सवाल एक अखबारनवीस के आतंकी से मुलाकात का नहीं है

14 जुलाई 14
संपादकीय

भारत में एक वक्त मीडिया के बड़े ओहदों पर रहे, और फिर बाद में लगातार बाबा रामदेव और हिन्दू संगठनों के करीब और उनके पसंदीदा रहे वेदप्रताप वैदिक पाकिस्तान जाकर हाफिज सईद से मिल आए, तो बहुत से सवाल उठने लगे। सवाल इसलिए नहीं उठे कि वे पत्रकार हैं, और मुंबई पर आतंकी हमले के आरोपी से मिलकर आए। मुजरिमों से मीडिया के लोग आए दिन बात करते हैं, कहीं किसी टीवी चैनल पर छोटा शकील से बातचीत सुनाई जाती है, तो बहुत से अखबारों में नक्सलियों से बातचीत होती है। सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि वेदप्रताप वैदिक जिन बाबा रामदेव के करीब हैं, उनके खेमे से तब सवाल उठे थे जब कश्मीर का एक आंदोलनकारी अपने पाकिस्तान दौरे के दौरान हाफिज सईद के साथ एक सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच पर दिखा था, और उसकी मौजूदगी को लेकर उसके खिलाफ भारत में देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग उठी थी। हिन्दू संगठनों ने इस तस्वीर को लेकर खासा बवाल मचाया था, और आज बाबा रामदेव के एक करीबी के नाते वेदप्रताप वैदिक को जवाब देना पड़ रहा है। 
दरअसल पत्रकारिता लंबे समय से एक ऐसा पेशा बना हुआ था, जिसके साथ किसी दूसरे किस्म के पेशे या कारोबार, आंदोलन या सामाजिक काम का घालमेल ठीक नहीं माना जाता था। पत्रकारिता को बाकी पेशों से अलग एक अलग इज्जत इसीलिए मिलती थी कि उसके लोग दूसरा काम नहीं करते थे। इसीलिए उनको लोकतंत्र में एक चौथे स्तंभ का अघोषित दर्जा भी मिला हुआ था, और देश में श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन चलता था, जिसकी वजह से पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों के लिए बार-बार वेतन आयोग भी बनाए गए। बाकी पेशों के लोगों को ऐसा कोई दर्जा नहीं मिला था, और न ही बाकी किसी कारोबार को ऐसी इज्जत मिली थी। लेकिन जहां कोई खास दर्जा मिलता है, खास इज्जत मिलती है, खास हक मिलते हैं, वहीं पर खास जिम्मेदारी भी बनती है। मीडिया के साथ एक जिम्मेदारी यह भी जुड़ी हुई है कि इसके लोग सक्रिय राजनीति में हिस्सा न लें, किसी ऐसे आंदोलन में हिस्सा न बनें, जिससे कि उनकी अखबारनवीसी पर असर पड़े, या आंच आए। 
वेदप्रताप वैदिक जैसे बहुत से ऐसे लोग हैं, जो एक पैर को मीडिया की नाव पर रखकर चलते हैं, और दूसरा पैर किसी वैचारिक आंदोलन, या सामाजिक आंदोलन पर रखे रहते हैं। बहुत से अखबारनवीस ऐसे भी हुए जो कि राजनीतिक दल की तरफ से राज्यसभा में पहुंचे, उस पार्टी के अखबार के मीडियाकर्मी हुए, और फिर भी पत्रकार होने का दावा करते रहे। ऐसे लोग कभी चुनाव लड़ते हैं, कभी किसी पार्टी के प्रवक्ता बन जाते हैं, कभी किसी कारपोरेट घराने के जनसंपर्क अफसर बन जाते हैं, और फिर भी पत्रकार होने का दावा करते हैं। ऐसे ही लोग सवालों से घिरते हैं, और वेदप्रताप वैदिक बाबा रामदेव के आंदोलन का हिस्सा बने हुए आज ऐसे सवालों से बच नहीं सकते। 
लेकिन फिर भी हम ऐसे सवालों के हिमायती नहीं हैं। हमारा मानना है कि बातचीत दुश्मनों के बीच भी होती रहनी चाहिए, और कल कश्मीर के किसी आंदोलनकारी ने हाफिज सईद के साथ बात की थी, तो वह भी गलत नहीं था, और आज अगर रामदेव के एक साथी ने बात की है, तो वह भी ठीक है। ठीक अगर कुछ नहीं है, तो किसी पत्रकार का गैरपत्रकार-मकसद के आंदोलन से गहरे तक जुडऩा है, उसका झंडा लेकर चलना है, और फिर भी पत्रकार रहने का दावा करना है। लोगों को पूरी ईमानदारी के साथ एक ही काम करना चाहिए, या कम से कम एक से अधिक ऐसे काम करना चाहिए, जिनका कि आपस में कोई टकराव न हो, जिनको लेकर जनता के मन में किसी तरह की गलतफहमी न हो। भारत में बहुत सी विचारधाराओं और राजनीतिक-सामाजिक प्रतिबद्धताओं से जुड़े हुए लोग पत्रकार रहने का दावा करते हैं, उनको अगर किसी आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी करनी है, तो उन्हें ईमानदारी से खालिस अखबारनवीसी से अलग हो जाना चाहिए। 

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