भगत सिंह, तुम्हारी शहादत की यहां सिर्फ इतनी कीमत है

27 सितंबर 2011
कल जब देश भर में जगह-जगह शहरों में लोग भगत सिंह की जन्मतिथि पर उनकी प्रतिमाओं पर जाकर तस्वीरें खिंचवाएंगे तब इस बात को कम ही लोग देखेंगे कि कौन-कौन से राजनीतिक दल और कौन-कौन से नेता इन प्रतिमाओं तक पहुंचने के हकदार भी नहीं हैं और जिनकी तमाम करतूतें भगत सिंह की सोच और उनके काम, उनकी जिंदगी और उनकी शहादत, इनमें से हर एक बात के खिलाफ हैं। लेकिन अगर यह फर्क जनता के बीच सोचने और समझने में नहीं आएगा, तो फिर यह वैसी ही राजनीतिक बेईमानी होगी जैसी गांधी की तस्वीरों के साथ होती है।  शहादत के लहू से अपने माथे तिलक करके जो लोग खुद भी शहीदों में नाम लिखाना चाहते हैं, उनको उजागर करना समाज के जागरूक तबके की जिम्मेदारी रहती है। लेकिन हिंदुस्तान में आज सभी किस्म के तबकों के बीच की विभाजन रेखा धुंधली होते-होते खत्म हो चुकी है और अब कोई भी किसी तस्वीर को लेकर चल सकता है और जनता को एक धोखा और झांसा दे सकता है।
1907 से 1931 तक कोई 25 बरस की जिंदगी में भगत सिंह ने अंगे्रजों के खिलाफ एक क्रांतिकारी लड़ाई लड़ते हुए शहादत की जो ऊंची मिसाल पेश की, उसने उन्हें गांधी से बहुत अलग रहते हुए भी, एक अलग किस्म का कद दिया। आज हम यह चर्चा यहां इसलिए कर रहे हैं कि अंगे्रजी राज के खिलाफ बगावत के पूरे वक्त के लडऩे के साथ-साथ छोटी सी उम्र में भगत सिंह ने जिस तरह से दुनिया के क्रांतिकारी आंदोलनों को पढ़ा, माक्र्स को पढ़ा, क्रांतिकारी हलचलों में वे शामिल हुए और जिस तरह से जान पर खेलकर उन्होंने अंगे्रजों के खिलाफ एक ऐसी हथियारबंद लड़ाई लड़ी जिसके चलते उन्हें मिली फांसी से उन्हें बचाने से गांधी तक ने अपील से मना कर दिया था। हिंदुस्तान की जनता के अधिकांश हिस्से में जिस हथियारबंद संघर्ष के लिए नापसंदगी थी, वह कड़ा और जानलेवा रास्ता जिस उम्र में भगत सिंह ने ले लिया था, आज उस उम्र की पीढ़ी भगत सिंह के इतिहास को भी नहीं पढ़ पातीं और दुनिया के संघर्ष की कहानियां तो अब गिने-चुने लड़के-लड़कियां ही पढ़ते हैं। जो न पढ़ते हैं, न जानते हैं, वे फैशन के बतौर चे गुएरा की तस्वीरों के टी-शर्ट पहनते हैं।
हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग के भीतर यह एक भयानक किस्म का, भयानक दर्जे का पाखंड है जिसके चलते तमाम साम्प्रदायिक, भ्रष्ट, दुष्ट और शोषक ताकतें भगत सिंह का नाम लेकर अपनी तस्वीरें छपवाने की कोशिश करती हैं। लेकिन यह किस तरह का देश है जहां और कुछ नहीं तो कम से कम भगत सिंह के इतिहास को पढऩे और समझने के लिए नौजवान पीढ़ी कुछ घंटों का वक्त निकालकर कम से कम अपने-आपको कुछ अधिक जागरूक और जानकार बनाने की भी नहीं सोच पाती! आज का हिंदुस्तान यहां की लोकतांत्रिक संस्थाओं की बेईमानी का शिकार होकर राजनीतिक हिकारत का सामान मान चुका है और अंतरराष्ट्रीय बाजार व्यवस्था के तहत आम हिंदुस्तानी अब एक ग्राहक सा रह गया है। भगत सिंह की लड़ाई की सारी जिंदगी बीस से पचीस बरस के उम्र की रही, और इस उम्र में एक मोबाईल और एक मोबाईल पर पूरा ध्यान लगाए हुए उनकी उम्र की हिंदुस्तानी पीढ़ी अपना वक्त गुजार देती है।
ऐसा देश इतिहास से कुछ सीखने, सबक लेने और नसीहत लेने की बात तो तभी सोच सकता था जब इतिहास को पढऩे में उसकी नौजवान पीढ़ी थोड़ा सा वक्त लगाती। और इतिहास पढऩे से हमारा यह मतलब नहीं है कि स्कूल और कॉलेज में इतिहास को एक विषय के रूप में कोई पढ़े। भगत सिंह जैसों की शहादत के खून से भीगी हुई, सींची हुई अपनी जड़ों को भी अगर कोई देखना नहीं चाहता तो फिर वे आज के बाजार में मौजूद सामान, और कल बाजार में आने वाले सामान के सपनों में डूबे लोग हैं जिनको भगत सिंह का नाम भी लेने का कोई हक नहीं है। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार इस देश के वे तमाम राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी हैं, वे तमाम प्रमुख लोग भी हैं जिन्होंने भगत सिंह को साल में दो बार माला के लायक बनाकर रख छोड़ा है और साल में दो बार राष्ट्र के नाम संदेश में उनका जिक्र हो जाए तो बहुत है। आज की राजनीतिक ताकतों को नौजवान पीढ़ी के बीच अधिक राजनीतिक जागरूकता से बहुत अधिक तकलीफ होना तय है, इसलिए इस पूरी पीढ़ी को एक अफीम के नशे की तरह सिर्फ फर्जी मुद्दों में उलझाकर रख दिया गया है और एक बावले ग्राहक की तरह उसके सामने एक के बाद दूसरा सामान, एक के बाद दूसरी सर्विस सरकारें रखती चली जाती हैं। पचीस बरस की उम्र तक के जितने लोग इस देश में मोबाईल फोन पर जितना वक्त अब तक गुजार चुके हैं क्या उसका एक फीसदी वक्त भी वे देश के सबसे जलते हुए मुद्दों को जानने और समझने में लगाते हैं?
भगत सिंह, यह देश बहुत ही अहसानफरामोश देश है और तुम्हारी शहादत की यहां सिर्फ इतनी कीमत है कि लोग उसके साथ खड़े होकर अपनी तस्वीरें छपवाने की गारंटी कर लेते हैं।

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