संपादकीय
13 जनवरी 2015
मध्यप्रदेश के स्कूलों में योग शिक्षा सूर्य नमस्कार के साथ शुरू की गई है। कुछ गैरहिंदू समुदायों ने इसका विरोध किया है जिनके धर्म में सूर्य की उपासना की जगह नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र में एक अभूतपूर्व समर्थन के साथ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का फैसला लिया गया और उसकी घोषणा हुई। दुनिया भर के 170 से अधिक देशों ने इसका समर्थन किया और इसके लिए इक्कीस जून की तारीख तय की गई। अब यह जाहिर है कि इतने देश कोई हिंदू राष्ट्र तो हो नहीं सकते, इनमें अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग होंगे, और अगर भारत या कोई भी इस पर अड़ेंगे कि इस योग का मतलब हिंदू योग है, तो जाहिर है कि योग को बढ़ावा देने का मकसद ही परास्त हो जाएगा, और ऐसी जीत से हिंदू धर्म को कुछ भी हासिल नहीं होगा। अगर भारतीय योग पद्धति को हिंदू धर्म की किसी पद्धति के रूप में बढ़ावा दिया जाएगा, तो जाहिर है कि भारत के ही बहुत से दूसरे समाज जिनकी उपासना पद्धति हिंदू उपासना पद्धति से अलग है, उनके लोग इस योग से परे रहेंगे।
जब नरेन्द्र मोदी ने दुनिया में योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा, तो जाहिर तौर पर वह किसी धर्म से परे था। भारत के हिंदू समाज में भी योग का मकसद धार्मिक उपासना न होकर तन और मन की सेहत रहता है। ऐसे फायदेमंद योग पर हिंदू धर्म की कुछ बातों को लादकर देश का नुकसान किया जा रहा है। होना तो यह चाहिए कि योग की अलग-अलग प्रचलित पद्धतियों में से भी केंद्र और राज्य सरकारों को भी धर्मनिरपेक्ष पद्धतियां छांटनी चाहिए, और किसी धर्म की सेहत सुधारने के बजाय देश की सेहत सुधारना चाहिए। खासकर सरकारों को अपने-आपको धार्मिक रीति-रिवाजों से, धर्म-स्थानों से, धार्मिक-कार्यक्रमों से परे रखना चाहिए वरना ऐसी सरकार जनता के सभी तबकों का विश्वास भी नहीं जीत सकतीं, और जिस भारतीय संविधान की शपथ लेकर सरकारें बनती हैं, वह संविधान ही सरकार को धार्मिक पक्षपात की इजाजत नहीं देता।
लेकिन सरकारें मध्यप्रदेश से परे भी आज कुछ और राज्यों में एक दकियानूसी सोच को बढ़ावा दे रही हैं। मप्र की तरह ही गोवा में भी भाजपा की सरकार है, और वहां के युवक और खेल मंत्री का बयान सामने आया है कि सरकार समलैंगिक और किन्नर (एलजीबीटी) युवाओं का इलाज कराने के लिए केंद्रों की स्थापना पर विचार कर रही है ताकि उन्हें 'सामान्यÓ बनाया जा सके। यह बात अपने-आपमें ऐसी भयानक नासमझी की अवैज्ञानिक बात है कि इस पर उस पूरी दुनिया की एक नापसंदगी भारत को झेलनी पड़ सकती है जहां पर नरेन्द्र मोदी जाकर पूंजी निवेश जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। आज जब देश में तीसरे जेंडर को कानूनी मान्यता दी जा रही है, तो गोवा का यह मंत्री लगातार कभी समुद्रतट के छोटे कपड़ों के खिलाफ बयान देता है, तो कभी शराब के खिलाफ। इस तरह की शुद्धता का दुराग्रह लोगों पर लादने से मोदी सरकार और भाजपा की एक कट्टरवादी और दकियानूसी छवि बनती और बढ़ती जा रही है।
आज ही की एक दूसरी खबर है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी पार्टी के सांसद साक्षी महाराज को उनके अवांछित बयानों पर एक नोटिस जारी किया है। साक्षी महाराज लगातार हिंदू महिलाओं से चार-चार बच्चे पैदा करवाने में लगे हुए हैं, ताकि उनके मुताबिक मुस्लिम आबादी जिस तरह बढ़ती है, उसी तरह हिंदू आबादी को भी बढ़ाया जाए। भाजपा को देश भर में अपने सांसदों, मंत्रियों, और नेताओं के बयानों से उसे खुद को हो रहे नुकसान के बारे में सोचना चाहिए। हमारा यह मानना है कि भाजपा का नुकसान देश के लिए महत्वहीन हो सकता है, लेकिन देश की वैज्ञानिक सोच और देश के साम्प्रदायिक सद्भाव को जो नुकसान ऐसे नाजायज बयानों से, या सरकारों के गैरधर्मनिरपेक्ष फैसलों से हो रहा है, वह नुकसान मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी बना रहेगा। मोदी और शाह को इस बारे में सोचने की जरूरत है।

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