26 सितंबर 2011
अमरीका और पाकिस्तान के बीच जिन आरोपों या सुबूतों के आधार पर रिश्ते तनाव से भरे हुए दिख रहे हैं उनसे भारत के कुछ लोग यह सोचकर खुश हो सकते हैं कि मुंबई हमले जैसे कई छोटे-बड़े हमले के लिए जिम्मेदार पाकिस्तान अब अपने सबसे बड़े मददगार देश अमरीका की नजरों में ही गिर रहा है या गिर गया है। पाकिस्तान की नई, नौजवान और खूबसूरत विदेश मंत्री ने अमरीका में दौरे के दौरान जवाबी हमला करते हुए यह कहा कि अमरीका पर आतंकी हमलों के लिए पाकिस्तान का नाम अगर इसी तरह अमरीका जोड़ेगा तो वह एक दोस्त खो बैठेगा। दोनों तरफ के बयानों को अगर देखें तो यह तनाव पिछले बहुत बरसों में अभूतपूर्व दिख रहा है लेकिन यह आगे कहां तक पहुंचेगा इसे लेकर अटकलबाजी आसान इसलिए नहीं है कि अमरीका की विदेश नीति और सैनिक नीति के लिए पाकिस्तान हिंद महासागर क्षेत्र के इस इलाके में अब भी उसकी सबसे पसंदीदा हुकूमत है। एक ऐसा देश जो अमरीका के पैसों पर जिंदा है, जो अपनी जमीन के अमरीका-विरोधी लोगों की नाराजगी कम रखने के लिए बीच-बीच में अमरीका पर गुर्राकर कुछ दांत उसे दिखाता है, लेकिन इससे परे हकीकत यह है कि उसकी जमीन पर अमरीकी फौजें जो चाहे वो करती हैं। ऐसे में इस तनाव की गंभीरता और उसके लंबे असर के बारे में हमें गहरा शक है। आतंकियों, कट्टरपंथियों, फौजियों और जासूस एजेंसियों से चारों तरफ से घिरे हुए और उनके शिकार इस देश की हालत अमरीका को एकदम माकूल बैठती है और उसे ऐसा ही परेशानहाल, मुसीबतजदा फौजी अड्डा चाहिए।
पाकिस्तान की परेशानियां बढ़ते देखकर हिंदुस्तान की जमीन के जंगखोर लोग खुश हो सकते हैं और कुछ अमनपसंद ऐसे लोग भी खुश हो सकते हैं जो पाकिस्तानी जमीन से यहां होने वाले आतंकी हमलों से जख्मी हैं। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की बेहतरी चाहने वाले लोगों में जो समझदार लोग हैं वे जानते और समझते हैं कि पड़ोस में लगी आग किसी के फायदे की नहीं होती। पाकिस्तान जैसे-जैसे एक अधिक नाकामयाब लोकतंत्र होते जा रहा है वैसे-वैसे वह अमरीका या चीन, या दोनों की फौजी डिजाइनों का एक अधिक बेबस पुर्जा होते चले जा रहा है। यह सिलसिला कभी भी भारत के फायदे का नहीं रहेगा और भारत के मामलों में दखल देने के लिए पाकिस्तान को अमरीका या चीन भाड़े के एक कंधे की तरह इस्तेमाल करते रह सकते हैं, रहेंगे। इसलिए पाकिस्तान में कट्टरपंथ और धर्मान्धता खत्म या कम होने, वहां फौज की दखल कम होने, वहां की गरीबी कम होने और वहां पर उनके खुद के या पड़ोसी देशों के आतंकियों का कब्जा कम होने में ही भारत का भला है। अमरीका जो कि अपने-आपको दस बरस पहले के आतंकी हमले के एक जख्मी की तरह पेश करते हुए पूरी दुनिया पर हमला करने का हकदार बताते रहता है, उसे अपने ऐसे पल भर के नुकसान के बाद जंग के फायदे अलग दिखते हैं। एक-एक देश की सरकारों को पलटना, वहां के अच्छे या बुरे, जैसे भी हों, शासकों को मारना और दुनिया के अकेले दादा की तरह अपने-आपको स्थापित करना उसकी धाक के लिए जरूरी और फायदेमंद है।
हमारे पाठकों को यह बात शायद याद होगी कि इराक में लोकतंत्र लाने के नाम पर जब अमरीका ने हमला किया तो उसके खिलाफ हमने लगातार लिखते हुए उस पर भारत सरकार की चुप्पी को भी इतिहास में दर्ज होने वाला एक शर्मनाक तथ्य लिखा था। लोगों ने इस हफ्ते की भारतीय प्रधानमंत्री की खबरों को अगर ध्यान से देखा है तो अब जाकर शायद पहली बार मनमोहन सिंह ने इस पर मुंह खोला है और पश्चिमी देशों द्वारा फौजी कार्रवाई से किसी देश में सत्ता बदलने की आलोचना उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के अपने भाषण में की है। अब तो अमरीका और उसके गिरोह के बाकी हमलावर देश इस राह पर इतना आगे बढ़ गए हैं कि भारत की ऐसी पहली कड़ी प्रतिक्रिया उनकी साजिशों को कोई भी नुकसान पहुंचाने की हालत में रह नहीं गई है। इसलिए हम मनमोहन सिंह या भारत की ऐसी प्रतिक्रिया को बहुत खोखली प्रतिक्रिया मानते हैं। और आज अमरीका और पाकिस्तान के बीच तनाव अगर सचमुच आगे बढ़ता है तो एक नौबत ऐसी आ सकती है कि पाकिस्तान को आतंकी-अड्डा बताते हुए अमरीका वहां भी तख्तापलट के लिए सीधी या दबी-छुपी फौजी कार्रवाई कर सकता है। यह हालत भी भारत के जिन लोगों को अच्छी लगेगी उन्हें एक विख्यात कविता याद रखनी चाहिए जो कहती है-मैं चुप रहा क्योंकि आज वे मुझे लेने नहीं आए थे...
पाकिस्तान और भारत के तनाव, अमरीका और पाकिस्तान के तनाव से बिल्कुल अलग मामला है और रिश्तों के ये दो अलग-अलग मामले किसी तरह की तुलना के लायक भी नहीं हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि भारत को एक ऐसी स्थाई विदेश नीति पर चलने की जरूरत है जिसमें किसी देश में सत्ता बदलने के लिए किसी भी दूसरे देश की फौजी कार्रवाई पर भारत की प्रतिक्रिया बरसों बाद न आए, और वह समय रहते, असर डालने के वक्त के भीतर ही आए। लेकिन मनमोहन सिंह जैसों से कोई उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि भारत का यह प्रधानमंत्री तो हमलावर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को औपचारिक रूप से जाकर यह कहता है कि भारत के लोग उसे बहुत चाहते हैं। इतिहास का इतना बड़ा झूठ जो प्रधानमंत्री अपने देश के नाम पर बाहर पेश करता है वैसा अमरीकापरस्त इंसान किसी मजबूत विदेश नीति को कभी नहीं बढ़ा सकता। दुनिया के इतिहास में खासी दखल रखने वाले जवाहर लाल नेहरू के देश और उनकी पार्टी की यह बदहाली करने वाले मनमोहन सिंह का नाम इतिहास में कैसी स्याही से दर्ज होगा क्या उस रंग को भी यहां बताने की जरूरत है?
अमरीका और पाकिस्तान के बीच जिन आरोपों या सुबूतों के आधार पर रिश्ते तनाव से भरे हुए दिख रहे हैं उनसे भारत के कुछ लोग यह सोचकर खुश हो सकते हैं कि मुंबई हमले जैसे कई छोटे-बड़े हमले के लिए जिम्मेदार पाकिस्तान अब अपने सबसे बड़े मददगार देश अमरीका की नजरों में ही गिर रहा है या गिर गया है। पाकिस्तान की नई, नौजवान और खूबसूरत विदेश मंत्री ने अमरीका में दौरे के दौरान जवाबी हमला करते हुए यह कहा कि अमरीका पर आतंकी हमलों के लिए पाकिस्तान का नाम अगर इसी तरह अमरीका जोड़ेगा तो वह एक दोस्त खो बैठेगा। दोनों तरफ के बयानों को अगर देखें तो यह तनाव पिछले बहुत बरसों में अभूतपूर्व दिख रहा है लेकिन यह आगे कहां तक पहुंचेगा इसे लेकर अटकलबाजी आसान इसलिए नहीं है कि अमरीका की विदेश नीति और सैनिक नीति के लिए पाकिस्तान हिंद महासागर क्षेत्र के इस इलाके में अब भी उसकी सबसे पसंदीदा हुकूमत है। एक ऐसा देश जो अमरीका के पैसों पर जिंदा है, जो अपनी जमीन के अमरीका-विरोधी लोगों की नाराजगी कम रखने के लिए बीच-बीच में अमरीका पर गुर्राकर कुछ दांत उसे दिखाता है, लेकिन इससे परे हकीकत यह है कि उसकी जमीन पर अमरीकी फौजें जो चाहे वो करती हैं। ऐसे में इस तनाव की गंभीरता और उसके लंबे असर के बारे में हमें गहरा शक है। आतंकियों, कट्टरपंथियों, फौजियों और जासूस एजेंसियों से चारों तरफ से घिरे हुए और उनके शिकार इस देश की हालत अमरीका को एकदम माकूल बैठती है और उसे ऐसा ही परेशानहाल, मुसीबतजदा फौजी अड्डा चाहिए।
पाकिस्तान की परेशानियां बढ़ते देखकर हिंदुस्तान की जमीन के जंगखोर लोग खुश हो सकते हैं और कुछ अमनपसंद ऐसे लोग भी खुश हो सकते हैं जो पाकिस्तानी जमीन से यहां होने वाले आतंकी हमलों से जख्मी हैं। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की बेहतरी चाहने वाले लोगों में जो समझदार लोग हैं वे जानते और समझते हैं कि पड़ोस में लगी आग किसी के फायदे की नहीं होती। पाकिस्तान जैसे-जैसे एक अधिक नाकामयाब लोकतंत्र होते जा रहा है वैसे-वैसे वह अमरीका या चीन, या दोनों की फौजी डिजाइनों का एक अधिक बेबस पुर्जा होते चले जा रहा है। यह सिलसिला कभी भी भारत के फायदे का नहीं रहेगा और भारत के मामलों में दखल देने के लिए पाकिस्तान को अमरीका या चीन भाड़े के एक कंधे की तरह इस्तेमाल करते रह सकते हैं, रहेंगे। इसलिए पाकिस्तान में कट्टरपंथ और धर्मान्धता खत्म या कम होने, वहां फौज की दखल कम होने, वहां की गरीबी कम होने और वहां पर उनके खुद के या पड़ोसी देशों के आतंकियों का कब्जा कम होने में ही भारत का भला है। अमरीका जो कि अपने-आपको दस बरस पहले के आतंकी हमले के एक जख्मी की तरह पेश करते हुए पूरी दुनिया पर हमला करने का हकदार बताते रहता है, उसे अपने ऐसे पल भर के नुकसान के बाद जंग के फायदे अलग दिखते हैं। एक-एक देश की सरकारों को पलटना, वहां के अच्छे या बुरे, जैसे भी हों, शासकों को मारना और दुनिया के अकेले दादा की तरह अपने-आपको स्थापित करना उसकी धाक के लिए जरूरी और फायदेमंद है।
हमारे पाठकों को यह बात शायद याद होगी कि इराक में लोकतंत्र लाने के नाम पर जब अमरीका ने हमला किया तो उसके खिलाफ हमने लगातार लिखते हुए उस पर भारत सरकार की चुप्पी को भी इतिहास में दर्ज होने वाला एक शर्मनाक तथ्य लिखा था। लोगों ने इस हफ्ते की भारतीय प्रधानमंत्री की खबरों को अगर ध्यान से देखा है तो अब जाकर शायद पहली बार मनमोहन सिंह ने इस पर मुंह खोला है और पश्चिमी देशों द्वारा फौजी कार्रवाई से किसी देश में सत्ता बदलने की आलोचना उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के अपने भाषण में की है। अब तो अमरीका और उसके गिरोह के बाकी हमलावर देश इस राह पर इतना आगे बढ़ गए हैं कि भारत की ऐसी पहली कड़ी प्रतिक्रिया उनकी साजिशों को कोई भी नुकसान पहुंचाने की हालत में रह नहीं गई है। इसलिए हम मनमोहन सिंह या भारत की ऐसी प्रतिक्रिया को बहुत खोखली प्रतिक्रिया मानते हैं। और आज अमरीका और पाकिस्तान के बीच तनाव अगर सचमुच आगे बढ़ता है तो एक नौबत ऐसी आ सकती है कि पाकिस्तान को आतंकी-अड्डा बताते हुए अमरीका वहां भी तख्तापलट के लिए सीधी या दबी-छुपी फौजी कार्रवाई कर सकता है। यह हालत भी भारत के जिन लोगों को अच्छी लगेगी उन्हें एक विख्यात कविता याद रखनी चाहिए जो कहती है-मैं चुप रहा क्योंकि आज वे मुझे लेने नहीं आए थे...
पाकिस्तान और भारत के तनाव, अमरीका और पाकिस्तान के तनाव से बिल्कुल अलग मामला है और रिश्तों के ये दो अलग-अलग मामले किसी तरह की तुलना के लायक भी नहीं हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि भारत को एक ऐसी स्थाई विदेश नीति पर चलने की जरूरत है जिसमें किसी देश में सत्ता बदलने के लिए किसी भी दूसरे देश की फौजी कार्रवाई पर भारत की प्रतिक्रिया बरसों बाद न आए, और वह समय रहते, असर डालने के वक्त के भीतर ही आए। लेकिन मनमोहन सिंह जैसों से कोई उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि भारत का यह प्रधानमंत्री तो हमलावर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को औपचारिक रूप से जाकर यह कहता है कि भारत के लोग उसे बहुत चाहते हैं। इतिहास का इतना बड़ा झूठ जो प्रधानमंत्री अपने देश के नाम पर बाहर पेश करता है वैसा अमरीकापरस्त इंसान किसी मजबूत विदेश नीति को कभी नहीं बढ़ा सकता। दुनिया के इतिहास में खासी दखल रखने वाले जवाहर लाल नेहरू के देश और उनकी पार्टी की यह बदहाली करने वाले मनमोहन सिंह का नाम इतिहास में कैसी स्याही से दर्ज होगा क्या उस रंग को भी यहां बताने की जरूरत है?
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