संभावित भारत रत्न की नीयत

01 अक्टूबर 2011
सचिन तेंदुलकर ने दो दिन पहले मुंबई में अपने नए घर में गृहप्रवेश किया तो अच्छी खबर के साथ-साथ एक यह विवाद भी शुरू हो गया कि मुंबई म्युनिसिपल से उन्होंने निर्माण पूरा होने के बाद रहना शुरू करने की इजाजत नहीं ली और इसके लिए म्युनिसिपल ने कुछ लाख का नोटिस उन्हें दिया है। फिर यह खबर आई कि राज्य सरकार ने मुंबई महानगरपालिका को यह जुर्माना माफ करने को कहा है। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ दूसरी बातें जो याद पड़ती हैं वे खटकने वाली हैं।
सचिन तेंदुलकर को लेकर कुछ दूसरी खबरें भी सामने हैं जिनमें उन्हें केंद्र सरकार ने एक कार पर उन्हें आयातकर में करोड़ की छूट देना तय किया था और जिसके खिलाफ अदालत में भी मामला गया था। करोड़ों की यह कार सचिन को विदेश में तोहफे में मिली थी और भारत में उन्होंने सरकार से इस पर आयात शुल्क माफ करने की अपील की थी। अभी कुछ महीने पहले जब उन्होंने यह कार सूरत के एक कारोबारी को बेच दी तो फिर यह सवाल उठा कि इस पर सरकार को माफ किया गया आयात शुल्क क्या फिर वसूलना चाहिए? सचिन तेंदुलकर को लेकर इस कार के विवाद के साथ यह बात उठकर खड़ी हो गई थी कि अरबपति बन चुके इस क्रिकेट खिलाड़ी को टैक्स में रियायत की अपील क्यों करना चाहिए? यह माफी एनडीए की सरकार के रहते दी गई थी और इससे लोगों को यह लगा था कि इतने कमाने वाले लोग भी अगर गरीबों से लबालब इस देश में ऐसी रियायत चाहते हैं तो वह किसके मुंह का कौर छीनकर दी जा रही है?
बड़े-बड़े लोगों की माफी की ऐसी अर्जी उनके लिए भी शर्मनाक है और हमारा मानना है कि किसी भी सरकार को ऐसी माफी के लिए का कोई हक भी नहीं है। जब इस देश में छब्बीस रूपए रोज में किसी इंसान को जिंदा रहने का अंदाज यहां का योजना आयोग लगाता है तो ढाई करोड़ की ऐसी माफी को किस तरह देखा जाए? आज सचिन तेंदुलकर अपने उस घर में रहने गए हैं जिसे खरीदी के कागजात के मुताबिक ही करीब चालीस करोड़ में खरीदा गया था और फिर उस जगह पर दुबारा बनाने में दसियों करोड़ और लगाए गए। अब इसके बाद अगर कुछ लाख के जुर्माने से उन्हें फिर माफी दी जाती है तो यह मुंबई के उन लाखों गरीब लोगों के साथ बेइंसाफी होगी जिन्हें सरकार तरह-तरह से जुर्माना पटाने पर बेबस करती है। ऐसी रियायत उन लोगों को क्यों दी जाए जो कि अपने पल-पल की कमाई करते हैं और जिनका कोई सामाजिक योगदान दिखाई भी नहीं पड़ता है। सचिन जैसों के मामले में पहला योगदान तो यही हो सकता था कि वे करोड़ों की कार मुफ्त में पाने के बाद उस पर आयात शुल्क के कुछ करोड़ रूपए अपनी किसी छोटी-मोटी जेब से निकालकर चुका देते। इस देश का कानून बहुत से टूर्नामेंट की ट्रॉफी तक को बिना आयात शुल्क इस देश में लाने नहीं देता और सचिन को तो यह कार किसी टूर्नामेंट की ट्रॉफी की तरह भी नहीं मिली थी।
यही हाल इस देश में बहुत से नेताओं और दूसरे ताकतवर तबकों का देखने मिलता है जो सरकारी खर्च पर ऐसे तमाम काम करते हैं जो कि वे अपने खुद के पैसों पर बहुत आसानी से कर सकते हैं। अपने अधिकारों से परे की ऐसी फिजूलखर्ची के अलावा लोग अपनी तरह-तरह की निजी जरूरतों को दिखाते हुए सरकारी खजाने से दान पाने की अर्जी भी लगाते हैं और खासे ताकतवर लोग जब ऐसी अर्जियां लेकर खड़े हो जाते हैं तो लगता है कि सबसे गरीब को तो ऐसी कतार के पीछे भी लगने का हक शायद ही कभी मिल पाए। ताकतवर लोगों को गरीबों के हक पर डाका डालने के पहले यह भी सोचना चाहिए कि उससे उनकी अपनी तस्वीर कैसी बनेगी? जिस सचिन को लेकर देश में एक यह अभियान चल रहा है कि उन्हें भारत रत्न दिया जाए, ऐसे सचिन को ऐसे भारत के लिए इतना रहम तो दिखाना चाहिए कि वे छब्बीस रूपए रोज पर जीने वाले लोगों के पेट में जाने वाले पैसों को छीनने की कोशिश न करें।
और देश की जनता को यह चाहिए कि ऐसी रियायत पाने वाले या उसकी कोशिश करने वाले लोगों को उजागर करने की अपनी जिम्मेदारी वह पूरी करे। ऐसे एक दो मामले ही सचिन को भारत रत्न से दूर धकेलने के लिए काफी हैं और ऐसी किसी ताजपोशी के वक्त ये अभी ताजा पाटी गई, या अब तक खुली हुई कब्र से निकलकर सामने खड़े हो जाएंगे।
 

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