हमको मालूम है आंकड़ों की हकीकत लेकिन...

12 जनवरी 2015
संपादकीय
देश भर में किस प्रदेश में कितने शौचालय बने हैं, इसके आंकड़े केंद्र सरकार से जारी हुए हैं। इसमें पता लगता है कि कौन सा राज्य सबसे आगे है, और कौन सा पीछे है। लेकिन सरकारी आंकड़े अपने-आपमें कब तक झांसा देने वाले होते हैं, जब तक तर्क के साथ उनका विश्लेषण न किया जाए। अब दस करोड़ आबादी वाले राज्य में जितने शौचालय बने हैं उनकी तुलना अगर दो करोड़ आबादी वाले राज्य से होगी तो यह लगेगा कि छोटा राज्य एकदम पिछड़ा हुआ है। सरकार के आंकड़े तो नासमझ होते हैं, लेकिन उनके आधार पर खबरें बनाने वाले बड़े-बड़े अखबार भी उसी दर्जे की नासमझी जाहिर करते हैं। लेकिन यह बात सिर्फ सरकार के साथ नहीं है, यह बात आंकड़ों से खेलने वाले हर किसी के साथ है जो कि अंकों को अंतिम सत्य मान लेते हैं। 
अभी पिछले कुछ महीनों में दो-चार विमान दुर्घटनाएं हुईं तो लोगों ने यह मान लिया कि यह पूरा बरस बुरी हवाई दुर्घटनाओं का रहा। बहुतों को लगा कि हवाईयात्रा सुरक्षित नहीं रह गई है और बड़ी संख्या में लोग मर रहे हैं। लेकिन दुर्घटनाओं में मौतों के आंकड़े अगर इन आंकड़ों के बिना देखें जाएं कि पिछले बरसों में हवाई मुसाफिर कितने बढ़े हैं, और हवाई सफर कितना बढ़ा है, और उस अनुपात में ही अगर मौतों के आंकड़ों को परखा जाए, तो ही सही तस्वीर सामने आएगी। 
जिंदगी में हर आम इंसान के पास न तो इतना वक्त होता कि वे आंकड़ों का विश्लेषण कर सकें, और न ही हर किसी की इतनी समझ होती। ऐसे में सरकार या सरकार से परे के जो लोग किसी तरह के तथ्य और विश्लेषण सामने रखते हैं, उनको सामाजिक हकीकत बताने के लिए, अर्थव्यवस्था और आबादी के आंकड़े बताने के लिए कुछ मेहनत करनी चाहिए। अब छत्तीसगढ़ के बस्तर को ही लें, तो वहां पर एनएमडीसी की लोहा खदानों से हर बरस होने वाली दसियों हजार करोड़ की कमाई के चलते खदान वाले जिले में हर व्यक्ति की औसत आय को पूरे छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक गिन लिया गया था। अब अगर सिर्फ उसी आधार पर सरकार वहां के लोगों को अधिक मदद का हकदार नहीं मानती, तो फिर उनके साथ बेइंसाफी होती। इसी तरह छत्तीसगढ़ का ही एक दूसरा मामला है किसानों की आत्महत्या का। अभी दो बरस पहले तक इस राज्य में हर बरस सैकड़ों किसानों की आत्महत्या दर्ज होती थी। राज्य सरकार का तर्क यह था कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के चार्ट में किसी भी आत्महत्या करने वाले का पेशा किसान डालने पर उसका एक विश्लेषण किसान की आत्महत्या गिन लिया जाता था। पिछले दो बरस में छत्तीसगढ़ में एक भी किसान की आत्महत्या दर्ज नहीं हुई है। लेकिन किसानी की तस्वीर न तो पहले उतनी भयानक थी, और न ही एकदम से अब इतनी शानदार हो गई है। राज्य के अफसरों ने आत्महत्या के आंकड़े दर्ज करते समय किसान लिखना बंद कर दिया, और अब देश में जो लोग विश्लेषण करते हैं, उनको छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई मामला मिलता ही नहीं। पहले जब ऐसी सैकड़ों आत्महत्याएं दर्ज होती थीं, तब भी किसानी-आत्महत्या के वैसे मामले होते नहीं थे। और आज भी असल तस्वीर ऐसी नहीं है कि एक भी किसानी-आत्महत्या न होती हो। 
इसलिए हमारा यह मानना है कि आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के लिए सिर्फ कैलकुलेटर काफी नहीं होता, एक सामान्य समझ-बूझ और तर्कों का इस्तेमाल भी करना चाहिए, और अगल-बगल की तस्वीर के साथ जोड़कर ही किसी छोटी तस्वीर को देखना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें