21 जनवरी 2015
संपादकीय
भारतीय हिंदी टीवी मनोरंजन को देखें, तो अचानक यह लगता है कि लोगों में हास्यबोध एकदम से बढ़ गया है। लोग कॉमेडी के कार्यक्रम का इंतजार करने लगे हैं, और फिल्म-टीवी अवार्ड समारोह में कॉमेडी सबसे अधिक हावी मनोरंजन दिख रहा है। एक सबसे लोकप्रिय कॉमेडी कलाकार कपिल शर्मा के बारे में यह खबर है कि हफ्ते में दो दिन आने वाला उनका कार्यक्रम अब घटाकर एक दिन करना पड़ रहा है क्योंकि उनके पास फिल्मों का इतना काम आ गया है कि वे टीवी कार्यक्रम को उतना समय नहीं दे पा रहे हैं। हिंदी मनोरंजन टीवी पर आमतौर पर जो सीरियल चलते हैं, उनके लिए गाली की तरह सास-बहू सीरियल शब्द का इस्तेमाल होता है, और हमको भी यही लगता है कि हिंदी दर्शकों की मानसिक स्थिति को खराब करने में ऐसे सीरियलों का ही सबसे बड़ा योगदान है। ऐसे में अगर हंसने और हंसाने को एक जगह मिल रही है, तो वह रोने और रूलाने के मुकाबले बहुत बेहतर नौबत है।
टीवी के मनोरंजन को कम आंकना ठीक नहीं है। लोग रोने से लेकर डराने तक को मनोरंजन मानते हैं, और हर किस्म के शो टीवी पर चलते हैं। इनका लोगों की सोच पर बड़ा असर होता है, और नकारात्मक, हिंसक, तनावपूर्ण, और नफरत की बातों को देख-देखकर लोगों की सोच भी ऐसी होने लगती है, मानो चारों तरफ समाज में सब बुरा ही बुरा है। ऐसे में जब हंसी के कुछ कार्यक्रम अच्छे बनते हैं, और वे लोगों को बांध लेते हैं, तो यह समझ आता है कि लोग अब भी हंसने पर कितना यकीन रखते हैं।
अब यहां हम भारत के सरकारी टीवी चैनलों की अगर बात करें, तो एक स्वायत्तशासी प्रसार भारती के तहत आने के बावजूद दूरदर्शन सरकार की नीतियों से बंधा हुआ है, और वहां पर अब भी अच्छे कार्यक्रम बनते हैं, प्रसारित होते हैं, और उनकी संभावनाएं भी हैं। केंद्र सरकार को यह सोचना चाहिए कि जनता के बीच लोकप्रिय हो सकने वाले ऐसे कौन से चैनल लाए जा सकते हैं जिनसे कि लोगों को एक बेहतर मनोरंजन का विकल्प मिल सके। कॉमेडी के कार्यक्रमों ने तो यह साबित कर ही दिया है कि लोग एकता कपूर ब्रांड के पारिवारिक दुष्टता के सीरियलों से परे भी कुछ देखना चाहते हैं, और क्राईम पेट्रोल से परे भी। अब सरकार को यह सोचना चाहिए कि वह सिर्फ खबरों और संसद प्रसारण, या शास्त्रीय संगीत के प्रसारण तक अपने को सीमित न रखे, और सकारात्मक मनोरंजन की तरफ भी आगे बढ़े।
इसी सिलसिले में हम यह भी कहना चाहेंगे कि छत्तीसगढ़ सहित देश के राज्यों को भी चाहिए कि वे अपने टीवी चैनल शुरू करें। आज भारत सरकार की नीति के तहत राजनीतिक दल भी अपने सेटेलाइट चैनल चला रहे हैं, तो ऐसा कोई कानून नहीं हो सकता जो कि किसी राज्य सरकार को अपना टीवी चैनल शुरू करने से रोके। राज्य के स्तर पर भी अच्छी सामग्री, अच्छी खबरें, जरूरत की जानकारी, और बेहतर मनोरंजन के साथ अगर स्थानीय संस्कृति और कला को बढ़ावा मिलेगा, तो इससे राज्य के दर्शकों का भला भी होगा। राज्य सरकारों को अपने बंधे-बंधाए दायरों से बाहर निकलकर अपने टीवी चैनलों के बारे में सोचना चाहिए, ताकि जनता को बेहतर कार्यक्रम मिल सकें।

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