28 सितंबर
पांच दिन लंबे अमरीका प्रवास से लौटने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष की आलोचना करते हुए जो बयान दिया है वह निहायत बेबुनियाद, और एक हताश नेता का बयान है जिसके कि काबू में कुछ भी नहीं रह गया। उन्होंने कहा कि विपक्ष बेचैन है और देश पर समय से पहले चुनाव थोपना चाह रहा है। उनकी इस बात पर आज देश के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने कहा है कि सरकार के मंत्री आपस में ही लड़ रहे हैं, विपक्ष को उन्हें अस्थिर करने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार अगर गिरती है तो वह अपने कर्मों की वजह से गिरेगी। विपक्ष की यह प्रतिक्रिया बिल्कुल तर्कसंगत है और कल से प्रधानमंत्री के बयान को सुनकर एकदम यही बात हम खुद होकर भी लिखने वाले थे।
किसी लोकतंत्र में विपक्ष कैसे चुनाव थोप सकता है? संसद या विधानसभा में जिस पार्टी या गठबंधन का बहुमत होता है वही अगर चाहे तो समय के पहले सदन को भंग करके चुनाव की घोषणा कर सकता है। लेकिन भारतीय विपक्ष ने न तो सांसदों की खरीद-फरोख्त करके सरकार को गिराने की कोशिश की और न ही विपक्ष से लोकतंत्र में यह उम्मीद की जा सकती कि वह सत्ता के जुर्म, मनमोहनी अंदाज में, अनदेखे करके चुपचाप बैठे रहे। विपक्ष ने, मीडिया ने और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अगर यूपीए सरकार के कुकर्मों को उजागर किया है, इस गरीब देश की जनता के हक की लूटपाट को सामने रखा है तो इनमें से किसी ने भी सरकार पर चुनाव को नहीं थोपा है। सरकार पर चुनाव तो खुद उसके मंत्री, खुद उसके नेता थोप रहे हैं जो कि इस अंदाज में बेईमानी कर रहे हैं कि अगले आम चुनाव में अब आने की कोई गुंजाइश बची नहीं है इसलिए अभी जितनी लूटपाट हो सके वह कर ली जाए।
सरकार से परे कांगे्रस पार्टी का हाल अगर देखें तो उसकी दुर्गति भी देखने लायक है। एक तरफ इसके प्रवक्ता एक बड़े नाजुक मौके पर अन्ना हजारे जैसे जननायक बने हुए बुजुर्ग को लेकर गालियां बकते हैं, पूरी की पूरी पार्टी किसी धर्म से जुड़े मुद्दे पर ऐसे धर्म के नेता या प्रवक्ता का इस्तेमाल करती है जिससे नुकसान के अलावा और कुछ न हो। फिर दिग्विजय सिंह जैसे नेता हैं जो कि बाबा-अन्ना जैसे लोगों के लिए गालियों के इस्तेमाल के साथ-साथ ओसामा के लिए ओसामाजी कहकर पता नहीं इस देश के कौन से ऐसे मुस्लिम तबके को खुश करना चाहते हैं जो कि ऐसे आतंकी के साथ हमदर्दी रखता हो। कांगे्रस के नेताओं के ऐसे मुस्लिम पे्रम से इस देश के मुस्लिमों की तस्वीर भी बिगड़ती है और हिंदू साम्प्रदायिकता पर राजनीति करने वाले लोगों को हथियार भी जुट जाता है। मनमोहन सिंह ने यह बात भी कही है कि उनकी सरकार जनता के नजरिए को ठीक कर पाने में नाकामयाब रही। ऊपर हमने जिन बातों को गिनाया है वे तमाम बातें जनता की नजरों में यूपीए सरकार और इस गठबंधन की पार्टियों के बारे में तस्वीर बनाने का काम करती रहीं। और यह तस्वीर खासी भयानक बन गई है जिसके बारे में अब अधिक, और अधिक लोग यह मानने लगे हैं कि अगले आम चुनाव तक यूपीए का उबर पाना नामुमकिन होगा, हालांकि हम राजनीति में इतनी जल्दी ऐसी अटकल लगाने में अपने को कमजोर पाते हैं।
मनमोहन सिंह में अगर जरा भी समझदारी, जरा भी शर्म बची हो तो उन्हें अपनी सरकार के बाकी जुर्म बाहर कहीं-कहीं से भांडाफोड़ होने के पहले खुद जनता के सामने रखने चाहिए और अपने घर बिदा हो जाना चाहिए। उनकी सज्जनता की छवि अब एक इतिहास की बात है। किसी गिरोह के सरदार को ऐसी रियायत नहीं मिल सकती कि वह मासूम है। और यही बात यूपीए के डीएमके जैसे दलों पर भी लागू होती है, इसके भूतपूर्व मंत्रियों और वर्तमान मंत्रियों पर भी लागू होती है। पिछली आधी सदी में हमें ऐसी कोई भारत सरकार याद नहीं पड़ती जिसकी इस कदर बदहाली हुई हो और जिसे लेकर देश की जनता में कोई विश्वसनीयता न बची हो। भारतीय जनता पार्टी चूंकि देश की सरकार नहीं चला रही है इसलिए वह सिर्फ कर्नाटक या उत्तराखंड जैसे अपने राज के प्रदेशों में ही भ्रष्टाचार करके सब्र कर रही है। उसका रिकॉर्ड भ्रष्टाचार पर कोई अधिक बेहतर नहीं है और वह विपक्ष में रहने की वजह से आज इस मौके पर कुछ कम कालिख से पुती हुई है। ऐसे में सरकार की फजीहत के लिए भाजपा इसी तारीफ की हकदार नहीं है और मनमोहन सिंह की यह सरकार अपने ही कुकर्मांे के वजन से डूबने के करीब है। मनमोहन सिंह को कम से कम इतनी समझदारी दिखानी चाहिए थी कि वे चुनाव लादने का श्रेय विपक्ष को न देते क्योंकि ऐसा करने की ताकत खुद उनके घर में है और उनके घर के तमाम नेता-मंत्री ऐसा करने में जुटे हुए हैं। देश में आज सवाल यह है कि क्या यूपीए अगले चुनाव में अपनी संभावनाओं को शून्य देखते हुए उसी अंदाज में लूटपाट में जुटी हुई है जिस अंदाज में लौटता हुआ कोई राजा सब कुछ लूटते हुए लौटता है?
पांच दिन लंबे अमरीका प्रवास से लौटने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष की आलोचना करते हुए जो बयान दिया है वह निहायत बेबुनियाद, और एक हताश नेता का बयान है जिसके कि काबू में कुछ भी नहीं रह गया। उन्होंने कहा कि विपक्ष बेचैन है और देश पर समय से पहले चुनाव थोपना चाह रहा है। उनकी इस बात पर आज देश के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने कहा है कि सरकार के मंत्री आपस में ही लड़ रहे हैं, विपक्ष को उन्हें अस्थिर करने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार अगर गिरती है तो वह अपने कर्मों की वजह से गिरेगी। विपक्ष की यह प्रतिक्रिया बिल्कुल तर्कसंगत है और कल से प्रधानमंत्री के बयान को सुनकर एकदम यही बात हम खुद होकर भी लिखने वाले थे।
किसी लोकतंत्र में विपक्ष कैसे चुनाव थोप सकता है? संसद या विधानसभा में जिस पार्टी या गठबंधन का बहुमत होता है वही अगर चाहे तो समय के पहले सदन को भंग करके चुनाव की घोषणा कर सकता है। लेकिन भारतीय विपक्ष ने न तो सांसदों की खरीद-फरोख्त करके सरकार को गिराने की कोशिश की और न ही विपक्ष से लोकतंत्र में यह उम्मीद की जा सकती कि वह सत्ता के जुर्म, मनमोहनी अंदाज में, अनदेखे करके चुपचाप बैठे रहे। विपक्ष ने, मीडिया ने और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अगर यूपीए सरकार के कुकर्मों को उजागर किया है, इस गरीब देश की जनता के हक की लूटपाट को सामने रखा है तो इनमें से किसी ने भी सरकार पर चुनाव को नहीं थोपा है। सरकार पर चुनाव तो खुद उसके मंत्री, खुद उसके नेता थोप रहे हैं जो कि इस अंदाज में बेईमानी कर रहे हैं कि अगले आम चुनाव में अब आने की कोई गुंजाइश बची नहीं है इसलिए अभी जितनी लूटपाट हो सके वह कर ली जाए।
सरकार से परे कांगे्रस पार्टी का हाल अगर देखें तो उसकी दुर्गति भी देखने लायक है। एक तरफ इसके प्रवक्ता एक बड़े नाजुक मौके पर अन्ना हजारे जैसे जननायक बने हुए बुजुर्ग को लेकर गालियां बकते हैं, पूरी की पूरी पार्टी किसी धर्म से जुड़े मुद्दे पर ऐसे धर्म के नेता या प्रवक्ता का इस्तेमाल करती है जिससे नुकसान के अलावा और कुछ न हो। फिर दिग्विजय सिंह जैसे नेता हैं जो कि बाबा-अन्ना जैसे लोगों के लिए गालियों के इस्तेमाल के साथ-साथ ओसामा के लिए ओसामाजी कहकर पता नहीं इस देश के कौन से ऐसे मुस्लिम तबके को खुश करना चाहते हैं जो कि ऐसे आतंकी के साथ हमदर्दी रखता हो। कांगे्रस के नेताओं के ऐसे मुस्लिम पे्रम से इस देश के मुस्लिमों की तस्वीर भी बिगड़ती है और हिंदू साम्प्रदायिकता पर राजनीति करने वाले लोगों को हथियार भी जुट जाता है। मनमोहन सिंह ने यह बात भी कही है कि उनकी सरकार जनता के नजरिए को ठीक कर पाने में नाकामयाब रही। ऊपर हमने जिन बातों को गिनाया है वे तमाम बातें जनता की नजरों में यूपीए सरकार और इस गठबंधन की पार्टियों के बारे में तस्वीर बनाने का काम करती रहीं। और यह तस्वीर खासी भयानक बन गई है जिसके बारे में अब अधिक, और अधिक लोग यह मानने लगे हैं कि अगले आम चुनाव तक यूपीए का उबर पाना नामुमकिन होगा, हालांकि हम राजनीति में इतनी जल्दी ऐसी अटकल लगाने में अपने को कमजोर पाते हैं।
मनमोहन सिंह में अगर जरा भी समझदारी, जरा भी शर्म बची हो तो उन्हें अपनी सरकार के बाकी जुर्म बाहर कहीं-कहीं से भांडाफोड़ होने के पहले खुद जनता के सामने रखने चाहिए और अपने घर बिदा हो जाना चाहिए। उनकी सज्जनता की छवि अब एक इतिहास की बात है। किसी गिरोह के सरदार को ऐसी रियायत नहीं मिल सकती कि वह मासूम है। और यही बात यूपीए के डीएमके जैसे दलों पर भी लागू होती है, इसके भूतपूर्व मंत्रियों और वर्तमान मंत्रियों पर भी लागू होती है। पिछली आधी सदी में हमें ऐसी कोई भारत सरकार याद नहीं पड़ती जिसकी इस कदर बदहाली हुई हो और जिसे लेकर देश की जनता में कोई विश्वसनीयता न बची हो। भारतीय जनता पार्टी चूंकि देश की सरकार नहीं चला रही है इसलिए वह सिर्फ कर्नाटक या उत्तराखंड जैसे अपने राज के प्रदेशों में ही भ्रष्टाचार करके सब्र कर रही है। उसका रिकॉर्ड भ्रष्टाचार पर कोई अधिक बेहतर नहीं है और वह विपक्ष में रहने की वजह से आज इस मौके पर कुछ कम कालिख से पुती हुई है। ऐसे में सरकार की फजीहत के लिए भाजपा इसी तारीफ की हकदार नहीं है और मनमोहन सिंह की यह सरकार अपने ही कुकर्मांे के वजन से डूबने के करीब है। मनमोहन सिंह को कम से कम इतनी समझदारी दिखानी चाहिए थी कि वे चुनाव लादने का श्रेय विपक्ष को न देते क्योंकि ऐसा करने की ताकत खुद उनके घर में है और उनके घर के तमाम नेता-मंत्री ऐसा करने में जुटे हुए हैं। देश में आज सवाल यह है कि क्या यूपीए अगले चुनाव में अपनी संभावनाओं को शून्य देखते हुए उसी अंदाज में लूटपाट में जुटी हुई है जिस अंदाज में लौटता हुआ कोई राजा सब कुछ लूटते हुए लौटता है?
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