15 जुलाई 2014
संपादकीय
बरसों से केंद्र और हरियाणा दोनों जगहों पर कांगे्रस की सरकार के तहत उनकी आंखों की किरकिरी बने हुए हरियाणा के आईएएस अफसर अशोक खेमका को आखिरकार हरियाणा से आजादी मिली और केंद्र सरकार ने 2010 से चली आ रही उनकी अर्जी को मानकर उनको केंद्र सरकार में जगह दी है। अशोक खेमका का मामला भारत के लोकतंत्र में सरकारी कामकाज की एक बहुत अच्छी और बहुत बुरी दोनों किस्म की मिसाल है। एक बहुत ताकतवर राजनीतिक परिवार के खिलाफ एक अफसर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए खड़ा हो सकता है, और किस हद तक प्रताडि़त हो सकता है, इस पर अशोक खेमका खबरों में आए। दूसरी तरफ सत्ता को हांक रही एक राजनीतिक पार्टी अपने राजनीतिक आकाओं को बचाने के लिए सरकारी बांहों को किस हद तक मरोड़ सकती है, इसकी भी मिसाल हरियाणा की कांगे्रस सरकार ने पेश की थी।
आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के आसमान को चीरते हुए जिस सरदार पटेल की प्रतिमा को खड़ा करने जा रहे हैं, उन्हीं का नाम भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के पीछे आता है। गुजरात की प्रशासनिक अकादमी वल्लभ भाई पटेल के नाम पर ही रखी गई है, और राष्ट्रीय पुलिस अकादमी भी उन्हीं के नाम पर है। सरदार पटेल जिस कड़ाई के हिमायती थे, वैसी कड़ाई और ईमानदारी को शासन-प्रशासन में लागू करना ही उनका असली सम्मान होगा, प्रतिमा खड़ी होती है तो हो, और नहीं होती है, तो न हो। प्रतिमा से अधिक जरूरी है मिसालें खड़ी होना। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में जब पूरे देश के लिए केंद्र और राज्य के संबंधों को देखते हुए राष्ट्रीय सेवाओं का ढांचा बनाया गया, तो उसमें अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों को यह सुरक्षा भी दी गई थी, कि वे राज्यों और केंद्र के बीच, एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच, सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों के बीच, कई तरह की जगहों पर भेजे जा सकें, और खुद होकर भी इसके लिए अर्जी दे सकें।
अशोक खेमका पर हरियाणा सरकार का जो रूख रहा, या दूसरे कई अफसरों के मामलों में दूसरे राज्यों का जो रूख रहा, उसको देखते हुए यह लगता है कि अफसरों के पास टकराव की नौबत में राज्य से केंद्र जाने, या केंद्र से राज्य जाने के विकल्प कुछ आसान बनाने चाहिए। अशोक खेमका 2010 से केंद्र सरकार में आना चाहते थे, या अधिक सही यह कहना होगा कि वे हरियाणा से निकलना चाहते थे। वैसे में उन्हें बहुत ही विपरीत और बागी माहौल में चार बरस तक बनाए रखना, और प्रताडि़त करना ठीक नहीं था। अशोक खेमका की बीस बरस की नौकरी में जिस तरह करीब पचास बार तबादला हुआ है वह किसी भी अच्छे अफसर का हौसला तोड़ देने वाली बात है। केंद्र और राज्यों को मिलकर यह देखना चाहिए कि ऐसी नौबत कैसे घटे। और हम यह बात सिर्फ अखिल भारतीय सेवाओं के बारे में नहीं कह रहे, देश की किसी प्रादेशिक सरकार में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। किसी एक मामले के खबरों में आने की वजह से इस पर चर्चा का मौका आया है, लेकिन इतने चर्चित न होने पर भी किसी अफसर के साथ ऐसा न हो यह देखना चाहिए।

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