देश को योग की जरूरत तो है, हिंदू योग की नहीं

संपादकीय
13 जनवरी 2015

मध्यप्रदेश के स्कूलों में योग शिक्षा सूर्य नमस्कार के साथ शुरू की गई है। कुछ गैरहिंदू समुदायों ने इसका विरोध किया है जिनके धर्म में सूर्य की उपासना की जगह नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र में एक अभूतपूर्व समर्थन के साथ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का फैसला लिया गया और उसकी घोषणा हुई। दुनिया भर के 170 से अधिक देशों ने इसका समर्थन किया और इसके लिए इक्कीस जून की तारीख तय की गई। अब यह जाहिर है कि इतने देश कोई हिंदू राष्ट्र तो हो नहीं सकते, इनमें अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग होंगे, और अगर भारत या कोई भी इस पर अड़ेंगे कि इस योग का मतलब हिंदू योग है, तो जाहिर है कि योग को बढ़ावा देने का मकसद ही परास्त हो जाएगा, और ऐसी जीत से हिंदू धर्म को कुछ भी हासिल नहीं होगा। अगर भारतीय योग पद्धति को हिंदू धर्म की किसी पद्धति के रूप में बढ़ावा दिया जाएगा, तो जाहिर है कि भारत के ही बहुत से दूसरे समाज जिनकी उपासना पद्धति हिंदू उपासना पद्धति से अलग है, उनके लोग इस योग से परे रहेंगे। 
जब नरेन्द्र मोदी ने दुनिया में योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा, तो जाहिर तौर पर वह किसी धर्म से परे था। भारत के हिंदू समाज में भी योग का मकसद धार्मिक उपासना न होकर तन और मन की सेहत रहता है। ऐसे फायदेमंद योग पर हिंदू धर्म की कुछ बातों को लादकर देश का नुकसान किया जा रहा है। होना तो यह चाहिए कि योग की अलग-अलग प्रचलित पद्धतियों में से भी केंद्र और राज्य सरकारों को भी धर्मनिरपेक्ष पद्धतियां छांटनी चाहिए, और किसी धर्म की सेहत सुधारने के बजाय देश की सेहत सुधारना चाहिए। खासकर सरकारों को अपने-आपको धार्मिक रीति-रिवाजों से, धर्म-स्थानों से, धार्मिक-कार्यक्रमों से परे रखना चाहिए वरना ऐसी सरकार जनता के सभी तबकों का विश्वास भी नहीं जीत सकतीं, और जिस भारतीय संविधान की शपथ लेकर सरकारें बनती हैं, वह संविधान ही सरकार को धार्मिक पक्षपात की इजाजत नहीं देता। 
लेकिन सरकारें मध्यप्रदेश से परे भी आज कुछ और राज्यों में एक दकियानूसी सोच को बढ़ावा दे रही हैं। मप्र की तरह ही गोवा में भी भाजपा की सरकार है, और वहां के युवक और खेल मंत्री का बयान सामने आया है कि सरकार समलैंगिक और किन्नर (एलजीबीटी) युवाओं का इलाज कराने के लिए केंद्रों की स्थापना पर विचार कर रही है ताकि उन्हें 'सामान्यÓ बनाया जा सके। यह बात अपने-आपमें ऐसी भयानक नासमझी की अवैज्ञानिक बात है कि इस पर उस पूरी दुनिया की एक नापसंदगी भारत को झेलनी पड़ सकती है जहां पर नरेन्द्र मोदी जाकर पूंजी निवेश जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। आज जब देश में तीसरे जेंडर को कानूनी मान्यता दी जा रही है, तो गोवा का यह मंत्री लगातार कभी समुद्रतट के छोटे कपड़ों के खिलाफ बयान देता है, तो कभी शराब के खिलाफ। इस तरह की शुद्धता का दुराग्रह लोगों पर लादने से मोदी सरकार और भाजपा की एक कट्टरवादी और दकियानूसी छवि बनती और बढ़ती जा रही है। 
आज ही की एक दूसरी खबर है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी पार्टी के सांसद साक्षी महाराज को उनके अवांछित बयानों पर एक नोटिस जारी किया है। साक्षी महाराज लगातार हिंदू महिलाओं से चार-चार बच्चे पैदा करवाने में लगे हुए हैं, ताकि उनके मुताबिक मुस्लिम आबादी जिस तरह बढ़ती है, उसी तरह हिंदू आबादी को भी बढ़ाया जाए। भाजपा को देश भर में अपने सांसदों, मंत्रियों, और नेताओं के बयानों से उसे खुद को हो रहे नुकसान के बारे में सोचना चाहिए। हमारा यह मानना है कि भाजपा का नुकसान देश के लिए महत्वहीन हो सकता है, लेकिन देश की वैज्ञानिक सोच और देश के साम्प्रदायिक सद्भाव को जो नुकसान ऐसे नाजायज बयानों से, या सरकारों के गैरधर्मनिरपेक्ष फैसलों से हो रहा है, वह नुकसान मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी बना रहेगा। मोदी और शाह को इस बारे में सोचने की जरूरत है।

धर्म को आंकने की जरूरत

12 जनवरी 2015
पेरिस में एक व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दो पर हुए हमले के बाद फ्रांस में इस्लाम के नाम पर आतंकी हमले करने वालों के जो नाम सामने आ रहे हैं, उनमें वहां की एक नौजवान महिला का नाम और चेहरा भी है, और उसके बारे में बताया गया है कि वह फ्रांस से टर्की होते हुए इस्लामी जेहाद में शामिल होने सीरिया जा चुकी है। पूरी दुनिया में शायद फ्रांस से ही ऐसे सबसे अधिक लोग आईएसआईएस जैसे मोर्चों पर गए हैं, और इसकी वजह फ्रांस में अधिक मुस्लिमों का होना भी है, और वहां पर आधुनिक लोकतांत्रिक जीवनशैली के साथ मुस्लिमों का चले आ रहा सांस्कृतिक टकराव भी है। भारत में कांगे्रस के नेता मणिशंकर अय्यर ने अपने एक बयान में इस बारे में कहा भी है कि फ्रांस में बुर्कों पर लगाई गई रोक की वजह से भी वहां एक मुस्लिम प्रतिक्रिया हो रही है। 
लेकिन यह आज लिखने का मुद्दा नहीं है। दरअसल जिस महिला का जिक्र ऊपर के पैरा में किया है उसकी दो तस्वीरें अभी विदेशी मीडिया में आई है। एक में वह महज नाम के लिए डोरी जैसी एक बिकिनी पहने हुए अपने पुरूष साथी से लिपटी हुई है, और दूसरी तस्वीर में वह उसी आदमी के साथ बुर्के में दिख रही है, सिर्फ आंखें दिखती हैं, और हाथ में निशाना लगाते हुए एक पिस्तौल है। ऐसी बहुत सी लड़कियां या महिलाएं योरप के विकसित और आधुनिक देशों से निकलकर इस्लामी जेहाद के मोर्चो पर जा रही हैं और उनमें से कुछ तो इस इरादे से जा रही हैं कि वे जिहादियों से शादी करके एक शहीद की बेवा की जिंदगी अधिक पसंद करेंगी। 
धर्म का यह असर देखने लायक है। सबसे अधिक विकसित और उदार देशों में रहने वाले लोग जब धार्मिक मान्यताओं के चलते अपनी सारी लोकतांत्रिक समझ को किनारे रखकर एक हिंसक और आतंकी जिंदगी के लिए चले जाते हैं, अनगिनत लोगों को मारते हुए उनको हिचक नहीं होती, तो धर्म की किताबों में दर्ज नसीहतें रखी रह जाती हैं, और वे लोगों को हिंसा से नहीं रोक पातीं। और यह बात सिर्फ इस्लाम के साथ नहीं है, यह बात हिंदुओं के बीच भी देखने में आ रही है, सिखों के बीच भी इतिहास में दर्ज है, और कुछ सदी पहले का भारत का इतिहास देखें तो उसमें भी हिंदुओं के नाम अनगिनत हत्याएं दर्ज हैं। आज खबरों को देखकर कुछ लोग यह गिनती जरूर कर सकते हैं कि किस धर्म के लोग आतंक और हिंसा में सबसे अधिक शामिल निकल रहे हैं, लेकिन भारत में पहले हिंदुओं की हिंसा का भी लंबा इतिहास दर्ज है। कई सदी पहले से भारत में हिंदू धर्म के अलग-अलग सम्प्रदायों की अपनी-अपनी हथियारबंद फौज होने और उनकी हिंसा सदियों के इतिहास में दर्ज है। एक वक्त ऐसा भी था जब हिंदुओं ने बौद्धों की बड़े पैमाने पर हत्या की थी, और वे देश भर में जगह-जगह छुपकर रहने पर मजबूर भी हुए थे। 
एक किताब के अनुसार- पुष्यमित्र शुंग सम्राट प्राचीन वैदिक धर्म के अनुयायी थे। उनके समय में बौद्ध और जैन धर्मों का ह्रास होकर वैदिक धर्म का पुनरुत्थान प्रारम्भ हुआ। दिव्यावदान (बौद्ध कथाओं का ग्रंथ)में पुष्यमित्र शुंग को मौर्य वंश का अन्तिम शासक बतलाया गया है।  जिसके अनुसार पुष्यमित्र बौद्धों से द्वेष करता था, और उसने बहुत-से स्तूपों का ध्वंस करवाया था, और बहुत-से बौद्ध-श्रमणों की हत्या करायी थी। दिव्यावदान ने तो यहाँ तक लिखा है, कि साकल (सियालकोट) में जाकर उसने घोषणा की थी, कि कोई किसी श्रमण का सिर लाकर देगा, तो उसे मैं सौ दीनार पारितोषिक दूँगा। सम्भव है, बौद्ध ग्रंथ के इस कथन में अत्युक्ति हो, पर इसमें सन्देह नहीं कि पुष्यमित्र के समय में यज्ञप्रधान वैदिक धर्म का पुनरुत्थान शुरू हो गया था। उस द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ ही इसके प्रमाण हैं।
इसलिए आज एक तरफ तो इस्लाम के नाम पर दुनिया भर में हिंसक आतंक जारी है, दूसरी तरफ भारत में हिंदुओं के भीतर भी एक धार्मिक उकसावे की कोशिश चल रही है, जो कि देश और दुनिया की आज की जरूरत के मुताबिक पूरी तरह से गैरजरूरी और नाजयाज है। जीवन में धर्म की जितनी जगह और जितनी अहमियत होनी चाहिए, उससे परे ले जाकर उसे सबसे ऊपर स्थापित करने, दूसरों के हक के ऊपर ले जाने, देश के कानून और लोकतंत्र के ऊपर ले जाने का काम आज किया जा रहा है।
हम पेरिस से लेकर भारत तक के संदर्भ में एक बड़ी सरल बात करना चाहते हैं कि धर्म का मिजाज न्याय और लोकतंत्र के मिजाज से बिल्कुल अलग है। और जब आस्था की बात आती है तो लोग अपनी आस्था को सबसे ऊपर मानने लगते हैं। आज दुनिया के जिन देशों में इस्लामी आतंकियों ने देश और जिंदगी को कब्जे में कर लिया है, कुछ बरस पहले तो वहां पर भी धार्मिक उन्माद अपने शुरूआती दिनों में था, और अभी पांच बरस पहले तक किसने सोचा था कि सीरिया या इराक में मजहबी जिहादियों का राज हो जाएगा? किसने सोचा था कि योरप जैसे इलाके से आधुनिक लोग निकलकर ऐसे धर्मयुद्ध में हिस्सा लेने चले जाएंगे? और फिर एक आधुनिक और उदारवादी जीवनशैली को छोड़कर अगर एक कट्टर, दकियानूसी, औरत से भेदभाव करने वाली, चारों तरफ लहू बहाने वाली, आतंकी-संस्कृति में जाने में भी अगर लोगों को कुछ गलत नहीं लग रहा है, और कैमरों के सामने लोगों के सिर काटना सही लग रहा है, तो धर्म का ऐसा असर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।
कहने के लिए तो एक आम बात सभी धर्मों के बारे में अक्सर कह दी जाती है कि सभी धर्म शांति सिखाते हैं। लेकिन जब जमीन पर हम हकीकत देखते हैं तो यह दिख जाता है कि जिन्हें वह शांति सिखाते हैं वे किस तरह चुप्पी मारकर घर में शांत बैठने वाले बन जाते हैं। और जिनको धर्म शांति नहीं सिखा पाते, और जो धर्म का नाम लेकर चारों तरफ लहू फैलाते हैं, थोक में सौ-डेढ़ सौ मासूम बच्चों को एक साथ मार डालते हैं, धर्म और ईश्वर उनका बाल भी बांका नहीं कर सकते। ऐसे माहौल में धर्म के बारे में अच्छी बातें सिखाने और अमन-मोहब्बत सिखाने की कल्पना, कल्पना ही है। धर्म का असर बहुत खूनी हो रहा है।
इसलिए जिन देशों में आज यह उन्माद छोटा खतरा लग रहा है, या खतरा ही नहीं लग रहा है, वहां भी यह कल के दिन अधिक बड़ा और बेकाबू खतरा हो सकता है। इसलिए लोगों को अपने मन और अपने घर के भीतर की निजी आस्था से परे धर्म की सार्वजनिक और सामाजिक भूमिका के बारे में सोचना चाहिए, और दुनिया की जिंदगी में धर्म के महत्व के अनुपात को भी दुबारा आंकना चाहिए।

हमको मालूम है आंकड़ों की हकीकत लेकिन...

12 जनवरी 2015
संपादकीय
देश भर में किस प्रदेश में कितने शौचालय बने हैं, इसके आंकड़े केंद्र सरकार से जारी हुए हैं। इसमें पता लगता है कि कौन सा राज्य सबसे आगे है, और कौन सा पीछे है। लेकिन सरकारी आंकड़े अपने-आपमें कब तक झांसा देने वाले होते हैं, जब तक तर्क के साथ उनका विश्लेषण न किया जाए। अब दस करोड़ आबादी वाले राज्य में जितने शौचालय बने हैं उनकी तुलना अगर दो करोड़ आबादी वाले राज्य से होगी तो यह लगेगा कि छोटा राज्य एकदम पिछड़ा हुआ है। सरकार के आंकड़े तो नासमझ होते हैं, लेकिन उनके आधार पर खबरें बनाने वाले बड़े-बड़े अखबार भी उसी दर्जे की नासमझी जाहिर करते हैं। लेकिन यह बात सिर्फ सरकार के साथ नहीं है, यह बात आंकड़ों से खेलने वाले हर किसी के साथ है जो कि अंकों को अंतिम सत्य मान लेते हैं। 
अभी पिछले कुछ महीनों में दो-चार विमान दुर्घटनाएं हुईं तो लोगों ने यह मान लिया कि यह पूरा बरस बुरी हवाई दुर्घटनाओं का रहा। बहुतों को लगा कि हवाईयात्रा सुरक्षित नहीं रह गई है और बड़ी संख्या में लोग मर रहे हैं। लेकिन दुर्घटनाओं में मौतों के आंकड़े अगर इन आंकड़ों के बिना देखें जाएं कि पिछले बरसों में हवाई मुसाफिर कितने बढ़े हैं, और हवाई सफर कितना बढ़ा है, और उस अनुपात में ही अगर मौतों के आंकड़ों को परखा जाए, तो ही सही तस्वीर सामने आएगी। 
जिंदगी में हर आम इंसान के पास न तो इतना वक्त होता कि वे आंकड़ों का विश्लेषण कर सकें, और न ही हर किसी की इतनी समझ होती। ऐसे में सरकार या सरकार से परे के जो लोग किसी तरह के तथ्य और विश्लेषण सामने रखते हैं, उनको सामाजिक हकीकत बताने के लिए, अर्थव्यवस्था और आबादी के आंकड़े बताने के लिए कुछ मेहनत करनी चाहिए। अब छत्तीसगढ़ के बस्तर को ही लें, तो वहां पर एनएमडीसी की लोहा खदानों से हर बरस होने वाली दसियों हजार करोड़ की कमाई के चलते खदान वाले जिले में हर व्यक्ति की औसत आय को पूरे छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक गिन लिया गया था। अब अगर सिर्फ उसी आधार पर सरकार वहां के लोगों को अधिक मदद का हकदार नहीं मानती, तो फिर उनके साथ बेइंसाफी होती। इसी तरह छत्तीसगढ़ का ही एक दूसरा मामला है किसानों की आत्महत्या का। अभी दो बरस पहले तक इस राज्य में हर बरस सैकड़ों किसानों की आत्महत्या दर्ज होती थी। राज्य सरकार का तर्क यह था कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के चार्ट में किसी भी आत्महत्या करने वाले का पेशा किसान डालने पर उसका एक विश्लेषण किसान की आत्महत्या गिन लिया जाता था। पिछले दो बरस में छत्तीसगढ़ में एक भी किसान की आत्महत्या दर्ज नहीं हुई है। लेकिन किसानी की तस्वीर न तो पहले उतनी भयानक थी, और न ही एकदम से अब इतनी शानदार हो गई है। राज्य के अफसरों ने आत्महत्या के आंकड़े दर्ज करते समय किसान लिखना बंद कर दिया, और अब देश में जो लोग विश्लेषण करते हैं, उनको छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई मामला मिलता ही नहीं। पहले जब ऐसी सैकड़ों आत्महत्याएं दर्ज होती थीं, तब भी किसानी-आत्महत्या के वैसे मामले होते नहीं थे। और आज भी असल तस्वीर ऐसी नहीं है कि एक भी किसानी-आत्महत्या न होती हो। 
इसलिए हमारा यह मानना है कि आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के लिए सिर्फ कैलकुलेटर काफी नहीं होता, एक सामान्य समझ-बूझ और तर्कों का इस्तेमाल भी करना चाहिए, और अगल-बगल की तस्वीर के साथ जोड़कर ही किसी छोटी तस्वीर को देखना चाहिए।

कोई समाज बच्चों के साथ बलात्कार करके भविष्य नहीं बना सकता...

संपादकीय
11 जनवरी 2015
नाइजीरिया में इस्लामी आतंकियों ने दस बरस की एक बच्ची के बदन पर बम बांधकर उसे आत्मघाती मानव बम बना दिया, और उसका विस्फोट करके डेढ़ दर्जन लोगों की और मौत करवा दी। पिछले कुछ दिनों में इस किस्म के कुछ और मामले भी सामने आए हैं, और ऐसी एक बच्ची ने सुरक्षा दस्तों के पास पहुंचकर अपनी जान बचाई, और आतंकियों की साजिश और तकनीक बतलाई। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे इलाके में नक्सली लगातार बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं, और कुछ बरस पहले के एक बहुत बड़े हमले के बाद जब दर्जनों सुरक्षा कर्मचारी मारे गए थे, तो उनके हथियार बीनने के लिए उन्होंने बच्चों का इस्तेमाल किया था, और उसका वीडियो भी बनाया था जो बाद में सामने आया। नक्सलियों के बारे में यह भी खबर लगती है कि वे सुरक्षा दस्तों का मुकाबला करने के लिए गांव के औरत-बच्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं, और उनको सामने रखकर पुलिस से मुकाबला करते हैं। सीरिया और इराक जैसे कई देशों से ऐसी भयानक तस्वीरें आती हैं जिनमें छोटे-छोटे बच्चे बहुत बड़े-बड़े हथियार लिए हुए आतंकी या बागी मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहे हैं। जो अमरीका मानवाधिकार और बच्चों के हक को लेकर दुनिया में मुखिया बना रहता है, उसी अमरीका की एक सबसे बड़ी समाचार एजेंसी ने ऐसे एक मोर्चे से एक किशोर फोटोग्राफर को भुगतान करके उससे फोटोग्राफी करवाई थी, और हथियारबंद लड़ाई की वैसी फोटोग्राफी में ही वह लड़का मारा भी गया। 
अब हम भारत जैसी जगह पर एक दूसरा मोर्चा देखें तो छत्तीसगढ़ के आदिवासी बस्तर के स्कूली बच्चियों के आश्रम में उनके साथ बलात्कार के दर्जनों मामले सामने आए हैं, कुछ आश्रम-कर्मचारी गिरफ्तार हुए हैं, बस्तर के बाहर भी ऐसे मामले हुए हैं, और गिरफ्तारी के बाद भी जगह-जगह ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। मतलब यह कि सरकार का काबू अपने ही संगठित संस्थानों पर नहीं रह गया है, वहां कोई निगरानी नहीं है, और वहां पर शिकायतें बड़ी मुश्किल से दर्ज की जा रही हैं। और यह जाहिर है कि ऐसी हर शिकायत के मुकाबले दर्जनों शिकायतें दबा दी जाती होंगी। इसके अलावा हम दूर बेंगलुरू को देखें, तो देश के इस सबसे विकसित महानगरों में से एक, कर्नाटक की यह राजधानी ऐसी है जहां शहर के बीच के स्कूलों में हर कुछ हफ्तों में स्कूल शिक्षक या कर्मचारी बच्चों से बलात्कार के मामलों में पकड़ा रहे हैं, और बच्चों के मां-बाप स्कूलों में प्रदर्शन कर रहे हैं, स्कूलों में तोडफ़ोड़ कर रहे हैं। एक दूसरा मुद्दा है पूरे देश से बच्चों की तस्करी का। महानगरों में बंधुआ मजदूरी के लिए कई प्रदेशों से बच्चों को दलाल ले जाते हैं, और फिर इनमें से ही अनगिनत बच्चे देह के धंधे में उतार दिए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे गायब बच्चों पर जवाब मांगने के लिए हर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस प्रमुख को निजी रूप से जिम्मेदार माना है, और इसके बाद छत्तीसगढ़ सहित कई प्रदेशों में ऐसे बच्चों की बरामदगी हो रही है। 
ऐसे और भी कई किस्म के मामले हैं, लेकिन हम जिस मुद्दे पर आज यहां बात करना चाहते हैं, वह है कि हम देश में या दुनिया में किस तरह की अगली पीढ़ी तैयार कर रहे हैं? एक तरफ तो संपन्न और विकसित देशों में बच्चों के मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषक सबसे अधिक व्यस्त और सबसे अधिक कमाऊ माने जाते हैं, क्योंकि वहां बच्चों के मन की छोटी-छोटी उलझनों को सुलझाने के लिए सरकार और समाज बहुत ही चौकन्ना रहते हैं। दूसरी तरफ अफ्रीका के देशों से लेकर खाड़ी के देशों तक, और पाकिस्तान से लेकर भारत तक, बच्चों से बलात्कार, बच्चों से देह का धंधा, बच्चों से बंधुआ मजदूरी का कोई अंत ही नहीं है। यह समझने के लिए मनोविज्ञान में पीएचडी की जरूरत नहीं है कि बचपन से जो बच्चे ऐसे जख्मी होकर बड़े होते हैं, उनकी दिमागी सेहत का हाल बाकी समाज के लिए कितना नकारात्मक, हिंसक, या नुकसान का हो सकता है। दुनिया के सभ्य देश अपने बच्चों को फूल और गुलदस्ते की तरह रखते हैं, लेकिन भारत सहित जिन देशों की यहां चर्चा की गई है, वहां पर सरकार और समाज इन दोनों की हिंसक-अनदेखी से पीढ़ी-दर-पीढ़ी घायल होते चल रही हैं, और इन बच्चों को ढूंढने के लिए, बचाने के लिए, देश की सबसे बड़ी अदालत को, राज्यों के सबसे बड़े दो अफसरों को कटघरे में खड़ा करना पड़ रहा है। कोई समाज अपने बच्चों के साथ बलात्कार करके भविष्य नहीं बना सकता।

स्मारकों के बजाय उत्पादक उपयोग के संस्थान बनें...

संपादकीय
10 जनवरी 2015

महाराष्ट्र भाजपा ने केन्द्र सरकार से मांग की है कि वह लंदन का बिकने जा रहा वह मकान खरीदे जहां कि डॉ. बाबा साहब आंबेडकर रहे थे। पिछले कुछ महीनों से इस मकान की तस्वीरों के साथ यह खबर आ रही है कि यह बिकने जा रहा है, और इसका बाजार भाव करीब 40 करोड़ रूपए है। 
भारत के दलितों के सबसे बड़े नेता आंबेडकर का मामला राजनीतिक रूप से नाजुक है, और इससे करोड़ों लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। लेकिन ऐसे मामले केन्द्र और राज्य सरकारों के सामने कई बार आते हैं जिनमें जनता के पैसों से किसी एक धरोहर या विरासत को बचाने की मांग आती है, किसी सरकारी जमीन या इमारत को किसी स्मारक के लिए देने की मांग सामने आती है। और बहुत से ऐसे मौके रहते हैं जब सरकारी पैसे से किसी स्मारक को बनाया जाता है। लोगों को उत्तरप्रदेश का मामला अब तक सुप्रीम कोर्ट में चलते दिख रहा है जिसमें मायावती के मुख्यमंत्री रहते हुए सैकड़ों करोड़ की लागत से हजारों करोड़ दाम की सरकारी जमीन पर मायावती के नेता कांशीराम, आंबेडकर, खुद मायावती, और उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की प्रतिमाएं बनाई गई थीं। उत्तरप्रदेश की राजधानी में इन प्रतिमाओं को खेत में धान की तरह रोप दिया गया था, और जनता का पैसा ऐसे राजनीतिक महिमामंडन पर खर्च करने पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई कर रहा है। दूसरी तरफ गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने की जो घोषणा की थी, वह शुरू तो हुई थी देश भर से हर किसान से कुछ लोहे का दान लेकर बनाने की, लेकिन अब सरकारी बजट में उसके लिए तीन हजार करोड़ रूपए रखे गए हैं। 
लोगों को यह भी याद होगा कि कुछ महीने पहले भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री अजीत सिंह अपने पिता चौधरी चरण सिंह के वक्त से अपने कब्जे में चले आ रहे एक विशाल बंगले को अपने पिता के स्मारक के लिए लेना चाहते थे, और उसके लिए उन्होंने जमीन-आसमान एक कर दिया था, और अपने प्रभाव क्षेत्र की जनता को सड़कों पर भी झोंक दिया था। ऐसी ही मांग लाल बहादुर शास्त्री के परिवार ने की थी, और कुछ और नेताओं के लिए भी ऐसे स्मारक मांगे गए थे, और शायद बाबू जगजीवन राम की याद में उनकी लोकसभा अध्यक्ष-बेटी मीरा कुमार को यूपीए सरकार ने जाते-जाते एक बंगला, स्मारक के लिए दे भी दिया था। अभी-अभी आई संजय बारू की लिखी हुई मनमोहन सिंह पर किताब में इस बात का लंबा-चौड़ा जिक्र है कि नरसिंह राव के गुजरने के बाद किस तरह सोनिया गांधी की ओर से यह कोशिश हुई कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में न हो, और शव को हैदराबाद ले जाया जाए। ऐसा इसलिए कि दिल्ली में ऐसा होने पर एक और समाधि स्थल बनाया जाता, और कांग्रेस के आपसी टकराव की वजह से सोनिया ऐसा नहीं चाहती थीं। लोगों को यह भी याद होगा कि संजय गांधी के किसी भी संवैधानिक पद पर न रहते हुए भी उनकी विमान-हादसे में मौत के बाद उनके लिए वैसी ही समाधि बनाई गई, जैसी कि गांधी, नेहरू की बनाई गई थी। यह सब कुछ जनता के पैसों से, और जनता की जमीन पर हुआ था, और संजय गांधी का तो देश के लिए कोई योगदान भी नहीं था। 
हम किसी भी धार्मिक व्यक्ति, राजनेता, सामाजिक नेता, या किसी और प्रमुख व्यक्ति के लिए जनता के पैसों से किसी भी तरह के स्मारक के खिलाफ हैं। जिनका विवादों से परे देश के लिए योगदान रहा, वह पूरी पीढ़ी ही अब खत्म हो चुकी है। अब किसी के लिए भी जनता पर बोझ नहीं डालना चाहिए। ऐसा न होने पर इस गरीब देश की कुपोषण की शिकार जनता का पेट काट-काटकर स्मारक खड़े करना जारी रहेगा, जिनका कि कोई सामाजिक योगदान नहीं रहता। आंबेडकर का योगदान इस देश के लिए बहुत रहा, उनके लिए देश भर में जगह-जगह सरकारी और गैरसरकारी स्मारक बहुत से बने हुए हैं। उनके लिए लंदन में पहले तो चालीस करोड़ से एक मकान खरीदना, और फिर वहां कोई संस्था चलाने के लिए और सरकारी खर्च करना ठीक नहीं होगा। कल के दिन गांधी के रहने वाली कुछ इमारतें सामने आएंगी, कहीं दक्षिण अफ्रीका का कोई आश्रम सामने आ जाएगा, कहीं कोई सरदार पटेल की प्रतिमा से दोगुना ऊंची प्रतिमा किसी और नेता की बनाने की बात करने लगेगा, और यह सिलसिला देखादेखी में और बढ़ते चले जाएगा। इसलिए जनता के पैसों पर स्मारक बनाना एक खतरनाक शुरूआत होती है, जो कि बढ़ते ही चलती है। किसी के नाम पर कुछ बनाना भी हो, तो ऐसे अस्पताल, ऐसे स्कूल-कॉलेज, बाग-बगीचे, बनाने चाहिए, जहां पर उनके नाम का सम्मान तो हो, लेकिन सरकारी लागत का उत्पादक उपयोग भी हो।

लाल फीता लाल कालीन में कहां पर बदला है?

9 जनवरी 2015
संपादकीय
प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि एक समय हिंदुस्तानी संभावनाओं को तलाशने के लिए दूसरे देशों में जाते थे, अब संभावनाएं भारत में ही मौजूद हैं, और लोगों को अब भारत आकर यहां काम करना चाहिए। उन्होंने पासपोर्ट और वीजा जैसी कुछ सहूलियतों का जिक्र किया जो कि पिछले महीने में लागू की गई हैं। वे इस तरह की बातें अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में भी प्रवासी भारतीयों के बीच बोल चुके हैं, लेकिन भारत में बसे हुए लोग यह जानते हैं कि हकीकत इससे काफी अलग है। भारत में काम करने की ऐसी संभावनाएं रहें, जिनकी वजह से भारत के लोग दूसरे देशों में जाकर काम करने के बजाय यहां काम करना पसंद करें, या बाहर से भारत लौटकर यहां काम आगे बढ़ाएं, ये बातें मोदी की भावनाएं तो हो सकती हैं, लेकिन देश में आज के हालात इस तरह के हैं नहीं।
भाषणों और घोषणापत्रों से परे, भारत के सरकारी दफ्तरों में कामकाज का ढर्रा, यहां पर सरकार के भीतर कदम-कदम पर भयंकर भ्रष्टाचार, यहां अदालतों की धीमी रफ्तार, और सड़कों जैसी सार्वजनिक जगहों पर सत्ता पर काबिज लोगों का सामंती कब्जा, देखने लायक है। आज दूसरे देशों में जो लोग काम कर चुके हैं, वे यह देखकर हक्का-बक्का रह जाते हैं कि भारत में नेता और अफसर, जज और संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे हुए तथाकथित-स्वघोषित वीवीआईपी लोग किस तरह आम जनता की जिंदगी को कुचलते हुए अपनी हर राह को राजपथ बनाने पर उतारू रहते हैं। दुनिया के किसी भी सभ्य देश में ऐसा नहीं होता।
दूसरी तरफ देश से लेकर छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश तक यह चर्चा ही चर्चा चल रही है कि गैरजरूरी कानूनों और नियमों को बदला जाए। यह देश आजाद हुए पौन सदी होने को है, और छत्तीसगढ़ को राज्य बने पन्द्रह बरस हो जाएंगे। ऐसे में सरकारों को अब तक किसने रोका था कि वे गैरजरूरी और मुर्दा कानूनों को अंग्रेजों की विरासत के टोकरे की तरह ढोना बंद करें, और इन्हें खत्म करें। लेकिन कई तरह के आयोग और कई तरह की कमेटियां देश-प्रदेश में बनती रहती हैं, बनते आई हैं, लेकिन उनकी सिफारिशों के बाद भी सरकारी कामकाज आसान करने की कोशिश नहीं हुई। दरअसल सरकारी जटिलताएं जितनी अधिक रहती हैं, उतनी ही गुंजाइश रिश्वत की रहती है। 
कहने को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह नारा अब जरूर लगा रहे हैं कि उन्होंने हिंदुस्तानी अफसरशाही की कुख्यात लालफीताशाही के लाल फीते से लाल कालीन बुन दिया है जो कि कारोबारियों के स्वागत के लिए बिछा है। लेकिन सरकारी कामकाज से जिनका वास्ता पड़ता है, वे जानते हैं कि पटवारी से लेकर ऊपर तक कदम-कदम पर अडंगा ही अडंगा देखते हैं। छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में जमीनों के मामले में तहसीलदार के स्तर पर इस तरह के नए-नए नियम जोड़े गए हैं जिनका मकसद सिवाय वसूली-उगाही के और कुछ नहीं हो सकता। एक तरफ तो सरकार गैरजरूरी नियम-कानून खत्म करने की बात करती है, दूसरी तरफ उसके कामकाज में लोगों के लिए ऐसे रोड़े बिछाना बढ़ाया जा रहा है कि आम जनता की जिंदगी इतनी मुश्किल हो जाए कि वह हजारों-लाखों की रिश्वत देने पर मजबूर हो। 
हो सकता है कि प्रधानमंत्री के स्तर पर केंद्र सरकार और उनके कहे हुए राज्य सरकारें बड़े-बड़े लोगों के लिए कानूनों को लचीला बना दें, जैसा कि अभी जमीन अधिग्रहण कानून के मामले में किया गया है, लेकिन आम जनता की जिंदगी को नर्क बना देने वाला सरकारी इंतजाम देश की निन्यानवे फीसदी जनता के लिए बदलते नहीं दिख रहा है।

फ्रांस के हमले को देखकर भारत को सबक लेना चाहिए

8 जनवरी 2015
संपादकीय
फ्रांस की एक व्यंग्य पत्रिका शर्ली एब्डो पर कल इस्लामी आतंकियों ने हमला किया और दर्जन भर लोगों को मार डाला। इसमें पत्रिका के संपादक सहित फ्रांस के चार सबसे बड़े कार्टूनिस्ट भी थे जो कि फ्रेंच समाज को रोजाना झकझोरने का काम करते थे। यह पत्रिका अपने बुलंद हौसले के लिए जानी जाती थी, और धार्मिक पाखंड और कट्टरता जैसे कई मुद्दों के खिलाफ यह लगातार लिखती थी और कार्टून छापती थी। दो-तीन बरस पहले भी पैगम्बर मोहम्मद के कुछ कार्टून छापने के बाद इस पत्रिका पर पेट्रोल बम से हमला किया गया था, और इस पर मजहबी आतंक का खतरा माना जाता था। ऐसे में जब इसकी एक बैठक में ये तमाम कार्टूनिस्ट एक साथ इक_ा थे, तब एक फौजी तैयारी के साथ ठीक उसी बैठक पर हमला किया गया, और यह नारा भी लगाया गया कि इसके कार्टून ने आईएसआईएस के आतंकी मुखिया की बेइज्जती की थी, और उसका बदला लिया जा रहा है। एक हमलावर पकड़ा गया है और दो की शिनाख्त के बाद उनकी तलाश चल रही है। इसके पीछे किसी शक से परे सीधे-सीधे इस्लामी आतंकियों का हाथ है, और यह आतंकियों के कब्जे के देशों से परे का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपने किस्म का सबसे बड़ा हमला है। 
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर हमने कई बार यहां लिखा है। दुनिया के अलग-अलग देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैमाने अलग-अलग हैं। उन देशों की स्थितियां अलग हैं, वहां की संस्कृति अलग है, और वहां लोकतंत्र की परिपक्वता, कानून के राज का असर भी अलग-अलग हैं। अमरीका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुछ अलग किस्म की है, वहां पहले से मुनादी करके एक ईसाई चर्च का पादरी कुरान के पन्ने भी जला सकता है। भारत इन मामलों में एक मिले-जुले दर्जे का देश है, यहां पर कई मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और कई मामलों में लोगों का बर्दाश्त बिल्कुल भी नहीं है, और अपने आपको घायल बताकर कुछ लोग, कुछ तबके, कुछ धर्म और कुछ जातियां दूसरों पर हमला करने को भारतीय कानून के तहत उनको दिया गया हक मानती हैं। भारत में धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना एक ऐसा लचर कानून है जिसके तहत कोई भी रिपोर्ट लिखा सकते हैं, और एक थानेदार उस पर गिरफ्तारी कर सकता है। ऐसा जगह-जगह होता भी है। फिर कई मौकों पर राजनीतिक दल अतिसक्रिय होकर कुछ मुद्दों को उठाते हैं, और आग लगाना शुरू कर देते हैं। 
कल भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ्रांस में हुए इस हमले पर अफसोस जाहिर किया है, लेकिन उन्हीं की पार्टी के लोग, उन्हीं के गठबंधन के लोग, उन्हीं के सहयोगी संगठन लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले करते आए हैं। जिस देश में देवी-देवताओं की नग्न प्रतिमाओं का हजारों बरस का इतिहास रहा है, वहां पर ऐसी पेंटिंग बनाने पर मकबूल फिदा हुसैन को देश ही छोड़कर जाना पड़ा था, और फिर उन्होंने परदेस में ही आखिरी सांसें लीं। लोगों को अच्छे से याद होगा कि किस तरह पुणे के भंडारकर शोध संस्थान पर कई बरस पहले हिन्दू संगठनों ने बुरा हमला किया था, क्योंकि इस इंस्टीट्यूट में एक अमरीकी लेखक को शोध कार्य में मदद की थी, और उस लेखक की एक किताब में शिवाजी के बारे में लिखी गई बातों पर इन संगठनों को आपत्ति थी। इन्होंने वहां घुसकर सारे प्राचीन रिकॉर्ड, पांडुलिपियां, तस्वीरें, और प्राचीन वस्तुएं नष्ट कर दी थीं, और वहां भारी तबाही की थी। अभी ताजा बात अगर देखें, तो दीनानाथ बत्रा नाम के एक हिन्दूवादी शिक्षा शास्त्री ने एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन संस्थान को कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर, उस पर दबाव डालकर हिन्दू धर्म पर लिखी गई एक किताब को बाजार से वापिस बुलाने पर मजबूर किया, और उसे खत्म करवा दिया। 
दूसरी तरफ हिन्दूवादियों से परे बंगाल में ममता बैनर्जी जैसे लोग हैं जो कि कार्टून बनाने वाले लोगों को जेल में डालते हैं। दो बरस पहले असीम त्रिवेदी नाम के एक कार्टूनिस्ट को एक कार्टून पर राजद्रोह के आरोप में मुम्बई में कांग्रेस की राज्य सरकार ने गिरफ्तार किया था, जिस पर बहुत से लोगों ने विरोध किया था और अदालत तक ने इसका नोटिस लिया था। अब लगे हाथों यहां पर बंगाल की वामपंथी सरकारों का भी जिक्र कर लेना ठीक होगा जिन्होंने राज्य में तस्लीमा नसरीन की किताबों पर प्रतिबंध लगाकर रखा, और तस्लीमा को वहां घुसने भी नहीं दिया। अब ममता बैनर्जी के राज में भी तस्लीमा पर यह रोक जारी है। सलमान रूश्दी की किताब पर भारत में उस समय रोक लगा दी गई थी, जब दुनिया के किसी इस्लामी या मुस्लिम देश में भी उस पर रोक नहीं लगी थी। 
आज अगर भारत के प्रधानमंत्री फ्रांस में इस हमले का विरोध करते हैं, लेकिन पिछले दस-बीस बरस में भारत के भीतर साम्प्रदायिक ताकतों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जितने हमले किए थे, उनमें से किसी पर भी वे कुछ नहीं कहते, तो यह अपने आपमें एक सैद्धांतिक विरोधाभास है, और इसका खुलासा होना चाहिए। भारत में छोटी-छोटी जगहों पर जिस तरह से साम्प्रदायिकता बढ़ाई जा रही है, उससे यह देश भी एक हिंसा की तरफ बढ़ रहा है, और हिंसा की प्रतिक्रिया में और हिंसा पैदा होना तय रहता है, इसलिए भारत को आज फ्रांस को देखकर सबक  लेना चाहिए, और किसी भी धर्म की साम्प्रदायिकता, कट्टरता को बढऩे से कड़ाई से रोकना चाहिए। हम भारत में आज फ्रांस या योरप की तरह की, या अमरीका की तरह की अभिव्यक्ति की आजादी की संभावना नहीं देखते, और न ही उस दर्जे की आजादी की आज वकालत करते, लेकिन भारत में जिस रफ्तार से साजिश के तहत बर्दाश्त को खत्म किया जा रहा है, उससे हम अभिव्यक्ति की एक अधिक आजादी की तरफ नहीं बढ़ रहे, एक अधिक हिंसा की तरफ बढ़ रहे हैं। इस देश को इस नौबत से बचना चाहिए, वरना हम आज आईएसआईएस की हिंसा का हाल देख ही रहे हैं, भारत में तो एक से अधिक धर्म हिंसा की ऐसी ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं। 

साक्षी महाराज जैसों की बातों पर मोदी चुप क्यों?

07 जनवरी 2015
संपादकीय
भाजपा के हमलावर-साम्प्रदायिक सांसद साक्षी महाराज ने एक बार फिर आग लगाने की कोशिश की है, लेकिन इस बार आग वे किसी गैरहिन्दू घर या बस्ती में नहीं लगा पा रहे, सिर्फ हिन्दुओं में उन्होंने आग लगाई है, और इसका नुकसान मोदी सरकार, भाजपा की साख, के साथ-साथ हिन्दुओं को होने जा रहा है। उन्होंने यह खुली सलाह दी है कि हर हिन्दू महिला को चार बच्चे पैदा करना चाहिए। उन्होंने मुस्लिमों का नाम लिए बिना उनके बारे में कहा कि चार बीवियां और चालीस बच्चे यहां नहीं चल सकेंगे, और जवाब में हिन्दू औरत को चार-चार बच्चे पैदा करना चाहिए। 
भाजपा अपने सांसदों और मंत्रियों की वजह से खासी शर्मिंदगी झेल चुकी है, और यह सिलसिला जारी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुंह खोले बिना उनकी तरफ से ऐसी खबरें बिना किसी हवाले के बाहर आती हैं कि वे साम्प्रदायिक एजेंडा से नाखुश हैं, और संघ परिवार जिस तरह अखबारी सुर्खियों और टीवी की खबरों पर छाया हुआ है, उससे वे फिक्रमंद भी हैं, क्योंकि सरकार की उपलब्धियां धरी रह जा रही हैं। कुछ ऐसी खबरें भी हैं कि विश्व हिन्दू परिषद के भीतर डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा के प्रमोशन से भी मोदी नाखुश हैं क्योंकि उन्होंने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए वहां के सारे तोगडिय़ाओं के पर कतर कर रख दिए थे, और अब तोगडिय़ा देश भर में एक बड़े हिन्दू आक्रामक नेता के रूप में फिर जगह बना रहे हैं। 
दरअसल संघ परिवार और भाजपा के संबंध, संघ परिवार और प्रधानमंत्री के संबंध, देश में ये हमेशा एक अटकल का सामान रहे, और कभी भी यह खुलासा नहीं हो पाता कि इनके अंतरसंबंध क्या हैं, किस पर किसका कितना काबू है। और फिर बीते दशकों में धीरे-धीरे कई ऐसे भगवाधारी भाजपा के रास्ते संसद तक पहुंचे हैं, जो कि आरएसएस के भी नहीं हैं, और भाजपा के भी नहीं हैं, वे महज भगवा हैं, और उनका अपना एक अलग एजेंडा है। ऐसे ही लोगों में साक्षी महाराज नाम के सांसद और एक साध्वी-मंत्री निरंजन ज्योति हैं जो कि पिछले दिनों मीडिया में मोदी से अधिक जगह पाकर पूरी दुनिया में ऐसी तस्वीर बना चुके हैं कि हिन्दुस्तान 22वीं सदी की तरफ नहीं, 6वीं सदी की तरफ बढ़ रहा है। 
हम हर हिन्दू औरत के चार बच्चे पैदा करने की बात पर लौटें, तो इससे अधिक भयानक सलाह हिन्दू समाज के लिए और कुछ नहीं हो सकती। आज जब लोग चार बच्चों से दो की तरफ बढ़ चुके हैं, और ऐसे दो बच्चों को बेहतर पढ़ाने, बेहतर खिलाने, और अधिक कामयाब बनाने का काम चल रहा है, तो चार बच्चों को पैदा करके मुस्लिमों का मुकाबला करने का यह फतवा मानने वाला तो कोई नहीं है, लेकिन इससे देश के भीतर एक साम्प्रदायिक तनातनी खड़ा करने का काम साक्षी महाराज जरूर कर रहे हैं। और शायद उनकी उपयोगिता भी यही है। 
लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह सोचना चाहिए कि क्या वे भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने के नाम पर बहुमत पाकर प्रधानमंत्री बने हैं, या फिर एक भ्रष्ट सरकार को हटाकर एक बेहतर सरकार लाने के लिए जनता ने उन्हें वोट दिया है? भारत कई बार साम्प्रदायिकता के सैलाब झेल चुका है, और यह तरीका किसी एक चुनाव में कहीं काम आ जाए तो आ जाए, लेकिन अगर पांच बरस ऐसी ही आग लगाई जाती रही, तो जनता आज ही इससे थक चुकी है, और लोग अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इस आग को मोदी की मंजूरी है? मोदी और उनके सिपहसालारों ने यह बात जरूर देखी होगी कि हिन्दी और अंग्रेजी मीडिया के जो दिग्गज लोग पिछले एक बरस से मोदी का झंडा उठाकर चल रहे थे, उनमें से एक-एक करके हर कोई आज के माहौल का और उस पर मोदी की चुप्पी का बहुत बुरा आलोचक बन चुका है। हम भाजपा और मोदी की संभावनाओं की फिक्र नहीं कर रहे, लेकिन प्रधानमंत्री को देश के माहौल को सुलगाने-जलाने की चल रही हरकतों को ऐसा अनदेखा नहीं करना चाहिए, इतिहास उनकी चुप्पी को दर्ज करते चल रहा है।

ऐसे बड़बोले मांझी देश में विपक्ष के लिए नुकसानदेह

6 जनवरी 2015
संपादकीय


बिहार के बड़बोले और अटपटे, महादलित तबके से आए हुए, और नीतीश कुमार के एक नैतिक-इस्तीफे के बाद वैकल्पिक मुख्यमंत्री बने जीतन राम मांझी ने फिर एक गैरजिम्मेदार बयान दिया है, और अपने-आपको एक आम आदमी बताते हुए कहा है कि मीडिया उनकी सहजता को तोड़-मरोड़कर मतलब निकालता है। उनका ताजा बयान नक्सलियों द्वारा ठेकेदारों और भ्रष्ट अफसरों से वसूली के बारे में है, और उन्होंने कहा है कि भ्रष्टाचार करने वाले ठेकेदार-अफसर से अगर नक्सली टैक्स वसूलते हैं, तो उसमें कुछ गलत नहीं है। इसके पहले मांझी ने गैरजिम्मेदार बयानों का एक लंबा इतिहास अपने कुछ महीनों के इस कार्यकाल में रच दिया है, और उनकी पार्टी के बारे में अब यह सोचना पड़ रहा है कि किस लिए उसने ऐसा मुख्यमंत्री चुना, और किस लिए वह ऐसी बकवास को बर्दाश्त कर रही है? 
नक्सलियों का खतरा झेलने वाले राज्यों में बिहार सबसे बड़ा राज्य है। ऐसे राज्य का मुख्यमंत्री अगर नक्सल-उगाही को सही ठहराने का काम करता है, तो उसके बाद वहां की पुलिस क्या खाकर नक्सलियों को पैसा देने वालों पर कार्रवाई करेगी? लेकिन मांझी ने अपनी राजनीतिक समझ, सोच, और अपनी बेअक्ली को बार-बार साबित किया है, और अब उनको जारी रखने वाली पार्टी इस सिलसिले को आगे बढ़ाकर अपने-आपको गैरजिम्मेदार और बेअक्ल साबित कर रही है। मांझी की ऐसी बातों से एक सामाजिक दिक्कत यह है कि उनके महादलित तबके के बारे में भारत के सवर्ण लोगों की जो सोच है, उसे जायज साबित करने का काम मांझी कर रहे हैं। किसी का आम या सहज होना उसे ऐसा हक नहीं देता कि वह आए दिन निहायत गैरजरूरी और निहायत नाजायज बातें करे। उनकी तरह-तरह की बेतुकी बातों से एक नुकसान यह भी हो रहा है कि आम लोगों को लोग शासन के लायक मानने पर शक कर सकते हैं, और ऐसे में खानदानी या ऊंची जात वाले लोगों की जरूरत बखान की जा सकती है। 
यह बात आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार में जदयू की सरकार देश में अब गिनीचुनी गैरएनडीए सरकारों में से एक है, और यह पार्टी मोदी के मुकाबले खड़े किए जा रहे जनता परिवार नाम के एक नए गठबंधन का एक प्रमुख हिस्सा रहने वाली है। इसी जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव जब संसद में कुछ बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो हमारे जैसे लोग ध्यान से सुनते हैं कि देश की एक प्रमुख सोच सामने आने वाली है। राष्ट्रीय राजनीति में जदयू की भूमिका को देखते हुए यह जरूरी है कि बिहार में भी मुख्यमंत्री के पद पर वह गंभीर सोच रखने वाले किसी व्यक्ति को रखे, उसके बिना यह पार्टी ही गैरगंभीर लगने लगेगी जो कि लोकतंत्र में विपक्ष के लिए बड़े नुकसान की बात होगी। इस पार्टी के लिए यह एक राजनीतिक फैसला हो सकता है कि एक महादलित को मुख्यमंत्री बनाया जाए, लेकिन जाति से परे यह सोचना भी जरूरी है कि एक गैरजिम्मेदार बड़बोड़े को मुख्यमंत्री न बनाया जाए। इस देश ने अंबेडकर की शक्ल में देश के सबसे विद्वान लोगों में से एक को देखा है, जिनकी बातों से न सिर्फ दलितों के बीच, बल्कि तमाम हिंदुस्तानियों के बीच गर्व पैदा होता है। इसलिए भारतीय लोकतंत्र में उटपटांग बातों के लिए किसी को जाति की रियायत नहीं दी जा सकती।

म्युनिसिपलों में कांगे्रस-भाजपा की उलझी हालत की दिक्कतें

5 जनवरी 2015
संपादकीय

जम्मू-कश्मीर में पिछले एक पखवाड़े में चुनावी नतीजे आने के बाद भी सरकार बनना मुमकिन नहीं हो पा रहा है, क्योंकि बहुमत किसी एक पार्टी या खेमे के पास नहीं है और तरह-तरह की जोड़-तोड़ चल रही है।  दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में कल नगरीय निकायों के जो चुनावी नतीजे सामने आए हैं, उनमें जगह-जगह एक अलग तरह के टकराव की नौबत दिखाई पड़ रही है। महापौर या पालिका-पंचायत अध्यक्ष अगर कांगे्रस के हैं, तो वहां पर पार्षदों का बहुमत भाजपा का है, और ऐसे में वहां सभापति भाजपा का बनना तय है। दोनों पार्टियों के बीच राज्य के स्तर पर जितनी कड़वाहट है, और जितना टकराव है, उसके चलते हो सकता है कि म्युनिसिपल की बैठकों में काम धरे रह जाए, और इन दोनों पार्टियों के बीच टकराव ही चलता रहे। राजधानी रायपुर के नगर निगम में पूरे पांच बरस बैठकों से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों के मंच तक कांगे्रस की महापौर और भाजपा के सभापति या भाजपा के राज्य सरकार के मंत्री के बीच तनातनी और टकराव का नजारा रहा। 
भारत में लोकतांत्रिक शासन-प्रशासन में म्युनिसिपल और पंचायत के राज की जितनी स्वायत्तता सैद्धांतिक स्तर पर जितनी दिखती है, हकीकत में उतनी नहीं रहती। राज्य सरकार के स्तर से म्युनिसिपलों और पंचायतों पर तरह-तरह से काबू रखा जाता है, और ऐसे में राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा बड़ी संख्या में म्युनिसिपलों में जब विपक्ष में रहेगी, तो राज्य सरकार के स्तर से कांगे्रस के निर्वाचत महापौर-अध्यक्ष के काम में दखल का एक खतरा रहेगा। इस तरह का टकराव लोकतांत्रिक परिपक्वता की कमी भी साबित करेगा, और शहरों का विकास भी इससे रूकेगा। हमको ऐसा भी लगता है कि जहां-जहां ऐसे टकराव और तनाव के लिए जो लोग जिम्मेदार रहेंगे, उनको और उनकी पार्टी को अगले चुनाव में नुकसान भी होगा। यह भी हो सकता है कि इस बार के चुनाव में भी नुकसान का कुछ जिम्मा पिछले पांच बरसों के ऐसे टकराव पर रहा हो, लेकिन स्थानीय चुनावों के लिए जितने तरह के अलग-अलग पहलू जिम्मेदार होते हैं, उनके बीच हम जीत-हार के विश्लेषण का अतिसरलीकरण करना भी नहीं चाहते।
कांगे्रस और भाजपा के जो भी निर्वाचित लोग स्थानीय संस्थाओं में पार्टी की राजनीति को ऊपर रखकर काम करना चाहेंगे, वे अपनी जिम्मेदारी के साथ दगाबाजी भी करेंगे। स्थानीय संस्थाओं में पहली जिम्मेदारी वहां के बुनियादी कामकाज की होती है, और इसके ऊपर गुटबाजी या राजनीति को नहीं आने देना चाहिए। यह थोड़ी मुश्किल सलाह इसलिए है कि जब प्रदेश के स्तर पर कांगे्रस और भाजपा के बीच एक टकराव चल रहा है, और वह आगे खड़े पंचायत चुनाव के बाद भी जारी रहते दिख रहा है, तो छोटे निर्वाचित प्रतिनिधियों को काम को प्राथमिकता देना कुछ मुश्किल भी लग सकता है। ऐसे में दोनों पार्टियों के बड़े से लेकर छोटे नेताओं तक एक ऐसे तालमेल और आपसी सहमति की जरूरत है जिसके चलते स्थानीय जिम्मेदारियों की अनदेखी न हो। यह कैसे हो सकेगा, यह अंदाज लगाना हमारे लिए आसान नहीं है, लेकिन यह समझना आसान है कि प्रदेश के जनहित में राज्य सरकार से लेकर एक पार्षद तक, हर किसी को राजनीति से ऊपर काम की जिम्मेदारी को मानना पड़ेगा। ऐसा न करने वाले अपने राजनीतिक भविष्य का नुकसान भी करेंगे।