5 जनवरी 2015
संपादकीय
जम्मू-कश्मीर में पिछले एक पखवाड़े में चुनावी नतीजे आने के बाद भी सरकार बनना मुमकिन नहीं हो पा रहा है, क्योंकि बहुमत किसी एक पार्टी या खेमे के पास नहीं है और तरह-तरह की जोड़-तोड़ चल रही है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में कल नगरीय निकायों के जो चुनावी नतीजे सामने आए हैं, उनमें जगह-जगह एक अलग तरह के टकराव की नौबत दिखाई पड़ रही है। महापौर या पालिका-पंचायत अध्यक्ष अगर कांगे्रस के हैं, तो वहां पर पार्षदों का बहुमत भाजपा का है, और ऐसे में वहां सभापति भाजपा का बनना तय है। दोनों पार्टियों के बीच राज्य के स्तर पर जितनी कड़वाहट है, और जितना टकराव है, उसके चलते हो सकता है कि म्युनिसिपल की बैठकों में काम धरे रह जाए, और इन दोनों पार्टियों के बीच टकराव ही चलता रहे। राजधानी रायपुर के नगर निगम में पूरे पांच बरस बैठकों से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों के मंच तक कांगे्रस की महापौर और भाजपा के सभापति या भाजपा के राज्य सरकार के मंत्री के बीच तनातनी और टकराव का नजारा रहा।
भारत में लोकतांत्रिक शासन-प्रशासन में म्युनिसिपल और पंचायत के राज की जितनी स्वायत्तता सैद्धांतिक स्तर पर जितनी दिखती है, हकीकत में उतनी नहीं रहती। राज्य सरकार के स्तर से म्युनिसिपलों और पंचायतों पर तरह-तरह से काबू रखा जाता है, और ऐसे में राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा बड़ी संख्या में म्युनिसिपलों में जब विपक्ष में रहेगी, तो राज्य सरकार के स्तर से कांगे्रस के निर्वाचत महापौर-अध्यक्ष के काम में दखल का एक खतरा रहेगा। इस तरह का टकराव लोकतांत्रिक परिपक्वता की कमी भी साबित करेगा, और शहरों का विकास भी इससे रूकेगा। हमको ऐसा भी लगता है कि जहां-जहां ऐसे टकराव और तनाव के लिए जो लोग जिम्मेदार रहेंगे, उनको और उनकी पार्टी को अगले चुनाव में नुकसान भी होगा। यह भी हो सकता है कि इस बार के चुनाव में भी नुकसान का कुछ जिम्मा पिछले पांच बरसों के ऐसे टकराव पर रहा हो, लेकिन स्थानीय चुनावों के लिए जितने तरह के अलग-अलग पहलू जिम्मेदार होते हैं, उनके बीच हम जीत-हार के विश्लेषण का अतिसरलीकरण करना भी नहीं चाहते।
कांगे्रस और भाजपा के जो भी निर्वाचित लोग स्थानीय संस्थाओं में पार्टी की राजनीति को ऊपर रखकर काम करना चाहेंगे, वे अपनी जिम्मेदारी के साथ दगाबाजी भी करेंगे। स्थानीय संस्थाओं में पहली जिम्मेदारी वहां के बुनियादी कामकाज की होती है, और इसके ऊपर गुटबाजी या राजनीति को नहीं आने देना चाहिए। यह थोड़ी मुश्किल सलाह इसलिए है कि जब प्रदेश के स्तर पर कांगे्रस और भाजपा के बीच एक टकराव चल रहा है, और वह आगे खड़े पंचायत चुनाव के बाद भी जारी रहते दिख रहा है, तो छोटे निर्वाचित प्रतिनिधियों को काम को प्राथमिकता देना कुछ मुश्किल भी लग सकता है। ऐसे में दोनों पार्टियों के बड़े से लेकर छोटे नेताओं तक एक ऐसे तालमेल और आपसी सहमति की जरूरत है जिसके चलते स्थानीय जिम्मेदारियों की अनदेखी न हो। यह कैसे हो सकेगा, यह अंदाज लगाना हमारे लिए आसान नहीं है, लेकिन यह समझना आसान है कि प्रदेश के जनहित में राज्य सरकार से लेकर एक पार्षद तक, हर किसी को राजनीति से ऊपर काम की जिम्मेदारी को मानना पड़ेगा। ऐसा न करने वाले अपने राजनीतिक भविष्य का नुकसान भी करेंगे।

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