चारों तरफ इतना बुरा हो रहा है कि अच्छे-बुरे की चर्चा जरूरी

16 जुलाई 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के भिलाई से एक दर्दनाक खबर आई है कि किस तरह कर्ज चुकाने के बजाय एक आदमी ने दोस्तों के साथ मिलकर, कर्ज देने वाले के परिवार को बंधक बनाने का नाटक किया, और किस तरह लूट की घटना पेश करते हुए कर्ज से बचने की कोशिश की। उसमें तो तमाम पढ़े-लिखे दोस्त गिरफ्तार हो ही गए, अभी खबर यह आई है कि इस कर्जदार की पत्नी ने आत्महत्या कर ली। इस तरह के कोई न कोई मामले छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों से रोज आ रहे हैं, और जुर्म के आंकड़ों को बढ़ाने के अलावा ये एक सामाजिक फिक्र भी खड़ी करते हैं। आपसी संबंधों में, मां-बाप, बेटा-बेटी के रिश्तों में, पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिका में, बहुत पुराने दोस्तों में जिस तरह के जुर्म सामने आ रहे हैं, उनसे नुकसान न सिर्फ जुर्म के शिकार परिवारों का होता है, बल्कि मुजरिम का परिवार भी जेल और अदालत के बाहर रहते हुए भी सजा पाते रहता है। लेकिन बड़ा नुकसान इससे अलग है, सामाजिक और मानवीय संबंधों में भरोसा उठने से जितना अधिक नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती, और न ही जुर्म के आंकड़ों में भरोसा टूटने की गिनती लगाई जा सकती। 
यह पूरा सिलसिला एक इंसान के दूसरे इंसान पर से भरोसा उठ जाने का है, कोई कर्ज चुकाने के बजाय कत्ल कर रहा है, कोई कर्ज की वसूली के लिए कत्ल कर रहा है, कहीं पर कोई नशे में बच्चों को मार रहा है, तो कहीं नशे में बच्चे मां-बाप का कत्ल कर रहे हैं, कहीं पर जादू-टोने के शक में परिवार के लोग ही दूसरे को मार रहे हैं। ऐसी तमाम वारदातें बताती हैं कि समाज में लोगों की सोच में कितनी और कैसी कमजोरी है। और यह कमजोरी सिर्फ पढ़ाई-लिखाई की कमी से उपजी हुई नहीं है। यह कमजोरी लोगों में एक तो वैज्ञानिक सोच की कमी से है, दूसरी यह उन मूल्यों की कमी से है, जिन्हें कि इंसानियत कहा जाता है। इसके अलावा कहीं पैसे कमाने की हड़बड़ी में लोगों में जुर्म की तरफ बढ़ जाने की लापरवाही है, तो कहीं पर धोखा देकर भी दूसरों से कमा लेने की आरामतलबी है। 
समाज में लोगों की सोच बेहतर करना पुलिस का काम नहीं है, और न ही सरकार के बाकी हिस्से का। यह तो किसी भी देश-प्रदेश में, समाज में, लोगों में बेहतर सोच से ही हो सकता है, किसी लाठी या कानून से नहीं। भारत में लोग दूसरों के अधिकार और अपनी जिम्मेदारी की तरफ से पूरी तरह बेखबर रहते हैं, और सोच-समझकर अनजान रहते हैं। अगर लोग अपनी जिम्मेदारी को पहले सोचकर दूसरों के अधिकार की इज्जत करना सीखते, तो इनमें से कई किस्म के जुर्म कम हो जाते। लेकिन शायद लोगों को इंसानियत से अधिक भरोसा भारत में कानून की व्यवस्था के बेअसर होने पर है, इसलिए लोग जुर्म करके बच जाने की उम्मीद रखते हैं। एक और पहलू इस पूरे तस्वीर का यह है कि परिवार के भीतर जो लिहाज लोगों में रहता था, समाज का जो दबाव लोगों पर रहता था, वह भी बढ़ते हुए जुर्म के साथ-साथ हल्का होने लगता है। अब लोग एक-दूसरे के जुर्म की मिसाल से बेधड़क होते चलते हैं, और मानो एक मुजरिम दूसरे मुजरिम को राह दिखाते चलता है। अच्छी राह दिखाना भी मुश्किल होता है और अच्छी राह पर चलना सीखना भी तकलीफदेह होता है। लेकिन हिंसा और जुर्म बहुत आसान होते हैं, हिसाब चुकता करने के लिए भी, अपनी दिक्कतें दूर करने के लिए भी, और अपने लिए अधिक आराम या सुख जुटाने के लिए भी। इसके साथ-साथ कुछ लोगों के बीच एक ऐसा घमंड होता है, जो उनको दूसरों के मुकाबले अपने बेहतर होने की खुशफहमी में रखता है। ऐसी तमाम बातें अधिकतर अपराधों के पीछे हैं, और समाज को अपने भीतर से ही लोगों को अधिक जागरूक करने, और जिम्मेदार बनाने का काम करना पड़ेगा। हम एक बहुत ही नीरस मुद्दे पर यह चर्चा छेड़ बैठे हैं, लेकिन हमारे हिसाब से यह मुद्दा कम महत्व का नहीं है, और इस बारे में लोगों को, खासकर जिम्मेदार और अच्छे-भले लोगों को अपने बच्चों के साथ चर्चा जरूर करनी चाहिए, और दोस्तों से भी कहना चाहिए कि वे भी अपने बच्चों से अच्छे और बुरे के फर्क की बात जरूर करें। आज का मीडिया खबरों को सामने रख सकता है, लेकिन किसी अच्छी राह को दिखाने का काम उसके लिए कुछ मुश्किल भी होता है। ऐसे में लोगों को अपना ख्याल खुद भी करना होगा। 

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