20 जुलाई 2014
संपादकीय
शहर की एक तस्वीर देखने मिली जिसमें आज सुबह की एक समाज के लोग गरीब बच्चों को कॉपी-किताब बांटते दिखे। कतार में दर्जनों बच्चे लगे थे, और सभी ने ठीक-ठाक कपड़े पहन रखे थे। वे संपन्न परिवारों के चाहे न हों, वे कम से कम खाते-पीते घरों के तो थे ही, क्योंकि पैरों में चप्पलें भी थीं, कुछ पैरों में पायजेब भी थे, और शायद ही किसी के कपड़े खराब थे।
शहरों में दानदाताओं का उत्साह कई मौकों पर सामने आता है। जब किसी जाति या धर्म का त्यौहार आता है, तो उसके लोग सड़क किनारे कहीं भंडारा खोल लेते हैं, कहीं शरबत बांटते हैं, और कहीं किसी और शक्ल में प्रसाद बांटते हैं। ऐसी जगहों पर रास्ता जाम हो जाने की हद तक भीड़ लग जाती है, रिक्शे-ठेले से लेकर आटो रिक्शा और मोटरसाइकिलों तक को खड़ा करके लोग खाने-पीने में जुट जाते हैं। दानदाताओं को यह तसल्ली रहती है कि उन्होंने धर्म का काम किया है, और गरीबों का पेट भी भरा है।
दरअसल शहरी गरीब शायद ही भूखे रहते हैं। उनका पेट भी भरा होता है, और उनके पास आमतौर पर काम भी होता है। भंडारों में कतार में लगे हुए लोगों से परे भिखारी, बीमार, बूढ़े, और विचलित लोग अलग होते हैं, जिनको खाने की जरूरत होती है। लेकिन प्रसाद और दान की दूसरी शक्लों में पेट भरने के सामान पाने वाले तकरीबन सारे लोग बहती गंगा में हाथ धोने के अंदाज में अपनी आस्था भी पूरी कर लेते हैं, और पेट भी भर लेते हैं।
हम इस पूरे सिलसिले में गलती किसी की नहीं मानते, लेकिन दान के बेहतर इस्तेमाल की संभावना जरूर देखते हैं। जब कभी भूखों के नाम पर दानदाताओं की जेब से रकम निकलती है, तो उसका सबसे अच्छा इस्तेमाल ही होना चाहिए। यह दान सबसे गरीब तक जाना चाहिए। लेकिन सबसे गरीब से परे बाकी लोगों तक यह न जाए, ऐसा कोई जरिया सड़क किनारे के भंडारों में निकलना नामुमकिन है। सबसे गरीब और सबसे जरूरतमंद की तलाश, शिनाख्त, और उस तक पहुंच के लिए खासी जांच-पड़ताल की जरूरत पड़ती है, जो कि सड़क किनारे के मौजूदा दान-धर्म के मुकाबले खासी अधिक मशक्कत का काम होगी। इसलिए लोग अपने मन की तसल्ली के लिए आसपास कतार में जुटने वाले लोगों को भक्त, आस्तिक, या गरीब मानकर काम चला लेते हैं।
समाज में जो पैसा लोगों की जेब से निकलता है, उसके बेहतर इस्तेमाल के लिए एक सामाजिक ढांचा रहना चाहिए। इसके बिना सबसे अधिक जरूरतमंद, नजरों से दूर, कहीं अस्पतालों के पिछवाड़े में, तो कहीं कुष्ठ रोगियों की बस्तियों में, तो कहीं दूर के गांवों में पड़े रह जाते हैं। एक बार कोई भरोसेमंद संस्था या तरीका ऐसा निकल जाए, जो कि यह दिखा भी सके कि दान का सबसे अच्छा इस्तेमाल किया गया है, तो उससे फिर दानदाताओं का उत्साह बढ़ भी सकता है। लोग अपने आसपास के थोड़े से जरूरतमंद लोगों को ही दान का सुपात्र समझ लेते हैं, और ऐसे में उनका सामाजिक योगदान अधिक उत्पादक योगदान नहीं बन पाता। आज धर्म के नाम पर, आध्यात्म या जातियों के संगठनों के नाम पर, त्यौहारों पर लोगों की जेब से पैसे निकलते हैं, और इसके विश्वसनीय उपयोग का तरीका लोगों को सोचना चाहिए। ऐसा काम करने में वे लोग भी लग सकते हैं, जिनके पास खुद तो दान के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन कुछ करने का उत्साह है, ईमानदारी है, और साख है। ऐसे दो तबकों के मेल से समाज का भला हो सकता है।

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