9 जनवरी 2015
संपादकीय
प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि एक समय हिंदुस्तानी संभावनाओं को तलाशने के लिए दूसरे देशों में जाते थे, अब संभावनाएं भारत में ही मौजूद हैं, और लोगों को अब भारत आकर यहां काम करना चाहिए। उन्होंने पासपोर्ट और वीजा जैसी कुछ सहूलियतों का जिक्र किया जो कि पिछले महीने में लागू की गई हैं। वे इस तरह की बातें अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में भी प्रवासी भारतीयों के बीच बोल चुके हैं, लेकिन भारत में बसे हुए लोग यह जानते हैं कि हकीकत इससे काफी अलग है। भारत में काम करने की ऐसी संभावनाएं रहें, जिनकी वजह से भारत के लोग दूसरे देशों में जाकर काम करने के बजाय यहां काम करना पसंद करें, या बाहर से भारत लौटकर यहां काम आगे बढ़ाएं, ये बातें मोदी की भावनाएं तो हो सकती हैं, लेकिन देश में आज के हालात इस तरह के हैं नहीं।
भाषणों और घोषणापत्रों से परे, भारत के सरकारी दफ्तरों में कामकाज का ढर्रा, यहां पर सरकार के भीतर कदम-कदम पर भयंकर भ्रष्टाचार, यहां अदालतों की धीमी रफ्तार, और सड़कों जैसी सार्वजनिक जगहों पर सत्ता पर काबिज लोगों का सामंती कब्जा, देखने लायक है। आज दूसरे देशों में जो लोग काम कर चुके हैं, वे यह देखकर हक्का-बक्का रह जाते हैं कि भारत में नेता और अफसर, जज और संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे हुए तथाकथित-स्वघोषित वीवीआईपी लोग किस तरह आम जनता की जिंदगी को कुचलते हुए अपनी हर राह को राजपथ बनाने पर उतारू रहते हैं। दुनिया के किसी भी सभ्य देश में ऐसा नहीं होता।
दूसरी तरफ देश से लेकर छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश तक यह चर्चा ही चर्चा चल रही है कि गैरजरूरी कानूनों और नियमों को बदला जाए। यह देश आजाद हुए पौन सदी होने को है, और छत्तीसगढ़ को राज्य बने पन्द्रह बरस हो जाएंगे। ऐसे में सरकारों को अब तक किसने रोका था कि वे गैरजरूरी और मुर्दा कानूनों को अंग्रेजों की विरासत के टोकरे की तरह ढोना बंद करें, और इन्हें खत्म करें। लेकिन कई तरह के आयोग और कई तरह की कमेटियां देश-प्रदेश में बनती रहती हैं, बनते आई हैं, लेकिन उनकी सिफारिशों के बाद भी सरकारी कामकाज आसान करने की कोशिश नहीं हुई। दरअसल सरकारी जटिलताएं जितनी अधिक रहती हैं, उतनी ही गुंजाइश रिश्वत की रहती है।
कहने को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह नारा अब जरूर लगा रहे हैं कि उन्होंने हिंदुस्तानी अफसरशाही की कुख्यात लालफीताशाही के लाल फीते से लाल कालीन बुन दिया है जो कि कारोबारियों के स्वागत के लिए बिछा है। लेकिन सरकारी कामकाज से जिनका वास्ता पड़ता है, वे जानते हैं कि पटवारी से लेकर ऊपर तक कदम-कदम पर अडंगा ही अडंगा देखते हैं। छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में जमीनों के मामले में तहसीलदार के स्तर पर इस तरह के नए-नए नियम जोड़े गए हैं जिनका मकसद सिवाय वसूली-उगाही के और कुछ नहीं हो सकता। एक तरफ तो सरकार गैरजरूरी नियम-कानून खत्म करने की बात करती है, दूसरी तरफ उसके कामकाज में लोगों के लिए ऐसे रोड़े बिछाना बढ़ाया जा रहा है कि आम जनता की जिंदगी इतनी मुश्किल हो जाए कि वह हजारों-लाखों की रिश्वत देने पर मजबूर हो।
हो सकता है कि प्रधानमंत्री के स्तर पर केंद्र सरकार और उनके कहे हुए राज्य सरकारें बड़े-बड़े लोगों के लिए कानूनों को लचीला बना दें, जैसा कि अभी जमीन अधिग्रहण कानून के मामले में किया गया है, लेकिन आम जनता की जिंदगी को नर्क बना देने वाला सरकारी इंतजाम देश की निन्यानवे फीसदी जनता के लिए बदलते नहीं दिख रहा है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें