संपादकीय
20 जनवरी 2015
दिल्ली के चुनाव में किरण बेदी को अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक बहस की चुनौती दी, तो उन्होंने कहा कि वे विधानसभा के भीतर बहस करेंगी। जो लोग बहस करने में माहिर हैं, उनको इस तरह की चुनौतियां पेश करने में मजा आता है, और जनता भी यह उम्मीद करती है कि कुछ गरमागर्म बहस देखने मिले। लेकिन हर पार्टी के हर नेता का बहस में उतरना जरूरी नहीं होता है, और पार्टियों के पिछले कामकाज, उनके ताजा घोषणा पत्र, और उसके बाकी नेताओं के भाषण या बयान इसके लिए काफी माने जा सकते हैं। दिल्ली में चूंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बसेरा है, इसलिए वहां ऐसी कोशिश अधिक होती है, और घर-घर तक टीवी चैनलों की गाडिय़ां पहुंचकर बहस आगे बढ़ाती हैं।
ऐसे में प्रिंट मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने मिजाज के मुताबिक, और अपनी तकनीकी सीमाओं के मुताबिक दर्शक और श्रोता का ध्यान कुछ मिनट से अधिक नहीं खींच पाता। शब्द हवा में घुल जाते हैं, और लोगों के पास किसी एक बात को दुबारा ध्यान से सुनने की गुंजाइश नहीं रहती। ऐसे में लोगों की बातों के बड़े छोटे-छोटे टुकड़े टीवी पर दिखाकर खबरों की जो दुकान चलाई जाती है, वह दर्शकों को किसी गंभीर नतीजे तक पहुंचने में मदद नहीं करतीं। बल्कि इससे लोगों को गलतफहमियां अधिक होती हैं। दूसरी तरफ छपे हुए अखबार में गंभीरता की संभावनाएं अब भी हैं, और आगे भी रहेंगी। इसलिए चुनावों के मौके पर अखबारों को यह चाहिए कि वे पार्टियों और उम्मीदवारों के बीच मुकाबले को सनसनी की तरह पेश करने के बजाय एक गंभीर विश्लेषण के रूप में छापकर जनता का राजनीतिक शिक्षण करने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करें।
दिल्ली जिस तरह की धुंध से घिरी हुई है, वह मौसम से परे भी देश की राजनीति में धुंध फैलाते दिख रही है। कल तक नरेन्द्र मोदी की जिस लहर की चर्चा देश भर में करते हुए भाजपा थक नहीं रही थी, आज उसने अचानक बाहर से किरण बेदी को आयात करके मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है, और इसके साथ-साथ पिछली सरकार में कांग्रेस की केन्द्रीय मंत्री रही कृष्णा तीरथ को भी पार्टी में लाकर एक सनसनी फैलाई है। इससे हो सकता है कि भाजपा के हाथ दिल्ली में कुछ मजबूत हों, लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या इतने बरसों से दिल्ली में ताकतवर राजनीति कर रही भाजपा के पास किरण बेदी के पहले तक एक भी ऐसा असरदार चेहरा नहीं था जिसे कि मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जा सके? और वहां मौजूद उसके बड़े-बड़े नेता आज ताजा-ताजा आई हुई किरण बेदी के मुकाबले हाशिए पर क्यों धकेल दिए गए? खैर, चुनाव प्रचार के बीच में ऐसी बहुत सी घटनाएं होती हैं, जिनसे एक-एक, दो-दो फीसदी वोटों का फर्क होने की उम्मीद की जाती है, और कुछ ऐसी ही उम्मीद किरण बेदी को लेकर भाजपा की दिख रही है।
टीवी चैनलों के टुकड़ा-टुकड़ा काम से परे प्रिंट मीडिया को चीजों का व्यापक विश्लेषण करना चाहिए, और दिल्ली के चुनाव के बहाने हम यह चर्चा कर रहे हैं। आने वाले दिन बताएंगे कि दिल्ली की राजनीति में मीडिया का कैसा दखल या असर रहा, लेकिन यह बात तय है कि एक गंभीर असर के लिए राजनीति को आज भी दो-चार रूपए दाम वाले सस्ते अखबारों की जरूरत पड़ती है, और इन्हीं अखबारों के सहारे लोकतंत्र और राजनीति में एक गंभीर पत्रकारिता की गुंजाइश बची हुई है।

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