पड़ोस की मौतों को अनदेखा करने वालों के लिए दो बातें

संपादकीय
23 जनवरी 2015
पिछले कुछ महीनों में ताकतवर लोगों के मामलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई तरह के रूख दिखाए। एक तरफ तो सहारा कम्पनी के मालिक को जमानत के लिए हजारों करोड़ की शर्त रखी, और उसका इंतजाम न होने पर महीनों से सुब्रत राय जेल में है। दूसरी तरफ एक अभूतपूर्व इंतजाम की इजाजत देते हुए भारत की सर्वोच्च अदालत ने एक किस्म से जेल में सुब्रत राय को एक दफ्तर चलाने का इंतजाम दिया ताकि वे अपनी जायदाद बेचकर जमानत की रकम जुटा सकें। दूसरी तरफ सजा के खिलाफ सलमान खान जैसे अरबपति-अभिनेता का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। और आज सुप्रीम कोर्ट सहित दिल्ली की अदालतें बंद हैं क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति के लिए दिल्ली शहर सुरक्षा तैयारी कर रहा है। कुछ और मामले भी बड़े लोगों के ऐसे रहे जिन पर अदालती रूख लोगों को समझ नहीं आया। महाराष्ट्र की एक छोटी अदालत ने जिस तरह पुलिस और सरकार की सिफारिश पर बार-बार संजय दत्त को जेल से घर जाने की छूट दी, वह भी आम लोगों को हक्का-बक्का करने वाली थी। 
लोकतंत्र के भीतर आम और खास का फर्क बहुत ही जाहिर रहता है। ताकतवर लोगों के लिए तरह-तरह की छूट के इंतजाम हो जाते हैं, और गरीब अपनी सजा पूरी हो जाने के बाद भी जेल से रिहा नहीं हो पाते। सड़क किनारे से गरीबों की गुमटियां हटा दी जाती हैं, और ताकतवर लोग वक्त पूरा होने के बाद भी बरसों तक सरकारी बंगलों पर काबिज रहते हैं। आम और खास के ऐसे फर्क के खिलाफ ही भारत में कई राज्यों में नक्सल हिंसा को जगह मिली, और आज छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र सरहद पर जब नक्सली अमरीकी राष्ट्रपति के भारत आगमन के खिलाफ गाडिय़ां जला रहे हैं, तो वे आर्थिक असमानता पर टिके हुए समाज की हिंसा का मुद्दा ही उठा रहे हैं, जो कि देश के भीतर भी है, और दुनिया के देशों के बीच भी है। 
ऐसे माहौल में कुछ दिनों में जब अमरीकी राष्ट्रपति भारतीय रेडियो पर बोलने वाले हैं, और भारतीय प्रधानमंत्री ने जनता से सवाल मांगे हैं कि वह ओबामा से क्या पूछना चाहती है, तो देश के लोगों को इस मौके का इस्तेमाल करके दुनिया के इस सबसे बड़े दादा से सवाल पूछने चाहिए। भारत की सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों के चलते हुए, और फौजी जरूरतों को देखते हुए इस बात को एक बड़ी कामयाबी मान रही है कि भारतीय इतिहास में पहली बार गणतंत्र दिवस पर बराक ओबामा भारत आ रहे हैं। लेकिन जब वे भारत की जनता के पूछे गए सवालों को देखने वाले हैं, तो भारत के जागरूक लोगों को ट्विटर और दूसरे तरीके से अमरीकी राष्ट्रपति से वे तमाम सवाल करने चाहिए जो कि अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, और दूसरे देशों की कब्रों से नहीं उठ सकते। पिछले एक दशक में अमरीकी हमलों ने बिना कोई फर्क किए हुए जिस तरह से बेकसूर आम जनता को हवाई हमलों में थोक में मारा है, उन्हें लेकर दुनिया के इस सबसे ताकतवर आदमी से सवाल करने चाहिए। 
आज का वक्त ऐसा है कि लोग बिना वजह कोई सवाल भी नहीं करना चाहते। लोग कड़वी बातें कहना भी नहीं चाहते। लेकिन हमारा मानना है कि सरकारें तो हो सकता है कि अमरीकापरस्त हो जाएं, लेकिन जनता के बीच तो ऐसा तबका है ही जो कि अमरीकी हिंसा और उसके साम्राज्यवादी विस्तार के खिलाफ है। अमरीकी राष्ट्रपति के आने का विरोध करने, और मुद्दे उठाने का जिम्मा अकेले नक्सलियों पर छोड़ देने से यह भारतीय लोकतंत्र की नाकामयाबी होगी। आज भी इस देश में और इंटरनेट पर ऐसे बहुत से जनमंच खुले हुए हैं जहां पर लोग बराक ओबामा के लिए सवाल उछाल सकते हैं, उठा सकते हैं, और उन सबको अमरीकी सरकार की ताकत भी मिटा नहीं सकती। आज अगर हिन्दुस्तानी यह सोचकर अमरीकी सरकार के जुर्मों को अनदेखा करेंगे कि ये हमले हिन्दुस्तानियों पर नहीं हो रहे, तो ऐसे हमले भारत से बहुत दूर भी नहीं हैं। अमरीका से अगर भारत का जागरूक तबका भी सवाल नहीं करेगा, तो यह इस देश की राजनीतिक चेतना की बेइज्जती होगी। 
हम सुप्रीम कोर्ट में बड़े लोगों के साथ हो रहे अलग किस्म के बर्ताव से लेकर दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह के साथ हो रहे अलग किस्म के रियायती बर्ताव को एक साथ मिलाकर इसलिए लिख रहे हैं कि दुनिया में ताकतवर और कमजोर लोगों के बीच एक बहुत बड़ा फासला बन चुका है, और इसके खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है। अपने आरामदेह घरों में चैन से बैठे हुए लोग पड़ोस की मौतों को अनदेखा करते हुए, अपने लिए मौत को न्यौता ही देते हैं। 

जो खूबियां गिनाने से परहेज करे उसकी गिनाई खामियों की विश्वसनीयता नहीं होती

22 जनवरी 2015

संपादकीय

आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक देश के भूतपूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने किरण बेदी की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए उनमें एक अच्छे मुख्यमंत्री की संभावनाएं गिनाई हैं। अरविंद केजरीवाल के लिए मतदान के पहले इससे अधिक नुकसानदेह और शायद कुछ भी नहीं हो सकता था कि उनकी नींव की एक चट्टान खिसककर किरण बेदी की प्रतिमा के लिए चबूतरा बनते दिख रही हो। कल की ही एक दूसरी बात और है जिसे लेकर आज हम यहां इस मुद्दे पर लिख रहे हैं, कांग्रेस के सबसे वजनदार लोगों में से एक जनार्दन द्विवेदी ने मोदी की तारीफ में काफी कुछ कहा है, और लोग इसे हक्का-बक्का होकर देख रहे हैं कि क्या कृष्णा तीरथ के बाद जनार्दन द्विवेदी भी? लेकिन मोदी की ऐसी तारीफ करने वाले कुछ और कांग्रेस नेताओं में शशि थरूर भी रहे हैं, और उसे थरूर की कानूनी दिक्कतों से जुड़कर देखा गया कि क्या वे मोदी की रहम पाने के लिए उनकी तारीफ कर रहे थे? 
भारत की राजनीति में बड़ेदिल की गुंजाइश कम दिखती है। लोग अगर एक बयान किसी की तारीफ में देते हैं, तो उसे दल-बदल का एक आसार मान लिया जाता है। लोग अगर किसी के खिलाफ एक बयान देते हैं, तो वह बगावत मान लिया जाता है। इसके साथ-साथ अगर हम संसद के भीतर मतदान के पहले की बहस को देखें, मतदान को देखें, तो उसे दल-बदल कानून से जोड़ दिया गया है, मतलब यह कि लोग अपनी पार्टी की नीति के खिलाफ वोट नहीं डाल सकते। नतीजा यह होता है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत में देश की सबसे महत्वपूर्ण बहस में दिल और दिमाग का खुलकर इस्तेमाल करने की कोई संभावना नहीं बचती। लोग अपनी पार्टी के दायरे के भीतर बंधे रहने को बेबस होते हैं, और देश के कुछ सबसे अच्छे दिमाग अपनी कुछ सबसे महत्वपूर्ण सोच सामने रख ही नहीं पाते। 
राजनीतिक दलों में जाने के साथ यह एक दिक्कत जुड़ी होती है। मनमोहन सिंह जैसे विख्यात अर्थशास्त्री से लेकर किरण बेदी जैसी अफसर तक, जिंदगी के कई दायरों के काबिल लोग राजनीति में जा तो सकते हैं, लेकिन फिर अपने-आपको उस पार्टी की नीतियों के भीतर कैद करके रखना पड़ता है, जिस पार्टी के चुनाव चिन्ह को वे ढोते हैं।  अब आज अगर आम आदमी पार्टी के एक सबसे बड़े संस्थापक शांति भूषण अगर खुलकर किरण बेदी की संभावनाओं को गिना रहे हैं, तो यह दिल्ली के इस चुनाव में एक राजनीतिक भूचाल गिना जा रहा है। 
लोकतंत्र में चुनावी इस्तेमाल से परे भी लोगों को मुंह खोलने का साहस रहना चाहिए, और सच को एक बोझ नहीं मानना चाहिए। जब तक लोग एक-दूसरे की खूबियों को मानने से मना करते रहेंगे, तब तक उनकी गिनाई गई खामियों का कोई वजन नहीं रहेगा। लोग ऐसे लोगों की बातों पर अधिक भरोसा करते हैं जो कि एकतरफा बातें नहीं करते, और सच को मानते हैं, सच कहते हैं। सच का वजन अधिक होता है, और इसे छोडऩा नहीं चाहिए। विरोधी की हर बात को बुरा कहने वाले लोगों की बातों पर जनता गौर करना भी छोड़ देती है।

टीवी पर बेहतर कार्यक्रमों की जगह है, और जरूरत भी

21 जनवरी 2015

संपादकीय

भारतीय हिंदी टीवी मनोरंजन को देखें, तो अचानक यह लगता है कि लोगों में हास्यबोध एकदम से बढ़ गया है। लोग कॉमेडी के कार्यक्रम का इंतजार करने लगे हैं, और फिल्म-टीवी अवार्ड समारोह में कॉमेडी सबसे अधिक हावी मनोरंजन दिख रहा है। एक सबसे लोकप्रिय कॉमेडी कलाकार कपिल शर्मा के बारे में यह खबर है कि हफ्ते में दो दिन आने वाला उनका कार्यक्रम अब घटाकर एक दिन करना पड़ रहा है क्योंकि उनके पास फिल्मों का इतना काम आ गया है कि वे टीवी कार्यक्रम को उतना समय नहीं दे पा रहे हैं। हिंदी मनोरंजन टीवी पर आमतौर पर जो सीरियल चलते हैं, उनके लिए गाली की तरह सास-बहू सीरियल शब्द का इस्तेमाल होता है, और हमको भी यही लगता है कि हिंदी दर्शकों की मानसिक स्थिति को खराब करने में ऐसे सीरियलों का ही सबसे बड़ा योगदान है। ऐसे में अगर हंसने और हंसाने को एक जगह मिल रही है, तो वह रोने और रूलाने के मुकाबले बहुत बेहतर नौबत है।
टीवी के मनोरंजन को कम आंकना ठीक नहीं है। लोग रोने से लेकर डराने तक को मनोरंजन मानते हैं, और हर किस्म के शो टीवी पर चलते हैं। इनका लोगों की सोच पर बड़ा असर होता है, और नकारात्मक, हिंसक, तनावपूर्ण, और नफरत की बातों को देख-देखकर लोगों की सोच भी ऐसी होने लगती है, मानो चारों तरफ समाज में सब बुरा ही बुरा है। ऐसे में जब हंसी के कुछ कार्यक्रम अच्छे बनते हैं, और वे लोगों को बांध लेते हैं, तो यह समझ आता है कि लोग अब भी हंसने पर कितना यकीन रखते हैं। 
अब यहां हम भारत के सरकारी टीवी चैनलों की अगर बात करें, तो एक स्वायत्तशासी प्रसार भारती के तहत आने के बावजूद दूरदर्शन सरकार की नीतियों से बंधा हुआ है, और वहां पर अब भी अच्छे कार्यक्रम बनते हैं, प्रसारित होते हैं, और उनकी संभावनाएं भी हैं। केंद्र सरकार को यह सोचना चाहिए कि जनता के बीच लोकप्रिय हो सकने वाले ऐसे कौन से चैनल लाए जा सकते हैं जिनसे कि लोगों को एक बेहतर मनोरंजन का विकल्प मिल सके। कॉमेडी के कार्यक्रमों ने तो यह साबित कर ही दिया है कि लोग एकता कपूर ब्रांड के पारिवारिक दुष्टता के सीरियलों से परे भी कुछ देखना चाहते हैं, और क्राईम पेट्रोल से परे भी। अब सरकार को यह सोचना चाहिए कि वह सिर्फ खबरों और संसद प्रसारण, या शास्त्रीय संगीत के प्रसारण तक अपने को सीमित न रखे, और सकारात्मक मनोरंजन की तरफ भी आगे बढ़े। 
इसी सिलसिले में हम यह भी कहना चाहेंगे कि छत्तीसगढ़ सहित देश के राज्यों को भी चाहिए कि वे अपने टीवी चैनल शुरू करें। आज भारत सरकार की नीति के तहत राजनीतिक दल भी अपने सेटेलाइट चैनल चला रहे हैं, तो ऐसा कोई कानून नहीं हो सकता जो कि किसी राज्य सरकार को अपना टीवी चैनल शुरू करने से रोके। राज्य के स्तर पर भी अच्छी सामग्री, अच्छी खबरें, जरूरत की जानकारी, और बेहतर मनोरंजन के साथ अगर स्थानीय संस्कृति और कला को बढ़ावा मिलेगा, तो इससे राज्य के दर्शकों का भला भी होगा। राज्य सरकारों को अपने बंधे-बंधाए दायरों से बाहर निकलकर अपने टीवी चैनलों के बारे में सोचना चाहिए, ताकि जनता को बेहतर कार्यक्रम मिल सकें।

भारतीय चुनावी राजनीति में टीवी और अखबार का फर्क

संपादकीय
20 जनवरी 2015
दिल्ली के चुनाव में किरण बेदी को अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक बहस की चुनौती दी, तो उन्होंने कहा कि वे विधानसभा के भीतर बहस करेंगी। जो लोग बहस करने में माहिर हैं, उनको इस तरह की चुनौतियां पेश करने में मजा आता है, और जनता भी यह उम्मीद करती है कि कुछ गरमागर्म बहस देखने मिले। लेकिन हर पार्टी के हर नेता का बहस में उतरना जरूरी नहीं होता है, और पार्टियों के पिछले कामकाज, उनके ताजा घोषणा पत्र, और उसके बाकी नेताओं के भाषण या बयान इसके लिए काफी माने जा सकते हैं। दिल्ली में चूंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बसेरा है, इसलिए वहां ऐसी कोशिश अधिक होती है, और घर-घर तक टीवी चैनलों की गाडिय़ां पहुंचकर बहस आगे बढ़ाती हैं। 
ऐसे में प्रिंट मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने मिजाज के मुताबिक, और अपनी तकनीकी सीमाओं के मुताबिक दर्शक और श्रोता का ध्यान कुछ मिनट से अधिक नहीं खींच पाता। शब्द हवा में घुल जाते हैं, और लोगों के पास किसी एक बात को दुबारा ध्यान से सुनने की गुंजाइश नहीं रहती। ऐसे में लोगों की बातों के बड़े छोटे-छोटे टुकड़े टीवी पर दिखाकर खबरों की जो दुकान चलाई जाती है, वह दर्शकों को किसी गंभीर नतीजे तक पहुंचने में मदद नहीं करतीं। बल्कि इससे लोगों को गलतफहमियां अधिक होती हैं। दूसरी तरफ छपे हुए अखबार में गंभीरता की संभावनाएं अब भी हैं, और आगे भी रहेंगी। इसलिए चुनावों के मौके पर अखबारों को यह चाहिए कि वे पार्टियों और उम्मीदवारों के बीच मुकाबले को सनसनी की तरह पेश करने के बजाय एक गंभीर विश्लेषण के रूप में छापकर जनता का राजनीतिक शिक्षण करने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करें। 
दिल्ली जिस तरह की धुंध से घिरी हुई है, वह मौसम से परे भी देश की राजनीति में धुंध फैलाते दिख रही है। कल तक नरेन्द्र मोदी की जिस लहर की चर्चा देश भर में करते हुए भाजपा थक नहीं रही थी, आज उसने अचानक बाहर से किरण बेदी को आयात करके मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है, और इसके साथ-साथ पिछली सरकार में कांग्रेस की केन्द्रीय मंत्री रही कृष्णा तीरथ को भी पार्टी में लाकर एक सनसनी फैलाई है। इससे हो सकता है कि भाजपा के हाथ दिल्ली में कुछ मजबूत हों, लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या इतने बरसों से दिल्ली में ताकतवर राजनीति कर रही भाजपा के पास किरण बेदी के पहले तक एक भी ऐसा असरदार चेहरा नहीं था जिसे कि मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जा सके? और वहां मौजूद उसके बड़े-बड़े नेता आज ताजा-ताजा आई हुई किरण बेदी के मुकाबले हाशिए पर क्यों धकेल दिए गए? खैर, चुनाव प्रचार के बीच में ऐसी बहुत सी घटनाएं होती हैं, जिनसे एक-एक, दो-दो फीसदी वोटों का फर्क होने की उम्मीद की जाती है, और कुछ ऐसी ही उम्मीद किरण बेदी को लेकर भाजपा की दिख रही है। 
टीवी चैनलों के टुकड़ा-टुकड़ा काम से परे प्रिंट मीडिया को चीजों का व्यापक विश्लेषण करना चाहिए, और दिल्ली के चुनाव के बहाने हम यह चर्चा कर रहे हैं। आने वाले दिन बताएंगे कि दिल्ली की राजनीति में मीडिया का कैसा दखल या असर रहा, लेकिन यह बात तय है कि एक गंभीर असर के लिए राजनीति को आज भी दो-चार रूपए दाम वाले सस्ते अखबारों की जरूरत पड़ती है, और इन्हीं अखबारों के सहारे लोकतंत्र और राजनीति में एक गंभीर पत्रकारिता की गुंजाइश बची हुई है। 

देश भर के भाजपा नेताओं के लिए किरण बेदी नाम का संदेश

19 जनवरी 2015
भारतीय राजनीति में मोदी की आंधी के बाद अभी दल-बदल और तोडफ़ोड़ से पार्टियों और नेताओं के बीच जमीन उसी तरह करवट ले रही है, जैसे कि भूकंप के बाद जमीन के भीतर की चट्टानें दुबारा जमते हुए सतह की मिट्टी तक को हिला देती हैं, और कई बड़े इमारतें गिर जाती हैं, कई इमारतें झुक जाती हैं। खासकर दिल्ली के चुनाव में आज जिस तरह भाजपा के खिलाफ चलने वाले आम आदमी पार्टी के, या अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े हुए नेता भाजपा में जा रहे हैं, उससे न सिर्फ बाकी पार्टियों को अपनी जमीन हिलते दिख रही है, बल्कि दिल्ली में भाजपा के पुराने नेताओं को भी अपनी नई जगह समझ नहीं आ रही है। कल तक जो दिल्ली में भाजपा के मुख्यमंत्री बनने की संभावना वाले दिख रहे थे, वे आज किरण बेदी को लेकर ऐसी चर्चाओं से सहमे हुए हैं, और बेजुबान से हो गए हैं। दिल्ली में भाजपा के उम्मीदवारों और नेताओं की ताजा फेहरिस्त देखें, तो उसमें आम आदमी पार्टी छोड़कर आए हुए कई नेता दिख रहे हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह की महाराष्ट्र में कांग्रेस सांसद रहते हुए टोल नाके पर गुंडागर्दी करने वाले नेता को भाजपा ने वहां अपना सांसद बनाकर छोड़ा। 
भारतीय राजनीति में यह एक संक्रमण काल चल रहा है जिसमें लोग अपनी नई संभावनाओं को तलाशते हुए विचारधारा, जाति, और धर्म से परे पार्टियों में जा रहे हैं, पार्टियां छोड़ रहे हैं। इस दौर की अकेली वजह पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को मिली एक अभूतपूर्व लोकप्रियता है, जिससे यह पार्टी आज कश्मीर की सरकार में भी भागीदार रहने के करीब है, और दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी के मंत्री और सांसद भी भाजपा में जाते हुए दिख रहे हैं। यूपीए की केन्द्र सरकार, और उसके पहले दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार में बाल विकास मंत्री रही कृष्णा तीरथ इन पंक्तियों के लिखने के बीच में ही भाजपा में शामिल हो गई हैं, और कांग्रेस की दिल्ली में चल रही प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया के उठाए सवाल पर पता लगा कि यह जानकारी कांग्रेस को इस पल तक नहीं थी। यह नौबत गैरभाजपाई पार्टियों के लिए दहशत की है, और भारतीय राजनीति में यह एक अलग किस्म का ध्रुवीकरण चल रहा है, क्योंकि गैरभाजपा दलों की संभावनाएं मजबूत नहीं दिख रही हैं। 
लेकिन इस बढ़ती हुई ताकत और लोकप्रियता के चलते भाजपा ने एक दूसरा काम यह भी किया है कि अपने पुराने और परंपरागत साथियों को उसने उनकी औकात दिखा दी है। महाराष्ट्र में शिवसेना गठबंधन सरकार में किस तरह घिसटते हुए आकर शामिल हुई है, यह सबने देखा है, और शिवसेना का दहाड़ता हुआ शेर भाजपा के सामने भीगी बिल्ली बन गया। अब इसके बाद पंजाब में अकाली दल के सामने इसी तरह का एक खतरा दिख रहा है। हो सकता है कि आगे चलकर दूसरे कुछ राज्यों में भी भाजपा के सहयोगी दलों, और एनडीए के भागीदारों को ऐसा नुकसान झेलना पड़े। लेकिन एनडीए के बाहर के लोग सीधे-सीधे भाजपा में शामिल होकर अपने राजनीतिक अस्तित्व को जिस तरह बचाने में लगे हैं, उससे ऐसा लगता है कि भारतीय राजनीति में नीति-सिद्धांत और विचारधारा अस्थाई रूप से निलंबित हैं, और भूकंप में जमीन के भीतर की चट्टानें हिलने के बाद अब तक बाहर की जमीन पूरी तरह थम नहीं पाई है। 
यह मौका बाकी पार्टियों के लिए भी अपने घर सम्हालने का भी है, और अपने काम के तौर-तरीकों को सुधारने का भी है। जिस तरह आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने अपनी जिंदगी की सबसे बुरी नौबत देख ली थी, उसी तरह 2014 के चुनाव में भी एक बार फिर गैरभाजपा, गैरएनडीए पार्टियों में अपनी जगह देख ली है। इसके बाद वे यहां से आगे बढ़ते हुए, ऊपर उठते हुए अपने को मजबूत भी बना सकती हैं। भाजपा की इस ऐतिहासिक और आक्रामक ताकत के मुकाबले ही जनता परिवार नाम से समाजवादी पार्टियों की एकजुटता की एक कोशिश चल रही है, और इंदिरा गांधी के मुकाबले 1977 के चुनाव में जनता पार्टी नाम का एक मोर्चा बना ही था, और कामयाब भी हुआ था। 
लेकिन एक बार फिर दिल्ली चुनाव की चर्चा करें, तो जिस तरह किरण बेदी भाजपा और इस चुनाव में पैराशूट से उतरी हैं, उससे भाजपा का स्थापित और परंपरागत ढांचा हिल गया है, बड़े-बड़े नेता सहम गए हैं, और ऐसे नेताओं के निजी नुकसान की कीमत पर भी एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में भाजपा फायदा पाने की कोशिश कर रही है। आने वाले दिनों में देश के दूसरे प्रदेशों में भी, या किसी लोकसभा या विधानसभा सीट पर गैरभाजपाई नेता, या गैरराजनीतिक लोग इस तरह आ सकते हैं, और दिल्ली की यह ताजा हलचल देश भर में अगर भाजपा के नेताओं को चौकन्ना नहीं करती है, तो यह उन नेताओं की लापरवाही और अदूरदर्शिता होगी, और वे किसी भी दिन खतरे में भी रहेंगे। यह किसी पार्टी के लिए एक बड़ा औजार है कि वह अपने मौजूदा नेताओं से परे भी किसी के बारे में रातोंरात सोच सकती है। इस किस्म के फैसले से हो सकता है कि भाजपा पूरे देश में अपने नेताओं को बिना कहे सावधान भी कर सके। 

मीडिया-अध्ययन के पैमाने तय करने की पहल समझदारी

संपादकीय
18 जनवरी 2015
केन्द्र सरकार ने अभी यह तैयारी शुरू की है कि भारत में मीडिया की पढ़ाई के पैमाने तय किए जाएं। इसके लिए ऐसी खबर है कि कुछ पुराने मीडिया कर्मियों की एक कमेटी बनाई गई है जो कि भारत में इंजीनियरिंग, मेडिकल, कानून जैसे पाठ्यक्रमों की तरह मीडिया का पाठ्यक्रम और उसकी तकनीकी जरूरतें तय करेगी, और उसके मुताबिक देश के विश्वविद्यालयों से एक स्तर की पढ़ाई की उम्मीद की जाएगी। मोदी सरकार के आलोचकों ने इसे मीडिया पर काबू करने की एक कोशिश माना है, जबकि यह बात पिछली सरकार के समय से चल रही थी और सार्वजनिक रूप से यूपीए के सूचना-प्रसारण मंत्री ने इसके बारे में कई बार कहा था। 
आज भारत में मीडिया के कामकाज को देखें, तो विचारधारा से परे, राजनीतिक पसंद और नापसंद से परे, समाचारों और विचारों को लिखने, खबरों को सजाने और दिखाने जैसे मीडिया के हर पहलू में सुधार की असीमित गुंजाइश दिखती है। आज बिना किसी मीडिया-संबंधित पढ़ाई-लिखाई या प्रशिक्षण के लोग अखबारों और टीवी चैनलों, समाचार-वेबसाइटों और दूसरे किस्म के मीडिया संस्थानों में काम करने लगते हैं। और पाठकों-दर्शकों का एक बड़ा तबका ऐसा रहता है जो कि मीडिया की कही बातों को जरूरत से कुछ अधिक गंभीरता से लेता है और अब इंटरनेट-टेलीफोन के चलते मीडिया के काम को आम लोग भी तेजी से फैलाते चलते हैं, जो कि एक दशक पहले तक सिर्फ मीडिया का जिम्मा और एकाधिकार था। ऐसेे में मीडिया के काम में उत्कृष्टता के पैमाने ऊंचे करने के लिए यह जरूरी है कि उसमें काम करने वाले लोग एक बुनियादी सीख लेकर आएं। 
इसके खिलाफ तर्क कई तरह के दिए जा सकते हैं कि स्कूल और कॉलेज, विश्वविद्यालय या प्रशिक्षण संस्थान पत्रकार पैदा नहीं कर सकते, और दुनिया के कुछ सबसे अच्छे पत्रकार बिना किसी मीडिया-डिग्री वाले रहे हैं। दरअसल एक वक्त ऐसा था कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी नहीं होती थी, और उस वक्त काम के तजुर्बे से ही लोग बड़ी-बड़ी इमारतें बना लेते थे। एक वक्त जिसने ताजमहल डिजाइन किया होगा, उसके पास डिग्री-डिप्लोमा कुछ नहीं रहा होगा, लेकिन उसने दुनिया की सबसे हैरतअंगेज इमारतों में से एक को बनाया था। भारत के बहुत से पुराने मंदिर सिर्फ अनुभव के आधार पर बनाए गए थे, और आज तो छोटे इंजीनियरों को उतनी बड़ी इमारत बिना विशेषज्ञ ढांचा-इंजीनियर की मदद के बिना बनाने की इजाजत भी नहीं है। इसलिए जो पहले से चले आ रहा है, वही सबसे अच्छा है यह सोच ठीक नहीं है। आज तो समाज सेवा के काम में भी पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री रहती है, और वह आमतौर पर मददगार पाई भी जाती है। अब कोई यह कहे कि क्या मदर टेरेसा, या बाबा आमटे ने समाज सेवा में कोई डिग्री ली थी, तो यह कुतर्क होगा। आमतौर पर काम को बेहतर बनाने वाली शिक्षा पाने में हिचक नहीं होनी चाहिए। 
हम मीडिया के काम में रोजाना इतनी खामियां देखते हैं कि उसमें सुधार की जरूरतें कदम-कदम पर दिखती हैं। इनमें से बहुत सी खामियां मीडिया की अच्छी पढ़ाई से, और उस ज्ञान-जानकारी के इस्तेमाल से दूर हो सकती हैं। फिर मीडिया का काम सीधे किसी आलमारी में बंद नहीं होता, वह हर घंटे या हर दिन जनता के बहुत बड़े तबके तक पहुंचता है, और उसकी खामियां भी बहुत से लोगों की जानकारी को गलत करते चलती हैं। मीडिया को अधिक असरदार, अधिक उत्पादक, और अधिक रचनात्मक बनाने के लिए इसकी एक अच्छी पढ़ाई में कोई बुराई नहीं है। और आज मोदी सरकार की इस पहल को मीडिया पर काबू पाने की पहल मानना उतना ही गलत होगा, जितना कि यह मानना कि गुजरात में कांग्रेस सरकार के रहते हुए प्रवीण तोगडिय़ा नाम का एक डॉक्टर बनाया गया था, और आज वह जो भी कर रहा है वह कांग्रेस का किया हुआ है। पेशेवर विषयों की पढ़ाई अपने आपमें राजनीतिक विचारधारा से परे की बनाई जा सकती है, और जब तक मीडिया पाठ्यक्रम में कोई भगवाकरण न दिखे, तब तक उससे दहशत खाने की जरूरत नहीं है। जिस तरह चिकित्सा, इंजीनियरिंग, और कानून की पढ़ाई के राष्ट्रीय पैमाने तय किए गए हैं, वैसे पैमाने मीडिया-अध्ययन के लिए तय करना एक अच्छी बात होगी। 

पूरी दुनिया की तरह भारत में भी सहनशीलता कसौटी पर

17 जनवरी 2015
संपादकीय
सोनिया गांधी पर लिखी गई एक कल्पनापूर्ण जीवनी बाजार में आने को है। खबरें बताती हैं कि यूपीए सरकार के रहते हुए भारत में इसका प्रकाशन रोका गया था, और अब इसके प्रकाशन का सही समय दिख रहा है इसलिए लेखक-प्रकाशक उत्साह में हैं। इसके लेखक का कहना है कि जब यह किताब प्रकाशित होने को थी तो कांगे्रस के एक बड़े नेता ने प्रकाशकों को खूब डराया था और इसे अंगे्रजी में आने से रोक दिया था। यह किताब स्पेनिश में छपी है, और अब शायद जल्द ही यह भारत में अंगे्रजी में, और शायद हिन्दी में भी आ जाए।
यह मुद्दा अपने-आपमें संपादकीय लिखने का नहीं है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर लेखक-रचनाकार और कलाकार की आजादी तक जिस तरह पूरी दुनिया में खबरों में है, उसे देखते हुए इस मुद्दे को भी हम आज यहां छू रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में जो लोग भी ऊंचे ओहदों पर, या महत्व की जगहों पर पहुंचते हैं, उनको सार्वजनिक छानबीन के लिए खुला रहना ही पड़ता है। गांधी और नेहरू तक ऐसी जांच पड़ताल से परे नहीं रहे, और उन पर लिखी गई किताबों में उनके सेक्स जीवन से लेकर पे्रम प्रसंगों तक सभी बातों पर लिखा गया। इतिहास के शिवाजी जैसे लोगों पर भी इतिहासकारों ने जो लिखा, उसका भी जमकर राजनीतिक और क्षेत्रीय विरोध हुआ, और किताब को रोक देना पड़ा। कभी मुस्लिम कट्टरपंथी तसलीमा नसरीन की किताबों को रोकते हैं, तो कभी हिंदूवादी दीनानाथ बत्रा हिंदुत्व पर लिखी गई एक गंभीर किताब को छपने के बाद लुग्दी बनाने पर मजबूर कर देते हैं। अभी तमिल के एक लेखक खबरों में हैं, जिनके लिखे हुए के खिलाफ एक अभियान छेडऩे से उन्होंने अपने-आपको लेखक के रूप में मार डालने की मुनादी खुद ही की, और कहा कि बची जिंदगी वे अपने इस पहलू से परे रहेंगे। 
भारत से परे दुनिया के के दूसरे देशों को देखें, तो वहां भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक नए सिरे से परिभाषित की जा रही है। एक मुस्लिम बहुल देश टर्की में दो दिन पहले ही वहां के सबसे बड़े अखबार पर सरकार ने एक जुर्म कायम किया कि उसने पेरिस की व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दो से लेकर इस्लाम पर कार्टून अपने अखबार में छापे। भारत की आज की खबर है कि हैदराबाद में पुलिस में एक रिपोर्ट दर्ज हुई है कि जी न्यूज ने अपने चैनल पर ये कार्टून दिखाए। जर्मनी में इन कार्टूनों को छापने वाले अखबार पर हमले हुए, और वहां पर एक बड़ा इस्लाम विरोधी उग्र आंदोलन सड़कों पर है, और एक मुस्लिम नौजवान को मार डाला गया है। 
आज जब दुनिया में कट्टरता बढ़ती चल रही है, भारत की जुबान में साम्प्रदायिकता, और पश्चिम की जुबान में रंगभेद, संस्कृति-भेद, और धर्म-भेद बढ़ते चल रहा है, तब धर्म की आस्थावादी सोच और लोकतंत्र की उदारवादी सोच के बीच टकराव कम होने का आसार नहीं है। और ऐसे में भारत में भी सहनशीलता का इम्तिहान चल रहा है। ऐसे में सोनिया गांधी पर आने वाली किताब तो एक छोटा मुद्दा है, और जिस स्पेन में यह किताब पहले छपी है, और जिस अंगे्रजी में इस किताब के छपने की घोषणा हुई है, उन भाषाओं वाले देश में लोगों की निजी जिंदगी में बड़े गहरे तक दखल की परंपरा है, संस्कृति है, और इसके लिए बर्दाश्त भी है। अब देखना यह है कि भारत के मौजूदा कानूनों के तहत सोनिया पर जीवनी का सिलसिला आगे चलकर कितने नेताओं की जीवनी तक पहुंचता है, और उससे समकालीन इतिहास लेखन को कैसी नई शक्ल मिलती है। लोकतंत्र में कानून बहुत बातों की इजाजत देता है, लेकिन हर देश का अपना-अपना लोकतंत्र अलग-अलग है, हर देश में परंपराएं भी अलग-अलग हैं, और सहनशीलता भी। भारत में भी बाकी दुनिया की तरह यह सब आज कसौटी पर है।

राज्यों के बीच अनुभवों की अदला-बदली के फायदे

16 जनवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कई राज्यों के अधिकारी एकजुट होकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में नवाचार पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। यह मुद्दा सरकार की जनकल्याण और जनउपयोग की, जनसुविधाओं की योजनाओं में अलग-अलग राज्यों में हुई मौलिक पहल को आपस में बांटना है, ताकि एक जगह की कामयाबी का दूसरी जगह भी फायदा उठाया जा सके। भारत जैसे संघीय लोकतंत्र में बहुत सी योजनाएं केन्द्र सरकार की तरफ से बारीकी तक तैयार करके राज्यों को भेजी जाती हैं, लेकिन बहुत सी योजनाएं राज्य अपने स्तर पर तैयार करते हैं, और कहीं पर मंत्रियों की मौलिक सोच काम आती है, तो कहीं पर अधिकारियों की किसी अनोखी पहल से जनता तक फायदा अधिक पहुंचता है। लोगों को याद होगा कि कुछ दशक पहले महाराष्ट्र में एक नए कलेक्टर ने जिला कार्यालय में एक नई प्रणाली शुरू की थी, जो अहमदनगर प्रणाली के नाम से पूरे देश में चर्चित हुई थी। खुद छत्तीसगढ़ में पिछले दस बरसों में राशन वितरण की पीडीएस कही जाने वाली योजना चर्चा में रही है, और देश-विदेश से लोग इसको देखने के लिए आए हैं। इसलिए अनुभव और कामयाबी को आपस में बांटने का यह काम सिर्फ सरकार के लिए जरूरी और उपयोगी नहीं है, यह सभी लोगों के काम का है और समाज के बाकी दायरे भी समय-समय पर अलग-अलग एकजुट होकर ऐसी चर्चा करते हैं।
सरकार में एक दूसरी बात पर भी चर्चा होनी चाहिए कि किस तरह केन्द्र की योजनाओं और राज्यों की योजनाओं में बेईमानी होती है, चोरी और भ्रष्टाचार को जगह मिलती है। यह बात इसलिए जरूरी है कि इस किस्म के जुर्म का तरीका अधिकतर राज्यों मेें एक जैसा हो सकता है, और एक जगह की गड़बड़ी से बाकी जगहों पर नसीहत की गुंजाइश बहुत रहती है। राज्यों को एक-दूसरे से यह सीखना चाहिए, और आर्थिक अपराधों को रोकने के लिए यह एक कारगर तरीका हो सकता है। अब मिसाल के लिए छत्तीसगढ़ में इन दिनों सिंचाई विभाग में बड़े भ्रष्टाचार की बड़ी कमाई की जब्ती चर्चा में है। अब अगर इन तमाम राज्यों के सिंचाई विभागों के लोग एक साथ जुटें, और सरकार के आर्थिक अपराधों की जांच करने वाले उनके साथ बैठें, तो हो सकता है कि लोगों को भ्रष्टाचार के तरीके, और उसको रोकने का, या पकडऩे का तरीका भी समझ में आए। एक खतरा यह भी हो सकता है कि जहां पर भ्रष्टाचार अभी तक उतना संगठित नहीं हो पाया है, वह भी होने लगे, लेकिन जांच एजेंसियों के साथ मिलकर जब ऐसी चर्चा होगी, तो शायद एक जागरूकता आएगी, और बाकी राज्य अपने इलाके में, अपने कामकाज में इसे रोकने की सोच सकेंगे। 
नवाचार का मतलब नई पहल, नई सोच, और नए तरीके हैं। इनके लिए यह भी जरूरी है कि सरकार के लोगों का निजी क्षेत्र के लोगों के साथ संपर्क बढ़े, मीडिया के साथ उठना-बैठना हो, और ज्ञान-अनुभव का ऐसा मेल-मिलाप लोगों को नए और संपन्न अनुभव दे जाता है। हमारा मानना है कि सरकार को अपने आपको अपने घर तक सीमित नहीं रखना चाहिए, और समय-समय पर दूसरे तबकों के साथ भी उठना-बैठना चाहिए, ताकि सरकार से उनके साबके के जो तजुर्बे हैं, उनका भी पता सरकार को लग सके। केन्द्र सरकार के बजट और राज्यों के बजट से जनता तक इतनी योजनाएं और इतनी सुविधाएं पहुंचती हैं कि उनसे जनता की जिंदगी बदल सकती है। लेकिन उनमें चोरी, बेईमानी, और लापरवाही से उनके बेअसर होने से यह नौबत नहीं आ पाती। भारत में सरकार ही सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर संस्था है। और अगर इसके सुधार की कोई गुंजाइश निकल सकती है, तो उससे देश की उत्पादकता बहुत बढ़ सकती है। 

स्थानीय संस्थाओं से पार्टियों का टकराव दूर रखा जाए...

15 जनवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के कोरबा में आज नगर निगम महापौर और पार्षदों के शपथ ग्रहण समारोह में वहां के सांसद और केन्द्रीय मंत्री रहे चरणदास महंत ने मंच और माईक से सबको यह नसीहत दी कि अब उन्हें किसी भी तरह के राजनीतिक या किसी दूसरे भेदभाव से परे काम करना चाहिए। यह अपने किस्म की अकेली राजनीतिक बात है जो कि खुलकर सार्वजनिक रूप से कही गई है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम पिछले कुछ दिनों में इसी जगह इस बारे में लिख चुके हैं कि राजनीतिक तनातनी से परे, पार्टीबाजी और गुटबाजी से परे लोगों को चुनाव के बाद अब स्थानीय संस्थाओं में मिलकर काम करना चाहिए, क्योंकि स्थानीय जिम्मेदारियों का राजनीतिक नीतियों से बहुत अधिक लेना-देना नहीं होता है, बल्कि मेहनत और ईमानदारी से काम करने की जरूरत रहती है। प्रदेश के बहुत से नगर निगमों और नगरपालिकाओं में ऐसी स्थिति आई है कि महापौर और अध्यक्ष तो कांग्रेस के बने हैं, लेकिन सभापति या दूसरे पदों पर भाजपा के पार्षदों की अधिक संख्या के आधार पर भाजपा के कोई नेता रहेंगे। इसके अलावा राज्य सरकार की तरफ से निगम और पालिकाओं में जो अधिकारी नियुक्त होते हैं, उनके बारे में यह माना जाता है कि वे राज्य सरकार के नियंत्रण में काम करते हैं, और वहां पर प्रदेश की भाजपा सरकार के मार्फत म्युनिसिपल की भाजपा एक दबाव डलवा सकती है। यह सिलसिला भी शुरू नहीं होना चाहिए, क्योंकि हमने राजधानी रायपुर के नगर निगम में ही पिछले पांच बरसों में कांग्रेस की महापौर और भाजपा के बहुमत के बीच टकराव देखा है, और उसमें अफसरों से लेकर मंत्रियों तक के नाम बीच में आते थे। यह बात प्रदेश में नहीं होनी चाहिए, और चरणदास महंत ने जो कहा है, उसी तरह बाकी बड़े नेताओं को, पार्टियों को, और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को काम करना चाहिए। रायपुर में कांग्रेस के निर्वाचित महापौर ने सबसे पहले जाकर प्रदेश के भाजपाई मुख्यमंत्री से मुलाकात की और उनकी शुभकामनाएं लीं, इस पर कांग्रेस के भीतर कुछ नाराजगी हुई, लेकिन हम इस स्वस्थ परंपरा को शहर के लिए बेहतर मानते हैं, और पूरे प्रदेश के लिए इसको एक मिसाल मानते हैं।
स्थानीय संस्थाओं के अधिकार भी असीमित रहते हैं, और उनकी संभावनाएं भी असीमित रहती हैं। राजनीतिक टकराव के चलते इनका नुकसान नहीं किया जाना चाहिए। आज भी छत्तीसगढ़ में कहने के लिए तो स्थानीय संस्थाएं अधिकारसंपन्न हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे हर बात के लिए राज्य सरकार की मोहताज भी रहती हैं। ऐसे में यह याद रखना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने दस बरस केन्द्र की यूपीए सरकार से बिना किसी टकराव के किस तरह राज्य के काम करवाए, और कांग्रेस-भाजपा का देशव्यापी टकराव राज्य के विकास में आड़े नहीं आने दिया। म्युनिसिपलों के भीतर भी महापौर-अध्यक्ष और सभापति अलग-अलग पार्टियों के होने पर भी उन्हें लड़ाई छोड़कर शहर के हित में काम करना चाहिए, इसके बिना जनता के बीच उनकी खुद की छवि भी बहुत खराब बनेगी। 

संचार और सोशल मीडिया स्कूल-कॉलेज में सिखाएं

संपादकीय
14 जनवरी 2015
भारत में प्रधानमंत्री के स्तर से लेकर गांव-देहात अनपढ़ लोगों तक सोशल मीडिया की चर्चा है। केन्द्र सरकार के मंत्रियों, और विभागों को लगातार कहा जा रहा है कि वे ट्विटर और फेसबुक जैसी लोकप्रिय सामाजिक वेबसाइटों के माध्यम से सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों, और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाएं। छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की तरफ से रोजाना ट्विटर पर कुछ न कुछ पोस्ट किया जाता है। भारत के दसियों करोड़ लोग इंटरनेट पर सोशल वेबसाइटों से जुड़े हुए हैं, और उनके बीच आपस में भी बहुत से मुद्दों पर बातचीत होती है। दूसरी तरफ अब करीब-करीब हर हिन्दुस्तानी हाथ तक मोबाइल फोन पहुंचने को हैं, और उन पर वॉट्सऐप जैसी मुफ्त की सेवा पर लोग बहुत से वीडियो, तस्वीरें और संदेश एक-दूसरे को भेजते हैं। आपसी संबंधों का, संपर्क का, और प्रचार का यह एक बिल्कुल नया माध्यम है, जो कि पिछले कुछ बरसों में भारत की जिंदगी का एक बड़ा सक्रिय हिस्सा बन गया है। लेकिन आम लोगों को न तो इसकी संभावनाओं का ठीक से अंदाज है, और न ही इसके खतरों का। 
इंटरनेट और टेलीफोन से आज लोग काम का सच और बेकाम का झूठ बात की बात में चारों तरफ फैला सकते हैं, और आज अगर कोई गणेश के दूध पीने की अफवाह फैलाए, तो वह जंगल की आग की तरह फैल सकती है। ऐसे में स्कूल-कॉलेज जैसी संगठित जगहों पर किशोर और नौजवान पीढ़ी के सक्रिय लड़के-लड़कियों को सोशल मीडिया के बारे में सिखाने की एक बड़ी संभावना है, और जरूरत भी है। आज हिन्दुस्तान के बहुत से अधेड़ लोग भी अपने छोटे बच्चों से फोन और इंटरनेट की तकनीक सीखते या समझते हैं, और फिर खुद उनका खुलकर इस्तेमाल भी करते हैं। लोगों के बीच हंसी-मजाक से लेकर अश्लील और फूहड़ लतीफों और तस्वीरों तक, सेक्स की वीडियो क्लिप तक इतने किस्म की बातें की आवाजाही होती है, कि जिसकी कल्पना भी कुछ बरस पहले किसी ने नहीं की थी। कुल मिलाकर यह एक ऐसा औजार भारतीय समाज में इस्तेमाल होने लगा है, जिसे कोई बिना धार का औजार समझ रहे हैं, तो कोई इसे जानलेवा हथियार समझ रहे हैं। जरूरत इनके बीच इस बात की है कि लोगों को इस नई तकनीक और जीवन शैली से परिचित कराया जाए, और उनको इसकी सकारात्मक संभावनाओं के बारे में बताया जाए। 
जैसा कि जिंदगी के हर दायरे में होता है, सनसनीखेज और बुरी बातें तेजी से फैलती हैं। एक पुरानी कहावत है कि जब तक भला अपने जूते बांधता है, तब तक बुरा गांव का चक्कर लगाकर आ जाता है। ऐसे समाज में, और ऐसे मानवीय स्वभाव के बीच जरूरत है सोशल मीडिया की संभावनाओं से लोगों को रूबरू कराने की। लोग इसका इस्तेमाल तो कर रहे हैं, लेकिन न तो इस नए औजार के लिए जरूरी जिम्मेदारी की समझ अधिक लोगों में है, और न ही इसके उत्पादक उपयोग की। कई किस्म के झूठ, गढ़ी गई तस्वीरें, अपमान और आपत्ति की बातें लोग एक-दूसरे को इतनी रफ्तार से आगे बढ़ा देते हैं, कि कुछ मिनटों में ही यह बात खो जाती है कि गलत बात भेजना किसने शुरू किया। कम्प्यूटर और फोन की तकनीक कॉपी और पेस्ट की ऐसी सहूलियत देती है कि लोग बिना किसी स्रोत का जिक्र किए, अपने ही अकाउंट से भली-बुरी सभी किस्म की बातें आगे बढ़ाते हैं। 
ऐसे में आज जरूरत है कि स्कूल और कॉलेज में आधुनिक संचार तकनीक और सोशल मीडिया की संभावनाओं और खतरों पर कुछ घंटों की एक ट्रेनिंग अनिवार्य की जाए। और फिर वहां से निकलकर बच्चे अपने घरों में मां-बाप को भी यह बात बता और सिखा सकते हैं। संचार तकनीक और सोशल मीडिया को अनदेखा करने से इसके खतरे तो कम नहीं हो सकते, इसकी संभावनाएं जरूर धरी रह जाएंगी। इसलिए इस हकीकत की मौजूदगी को मानना जरूरी है, और उसे सीखना जरूरी है। यह समाज के बहुत अच्छे काम भी आ सकती है, इसको महज बुरा कहना एक लापरवाही होगी।