6 जनवरी 2015
संपादकीय
बिहार के बड़बोले और अटपटे, महादलित तबके से आए हुए, और नीतीश कुमार के एक नैतिक-इस्तीफे के बाद वैकल्पिक मुख्यमंत्री बने जीतन राम मांझी ने फिर एक गैरजिम्मेदार बयान दिया है, और अपने-आपको एक आम आदमी बताते हुए कहा है कि मीडिया उनकी सहजता को तोड़-मरोड़कर मतलब निकालता है। उनका ताजा बयान नक्सलियों द्वारा ठेकेदारों और भ्रष्ट अफसरों से वसूली के बारे में है, और उन्होंने कहा है कि भ्रष्टाचार करने वाले ठेकेदार-अफसर से अगर नक्सली टैक्स वसूलते हैं, तो उसमें कुछ गलत नहीं है। इसके पहले मांझी ने गैरजिम्मेदार बयानों का एक लंबा इतिहास अपने कुछ महीनों के इस कार्यकाल में रच दिया है, और उनकी पार्टी के बारे में अब यह सोचना पड़ रहा है कि किस लिए उसने ऐसा मुख्यमंत्री चुना, और किस लिए वह ऐसी बकवास को बर्दाश्त कर रही है?
नक्सलियों का खतरा झेलने वाले राज्यों में बिहार सबसे बड़ा राज्य है। ऐसे राज्य का मुख्यमंत्री अगर नक्सल-उगाही को सही ठहराने का काम करता है, तो उसके बाद वहां की पुलिस क्या खाकर नक्सलियों को पैसा देने वालों पर कार्रवाई करेगी? लेकिन मांझी ने अपनी राजनीतिक समझ, सोच, और अपनी बेअक्ली को बार-बार साबित किया है, और अब उनको जारी रखने वाली पार्टी इस सिलसिले को आगे बढ़ाकर अपने-आपको गैरजिम्मेदार और बेअक्ल साबित कर रही है। मांझी की ऐसी बातों से एक सामाजिक दिक्कत यह है कि उनके महादलित तबके के बारे में भारत के सवर्ण लोगों की जो सोच है, उसे जायज साबित करने का काम मांझी कर रहे हैं। किसी का आम या सहज होना उसे ऐसा हक नहीं देता कि वह आए दिन निहायत गैरजरूरी और निहायत नाजायज बातें करे। उनकी तरह-तरह की बेतुकी बातों से एक नुकसान यह भी हो रहा है कि आम लोगों को लोग शासन के लायक मानने पर शक कर सकते हैं, और ऐसे में खानदानी या ऊंची जात वाले लोगों की जरूरत बखान की जा सकती है।
यह बात आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार में जदयू की सरकार देश में अब गिनीचुनी गैरएनडीए सरकारों में से एक है, और यह पार्टी मोदी के मुकाबले खड़े किए जा रहे जनता परिवार नाम के एक नए गठबंधन का एक प्रमुख हिस्सा रहने वाली है। इसी जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव जब संसद में कुछ बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो हमारे जैसे लोग ध्यान से सुनते हैं कि देश की एक प्रमुख सोच सामने आने वाली है। राष्ट्रीय राजनीति में जदयू की भूमिका को देखते हुए यह जरूरी है कि बिहार में भी मुख्यमंत्री के पद पर वह गंभीर सोच रखने वाले किसी व्यक्ति को रखे, उसके बिना यह पार्टी ही गैरगंभीर लगने लगेगी जो कि लोकतंत्र में विपक्ष के लिए बड़े नुकसान की बात होगी। इस पार्टी के लिए यह एक राजनीतिक फैसला हो सकता है कि एक महादलित को मुख्यमंत्री बनाया जाए, लेकिन जाति से परे यह सोचना भी जरूरी है कि एक गैरजिम्मेदार बड़बोड़े को मुख्यमंत्री न बनाया जाए। इस देश ने अंबेडकर की शक्ल में देश के सबसे विद्वान लोगों में से एक को देखा है, जिनकी बातों से न सिर्फ दलितों के बीच, बल्कि तमाम हिंदुस्तानियों के बीच गर्व पैदा होता है। इसलिए भारतीय लोकतंत्र में उटपटांग बातों के लिए किसी को जाति की रियायत नहीं दी जा सकती।
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