18 जुलाई 2014
संपादकीय
पिछले चौबीस घंटों में 6 साल की बच्ची से लेकर युवती और परिपक्व महिलाओं के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में ज्यादतियां होने की खबरें मिलीं। लखनऊ में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मुलाकात के मौके पर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद, शहर के करीब एक युवती के साथ निर्भया कांड जैसी दरिंदगी की खबर है, तो बंगलौर के पास एक गांव में, मिड डे मील के खराब स्तर की शिकायत करने पर एक महिला डॉक्टर और उसकी सहायिका के कपड़े गांव के सरपंच की मौजूदगी में दबंगों ने उतार लिए। उधर बिहार में एक राजनीतिक दल की महिला नेता को दबंगों ने सड़क पर कपड़े उतार कर पीटा और कोई बचाने तक नहीं आया। बेंगलौर के एक बड़े स्कूल में पहली कक्षा में पढ़ती 6 साल की बच्ची के साथ स्कूल के खेल शिक्षक और जिम टीचर द्वारा कथित सामूहिक बलात्कार की खबर अभी ताजा ही है। निर्भया कांड के बाद बलात्कार कानून को व्यापक और सख्त बनाने के बावजूद, महिलाओं के साथ देश में ऐसा सुलूक थमते कहीं नहीं दिख रहा है, जैसे लोगों को इस व्यवस्था की नाकामी का पूरा इत्मीनान हो।
इन सबके बीच नई सरकार की महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बने महिला आयोग को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग जैसे अधिकार और दोषियों को सजा देने की सत्ता की मांग कर रही है। एक अंग्रेजी अखबार के साथ बातचीत में मेनका ने बताया है कि कैसे आज की तारीख में महिला आयोग को कोई गंभीरता से नहीं लेता, जिनके खिलाफ शिकायतें हों वह बुलाए जाने पर आयोग के सामने पेश होना तक जरूरी नहीं समझते, और महिला आयोग में जाने वाली महिलाएं अपने पैसे और वक्त गंवाने के बावजूद कुछ हासिल नहीं कर पातीं। ऐसी हालत के लिए महिलाओं के अधिकारों के प्रति सत्ता पर बैठे लोगों की नीयत सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। निर्भया फंड बनाकर उसमें रखे गए एक हजार करोड़ रुपये में से एक साल में एक भी रुपया खर्च नहीं किया जाना इसकी एक मिसाल है, जबकि इस दौरान औरतों पर जुल्म के बहुत से मामले हुए। खुद मेनका गांधी ने कहा है कि महिला आयोग राजनीतिक मेहरबानियां लुटाने का जरिया बन चुके हंै। महिला आयोग ही नहीं, ज्यादातर संवैधानिक ,वैधानिक संस्थाओं, समितियों, पदों पर इस तरह की नियुक्तियां किए जाने के मामले देखने मिलते हंै। बहुत बार यह भी देखा जाता है कि नौकरी जारी रहते हुए अफसर अपने रिटायर होने के बाद इस तरह के संवैधानिक पद पाने का जुगाड़ करने, सत्ता में बैठे राजनीतिक दल के मनमाफिक काम करते हैं, या अपने मनमाफिक अफसरों से अपनी मर्जी के हिसाब से संवैधानिक संस्थाएं चलाने, सत्ता में आई राजनीतिक पार्टियों द्वारा उन्हें ऐसे पद दे दिए जाते हंै। ऐसा होने से न केवल जनता के पैसों का बेजा इस्तेमाल होता है,इन ओहदों और सुविधाओं के बदले ऐसे लोगों का इस्तेमाल सत्ता के स्वार्थ और हित साधने के लिए भी किए जाने की गुंजाईश भी रहती है। इस तरह संवैधानिक संस्थाएं वह काम भी नहीं कर पातीं, जिनके लिए यह बनाई जाती हैं।
यही नहीं इस तरह संवैधानिक संस्थाओं में ओहदा पा जाने वालों और इन संस्थाओं के फर्ज के बीच हितों के टकराव की भी पूरी गुंजाईश रहती है। मिसालन किसी एक राज्य में लंबी सेवा बजा चुके अफसर को रिटायर हो जाने के बाद जब कोई संवैधानिक पद मिल जाता है, तो उससे जिनके खिलाफ सुनवाई की उम्मीद की जाती है उनमें ज्यादातर लोग ऐसे होते हंै, जिनके साथ या जिनके हित में, उसने नौकरी में रहते हुए काम किया है। अब ऐसी व्यवस्था के अहसान तले दबा ऐसा पूर्व अफसर किसी संवैधानिक संस्था में जगह पाकर उसके मकसद कैसे पूरे कर पाएगा? बात सिर्फ किसी अफसर की व्यक्तिगत निष्ठा की ही नहीं रह जाती। हो सकता है ऐसे ओहदे पर बिठाए पूर्व अफसर बहुत काबिल हों, उनमें काम करने का जज़्बा भी हो, लेकिन नौकरी के दिनों के उनके अनुभव उनके हाथ रोके, इसकी गुंजाईश से इंकार नहीं किया जा सकता। हमने इस जगह कई बार संवैधानिक पदों को इस तरह रिटायर अफसरों और मनपसंद नेताओं में बांटने का विरोध किया है।
हमारा कहना है कि अगर सरकार को लगता है कि कोई अफसर, या उससे करीब से जुड़ा कोई नेता किस संवैधानिक पद के लिए बहुत अच्छा है, तो उसे उसके राज्य के अलावा दूसरे राज्य में ओहदा दिया जाए। हालांकि सारे संवैधानिक ओहदों के साथ ऐसा इंसाफ कर पाना तब तक मुमकिन नहीं होगा, जब तक कि उन पर रिटायर अफसरों या करीबी नेताओं को ही बैठाने की नीयत रखी जाएगी। राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष पद की तरफ लौटें तो पेशेवर काबीलियत के हिसाब से भी इस पद की कोई जरूरत होती है। हम मानते हंै कि अगर सरकार महिलाओं के अधिकारों को लेकर इतनी संजीदा है, कि उसे देश में एक राष्ट्रीय महिला आयोग रखना है, तो उसकी कप्तानी वह किसी ऐसी महिला को दे, जो अपनी काबीलियत से इस ओहदे के लिए इज्जत पैदा कर सके। मेनका गांधी ने इस इंटरव्यू में जिक्र किया है कि कैसे सरकारी महकमे के एक आला अफसर ने, महिला आयोग के बुलावे पर आना भी जरूरी नहीं समझा। जाहिर था सरकार के रवैये से उसे यहां संदेश मिला हुआ है कि महिला आयोग के दांत दिखाने भर के हैं, इनमें काटने लायक पैनापन नहीं है। जब तक संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सरकार का ऐसा रवैया कायम रहेगा, वह असरदार होने की बजाय बोगस और दिखावे भर की बनी रहेगी, तथा जनता, और उसके संवैधानिक अधिकारों के बीच रोड़ा बनी रहेगी।
हमारा मानना है कि इस बारे में किसी सामाजिक कार्यकर्ता को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की पहल करनी चाहिए कि तमाम आयोगों, समितियों, संवैधानिक संस्थाओं के ओहदों पर नियुक्तियां करते समय , इनमें ओहदे पाने वालों के सियासी रुझान, और वफादारी पर भी इस तरह गौर किया जाए कि हितों के टकराव की नौबत ना आए, पारदर्शिता बनी रहे और उस ओहदे से जुड़ी पेशेवर काबीलियत से समझौता ना किया जाए। इतना तय करके ही सरकार राष्ट्रीय महिला आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं के लिए अपनी संजीदगी दिखा सकती है।

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