छोटी सी बात

1 अक्टूबर
जिनको आप पसंद नहीं करते, उनकी चर्चा में कितना वक्त बर्बाद करते हैं। क्या इतना वक्त उनकी चर्चा में आप लगाते हैं जिनको आप दिल से चाहते हैं।

संभावित भारत रत्न की नीयत

01 अक्टूबर 2011
सचिन तेंदुलकर ने दो दिन पहले मुंबई में अपने नए घर में गृहप्रवेश किया तो अच्छी खबर के साथ-साथ एक यह विवाद भी शुरू हो गया कि मुंबई म्युनिसिपल से उन्होंने निर्माण पूरा होने के बाद रहना शुरू करने की इजाजत नहीं ली और इसके लिए म्युनिसिपल ने कुछ लाख का नोटिस उन्हें दिया है। फिर यह खबर आई कि राज्य सरकार ने मुंबई महानगरपालिका को यह जुर्माना माफ करने को कहा है। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ दूसरी बातें जो याद पड़ती हैं वे खटकने वाली हैं।
सचिन तेंदुलकर को लेकर कुछ दूसरी खबरें भी सामने हैं जिनमें उन्हें केंद्र सरकार ने एक कार पर उन्हें आयातकर में करोड़ की छूट देना तय किया था और जिसके खिलाफ अदालत में भी मामला गया था। करोड़ों की यह कार सचिन को विदेश में तोहफे में मिली थी और भारत में उन्होंने सरकार से इस पर आयात शुल्क माफ करने की अपील की थी। अभी कुछ महीने पहले जब उन्होंने यह कार सूरत के एक कारोबारी को बेच दी तो फिर यह सवाल उठा कि इस पर सरकार को माफ किया गया आयात शुल्क क्या फिर वसूलना चाहिए? सचिन तेंदुलकर को लेकर इस कार के विवाद के साथ यह बात उठकर खड़ी हो गई थी कि अरबपति बन चुके इस क्रिकेट खिलाड़ी को टैक्स में रियायत की अपील क्यों करना चाहिए? यह माफी एनडीए की सरकार के रहते दी गई थी और इससे लोगों को यह लगा था कि इतने कमाने वाले लोग भी अगर गरीबों से लबालब इस देश में ऐसी रियायत चाहते हैं तो वह किसके मुंह का कौर छीनकर दी जा रही है?
बड़े-बड़े लोगों की माफी की ऐसी अर्जी उनके लिए भी शर्मनाक है और हमारा मानना है कि किसी भी सरकार को ऐसी माफी के लिए का कोई हक भी नहीं है। जब इस देश में छब्बीस रूपए रोज में किसी इंसान को जिंदा रहने का अंदाज यहां का योजना आयोग लगाता है तो ढाई करोड़ की ऐसी माफी को किस तरह देखा जाए? आज सचिन तेंदुलकर अपने उस घर में रहने गए हैं जिसे खरीदी के कागजात के मुताबिक ही करीब चालीस करोड़ में खरीदा गया था और फिर उस जगह पर दुबारा बनाने में दसियों करोड़ और लगाए गए। अब इसके बाद अगर कुछ लाख के जुर्माने से उन्हें फिर माफी दी जाती है तो यह मुंबई के उन लाखों गरीब लोगों के साथ बेइंसाफी होगी जिन्हें सरकार तरह-तरह से जुर्माना पटाने पर बेबस करती है। ऐसी रियायत उन लोगों को क्यों दी जाए जो कि अपने पल-पल की कमाई करते हैं और जिनका कोई सामाजिक योगदान दिखाई भी नहीं पड़ता है। सचिन जैसों के मामले में पहला योगदान तो यही हो सकता था कि वे करोड़ों की कार मुफ्त में पाने के बाद उस पर आयात शुल्क के कुछ करोड़ रूपए अपनी किसी छोटी-मोटी जेब से निकालकर चुका देते। इस देश का कानून बहुत से टूर्नामेंट की ट्रॉफी तक को बिना आयात शुल्क इस देश में लाने नहीं देता और सचिन को तो यह कार किसी टूर्नामेंट की ट्रॉफी की तरह भी नहीं मिली थी।
यही हाल इस देश में बहुत से नेताओं और दूसरे ताकतवर तबकों का देखने मिलता है जो सरकारी खर्च पर ऐसे तमाम काम करते हैं जो कि वे अपने खुद के पैसों पर बहुत आसानी से कर सकते हैं। अपने अधिकारों से परे की ऐसी फिजूलखर्ची के अलावा लोग अपनी तरह-तरह की निजी जरूरतों को दिखाते हुए सरकारी खजाने से दान पाने की अर्जी भी लगाते हैं और खासे ताकतवर लोग जब ऐसी अर्जियां लेकर खड़े हो जाते हैं तो लगता है कि सबसे गरीब को तो ऐसी कतार के पीछे भी लगने का हक शायद ही कभी मिल पाए। ताकतवर लोगों को गरीबों के हक पर डाका डालने के पहले यह भी सोचना चाहिए कि उससे उनकी अपनी तस्वीर कैसी बनेगी? जिस सचिन को लेकर देश में एक यह अभियान चल रहा है कि उन्हें भारत रत्न दिया जाए, ऐसे सचिन को ऐसे भारत के लिए इतना रहम तो दिखाना चाहिए कि वे छब्बीस रूपए रोज पर जीने वाले लोगों के पेट में जाने वाले पैसों को छीनने की कोशिश न करें।
और देश की जनता को यह चाहिए कि ऐसी रियायत पाने वाले या उसकी कोशिश करने वाले लोगों को उजागर करने की अपनी जिम्मेदारी वह पूरी करे। ऐसे एक दो मामले ही सचिन को भारत रत्न से दूर धकेलने के लिए काफी हैं और ऐसी किसी ताजपोशी के वक्त ये अभी ताजा पाटी गई, या अब तक खुली हुई कब्र से निकलकर सामने खड़े हो जाएंगे।
 

छोटी सी बात


29 सितंबर
अच्छे और बुरे काम बूमरैंग की तरह के होते हैं जो फेंकने वाले के पास लौटकर आते ही हैं। इसलिए कांटे बिखेरते हुए याद रखें कि उस राह पर आपको भी लौटना पड़ सकता है।

हृदय दिवस के बहाने कुछ सोचें

29 सितंबर 2011
आज दुनिया भर में विश्व हृदय दिवस मनाया जा रहा है। ऐसे दिनों का एक फायदा यह होता है कि इस दिन इससे जुड़ी हुई कुछ खबरें छप जाती हैं और कुछ ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिनसे लोगों को याद पड़ता है कि उनके बदन के भीतर ऐसा एक हिस्सा है और उन्हें उसका ख्याल रखना चाहिए। बीमारी से बचाव के बारे में हम लंबे समय से यह लिखते आए हैं कि तमाम आधुनिक इलाज अधिक मौजूद होते जाने के बावजूद न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि अमरीका जैसे देश में भी लोगों को बीमारी का इलाज करवाना खासा मुश्किल पड़ रहा है। इलाज के खर्च के लिए सेहत का जो बीमा लोग खुद करवाते हैं या सबसे गरीब तबके लिए भारत जैसे देश में सरकारों ने यह काम अभी शुरू किया है, उससे भी कुछ हद तक तो इलाज मुफ्त में होता है लेकिन बहुत से मामलों में बीमा कंपनियां और अस्पताल इतनी बेईमानी करते हैं कि सरकार से वसूली हो जाती है और लोगों का इलाज नहीं हो पाता।
लेकिन इससे सबसे परे हर किसी की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने-आपको सेहतमंद रखें, बीमारी से बचाकर रखें और अपने आसपास भी ऐसा ही माहौल बनाकर रखें। भारत में अभी ताजा आंकड़े बतलाते हैं कि गैरसंक्रामक रोग बड़ी रफ्तार से बढ़ रहे हैं और भारत सरकार इससे बचाव के लिए दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। लेकिन सरकार की योजनाएं कितना फायदा पहुंचा पाती हैं यह सबका देखा हुआ है। और फिर यह भी है कि कुदरत के बनाए हुए इस बदन को तमाम चिकित्सा विज्ञान मिलकर भी बीमारी के पहले की हालत तक नहीं पहुंचा सकता। इसलिए लोगों को खुद ही अपने शरीर का ध्यान रखना है और साल में ऐसी दिन तो बहुत बार आएंगे जब अलग-अलग बीमारियों या शरीर के अलग-अलग हिस्सों के नाम पर उस दिन को मनाया जाएगा, लेकिन एक बड़ी बात यह है कि अगर कोई सेहत पर ध्यान देना शुरू करेगा तो वह तो फिर सभी जगह काम आने लगेगा।
भारत जैसे देशों जहां पर आज भी गरीब और मध्यमवर्गीय तबके की जीवनशैली ऐसी है कि वह उन्हें फिट रहने में मदद करती है। ऐसे में लोगों को चाहिए कि रोज मामूली कसरत करके, अपने खाने-पीने को सेहतमंद रखकर, तंबाकू और शराब, भारी-भरकम खाने से बचकर, कम खाकर, तनावमुक्त रहकर, योग और प्राणायाम जैसी मुफ्त की मिली बातों का इस्तेमाल करके वे बीमारी से बचे रहें। और बीमार पडऩे के पहले भी तन और मन को चंगा रखने के कई अलग-अलग दर्जे होते हैं। इनसे लोगों की उत्पादकता पर फर्क पड़ता है। कुछ लोग आसानी से रोज दस घंटे काम कर लेते हैं और कुछ लोग आठ घंटे पूरे होने के पहले ही थककर चूर हो जाते हैं, दम तोड़ देते हैं। इसलिए जो लोग अपने शरीर को ठीक-ठाक रखते हैं वे अपने कामकाज में भी बेहतर रहते हैं और उनके आगे बढऩे की संभावनाएं भी अधिक होती हैं।
लेकिन इसमें सरकार की भी एक भूमिका हम देखते हैं। हर शहर और कस्बे में सरकार को ऐसे प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने चाहिए जहां पर लोग रोज मुफ्त में योग-प्राणायाम, कसरत जैसी सुविधा पा सकें और जहां पर खान-पान से जुड़ी हुई बातों को लेकर जागरूकता पैदा की जा सके। आज बेकाबू शहरीकरण के चलते ऐसी जगहें कम होती जा रही हैं और अगर कसरत के लिए शहरी सुविधाएं हैं तो वे इतनी महंगी हैं कि हर कोई उनका खर्च नहीं उठा सकता। हमने कुछ समय पहले ईरान की तस्वीरों के साथ छापा था कि किस तरह सड़क किनारे की सार्वजनिक जमीन पर किस तरह कसरत की मशीनें लगी रहती हैं ताकि आते-जाते लोग उनका इस्तेमाल कर सकें। चीन में सड़कों के किनारे फुटपाथ पर ऐसी साधारण मशीनें लगा दी जाती हैं जिन पर लोग बसों का या ट्रेन का इंतजार करते हुए कसरत कर सकें। बहुत ही कम दाम की ऐसी मशीनों को भारत में भी जगह-जगह लगाया जा सकता है ताकि आते-जाते उन्हें देखकर लोग उनके इस्तेमाल की सोच सकें। कुछ समय पहले अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में एक इलाके से दूसरे इलाके तक जाने वाली मोटरबोट में ऐसे फेरबदल किए गए थे ताकि लोग उन पर पैडल मारते हुए बैठे रहें और उसकी ताकत भी बोट को आगे बढ़ाने में इस्तेमाल हो। राज्य सरकारें और स्थानीय संस्थाएं ऐसी पहल कर सकती हैं।
इसके अलावा तकनीकी वैज्ञानिक जगह-जगह रोज के इस्तेमाल में आने वाली मशीनों में ऐसा फेरबदल कर सकते हैं ताकि वे बिजली के साथ-साथ पैडल से भी चल सकें और उससे कसरत भी हो जाए। ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी बातें हैं जिनका ख्याल करके लोग सेहतमंद बने रह सकते हैं, और वही बीमारी से अकेला बचाव है। कभी भी बीमार पडऩे के बाद तंदरूस्ती पूरी की पूरी नहीं लौटती।

छोटी सी बात

28 सितंबर
वजन कम करने की चाह रखने वालों के लिए एक तरकीब है। वे जिस हाथ से अधिकतर काम करते हैं, उसे खाने-पीने की चीजों की तरफ न बढ़ाएं। इसी तरह खाने के लिए चम्मच को उस हाथ में थामें जिसे आप कम इस्तेमाल करते हैं। एक अंदाज है कि इससे आपका खाना-पीना तीस फीसदी तक घट सकता है। दूसरी तरकीब है छोटे बर्तनों में खाने की, छोटे चम्मच से खाने की।

यूपीए को क्या अपने न लौटने की गारंटी हो चुकी है?

28 सितंबर
पांच दिन लंबे अमरीका प्रवास से लौटने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष की आलोचना करते हुए जो बयान दिया है वह निहायत बेबुनियाद, और एक हताश नेता का बयान है जिसके कि काबू में कुछ भी नहीं रह गया। उन्होंने कहा कि विपक्ष बेचैन है और देश पर समय से पहले चुनाव थोपना चाह रहा है। उनकी इस बात पर आज देश के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने कहा है कि सरकार के मंत्री आपस में ही लड़ रहे हैं, विपक्ष को उन्हें अस्थिर करने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार अगर गिरती है तो वह अपने कर्मों की वजह से गिरेगी। विपक्ष की यह प्रतिक्रिया बिल्कुल तर्कसंगत है और कल से प्रधानमंत्री के बयान को सुनकर एकदम यही बात हम खुद होकर भी लिखने वाले थे।
किसी लोकतंत्र में विपक्ष कैसे चुनाव थोप सकता है? संसद या विधानसभा में जिस पार्टी या गठबंधन का बहुमत होता है वही अगर चाहे तो समय के पहले सदन को भंग करके चुनाव की घोषणा कर सकता है। लेकिन भारतीय विपक्ष ने न तो सांसदों की खरीद-फरोख्त करके सरकार को गिराने की कोशिश की और न ही विपक्ष से लोकतंत्र में यह उम्मीद की जा सकती कि वह सत्ता के जुर्म, मनमोहनी अंदाज में, अनदेखे करके चुपचाप बैठे रहे। विपक्ष ने, मीडिया ने और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अगर यूपीए सरकार के कुकर्मों को उजागर किया है, इस गरीब देश की जनता के हक की लूटपाट को सामने रखा है तो इनमें से किसी ने भी सरकार पर चुनाव को नहीं थोपा है। सरकार पर चुनाव तो खुद उसके मंत्री, खुद उसके नेता थोप रहे हैं जो कि इस अंदाज में बेईमानी कर रहे हैं कि अगले आम चुनाव में अब आने की कोई गुंजाइश बची नहीं है इसलिए अभी जितनी लूटपाट हो सके वह कर ली जाए।
सरकार से परे कांगे्रस पार्टी का हाल अगर देखें तो उसकी दुर्गति भी देखने लायक है। एक तरफ इसके प्रवक्ता एक बड़े नाजुक मौके पर अन्ना हजारे जैसे जननायक बने हुए बुजुर्ग को लेकर गालियां बकते हैं, पूरी की पूरी पार्टी किसी धर्म से जुड़े मुद्दे पर ऐसे धर्म के नेता या प्रवक्ता का इस्तेमाल करती है जिससे नुकसान के अलावा और कुछ न हो। फिर दिग्विजय सिंह जैसे नेता हैं जो कि बाबा-अन्ना जैसे लोगों के लिए गालियों के इस्तेमाल के साथ-साथ ओसामा के लिए ओसामाजी कहकर पता नहीं इस देश के कौन से ऐसे मुस्लिम तबके को खुश करना चाहते हैं जो कि ऐसे आतंकी के साथ हमदर्दी रखता हो। कांगे्रस के नेताओं के ऐसे मुस्लिम पे्रम से इस देश के मुस्लिमों की तस्वीर भी बिगड़ती है और हिंदू साम्प्रदायिकता पर राजनीति करने वाले लोगों को हथियार भी जुट जाता है। मनमोहन सिंह ने यह बात भी कही है कि उनकी सरकार जनता के नजरिए को ठीक कर पाने में नाकामयाब रही। ऊपर हमने जिन बातों को गिनाया है वे तमाम बातें जनता की नजरों में यूपीए सरकार और इस गठबंधन की पार्टियों के बारे में तस्वीर बनाने का काम करती रहीं। और यह तस्वीर खासी भयानक बन गई है जिसके बारे में अब अधिक, और अधिक लोग यह मानने लगे हैं कि अगले आम चुनाव तक यूपीए का उबर पाना नामुमकिन होगा, हालांकि हम राजनीति में इतनी जल्दी ऐसी अटकल लगाने में अपने को कमजोर पाते हैं।
मनमोहन सिंह में अगर जरा भी समझदारी, जरा भी शर्म बची हो तो उन्हें अपनी सरकार के बाकी जुर्म बाहर कहीं-कहीं से भांडाफोड़ होने के पहले खुद जनता के सामने रखने चाहिए और अपने घर बिदा हो जाना चाहिए। उनकी सज्जनता की छवि अब एक इतिहास की बात है। किसी गिरोह के सरदार को ऐसी रियायत नहीं मिल सकती कि वह मासूम है। और यही बात यूपीए के डीएमके जैसे दलों पर भी लागू होती है, इसके भूतपूर्व मंत्रियों और वर्तमान मंत्रियों पर भी लागू होती है। पिछली आधी सदी में हमें ऐसी कोई भारत सरकार याद नहीं पड़ती जिसकी इस कदर बदहाली हुई हो और जिसे लेकर देश की जनता में कोई विश्वसनीयता न बची हो। भारतीय जनता पार्टी चूंकि देश की सरकार नहीं चला रही है इसलिए वह सिर्फ कर्नाटक या उत्तराखंड जैसे अपने राज के प्रदेशों में ही भ्रष्टाचार करके सब्र कर रही है। उसका रिकॉर्ड भ्रष्टाचार पर कोई अधिक बेहतर नहीं है और वह विपक्ष में रहने की वजह से आज इस मौके पर कुछ कम कालिख से पुती हुई है। ऐसे में सरकार की फजीहत के लिए भाजपा इसी तारीफ की हकदार नहीं है और मनमोहन सिंह की यह सरकार अपने ही कुकर्मांे के वजन से डूबने के करीब है। मनमोहन सिंह को कम से कम इतनी समझदारी दिखानी चाहिए थी कि वे चुनाव लादने का श्रेय विपक्ष को न देते क्योंकि ऐसा करने की ताकत खुद उनके घर में है और उनके घर के तमाम नेता-मंत्री ऐसा करने में जुटे हुए हैं। देश में आज सवाल यह है कि क्या यूपीए अगले चुनाव में अपनी संभावनाओं को शून्य देखते हुए उसी अंदाज में लूटपाट में जुटी हुई है जिस अंदाज में  लौटता हुआ कोई राजा सब कुछ लूटते हुए लौटता है?

छोटी सी बात


27 सितंबर
बीमारी या तकलीफ का इलाज शुरूआती दौर में ही आसान होता है। बहुत सी बीमारियों तो जंगल की आग सरीखी होती हैं, एक बार भड़क गईं, तो काबू में आना बहुत महंगा पड़ता है, लंबा होता है, नुकसान भी बहुत होता है। इसलिए कोई भी जांच तुरंत करवाएं, और उसमें गर कोई बीमारी न निकले, तो उसे फिजूलखर्ची न मानें।

भगत सिंह, तुम्हारी शहादत की यहां सिर्फ इतनी कीमत है

27 सितंबर 2011
कल जब देश भर में जगह-जगह शहरों में लोग भगत सिंह की जन्मतिथि पर उनकी प्रतिमाओं पर जाकर तस्वीरें खिंचवाएंगे तब इस बात को कम ही लोग देखेंगे कि कौन-कौन से राजनीतिक दल और कौन-कौन से नेता इन प्रतिमाओं तक पहुंचने के हकदार भी नहीं हैं और जिनकी तमाम करतूतें भगत सिंह की सोच और उनके काम, उनकी जिंदगी और उनकी शहादत, इनमें से हर एक बात के खिलाफ हैं। लेकिन अगर यह फर्क जनता के बीच सोचने और समझने में नहीं आएगा, तो फिर यह वैसी ही राजनीतिक बेईमानी होगी जैसी गांधी की तस्वीरों के साथ होती है।  शहादत के लहू से अपने माथे तिलक करके जो लोग खुद भी शहीदों में नाम लिखाना चाहते हैं, उनको उजागर करना समाज के जागरूक तबके की जिम्मेदारी रहती है। लेकिन हिंदुस्तान में आज सभी किस्म के तबकों के बीच की विभाजन रेखा धुंधली होते-होते खत्म हो चुकी है और अब कोई भी किसी तस्वीर को लेकर चल सकता है और जनता को एक धोखा और झांसा दे सकता है।
1907 से 1931 तक कोई 25 बरस की जिंदगी में भगत सिंह ने अंगे्रजों के खिलाफ एक क्रांतिकारी लड़ाई लड़ते हुए शहादत की जो ऊंची मिसाल पेश की, उसने उन्हें गांधी से बहुत अलग रहते हुए भी, एक अलग किस्म का कद दिया। आज हम यह चर्चा यहां इसलिए कर रहे हैं कि अंगे्रजी राज के खिलाफ बगावत के पूरे वक्त के लडऩे के साथ-साथ छोटी सी उम्र में भगत सिंह ने जिस तरह से दुनिया के क्रांतिकारी आंदोलनों को पढ़ा, माक्र्स को पढ़ा, क्रांतिकारी हलचलों में वे शामिल हुए और जिस तरह से जान पर खेलकर उन्होंने अंगे्रजों के खिलाफ एक ऐसी हथियारबंद लड़ाई लड़ी जिसके चलते उन्हें मिली फांसी से उन्हें बचाने से गांधी तक ने अपील से मना कर दिया था। हिंदुस्तान की जनता के अधिकांश हिस्से में जिस हथियारबंद संघर्ष के लिए नापसंदगी थी, वह कड़ा और जानलेवा रास्ता जिस उम्र में भगत सिंह ने ले लिया था, आज उस उम्र की पीढ़ी भगत सिंह के इतिहास को भी नहीं पढ़ पातीं और दुनिया के संघर्ष की कहानियां तो अब गिने-चुने लड़के-लड़कियां ही पढ़ते हैं। जो न पढ़ते हैं, न जानते हैं, वे फैशन के बतौर चे गुएरा की तस्वीरों के टी-शर्ट पहनते हैं।
हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग के भीतर यह एक भयानक किस्म का, भयानक दर्जे का पाखंड है जिसके चलते तमाम साम्प्रदायिक, भ्रष्ट, दुष्ट और शोषक ताकतें भगत सिंह का नाम लेकर अपनी तस्वीरें छपवाने की कोशिश करती हैं। लेकिन यह किस तरह का देश है जहां और कुछ नहीं तो कम से कम भगत सिंह के इतिहास को पढऩे और समझने के लिए नौजवान पीढ़ी कुछ घंटों का वक्त निकालकर कम से कम अपने-आपको कुछ अधिक जागरूक और जानकार बनाने की भी नहीं सोच पाती! आज का हिंदुस्तान यहां की लोकतांत्रिक संस्थाओं की बेईमानी का शिकार होकर राजनीतिक हिकारत का सामान मान चुका है और अंतरराष्ट्रीय बाजार व्यवस्था के तहत आम हिंदुस्तानी अब एक ग्राहक सा रह गया है। भगत सिंह की लड़ाई की सारी जिंदगी बीस से पचीस बरस के उम्र की रही, और इस उम्र में एक मोबाईल और एक मोबाईल पर पूरा ध्यान लगाए हुए उनकी उम्र की हिंदुस्तानी पीढ़ी अपना वक्त गुजार देती है।
ऐसा देश इतिहास से कुछ सीखने, सबक लेने और नसीहत लेने की बात तो तभी सोच सकता था जब इतिहास को पढऩे में उसकी नौजवान पीढ़ी थोड़ा सा वक्त लगाती। और इतिहास पढऩे से हमारा यह मतलब नहीं है कि स्कूल और कॉलेज में इतिहास को एक विषय के रूप में कोई पढ़े। भगत सिंह जैसों की शहादत के खून से भीगी हुई, सींची हुई अपनी जड़ों को भी अगर कोई देखना नहीं चाहता तो फिर वे आज के बाजार में मौजूद सामान, और कल बाजार में आने वाले सामान के सपनों में डूबे लोग हैं जिनको भगत सिंह का नाम भी लेने का कोई हक नहीं है। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार इस देश के वे तमाम राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी हैं, वे तमाम प्रमुख लोग भी हैं जिन्होंने भगत सिंह को साल में दो बार माला के लायक बनाकर रख छोड़ा है और साल में दो बार राष्ट्र के नाम संदेश में उनका जिक्र हो जाए तो बहुत है। आज की राजनीतिक ताकतों को नौजवान पीढ़ी के बीच अधिक राजनीतिक जागरूकता से बहुत अधिक तकलीफ होना तय है, इसलिए इस पूरी पीढ़ी को एक अफीम के नशे की तरह सिर्फ फर्जी मुद्दों में उलझाकर रख दिया गया है और एक बावले ग्राहक की तरह उसके सामने एक के बाद दूसरा सामान, एक के बाद दूसरी सर्विस सरकारें रखती चली जाती हैं। पचीस बरस की उम्र तक के जितने लोग इस देश में मोबाईल फोन पर जितना वक्त अब तक गुजार चुके हैं क्या उसका एक फीसदी वक्त भी वे देश के सबसे जलते हुए मुद्दों को जानने और समझने में लगाते हैं?
भगत सिंह, यह देश बहुत ही अहसानफरामोश देश है और तुम्हारी शहादत की यहां सिर्फ इतनी कीमत है कि लोग उसके साथ खड़े होकर अपनी तस्वीरें छपवाने की गारंटी कर लेते हैं।

छोटी सी बात

26 सितंबर
अपना सारा घमंड, सारी बददिमागी, अपने से अधिक ताकतवर लोगों पर आजमाकर देखें। सबक आपको अपने से कमजोर लोगों के साथ सही बर्ताव सिखा देगा।

भारत, पाकिस्तान और अमरीका

26 सितंबर 2011
अमरीका और पाकिस्तान के बीच जिन आरोपों या सुबूतों के आधार पर रिश्ते तनाव से भरे हुए दिख रहे हैं उनसे भारत के कुछ लोग यह सोचकर खुश हो सकते हैं कि मुंबई हमले जैसे कई छोटे-बड़े हमले के लिए जिम्मेदार पाकिस्तान अब अपने सबसे बड़े मददगार देश अमरीका की नजरों में ही गिर रहा है या गिर गया है। पाकिस्तान की नई, नौजवान और खूबसूरत विदेश मंत्री ने अमरीका में दौरे के दौरान जवाबी हमला करते हुए यह कहा कि अमरीका पर आतंकी हमलों के लिए पाकिस्तान का नाम अगर इसी तरह अमरीका जोड़ेगा तो वह एक दोस्त खो बैठेगा। दोनों तरफ के बयानों को अगर देखें तो यह तनाव पिछले बहुत बरसों में अभूतपूर्व दिख रहा है लेकिन यह आगे कहां तक पहुंचेगा इसे लेकर अटकलबाजी आसान इसलिए नहीं है कि अमरीका की विदेश नीति और सैनिक नीति के लिए पाकिस्तान हिंद महासागर क्षेत्र के इस इलाके में अब भी उसकी सबसे पसंदीदा हुकूमत है। एक ऐसा देश जो अमरीका के पैसों पर जिंदा है, जो अपनी जमीन के अमरीका-विरोधी लोगों की नाराजगी कम रखने के लिए बीच-बीच में अमरीका पर गुर्राकर कुछ दांत उसे दिखाता है, लेकिन इससे परे हकीकत यह है कि उसकी जमीन पर अमरीकी फौजें जो चाहे वो करती हैं। ऐसे में इस तनाव की गंभीरता और उसके लंबे असर के बारे में हमें गहरा शक है। आतंकियों, कट्टरपंथियों, फौजियों और जासूस एजेंसियों से चारों तरफ से घिरे हुए और उनके शिकार इस देश की हालत अमरीका को एकदम माकूल बैठती है और उसे ऐसा ही परेशानहाल, मुसीबतजदा फौजी अड्डा चाहिए।
पाकिस्तान की परेशानियां बढ़ते देखकर हिंदुस्तान की जमीन के जंगखोर लोग खुश हो सकते हैं और कुछ अमनपसंद ऐसे लोग भी खुश हो सकते हैं जो पाकिस्तानी जमीन से यहां होने वाले आतंकी हमलों से जख्मी हैं। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की बेहतरी चाहने वाले लोगों में जो समझदार लोग हैं वे जानते और समझते हैं कि पड़ोस में लगी आग किसी के फायदे की नहीं होती। पाकिस्तान जैसे-जैसे एक अधिक नाकामयाब लोकतंत्र होते जा रहा है वैसे-वैसे वह अमरीका या चीन, या दोनों की फौजी डिजाइनों का एक अधिक बेबस पुर्जा होते चले जा रहा है। यह सिलसिला कभी भी भारत के फायदे का नहीं रहेगा और भारत के मामलों में दखल देने के लिए पाकिस्तान को अमरीका या चीन भाड़े के एक कंधे की तरह इस्तेमाल करते रह सकते हैं, रहेंगे। इसलिए पाकिस्तान में कट्टरपंथ और धर्मान्धता खत्म या कम होने, वहां फौज की दखल कम होने, वहां की गरीबी कम होने और वहां पर उनके खुद के या पड़ोसी देशों के आतंकियों का कब्जा कम होने में ही भारत का भला है। अमरीका जो कि अपने-आपको दस बरस पहले के आतंकी हमले के एक जख्मी की तरह पेश करते हुए पूरी दुनिया पर हमला करने का हकदार बताते रहता है, उसे अपने ऐसे पल भर के नुकसान के बाद जंग के फायदे अलग दिखते हैं। एक-एक देश की सरकारों को पलटना, वहां के अच्छे या बुरे, जैसे भी हों, शासकों को मारना और दुनिया के अकेले दादा की तरह अपने-आपको स्थापित करना उसकी धाक के लिए जरूरी और फायदेमंद है।
हमारे पाठकों को यह बात शायद याद होगी कि इराक में लोकतंत्र लाने के नाम पर जब अमरीका ने हमला किया तो उसके खिलाफ हमने लगातार लिखते हुए उस पर भारत सरकार की चुप्पी को भी इतिहास में दर्ज होने वाला एक शर्मनाक तथ्य लिखा था। लोगों ने इस हफ्ते की भारतीय प्रधानमंत्री की खबरों को अगर ध्यान से देखा है तो अब जाकर शायद पहली बार मनमोहन सिंह ने इस पर मुंह खोला है और पश्चिमी देशों द्वारा फौजी कार्रवाई से किसी देश में सत्ता बदलने की आलोचना उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के अपने भाषण में की है। अब तो अमरीका और उसके गिरोह के बाकी हमलावर देश इस राह पर इतना आगे बढ़ गए हैं कि भारत की ऐसी पहली कड़ी प्रतिक्रिया उनकी साजिशों को कोई भी नुकसान पहुंचाने की हालत में रह नहीं गई है। इसलिए हम मनमोहन सिंह या भारत की ऐसी प्रतिक्रिया को बहुत खोखली प्रतिक्रिया मानते हैं। और आज अमरीका और पाकिस्तान के बीच तनाव अगर सचमुच आगे बढ़ता है तो एक नौबत ऐसी आ सकती है कि पाकिस्तान को आतंकी-अड्डा बताते हुए अमरीका वहां भी तख्तापलट के लिए सीधी या दबी-छुपी फौजी कार्रवाई कर सकता है। यह हालत भी भारत के जिन लोगों को अच्छी लगेगी उन्हें एक विख्यात कविता याद रखनी चाहिए जो कहती है-मैं चुप रहा क्योंकि आज वे मुझे लेने नहीं आए थे...
पाकिस्तान और भारत के तनाव, अमरीका और पाकिस्तान के तनाव से बिल्कुल अलग मामला है और रिश्तों के ये दो अलग-अलग मामले किसी तरह की तुलना के लायक भी नहीं हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि भारत को एक ऐसी स्थाई विदेश नीति पर चलने की जरूरत है जिसमें किसी देश में सत्ता बदलने के लिए किसी भी दूसरे देश की फौजी कार्रवाई पर भारत की प्रतिक्रिया बरसों बाद न आए, और वह समय रहते, असर डालने के वक्त के भीतर ही आए। लेकिन मनमोहन सिंह जैसों से कोई उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि भारत का यह प्रधानमंत्री तो हमलावर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को औपचारिक रूप से जाकर यह कहता है कि भारत के लोग उसे बहुत चाहते हैं। इतिहास का इतना बड़ा झूठ जो प्रधानमंत्री अपने देश के नाम पर बाहर पेश करता है वैसा अमरीकापरस्त इंसान किसी मजबूत विदेश नीति को कभी नहीं बढ़ा सकता। दुनिया के इतिहास में खासी दखल रखने वाले जवाहर लाल नेहरू के देश और उनकी पार्टी की यह बदहाली करने वाले मनमोहन सिंह का नाम इतिहास में कैसी स्याही से दर्ज होगा क्या उस रंग को भी यहां बताने की जरूरत है?