मीडिया-अध्ययन के पैमाने तय करने की पहल समझदारी

संपादकीय
18 जनवरी 2015
केन्द्र सरकार ने अभी यह तैयारी शुरू की है कि भारत में मीडिया की पढ़ाई के पैमाने तय किए जाएं। इसके लिए ऐसी खबर है कि कुछ पुराने मीडिया कर्मियों की एक कमेटी बनाई गई है जो कि भारत में इंजीनियरिंग, मेडिकल, कानून जैसे पाठ्यक्रमों की तरह मीडिया का पाठ्यक्रम और उसकी तकनीकी जरूरतें तय करेगी, और उसके मुताबिक देश के विश्वविद्यालयों से एक स्तर की पढ़ाई की उम्मीद की जाएगी। मोदी सरकार के आलोचकों ने इसे मीडिया पर काबू करने की एक कोशिश माना है, जबकि यह बात पिछली सरकार के समय से चल रही थी और सार्वजनिक रूप से यूपीए के सूचना-प्रसारण मंत्री ने इसके बारे में कई बार कहा था। 
आज भारत में मीडिया के कामकाज को देखें, तो विचारधारा से परे, राजनीतिक पसंद और नापसंद से परे, समाचारों और विचारों को लिखने, खबरों को सजाने और दिखाने जैसे मीडिया के हर पहलू में सुधार की असीमित गुंजाइश दिखती है। आज बिना किसी मीडिया-संबंधित पढ़ाई-लिखाई या प्रशिक्षण के लोग अखबारों और टीवी चैनलों, समाचार-वेबसाइटों और दूसरे किस्म के मीडिया संस्थानों में काम करने लगते हैं। और पाठकों-दर्शकों का एक बड़ा तबका ऐसा रहता है जो कि मीडिया की कही बातों को जरूरत से कुछ अधिक गंभीरता से लेता है और अब इंटरनेट-टेलीफोन के चलते मीडिया के काम को आम लोग भी तेजी से फैलाते चलते हैं, जो कि एक दशक पहले तक सिर्फ मीडिया का जिम्मा और एकाधिकार था। ऐसेे में मीडिया के काम में उत्कृष्टता के पैमाने ऊंचे करने के लिए यह जरूरी है कि उसमें काम करने वाले लोग एक बुनियादी सीख लेकर आएं। 
इसके खिलाफ तर्क कई तरह के दिए जा सकते हैं कि स्कूल और कॉलेज, विश्वविद्यालय या प्रशिक्षण संस्थान पत्रकार पैदा नहीं कर सकते, और दुनिया के कुछ सबसे अच्छे पत्रकार बिना किसी मीडिया-डिग्री वाले रहे हैं। दरअसल एक वक्त ऐसा था कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी नहीं होती थी, और उस वक्त काम के तजुर्बे से ही लोग बड़ी-बड़ी इमारतें बना लेते थे। एक वक्त जिसने ताजमहल डिजाइन किया होगा, उसके पास डिग्री-डिप्लोमा कुछ नहीं रहा होगा, लेकिन उसने दुनिया की सबसे हैरतअंगेज इमारतों में से एक को बनाया था। भारत के बहुत से पुराने मंदिर सिर्फ अनुभव के आधार पर बनाए गए थे, और आज तो छोटे इंजीनियरों को उतनी बड़ी इमारत बिना विशेषज्ञ ढांचा-इंजीनियर की मदद के बिना बनाने की इजाजत भी नहीं है। इसलिए जो पहले से चले आ रहा है, वही सबसे अच्छा है यह सोच ठीक नहीं है। आज तो समाज सेवा के काम में भी पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री रहती है, और वह आमतौर पर मददगार पाई भी जाती है। अब कोई यह कहे कि क्या मदर टेरेसा, या बाबा आमटे ने समाज सेवा में कोई डिग्री ली थी, तो यह कुतर्क होगा। आमतौर पर काम को बेहतर बनाने वाली शिक्षा पाने में हिचक नहीं होनी चाहिए। 
हम मीडिया के काम में रोजाना इतनी खामियां देखते हैं कि उसमें सुधार की जरूरतें कदम-कदम पर दिखती हैं। इनमें से बहुत सी खामियां मीडिया की अच्छी पढ़ाई से, और उस ज्ञान-जानकारी के इस्तेमाल से दूर हो सकती हैं। फिर मीडिया का काम सीधे किसी आलमारी में बंद नहीं होता, वह हर घंटे या हर दिन जनता के बहुत बड़े तबके तक पहुंचता है, और उसकी खामियां भी बहुत से लोगों की जानकारी को गलत करते चलती हैं। मीडिया को अधिक असरदार, अधिक उत्पादक, और अधिक रचनात्मक बनाने के लिए इसकी एक अच्छी पढ़ाई में कोई बुराई नहीं है। और आज मोदी सरकार की इस पहल को मीडिया पर काबू पाने की पहल मानना उतना ही गलत होगा, जितना कि यह मानना कि गुजरात में कांग्रेस सरकार के रहते हुए प्रवीण तोगडिय़ा नाम का एक डॉक्टर बनाया गया था, और आज वह जो भी कर रहा है वह कांग्रेस का किया हुआ है। पेशेवर विषयों की पढ़ाई अपने आपमें राजनीतिक विचारधारा से परे की बनाई जा सकती है, और जब तक मीडिया पाठ्यक्रम में कोई भगवाकरण न दिखे, तब तक उससे दहशत खाने की जरूरत नहीं है। जिस तरह चिकित्सा, इंजीनियरिंग, और कानून की पढ़ाई के राष्ट्रीय पैमाने तय किए गए हैं, वैसे पैमाने मीडिया-अध्ययन के लिए तय करना एक अच्छी बात होगी। 

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