तकलीफ की जिंदगी ढोने के बजाय मरने का हक बेहतर

17 जुलाई 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और देशभर के लोगों से राय जाननी चाही है कि लोग अपनी मर्जी से मरना चाहें, तो उन्हें इसकी कानूनी इजाजत मिलनी चाहिए, या नहीं। आज भारत में अंग्रेजों के बनाए हुए कानून के तहत आत्महत्या की कोशिश एक सजा वाला जुर्म है। खुदकुशी में कोई कामयाब हो जाते हैं, तो मामला वहीं खत्म हो जाता है, लेकिन कोशिश के बाद कोई बच जाए, जो उसके लिए सजा का इंतजाम है। 
यह भारत में संस्कृति, धर्म, सामाजिक मूल्यों, और कानून से जुड़ी हुई बात है कि लोगों को अपनी जान देने का हक रहना चाहिए या नहीं? इससे इंसानी जिंदगी का यह बुनियादी सवाल भी जुड़ा हुआ है कि जिंदगी पर हक किसका है? जिसका बदन है,  जान पर उसी का हक है, या परिवार का हक है, या समाज और सरकार का हक है? और यह बहस सिर्फ हिन्दुस्तान की नहीं है, दुनिया के कई देशों की है। ऐसे में स्विटजरलैंड में जब डॉक्टरी मदद से आत्महत्या का हक दिया गया, तो दुनिया के कई देशों से लोग वहां मरने के लिए पहुंचते हैं। लेकिन बात सिर्फ यूरोप के इस विकसित और संपन्न देश में निजी आजादी की सोच के एक अलग दर्जे की नहीं है, खुद भारत के भीतर जैन समाज में कई बार संथारा लेने की खबर आती है जो कि एक धार्मिक और सामाजिक परंपरा है। इसके तहत जब कोई प्राण छोड़ देने की सोचते हैं, तो वे खाना-पीना बंद कर देते हैं, और परिवार-समाज उनकी मौत तक उनका साथ देते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट जो राय चाह रहा है, उसके तहत यह बात भी सामने आ रही है कि गांधी ने भी कुछ हालात में लोगों के जान देने के हक की वकालत की थी। 
चूंकि आज देश में इस मुद्दे पर रायशुमारी हो रही है, इसलिए हम यहां पर अपनी बात भी कहना जरूरी समझते हैं। लोगों को कुछ खास स्थितियों में अपनी जान देने का हक होना चाहिए। जब लोग बिल्कुल लाइलाज हो जाएं, और उनकी बची हुई धड़कनों में दर्द के सिवाय उनके पास कुछ न बचे, तो उनको अपनी जान देने का फैसला लेने की छूट रहनी चाहिए। इसके लिए सरकार और अदालत मिलकर एक ऐसा पुख्ता ढांचा बनाएं, जो कि यह जांच करे कि जमीन-जायदाद की वजह से, या किसी और जुर्म की नीयत से तो किसी को मरने के लिए प्रेरित नहीं किया जा रहा है? ऐसे इंतजाम के बाद लोगों को छूट मिलनी चाहिए। लंबे समय से यह परंपरा पूरी दुनिया में चली आ रही है कि जानवरों को भी इलाज से परे हो जाने पर बिना दर्द की मौत देने के लिए जहर की इंजेक्शन लगाए जाते हैं। ऐसे में इंसानों को बहुत खराब हालत होने पर जबर्दस्ती जिंदा रखना ठीक नहीं है। यह न तो ऐसे इंसानों के बदन के लिए ठीक है, और न ही उनके परिवार के लिए। जहां पर लोग ऐसी नौबत आ जाने पर खुद होकर जान देने की सोचें, तो उनकी बची हुई जिंदगी में लगातार तकलीफ और अपमान देने के बजाय, उन्हें जान देने का हक देना चाहिए। 
भारत बहुत सारे मामलों में अंग्रेजों के वक्त के कानून को ढोते चल रहा है। खुद अंग्रेजों ने अपने देश में जिन कानूनों को खत्म कर दिया है, उनको भी भारत गोरों की खड़ाऊ की तरह माथे पर चढ़ाकर इक्कीसवीं सदी में जी रहा है। समलैंगिकता इनमें से एक है, और भी ऐसे कई कानून हैं। भारतीय संस्कृति में समलैंगिकता की घोषित जगह थी, और स्वैच्छिक मृत्यु भी भारतीय संस्कृति और भारत के धर्मों में हमेशा से रही है। इसलिए मौजूदा कानून को एक अंधे कानून की तरह ढोते चलना ठीक नहीं है। हम कुछ खास हालात में जान देने के हक को सही मानते हैं, और इसका बेजा इस्तेमाल न हो उसके लिए एक पुख्ता जांच-पड़ताल का इंतजाम किया जाना चाहिए।

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