हृदय दिवस के बहाने कुछ सोचें

29 सितंबर 2011
आज दुनिया भर में विश्व हृदय दिवस मनाया जा रहा है। ऐसे दिनों का एक फायदा यह होता है कि इस दिन इससे जुड़ी हुई कुछ खबरें छप जाती हैं और कुछ ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिनसे लोगों को याद पड़ता है कि उनके बदन के भीतर ऐसा एक हिस्सा है और उन्हें उसका ख्याल रखना चाहिए। बीमारी से बचाव के बारे में हम लंबे समय से यह लिखते आए हैं कि तमाम आधुनिक इलाज अधिक मौजूद होते जाने के बावजूद न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि अमरीका जैसे देश में भी लोगों को बीमारी का इलाज करवाना खासा मुश्किल पड़ रहा है। इलाज के खर्च के लिए सेहत का जो बीमा लोग खुद करवाते हैं या सबसे गरीब तबके लिए भारत जैसे देश में सरकारों ने यह काम अभी शुरू किया है, उससे भी कुछ हद तक तो इलाज मुफ्त में होता है लेकिन बहुत से मामलों में बीमा कंपनियां और अस्पताल इतनी बेईमानी करते हैं कि सरकार से वसूली हो जाती है और लोगों का इलाज नहीं हो पाता।
लेकिन इससे सबसे परे हर किसी की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने-आपको सेहतमंद रखें, बीमारी से बचाकर रखें और अपने आसपास भी ऐसा ही माहौल बनाकर रखें। भारत में अभी ताजा आंकड़े बतलाते हैं कि गैरसंक्रामक रोग बड़ी रफ्तार से बढ़ रहे हैं और भारत सरकार इससे बचाव के लिए दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। लेकिन सरकार की योजनाएं कितना फायदा पहुंचा पाती हैं यह सबका देखा हुआ है। और फिर यह भी है कि कुदरत के बनाए हुए इस बदन को तमाम चिकित्सा विज्ञान मिलकर भी बीमारी के पहले की हालत तक नहीं पहुंचा सकता। इसलिए लोगों को खुद ही अपने शरीर का ध्यान रखना है और साल में ऐसी दिन तो बहुत बार आएंगे जब अलग-अलग बीमारियों या शरीर के अलग-अलग हिस्सों के नाम पर उस दिन को मनाया जाएगा, लेकिन एक बड़ी बात यह है कि अगर कोई सेहत पर ध्यान देना शुरू करेगा तो वह तो फिर सभी जगह काम आने लगेगा।
भारत जैसे देशों जहां पर आज भी गरीब और मध्यमवर्गीय तबके की जीवनशैली ऐसी है कि वह उन्हें फिट रहने में मदद करती है। ऐसे में लोगों को चाहिए कि रोज मामूली कसरत करके, अपने खाने-पीने को सेहतमंद रखकर, तंबाकू और शराब, भारी-भरकम खाने से बचकर, कम खाकर, तनावमुक्त रहकर, योग और प्राणायाम जैसी मुफ्त की मिली बातों का इस्तेमाल करके वे बीमारी से बचे रहें। और बीमार पडऩे के पहले भी तन और मन को चंगा रखने के कई अलग-अलग दर्जे होते हैं। इनसे लोगों की उत्पादकता पर फर्क पड़ता है। कुछ लोग आसानी से रोज दस घंटे काम कर लेते हैं और कुछ लोग आठ घंटे पूरे होने के पहले ही थककर चूर हो जाते हैं, दम तोड़ देते हैं। इसलिए जो लोग अपने शरीर को ठीक-ठाक रखते हैं वे अपने कामकाज में भी बेहतर रहते हैं और उनके आगे बढऩे की संभावनाएं भी अधिक होती हैं।
लेकिन इसमें सरकार की भी एक भूमिका हम देखते हैं। हर शहर और कस्बे में सरकार को ऐसे प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने चाहिए जहां पर लोग रोज मुफ्त में योग-प्राणायाम, कसरत जैसी सुविधा पा सकें और जहां पर खान-पान से जुड़ी हुई बातों को लेकर जागरूकता पैदा की जा सके। आज बेकाबू शहरीकरण के चलते ऐसी जगहें कम होती जा रही हैं और अगर कसरत के लिए शहरी सुविधाएं हैं तो वे इतनी महंगी हैं कि हर कोई उनका खर्च नहीं उठा सकता। हमने कुछ समय पहले ईरान की तस्वीरों के साथ छापा था कि किस तरह सड़क किनारे की सार्वजनिक जमीन पर किस तरह कसरत की मशीनें लगी रहती हैं ताकि आते-जाते लोग उनका इस्तेमाल कर सकें। चीन में सड़कों के किनारे फुटपाथ पर ऐसी साधारण मशीनें लगा दी जाती हैं जिन पर लोग बसों का या ट्रेन का इंतजार करते हुए कसरत कर सकें। बहुत ही कम दाम की ऐसी मशीनों को भारत में भी जगह-जगह लगाया जा सकता है ताकि आते-जाते उन्हें देखकर लोग उनके इस्तेमाल की सोच सकें। कुछ समय पहले अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में एक इलाके से दूसरे इलाके तक जाने वाली मोटरबोट में ऐसे फेरबदल किए गए थे ताकि लोग उन पर पैडल मारते हुए बैठे रहें और उसकी ताकत भी बोट को आगे बढ़ाने में इस्तेमाल हो। राज्य सरकारें और स्थानीय संस्थाएं ऐसी पहल कर सकती हैं।
इसके अलावा तकनीकी वैज्ञानिक जगह-जगह रोज के इस्तेमाल में आने वाली मशीनों में ऐसा फेरबदल कर सकते हैं ताकि वे बिजली के साथ-साथ पैडल से भी चल सकें और उससे कसरत भी हो जाए। ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी बातें हैं जिनका ख्याल करके लोग सेहतमंद बने रह सकते हैं, और वही बीमारी से अकेला बचाव है। कभी भी बीमार पडऩे के बाद तंदरूस्ती पूरी की पूरी नहीं लौटती।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें