर्म सामने आ रहे हैं, उनसे नुकसान न सिर्फ जुर्म के शिकार परिवारों का होता है, बल्कि मुजरिम का परिवार भी जेल और अदालत के बाहर रहते हुए भी सजा पाते रहता है। लेकिन बड़ा नुकसान इससे अलग है, सामाजिक और मानवीय संबंधों में भरोसा उठने से जितना अधिक नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती, और न ही जुर्म के आंकड़ों में भरोसा टूटने की गिनती लगाई जा सकती। 
यह पूरा सिलसिला एक इंसान के दूसरे इंसान पर से भरोसा उठ जाने का है, कोई कर्ज चुकाने के बजाय कत्ल कर रहा है, कोई कर्ज की वसूली के लिए कत्ल कर रहा है, कहीं पर कोई नशे में बच्चों को मार रहा है, तो कहीं नशे में बच्चे मां-बाप का कत्ल कर रहे हैं, कहीं पर जादू-टोने के शक में परिवार के लोग ही दूसरे को मार रहे हैं। ऐसी तमाम वारदातें बताती हैं कि समाज में लोगों की सोच में कितनी और कैसी कमजोरी है। और यह कमजोरी सिर्फ पढ़ाई-लिखाई की कमी से उपजी हुई नहीं है। यह कमजोरी लोगों में एक तो वैज्ञानिक सोच की कमी से है, दूसरी यह उन मूल्यों की कमी से है, जिन्हें कि इंसानियत कहा जाता है। इसके अलावा कहीं पैसे कमाने की हड़बड़ी में लोगों में जुर्म की तरफ बढ़ जाने की लापरवाही है, तो कहीं पर धोखा देकर भी दूसरों से कमा लेने की आरामतलबी है। 
समाज में लोगों की सोच बेहतर करना पुलिस का काम नहीं है, और न ही सरकार के बाकी हिस्से का। यह तो किसी भी देश-प्रदेश में, समाज में, लोगों में बेहतर सोच से ही हो सकता है, किसी लाठी या कानून से नहीं। भारत में लोग दूसरों के अधिकार और अपनी जिम्मेदारी की तरफ से पूरी तरह बेखबर रहते हैं, और सोच-समझकर अनजान रहते हैं। अगर लोग अपनी जिम्मेदारी को पहले सोचकर दूसरों के अधिकार की इज्जत करना सीखते, तो इनमें से कई किस्म के जुर्म कम हो जाते। लेकिन शायद लोगों को इंसानियत से अधिक भरोसा भारत में कानून की व्यवस्था के बेअसर होने पर है, इसलिए लोग जुर्म करके बच जाने की उम्मीद रखते हैं। एक और पहलू इस पूरे तस्वीर का यह है कि परिवार के भीतर जो लिहाज लोगों में रहता था, समाज का जो दबाव लोगों पर रहता था, वह भी बढ़ते हुए जुर्म के साथ-साथ हल्का होने लगता है। अब लोग एक-दूसरे के जुर्म की मिसाल से बेधड़क होते चलते हैं, और मानो एक मुजरिम दूसरे मुजरिम को राह दिखाते चलता है। अच्छी राह दिखाना भी मुश्किल होता है और अच्छी राह पर चलना सीखना भी तकलीफदेह होता है। लेकिन हिंसा और जुर्म बहुत आसान होते हैं, हिसाब चुकता करने के लिए भी, अपनी दिक्कतें दूर करने के लिए भी, और अपने लिए अधिक आराम या सुख जुटाने के लिए भी। इसके साथ-साथ कुछ लोगों के बीच एक ऐसा घमंड होता है, जो उनको दूसरों के मुकाबले अपने बेहतर होने की खुशफहमी में रखता है। ऐसी तमाम बातें अधिकतर अपराधों के पीछे हैं, और समाज को अपने भीतर से ही लोगों को अधिक जागरूक करने, और जिम्मेदार बनाने का काम करना पड़ेगा। हम एक बहुत ही नीरस मुद्दे पर यह चर्चा छेड़ बैठे हैं, लेकिन हमारे हिसाब से यह मुद्दा कम महत्व का नहीं है, और इस बारे में लोगों को, खासकर जिम्मेदार और अच्छे-भले लोगों को अपने बच्चों के साथ चर्चा जरूर करनी चाहिए, और दोस्तों से भी कहना चाहिए कि वे भी अपने बच्चों से अच्छे और बुरे के फर्क की बात जरूर करें। आज का मीडिया खबरों को सामने रख सकता है, लेकिन किसी अच्छी राह को दिखाने का काम उसके लिए कुछ मुश्किल भी होता है। ऐसे में लोगों को अपना ख्याल खुद भी करना होगा। 

अच्छे अफसरों से बुरे सुलूक का सिलसिला खत्म हो

15 जुलाई 2014
संपादकीय
बरसों से केंद्र और हरियाणा दोनों जगहों पर कांगे्रस की सरकार के तहत उनकी आंखों की किरकिरी बने हुए हरियाणा के आईएएस अफसर अशोक खेमका को आखिरकार हरियाणा से आजादी मिली और केंद्र सरकार ने 2010 से चली आ रही उनकी अर्जी को मानकर उनको केंद्र सरकार में जगह दी है। अशोक खेमका का मामला भारत के लोकतंत्र में सरकारी कामकाज की एक बहुत अच्छी और बहुत बुरी दोनों किस्म की मिसाल है। एक बहुत ताकतवर राजनीतिक परिवार के खिलाफ एक अफसर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए खड़ा हो सकता है, और किस हद तक प्रताडि़त हो सकता है, इस पर अशोक खेमका खबरों में आए। दूसरी तरफ सत्ता को हांक रही एक राजनीतिक पार्टी अपने राजनीतिक आकाओं को बचाने के लिए सरकारी बांहों को किस हद तक मरोड़ सकती है, इसकी भी मिसाल हरियाणा की कांगे्रस सरकार ने पेश की थी। 
आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के आसमान को चीरते हुए जिस सरदार पटेल की प्रतिमा को खड़ा करने जा रहे हैं, उन्हीं का नाम भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के पीछे आता है। गुजरात की प्रशासनिक अकादमी वल्लभ भाई पटेल के नाम पर ही रखी गई है, और राष्ट्रीय पुलिस अकादमी भी उन्हीं के नाम पर है। सरदार पटेल जिस कड़ाई के हिमायती थे, वैसी कड़ाई और ईमानदारी को शासन-प्रशासन में लागू करना ही उनका असली सम्मान होगा, प्रतिमा खड़ी होती है तो हो, और नहीं होती है, तो न हो। प्रतिमा से अधिक जरूरी है मिसालें खड़ी होना। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में जब पूरे देश के लिए केंद्र और राज्य के संबंधों को देखते हुए राष्ट्रीय सेवाओं का ढांचा बनाया गया, तो उसमें अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों को यह सुरक्षा भी दी गई थी, कि वे राज्यों और केंद्र के बीच, एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच, सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों के बीच, कई तरह की जगहों पर भेजे जा सकें, और खुद होकर भी इसके लिए अर्जी दे सकें। 
अशोक खेमका पर हरियाणा सरकार का जो रूख रहा, या दूसरे कई अफसरों के मामलों में दूसरे राज्यों का जो रूख रहा, उसको देखते हुए यह लगता है कि अफसरों के पास टकराव की नौबत में राज्य से केंद्र जाने, या केंद्र से राज्य जाने के विकल्प कुछ आसान बनाने चाहिए। अशोक खेमका 2010 से केंद्र सरकार में आना चाहते थे, या अधिक सही यह कहना होगा कि वे हरियाणा से निकलना चाहते थे। वैसे में उन्हें बहुत ही विपरीत और बागी माहौल में चार बरस तक बनाए रखना, और प्रताडि़त करना ठीक नहीं था। अशोक खेमका की बीस बरस की नौकरी में जिस तरह करीब पचास बार तबादला हुआ है वह किसी भी अच्छे अफसर का हौसला तोड़ देने वाली बात है। केंद्र और राज्यों को मिलकर यह देखना चाहिए कि ऐसी नौबत कैसे घटे। और हम यह बात सिर्फ अखिल भारतीय सेवाओं के बारे में नहीं कह रहे, देश की किसी प्रादेशिक सरकार में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। किसी एक मामले के खबरों में आने की वजह से इस पर चर्चा का मौका आया है, लेकिन इतने चर्चित न होने पर भी किसी अफसर के साथ ऐसा न हो यह देखना चाहिए।


सवाल एक अखबारनवीस के आतंकी से मुलाकात का नहीं है

14 जुलाई 14
संपादकीय

भारत में एक वक्त मीडिया के बड़े ओहदों पर रहे, और फिर बाद में लगातार बाबा रामदेव और हिन्दू संगठनों के करीब और उनके पसंदीदा रहे वेदप्रताप वैदिक पाकिस्तान जाकर हाफिज सईद से मिल आए, तो बहुत से सवाल उठने लगे। सवाल इसलिए नहीं उठे कि वे पत्रकार हैं, और मुंबई पर आतंकी हमले के आरोपी से मिलकर आए। मुजरिमों से मीडिया के लोग आए दिन बात करते हैं, कहीं किसी टीवी चैनल पर छोटा शकील से बातचीत सुनाई जाती है, तो बहुत से अखबारों में नक्सलियों से बातचीत होती है। सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि वेदप्रताप वैदिक जिन बाबा रामदेव के करीब हैं, उनके खेमे से तब सवाल उठे थे जब कश्मीर का एक आंदोलनकारी अपने पाकिस्तान दौरे के दौरान हाफिज सईद के साथ एक सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच पर दिखा था, और उसकी मौजूदगी को लेकर उसके खिलाफ भारत में देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग उठी थी। हिन्दू संगठनों ने इस तस्वीर को लेकर खासा बवाल मचाया था, और आज बाबा रामदेव के एक करीबी के नाते वेदप्रताप वैदिक को जवाब देना पड़ रहा है। 
दरअसल पत्रकारिता लंबे समय से एक ऐसा पेशा बना हुआ था, जिसके साथ किसी दूसरे किस्म के पेशे या कारोबार, आंदोलन या सामाजिक काम का घालमेल ठीक नहीं माना जाता था। पत्रकारिता को बाकी पेशों से अलग एक अलग इज्जत इसीलिए मिलती थी कि उसके लोग दूसरा काम नहीं करते थे। इसीलिए उनको लोकतंत्र में एक चौथे स्तंभ का अघोषित दर्जा भी मिला हुआ था, और देश में श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन चलता था, जिसकी वजह से पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों के लिए बार-बार वेतन आयोग भी बनाए गए। बाकी पेशों के लोगों को ऐसा कोई दर्जा नहीं मिला था, और न ही बाकी किसी कारोबार को ऐसी इज्जत मिली थी। लेकिन जहां कोई खास दर्जा मिलता है, खास इज्जत मिलती है, खास हक मिलते हैं, वहीं पर खास जिम्मेदारी भी बनती है। मीडिया के साथ एक जिम्मेदारी यह भी जुड़ी हुई है कि इसके लोग सक्रिय राजनीति में हिस्सा न लें, किसी ऐसे आंदोलन में हिस्सा न बनें, जिससे कि उनकी अखबारनवीसी पर असर पड़े, या आंच आए। 
वेदप्रताप वैदिक जैसे बहुत से ऐसे लोग हैं, जो एक पैर को मीडिया की नाव पर रखकर चलते हैं, और दूसरा पैर किसी वैचारिक आंदोलन, या सामाजिक आंदोलन पर रखे रहते हैं। बहुत से अखबारनवीस ऐसे भी हुए जो कि राजनीतिक दल की तरफ से राज्यसभा में पहुंचे, उस पार्टी के अखबार के मीडियाकर्मी हुए, और फिर भी पत्रकार होने का दावा करते रहे। ऐसे लोग कभी चुनाव लड़ते हैं, कभी किसी पार्टी के प्रवक्ता बन जाते हैं, कभी किसी कारपोरेट घराने के जनसंपर्क अफसर बन जाते हैं, और फिर भी पत्रकार होने का दावा करते हैं। ऐसे ही लोग सवालों से घिरते हैं, और वेदप्रताप वैदिक बाबा रामदेव के आंदोलन का हिस्सा बने हुए आज ऐसे सवालों से बच नहीं सकते। 
लेकिन फिर भी हम ऐसे सवालों के हिमायती नहीं हैं। हमारा मानना है कि बातचीत दुश्मनों के बीच भी होती रहनी चाहिए, और कल कश्मीर के किसी आंदोलनकारी ने हाफिज सईद के साथ बात की थी, तो वह भी गलत नहीं था, और आज अगर रामदेव के एक साथी ने बात की है, तो वह भी ठीक है। ठीक अगर कुछ नहीं है, तो किसी पत्रकार का गैरपत्रकार-मकसद के आंदोलन से गहरे तक जुडऩा है, उसका झंडा लेकर चलना है, और फिर भी पत्रकार रहने का दावा करना है। लोगों को पूरी ईमानदारी के साथ एक ही काम करना चाहिए, या कम से कम एक से अधिक ऐसे काम करना चाहिए, जिनका कि आपस में कोई टकराव न हो, जिनको लेकर जनता के मन में किसी तरह की गलतफहमी न हो। भारत में बहुत सी विचारधाराओं और राजनीतिक-सामाजिक प्रतिबद्धताओं से जुड़े हुए लोग पत्रकार रहने का दावा करते हैं, उनको अगर किसी आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी करनी है, तो उन्हें ईमानदारी से खालिस अखबारनवीसी से अलग हो जाना चाहिए। 

लोग मौसेरा भाई सोच रहे थे लेकिन यह चचेरा भाई निकला

13 जुलाई 2014
संपादकीय
बिहार के आक्रामक भाजपा सांसद गिरिराज सिंह पिछले कुछ महीनों से सिर्फ बुरी वजहों से खबरों में हैं। पहले उन्होंने मोदी विरोधियों को पाकिस्तान जाने की सलाह दी थी, जिसे कि पार्टी ने खारिज कर दिया था। बाद में उनके घर से एक चोरी के बाद चोरों से एक-सवा करोड़ की नगदी बरामद हुई, तो उन्होंने साफ-साफ जवाब देने के बजाय इसे अपने कजन (कई तरह के रिश्ते के भाई-बहन) की रकम बताया, और रकम की इस बरामदगी को राजनीतिक साजिश कहा। अब कल जब पुलिस मेें उनके एक चचेरे भाई ने आकर रकम को अपना कहा, तो सवाल यह बच गया कि इसमें गिरिराज सिंह के खिलाफ राजनीतिक साजिश क्या थी? 
दरअसल राजनीति में जो लोग हैं, वे जनता को तब तक बेवकूफ समझते हैं, और बेवकूफ बनाते हैं, जब तक कि उन्हें खुद खासी बड़ी अदालत से सजा न हो जाए। और अगर वे परले दर्जे के भ्रष्ट या दुष्ट हैं, तो सुप्रीम कोर्ट तक लड़ते हुए भी अपने को बेकसूर बताते हैं, और कानून की अदालत से सजा मिलने पर अपने को जनता की अदालत में बेगुनाह साबित करने की बात कहते हैं, और जनता के बीच बदनामी के सुबूत सामने आ जाएं, तो फिर वे कानून की अदालत में अपने को बेगुनाह साबित करने की बात कहते हैं। इन दो अदालतों के बीच भ्रष्ट लोग अपनी पूरी जिंदगी की राजनीति कर लेते हैं, और सत्ता पर काबिज भी रह जाते हैं। 
सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का तकाजा अब किताबों के बीच दफन हो चुका है, और अब पेशेवर मुजरिम की तरह लोग जितने लंबे समय तक बचते चल सकें, उतने समय तक बचते चलते हैं। गिरिराज सिंह के मामले को यहां मिसाल की तरह इस्तेमाल करें, तो चोरी के दिन न वे अपने कजन का नाम बता सके, और एक साजिश की तोहमत लगाकर उन्होंने चुप्पी साध ली। चौथे दिन जाकर एक कजन बरामद हुआ, और इतनी लंबी नगदी का क्या काम था, इसकी जानकारी बरामद होने में पुलिस और इंकम टैक्स को और पता नहीं कितने दिन लगेंगे। 
हिन्दुस्तान में सार्वजनिक नैतिकता इस कदर अनचाही बात हो गई है, कि आज अगर मदर टेरेसा जिंदा होतीं, तो अनचाहे बच्चे की तरह लोग नैतिकता को ले जाकर उनके आश्रम के दरवाजे के झूले पर छोड़कर आ जाते। अब सरकार और पार्टी में, दूसरे सार्वजनिक और संवैधानिक ओहदों पर लोगों के आने और जाने को लेकर किसी तरह की कोई हिचक और झिझक नहीं रह गई है। बुरे से बुरे आरोपों से घिरे हुए लोग कुर्सियों पर आते और जाते रहते हैं, और भारतीय लोकतंत्र को अब इस नई सार्वजनिक संस्कृति के साथ जीने की आदत डालनी पड़ी है। 
दरअसल जनता के सामने चुनाव के नाम पर जो पसंद परोसी जाती है, उसमें नेताओं के लिए तो कौन बनेगा करोड़पति जैसे विकल्प रहते हैं, जनता के लिए महज ये विकल्प बचते हैं कि उनको किसके हाथों लुटना सुहाएगा। चुनाव में मानो अमिताभ बच्चन चार नाम पेश करते हैं, कि इनमें से किसी एक बुरे को छांट लें, या किसी एक बुरी पार्टी को छांट लें। लोगों को चुनावों के वक्त का यह नारा याद होगा कि कभी किसी पार्टी को जरूरी बताते हुए उसके उम्मीदवार को मजबूरी बताकर भी वोट मांगे जाते हैं, और कभी किसी उम्मीदवार को जरूरी बताते हुए पार्टी को मजबूरी मानकर वोट देने को कहा जाता है। 
इन मुद्दों पर हम इतनी बार लिखते हैं, कि लिखते-लिखते खुद ही थक जाते हैं, लेकिन जनता के बीच सवाल उठने अब बंद हो चुके हैं। गिरिराज सिंह का पूरा मामला कुछ देर के लिए खबरों में आया, और खत्म हो गया। बाकी पार्टियों के नेताओं के बारे में भी ऐसी ही खबरें आती-जाती रहती हैं, और जनता यह सोचते रह जाती है कि कौन से कजन ममेरे भाई हैं, और कौन से कजन (चोर-चोर) मौसेरे भाई हैं। लेकिन जनता की सोच अब उसके दिल-दिमाग में दफन है, क्योंकि न उसके पास बोलने का हौसला है, और न सचमुच में बड़े मुजरिमों के खिलाफ मीडिया में कोई बड़ी जगह बाकी है। 

लोकतंत्र के पतन को, लोकतंत्र का विकास मानने की खुशफहमी

12 जुलाई 2014
संपादकीय
भारत के उत्तरप्रदेश को देखें, तो मुजफ्फरनगर के जिन इलाकों में दंगों में दर्जनों लोग मारे गए, और दसियों हजार बेघर हुए, वहां तब से लेकर अब तक लगातार जाति और धर्म की राजनीति, राजनीतिक दलों और नेताओं के हाथों खेली जा रही है। जहां पर सांसद और विधायक दंगा भड़काते पकड़ाते हैं, वहां पर अमन-चैन की कोशिश के बजाय मंदिर-मस्जिद पर लगे लाउडस्पीकरों को हटाने को लेकर एक ऐसा तनाव खड़ा किया जाता है कि मानो इनको हटाए बिना देश का विकास रूक जा रहा है। हकीकत यह है कि पूरे देश में धर्मस्थलों के लाउडस्पीकर लोगों का जीना हराम करते हैं, सुप्रीम कोर्ट के हुक्म के बाद भी इन पर कोई काबू नहीं किया जाता, सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेश के बाद भी सार्वजनिक जगहों पर और सड़क किनारे धर्मस्थलों का अवैध निर्माण नहीं रूक रहा है। ऐसे में यह बात लगती है कि क्या चुनावी राजनीति में अधिक नंबर पाने के लिए लोग सांप्रदायिकता और जातिवाद को बढ़ाते हुए ही भारत को 22वीं सदी में ले जाएंगे? 
विज्ञान और टेक्नालॉजी में उपलब्धियां, आर्थिक विकास, शहरीकरण, और शिक्षा का विस्तार, इन सबसे भी हिन्दुस्तानी इंसानों के भीतर की वह हिंसा कम नहीं हो रही, जो कि दूसरे धर्म, दूसरी जाति के लोगों का गला काटे बिना शांत नहीं बैठती। और आज दिक्कत यह है कि भारत की बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियां ऐसी हिंसा से परहेज नहीं कर रही हैं। ऐसे में यह लगता है कि भारतीय लोकतंत्र परिपक्व हो रहा है, या गड्ढे में जा रहा है? इस देश में लगातार कामयाबी से होने वाले चुनावी मतदान को लोग लोकतंत्र की कामयाबी मान लेते हैं। लोकतंत्र एक अलग चीज है, और मतदान की कामयाबी उसका एक बहुत छोटा सा हिस्सा है। लोकतंत्र का बाकी तमाम हिस्सा तो दो चुनावों के बीच देश में लोगों के हक और लोगों की जिम्मेदारी के बीच के एक न्यायसंगत संतुलन का होना चाहिए, लेकिन वह कहीं नजर नहीं आता है। दुनिया में लोकतांत्रिक तरीके से होने वाले चुनाव और मतदान को लेकर भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र करार दिया जाता है। लेकिन लोकतंत्र की जो बुनियादी सोच है, उसका न हिन्दुस्तानी चुनावों में कोई असर होता, और न फिर बाद में पांच बरस की सरकार के दौरान यह होता है। भारतीय चुनाव जिस तरह दो नंबर के पैसों का कारोबार हो गए हैं, और उसके बाद जिस तरह से वोट खरीदकर लोग राज्यसभा और विधान परिषदों में पहुंचते हैं, जगह-जगह पूंजीनिवेश से मंत्री बनते हैं, और फिर अपनी लागत की वसूली के लिए पांच बरस जुट जाते हैं, वह देखने लायक है। और इस वसूली के जुर्म में वे कभी पकड़ाते भी हैं, तो अगले कई चुनाव वे जमानत पर रहते हुए निपटा लेते हैं, सत्ता पर आ जाते हैं, और आखिरी सजा के पहले जिंदगी के आखिरी दिन भी भोग चुके रहते हैं।
हिन्दुस्तान में तस्वीर इतना निराश करती है, कि कई बार यह हैरानी होती है कि  ऐसे तथाकथित लोकतांत्रिक चुनावों के खिलाफ कोई मजबूत जनआंदोलन शुरू क्यों नहीं होता? देश के बहुत बड़े हिस्से में लोकतंत्र के नाम पर चल रहे पाखंड के खिलाफ माओवादी सोच के लोगों ने बरसों से हिंसा का सैलाब फैलाया हुआ है, लेकिन लोकतंत्र की मरम्मत का काम लोकतंत्र को खारिज करने से नहीं हो सकता। रास्ता लोकतंत्र के भीतर ही निकालना होगा, बाहर से इसका कोई इलाज आयात नहीं हो सकता। और आज दिक्कत यह है कि चुनावों को जीतने के लिए जिन नारों को खड़ा किया जाता है, उनके तले किसी ईमानदार सोच की कोई जमीन भी नहीं होती। आम जनता की दिक्कत यह है कि भारत की चुनाव प्रणाली के तहत उसे किसी पार्टी को चुनने की आजादी नहीं है, उसे स्थानीय उम्मीदवारों के रास्ते ही किसी पार्टी को चुनना होता है। ऐसे में वह पार्टी को चुनें, या उम्मीदवार को, इसको लेकर एक धुंध छाई रहती है, और आखिर तक यह भी समझ नहीं आता कि मतदाता ने किसी पार्टी के पक्ष में वोट दिया है, या किसी उम्मीदवार के पक्ष में, या फिर किसी पार्टी के खिलाफ वोट दिया है, या किसी उम्मीदवार के खिलाफ? यह भी समझ नहीं आता कि चुनाव में कितने वोटों की खरीद-बिक्री हुई है? 
ऐसे माहौल में चुनावों से देश और प्रदेशों में सरकारें आती-जाती हैं, और इसे ही लोकतंत्र का विकास मान लिया गया है। हमारा यह मानना है कि भारत में चुनाव जिस तरह से हो रहे हैं, उनसे लोकतंत्र का पतन ही हो रहा है।