पूरी दुनिया की तरह भारत में भी सहनशीलता कसौटी पर

17 जनवरी 2015
संपादकीय
सोनिया गांधी पर लिखी गई एक कल्पनापूर्ण जीवनी बाजार में आने को है। खबरें बताती हैं कि यूपीए सरकार के रहते हुए भारत में इसका प्रकाशन रोका गया था, और अब इसके प्रकाशन का सही समय दिख रहा है इसलिए लेखक-प्रकाशक उत्साह में हैं। इसके लेखक का कहना है कि जब यह किताब प्रकाशित होने को थी तो कांगे्रस के एक बड़े नेता ने प्रकाशकों को खूब डराया था और इसे अंगे्रजी में आने से रोक दिया था। यह किताब स्पेनिश में छपी है, और अब शायद जल्द ही यह भारत में अंगे्रजी में, और शायद हिन्दी में भी आ जाए।
यह मुद्दा अपने-आपमें संपादकीय लिखने का नहीं है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर लेखक-रचनाकार और कलाकार की आजादी तक जिस तरह पूरी दुनिया में खबरों में है, उसे देखते हुए इस मुद्दे को भी हम आज यहां छू रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में जो लोग भी ऊंचे ओहदों पर, या महत्व की जगहों पर पहुंचते हैं, उनको सार्वजनिक छानबीन के लिए खुला रहना ही पड़ता है। गांधी और नेहरू तक ऐसी जांच पड़ताल से परे नहीं रहे, और उन पर लिखी गई किताबों में उनके सेक्स जीवन से लेकर पे्रम प्रसंगों तक सभी बातों पर लिखा गया। इतिहास के शिवाजी जैसे लोगों पर भी इतिहासकारों ने जो लिखा, उसका भी जमकर राजनीतिक और क्षेत्रीय विरोध हुआ, और किताब को रोक देना पड़ा। कभी मुस्लिम कट्टरपंथी तसलीमा नसरीन की किताबों को रोकते हैं, तो कभी हिंदूवादी दीनानाथ बत्रा हिंदुत्व पर लिखी गई एक गंभीर किताब को छपने के बाद लुग्दी बनाने पर मजबूर कर देते हैं। अभी तमिल के एक लेखक खबरों में हैं, जिनके लिखे हुए के खिलाफ एक अभियान छेडऩे से उन्होंने अपने-आपको लेखक के रूप में मार डालने की मुनादी खुद ही की, और कहा कि बची जिंदगी वे अपने इस पहलू से परे रहेंगे। 
भारत से परे दुनिया के के दूसरे देशों को देखें, तो वहां भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक नए सिरे से परिभाषित की जा रही है। एक मुस्लिम बहुल देश टर्की में दो दिन पहले ही वहां के सबसे बड़े अखबार पर सरकार ने एक जुर्म कायम किया कि उसने पेरिस की व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दो से लेकर इस्लाम पर कार्टून अपने अखबार में छापे। भारत की आज की खबर है कि हैदराबाद में पुलिस में एक रिपोर्ट दर्ज हुई है कि जी न्यूज ने अपने चैनल पर ये कार्टून दिखाए। जर्मनी में इन कार्टूनों को छापने वाले अखबार पर हमले हुए, और वहां पर एक बड़ा इस्लाम विरोधी उग्र आंदोलन सड़कों पर है, और एक मुस्लिम नौजवान को मार डाला गया है। 
आज जब दुनिया में कट्टरता बढ़ती चल रही है, भारत की जुबान में साम्प्रदायिकता, और पश्चिम की जुबान में रंगभेद, संस्कृति-भेद, और धर्म-भेद बढ़ते चल रहा है, तब धर्म की आस्थावादी सोच और लोकतंत्र की उदारवादी सोच के बीच टकराव कम होने का आसार नहीं है। और ऐसे में भारत में भी सहनशीलता का इम्तिहान चल रहा है। ऐसे में सोनिया गांधी पर आने वाली किताब तो एक छोटा मुद्दा है, और जिस स्पेन में यह किताब पहले छपी है, और जिस अंगे्रजी में इस किताब के छपने की घोषणा हुई है, उन भाषाओं वाले देश में लोगों की निजी जिंदगी में बड़े गहरे तक दखल की परंपरा है, संस्कृति है, और इसके लिए बर्दाश्त भी है। अब देखना यह है कि भारत के मौजूदा कानूनों के तहत सोनिया पर जीवनी का सिलसिला आगे चलकर कितने नेताओं की जीवनी तक पहुंचता है, और उससे समकालीन इतिहास लेखन को कैसी नई शक्ल मिलती है। लोकतंत्र में कानून बहुत बातों की इजाजत देता है, लेकिन हर देश का अपना-अपना लोकतंत्र अलग-अलग है, हर देश में परंपराएं भी अलग-अलग हैं, और सहनशीलता भी। भारत में भी बाकी दुनिया की तरह यह सब आज कसौटी पर है।

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