21 जुलाई 2014
संपादकीय
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में छह बरस की एक बच्ची के साथ स्कूल में बलात्कार के बाद वहीं का एक खेल प्रशिक्षक-शिक्षक पकड़ाया है, जिसके लैपटॉप पर बच्चों से बलात्कार के बहुत से वीडियो निकले हैं। बड़े शहरों में होने वाले जुर्म पर चर्चा जल्दी शुरू होती है लेकिन हम हमेशा से बच्चों के देह शोषण के खतरे के बारे में लिखते आ रहे हैं। हम इस बारे में जितनी बार लिखते हैं, और लोगों को जितना सावधान करते हैं, उसको लेकर कुछ लोगों को यह भी लगता है कि इस मुद्दे पर इतनी चर्चा की क्या जरूरत है। लेकिन हमारा यह मानना है कि इस पर चर्चा की अधिक जरूरत इसलिए भी है कि ऐसे शोषण के शिकार बच्चों की खुद की जुबान की आवाज सुनने वाले लोग नहीं रहते। स्कूल में या मैदान में कोई शिक्षक-प्रशिक्षक ऐसा करे, तो उसकी शिकायत स्कूल नहीं सुनता, घर या पड़ोस में कोई ऐसा करें, तो उस बात को परिवार अनसुना कर देता है, और जब कभी बच्चे की कोई शिकायत भरोसेमंद भी लगे, तो उसे बात को न बढ़ाने की बात कहते हुए, उसे रफा-दफा करने की कोशिश होती है। नतीजा यह होता है कि बच्चों के यौन शोषण के मुजरिम अमूमन हर मामले में बच निकलते हैं, और वे आखिर तक दूसरे बच्चों के लिए खतरा बने रहते हैं।
दूसरी बात यह भी है कि हिन्दुस्तान में बलात्कार की वजहों को लेकर सत्ता पर बैठे हुए बेवकूफ और बदमिजाज लोग जिस तरह की बातें करते हैं, उनको लेकर सेक्स-अपराध पर बहस एक गलत तरफ मुड़ जाती है। कोई महिलाओं के कपड़ों को बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहरा देता है, कोई उनके देर रात तक बाहर रहने को, और कोई उनके शराब पीने को। अब बात कुछ आगे तक बढ़ गई है, और लोग मांसाहार को और मोबाइल फोन को भी बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहराने लगे हैं। इस बहस के बीच यह बात धरी रह जाती है कि जब चार-छह बरस की बच्चियों से बलात्कार होता है, तो न तो वे कम कपड़े पहनी रहतीं, न वे शराब पीती रहतीं, न वे देर रात तक घर के बाहर रहतीं, और न वे मोबाइल फोन की वजह से बलात्कार का शिकार होती हैं। दरअसल हिन्दुस्तानी सोच का पूरा ढांचा महिला के खिलाफ है, और वह अपने लड़कों के बारे में खुलकर यह कहता है कि लड़कों से तो गलतियां हो ही जाती हैं, लड़कियों को ही सावधान रहना चाहिए। मतलब यह कि लड़कों का हिंसक जुर्म माफी के लायक है, और लड़कियों का अपनी तरह से रहना माफी के लायक नहीं है। यह वही देश है जो कि अजन्मी लड़कियों को मारने के मामले में दुनिया में सबसे आगे है, और शायद दुनिया में ऐसी कोई दूसरी मिसाल भी नहीं है। जिन मुस्लिम देशों को भी अनपढ़ और जाहिल, कट्टर और धर्मान्ध, पिछड़ा और आतंकी करार दिया जाता है, वहां भी अजन्मी बच्चियों को मारने की कोई सामाजिक प्रथा नहीं है।
हम फिर बच्चों के यौन शोषण की बात पर लौटें, तो भारत में कानून से परे जमीन पर कुछ बातों को करने की बहुत जरूरत है। एक तो यह कि स्कूल और कॉलेज में कोई भी कमरे ऐसे नहीं होने चाहिए जिनमें कि बाहर से भीतर देखा न जा सके। इसके अलावा बच्चों को सेक्स हिंसा के खतरों के बारे में स्कूल के परामर्शदाता उन बच्चों के मां-बाप की मौजूदगी में उन्हें बताएं, ताकि बच्चे भी सावधान रह सकें, और स्कूल से परे भी उनके मां-बाप बच्चों के लिए ऐसे खतरों से वाकिफ रह सकें। अभी तक हम उन बच्चों की बात कर रहे हैं जिनको स्कूल नसीब है, और मां-बाप नसीब हैं, एक घर नसीब है। लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसे करोड़ों बच्चे हैं जिनके लिए महज फुटपाथ और रेलवे प्लेटफार्म हैं। ऐसे बच्चे सेक्स हिंसा और देह शोषण को बहुत बुरी तरह झेलते हैं, और उनको बचाने वाला भी कोई नहीं होता। हमने ही पहले कई बार यह लिखा है कि इस देश में दसियों लाख बच्चे ऐसे हैं जिनको ठंड में एक कम्बल में सोने की जगह देकर लोग उनका देह शोषण कर लेते हैं। यह सिलसिला इस देश को एक ऐसी जख्मी और तकलीफजदा पीढ़ी दे रहा है, जो कि किसी भी सेहतमंद देश के लिए बहुत खतरनाक है। लेकिन हमने छत्तीसगढ़ में पिछली आधी सदी में बच्चों के देह शोषण के खतरों पर चर्चा के लिए एक बैठक भी होते आज तक देखी नहीं है। ऐसे में इस देश-प्रदेश में कोई जागरूकता आ भी कैसे सकती है?
