13 जुलाई 2014
संपादकीय
बिहार के आक्रामक भाजपा सांसद गिरिराज सिंह पिछले कुछ महीनों से सिर्फ बुरी वजहों से खबरों में हैं। पहले उन्होंने मोदी विरोधियों को पाकिस्तान जाने की सलाह दी थी, जिसे कि पार्टी ने खारिज कर दिया था। बाद में उनके घर से एक चोरी के बाद चोरों से एक-सवा करोड़ की नगदी बरामद हुई, तो उन्होंने साफ-साफ जवाब देने के बजाय इसे अपने कजन (कई तरह के रिश्ते के भाई-बहन) की रकम बताया, और रकम की इस बरामदगी को राजनीतिक साजिश कहा। अब कल जब पुलिस मेें उनके एक चचेरे भाई ने आकर रकम को अपना कहा, तो सवाल यह बच गया कि इसमें गिरिराज सिंह के खिलाफ राजनीतिक साजिश क्या थी?
दरअसल राजनीति में जो लोग हैं, वे जनता को तब तक बेवकूफ समझते हैं, और बेवकूफ बनाते हैं, जब तक कि उन्हें खुद खासी बड़ी अदालत से सजा न हो जाए। और अगर वे परले दर्जे के भ्रष्ट या दुष्ट हैं, तो सुप्रीम कोर्ट तक लड़ते हुए भी अपने को बेकसूर बताते हैं, और कानून की अदालत से सजा मिलने पर अपने को जनता की अदालत में बेगुनाह साबित करने की बात कहते हैं, और जनता के बीच बदनामी के सुबूत सामने आ जाएं, तो फिर वे कानून की अदालत में अपने को बेगुनाह साबित करने की बात कहते हैं। इन दो अदालतों के बीच भ्रष्ट लोग अपनी पूरी जिंदगी की राजनीति कर लेते हैं, और सत्ता पर काबिज भी रह जाते हैं।
सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का तकाजा अब किताबों के बीच दफन हो चुका है, और अब पेशेवर मुजरिम की तरह लोग जितने लंबे समय तक बचते चल सकें, उतने समय तक बचते चलते हैं। गिरिराज सिंह के मामले को यहां मिसाल की तरह इस्तेमाल करें, तो चोरी के दिन न वे अपने कजन का नाम बता सके, और एक साजिश की तोहमत लगाकर उन्होंने चुप्पी साध ली। चौथे दिन जाकर एक कजन बरामद हुआ, और इतनी लंबी नगदी का क्या काम था, इसकी जानकारी बरामद होने में पुलिस और इंकम टैक्स को और पता नहीं कितने दिन लगेंगे।
हिन्दुस्तान में सार्वजनिक नैतिकता इस कदर अनचाही बात हो गई है, कि आज अगर मदर टेरेसा जिंदा होतीं, तो अनचाहे बच्चे की तरह लोग नैतिकता को ले जाकर उनके आश्रम के दरवाजे के झूले पर छोड़कर आ जाते। अब सरकार और पार्टी में, दूसरे सार्वजनिक और संवैधानिक ओहदों पर लोगों के आने और जाने को लेकर किसी तरह की कोई हिचक और झिझक नहीं रह गई है। बुरे से बुरे आरोपों से घिरे हुए लोग कुर्सियों पर आते और जाते रहते हैं, और भारतीय लोकतंत्र को अब इस नई सार्वजनिक संस्कृति के साथ जीने की आदत डालनी पड़ी है।
दरअसल जनता के सामने चुनाव के नाम पर जो पसंद परोसी जाती है, उसमें नेताओं के लिए तो कौन बनेगा करोड़पति जैसे विकल्प रहते हैं, जनता के लिए महज ये विकल्प बचते हैं कि उनको किसके हाथों लुटना सुहाएगा। चुनाव में मानो अमिताभ बच्चन चार नाम पेश करते हैं, कि इनमें से किसी एक बुरे को छांट लें, या किसी एक बुरी पार्टी को छांट लें। लोगों को चुनावों के वक्त का यह नारा याद होगा कि कभी किसी पार्टी को जरूरी बताते हुए उसके उम्मीदवार को मजबूरी बताकर भी वोट मांगे जाते हैं, और कभी किसी उम्मीदवार को जरूरी बताते हुए पार्टी को मजबूरी मानकर वोट देने को कहा जाता है।
इन मुद्दों पर हम इतनी बार लिखते हैं, कि लिखते-लिखते खुद ही थक जाते हैं, लेकिन जनता के बीच सवाल उठने अब बंद हो चुके हैं। गिरिराज सिंह का पूरा मामला कुछ देर के लिए खबरों में आया, और खत्म हो गया। बाकी पार्टियों के नेताओं के बारे में भी ऐसी ही खबरें आती-जाती रहती हैं, और जनता यह सोचते रह जाती है कि कौन से कजन ममेरे भाई हैं, और कौन से कजन (चोर-चोर) मौसेरे भाई हैं। लेकिन जनता की सोच अब उसके दिल-दिमाग में दफन है, क्योंकि न उसके पास बोलने का हौसला है, और न सचमुच में बड़े मुजरिमों के खिलाफ मीडिया में कोई बड़ी जगह बाकी है।

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