स्थानीय संस्थाओं से पार्टियों का टकराव दूर रखा जाए...

15 जनवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के कोरबा में आज नगर निगम महापौर और पार्षदों के शपथ ग्रहण समारोह में वहां के सांसद और केन्द्रीय मंत्री रहे चरणदास महंत ने मंच और माईक से सबको यह नसीहत दी कि अब उन्हें किसी भी तरह के राजनीतिक या किसी दूसरे भेदभाव से परे काम करना चाहिए। यह अपने किस्म की अकेली राजनीतिक बात है जो कि खुलकर सार्वजनिक रूप से कही गई है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम पिछले कुछ दिनों में इसी जगह इस बारे में लिख चुके हैं कि राजनीतिक तनातनी से परे, पार्टीबाजी और गुटबाजी से परे लोगों को चुनाव के बाद अब स्थानीय संस्थाओं में मिलकर काम करना चाहिए, क्योंकि स्थानीय जिम्मेदारियों का राजनीतिक नीतियों से बहुत अधिक लेना-देना नहीं होता है, बल्कि मेहनत और ईमानदारी से काम करने की जरूरत रहती है। प्रदेश के बहुत से नगर निगमों और नगरपालिकाओं में ऐसी स्थिति आई है कि महापौर और अध्यक्ष तो कांग्रेस के बने हैं, लेकिन सभापति या दूसरे पदों पर भाजपा के पार्षदों की अधिक संख्या के आधार पर भाजपा के कोई नेता रहेंगे। इसके अलावा राज्य सरकार की तरफ से निगम और पालिकाओं में जो अधिकारी नियुक्त होते हैं, उनके बारे में यह माना जाता है कि वे राज्य सरकार के नियंत्रण में काम करते हैं, और वहां पर प्रदेश की भाजपा सरकार के मार्फत म्युनिसिपल की भाजपा एक दबाव डलवा सकती है। यह सिलसिला भी शुरू नहीं होना चाहिए, क्योंकि हमने राजधानी रायपुर के नगर निगम में ही पिछले पांच बरसों में कांग्रेस की महापौर और भाजपा के बहुमत के बीच टकराव देखा है, और उसमें अफसरों से लेकर मंत्रियों तक के नाम बीच में आते थे। यह बात प्रदेश में नहीं होनी चाहिए, और चरणदास महंत ने जो कहा है, उसी तरह बाकी बड़े नेताओं को, पार्टियों को, और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को काम करना चाहिए। रायपुर में कांग्रेस के निर्वाचित महापौर ने सबसे पहले जाकर प्रदेश के भाजपाई मुख्यमंत्री से मुलाकात की और उनकी शुभकामनाएं लीं, इस पर कांग्रेस के भीतर कुछ नाराजगी हुई, लेकिन हम इस स्वस्थ परंपरा को शहर के लिए बेहतर मानते हैं, और पूरे प्रदेश के लिए इसको एक मिसाल मानते हैं।
स्थानीय संस्थाओं के अधिकार भी असीमित रहते हैं, और उनकी संभावनाएं भी असीमित रहती हैं। राजनीतिक टकराव के चलते इनका नुकसान नहीं किया जाना चाहिए। आज भी छत्तीसगढ़ में कहने के लिए तो स्थानीय संस्थाएं अधिकारसंपन्न हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे हर बात के लिए राज्य सरकार की मोहताज भी रहती हैं। ऐसे में यह याद रखना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने दस बरस केन्द्र की यूपीए सरकार से बिना किसी टकराव के किस तरह राज्य के काम करवाए, और कांग्रेस-भाजपा का देशव्यापी टकराव राज्य के विकास में आड़े नहीं आने दिया। म्युनिसिपलों के भीतर भी महापौर-अध्यक्ष और सभापति अलग-अलग पार्टियों के होने पर भी उन्हें लड़ाई छोड़कर शहर के हित में काम करना चाहिए, इसके बिना जनता के बीच उनकी खुद की छवि भी बहुत खराब बनेगी। 

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