जो खूबियां गिनाने से परहेज करे उसकी गिनाई खामियों की विश्वसनीयता नहीं होती

22 जनवरी 2015

संपादकीय

आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक देश के भूतपूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने किरण बेदी की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए उनमें एक अच्छे मुख्यमंत्री की संभावनाएं गिनाई हैं। अरविंद केजरीवाल के लिए मतदान के पहले इससे अधिक नुकसानदेह और शायद कुछ भी नहीं हो सकता था कि उनकी नींव की एक चट्टान खिसककर किरण बेदी की प्रतिमा के लिए चबूतरा बनते दिख रही हो। कल की ही एक दूसरी बात और है जिसे लेकर आज हम यहां इस मुद्दे पर लिख रहे हैं, कांग्रेस के सबसे वजनदार लोगों में से एक जनार्दन द्विवेदी ने मोदी की तारीफ में काफी कुछ कहा है, और लोग इसे हक्का-बक्का होकर देख रहे हैं कि क्या कृष्णा तीरथ के बाद जनार्दन द्विवेदी भी? लेकिन मोदी की ऐसी तारीफ करने वाले कुछ और कांग्रेस नेताओं में शशि थरूर भी रहे हैं, और उसे थरूर की कानूनी दिक्कतों से जुड़कर देखा गया कि क्या वे मोदी की रहम पाने के लिए उनकी तारीफ कर रहे थे? 
भारत की राजनीति में बड़ेदिल की गुंजाइश कम दिखती है। लोग अगर एक बयान किसी की तारीफ में देते हैं, तो उसे दल-बदल का एक आसार मान लिया जाता है। लोग अगर किसी के खिलाफ एक बयान देते हैं, तो वह बगावत मान लिया जाता है। इसके साथ-साथ अगर हम संसद के भीतर मतदान के पहले की बहस को देखें, मतदान को देखें, तो उसे दल-बदल कानून से जोड़ दिया गया है, मतलब यह कि लोग अपनी पार्टी की नीति के खिलाफ वोट नहीं डाल सकते। नतीजा यह होता है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत में देश की सबसे महत्वपूर्ण बहस में दिल और दिमाग का खुलकर इस्तेमाल करने की कोई संभावना नहीं बचती। लोग अपनी पार्टी के दायरे के भीतर बंधे रहने को बेबस होते हैं, और देश के कुछ सबसे अच्छे दिमाग अपनी कुछ सबसे महत्वपूर्ण सोच सामने रख ही नहीं पाते। 
राजनीतिक दलों में जाने के साथ यह एक दिक्कत जुड़ी होती है। मनमोहन सिंह जैसे विख्यात अर्थशास्त्री से लेकर किरण बेदी जैसी अफसर तक, जिंदगी के कई दायरों के काबिल लोग राजनीति में जा तो सकते हैं, लेकिन फिर अपने-आपको उस पार्टी की नीतियों के भीतर कैद करके रखना पड़ता है, जिस पार्टी के चुनाव चिन्ह को वे ढोते हैं।  अब आज अगर आम आदमी पार्टी के एक सबसे बड़े संस्थापक शांति भूषण अगर खुलकर किरण बेदी की संभावनाओं को गिना रहे हैं, तो यह दिल्ली के इस चुनाव में एक राजनीतिक भूचाल गिना जा रहा है। 
लोकतंत्र में चुनावी इस्तेमाल से परे भी लोगों को मुंह खोलने का साहस रहना चाहिए, और सच को एक बोझ नहीं मानना चाहिए। जब तक लोग एक-दूसरे की खूबियों को मानने से मना करते रहेंगे, तब तक उनकी गिनाई गई खामियों का कोई वजन नहीं रहेगा। लोग ऐसे लोगों की बातों पर अधिक भरोसा करते हैं जो कि एकतरफा बातें नहीं करते, और सच को मानते हैं, सच कहते हैं। सच का वजन अधिक होता है, और इसे छोडऩा नहीं चाहिए। विरोधी की हर बात को बुरा कहने वाले लोगों की बातों पर जनता गौर करना भी छोड़ देती है।

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