सुप्रीम कोर्ट के जजों से लेकर छत्तीसगढ़ सरकार तक लालबत्ती के सारे आशिकों से...
11 दिसंबर 2013
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में नई सरकार बनने के मौके पर हम कुछ दिनों तक लगातार इस जगह पर उससे जुड़े मुद्दों पर ही लिखना चाहते थे, और कल सुप्रीम कोर्ट का एक ऐसा आदेश आया है कि उस पर भी लिखना था, यह एक ऐसा मामला है जिस पर ये दोनों जरूरतें पूरी हो रही हैं, और हम हिन्दुस्तान की लालबत्ती सोच और छत्तीसगढ़ की नई सरकार, इन दोनों पर एक साथ लिख पा रहे हैं।
हमारे नियमित पाठकों को मालूम होगा कि हम हर कुछ महीनों में लालबत्तियों के खिलाफ और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में कुख्यात और बदनाम हो चुके, जनता के बीच नफरत का सामान बन गए वीआईपी नाम के शब्द के खिलाफ लिखते आए हैं, और जब सुप्रीम कोर्ट ने लालबत्ती के बारे में कुछ महीने पहले भी नोटिस जारी किए थे, तब हमने अदालत के खिलाफ भी लिखा था। आज भारतीय लोकतंत्र के लिए बुरा यह है कि अदालत अपनी सामंती सोच से ऊपर नहीं उठ पाई है, और हमारे लिए आज लिखने का एक अच्छा मुद्दा फिर तैयार है।
लोकतंत्र के भीतर इस तरह की सोच पर हमें तरस आता है और शर्म भी आती है कि देश की जनता ऐसे प्रतिनिधियों को ढोने के लिए बेबस है जो कि अपने-आपको जनता से बिल्कुल ही अलग, बिल्कुल ही ऊपर देखना चाहते हैं। यह सोच हमें मनुवादी जिंदगी जीते भारत के उस हिस्से की लगती है जहां पर कि अपने-आपको ऊंची जाति का मानने वाले लोग कुछ दूसरों को नीची जाति का मानते हुए उन पर जुल्म करते हैं, उनके दूल्हों को घोड़ों पर नहीं चढऩे देते, उन्हें जूते पहनकर नहीं चलने देते और गांवों में उनको ऐसी जगहों पर ही बस्तियां बनाने देते हैं जहां पर तथाकथित ऊंची जात के गुरूर वाले लोगों की बस्तियों से निकली नालियों का पानी बहकर पहुंचता हो।
यह बात हमारी समझ से पूरी तरह परे है कि एक निर्वाचित नेता को जनता से इस कदर कटने की जरूरत क्या है, वह जनता के मन में अपने लिए नफरत खड़ी करने से बिना डरे कैसे रहता है, और लोकतंत्र के भीतर सत्ता-सवर्णों का एक नया दर्जा कैसे बनाया जा सकता है? यह एक भयानक हालत है जिसके पीछे सत्ता की अंधी ताकत से उपजी बददिमागी है और जो देश के भीतर राजा और प्रजा जैसे दो अलोकतांत्रिक और सामंती फर्क वाले दर्जे खड़े कर रही है। हमें उन जजों और अफसरों पर भी तरस आता है जो कि लालबत्ती जलाकर या सायरन बजाते हुए या पायलट गाड़ी सामने-सामने चलवाकर जनता के बीच से आते-जाते हैं। हम इसे सुविधा नहीं एक आतंक मानते हैं और उसका कोई तर्क हमें नहीं दिखता सिवाय इसके कि सत्ता पर काबिज लोग धीरे-धीरे करके अपने लिए सुविधाएं और खास अधिकार जुटाते चलते हैं। इस पर रोक न लगे इसलिए ऐसे तमाम हक सत्ता पर बैठे लोग, संसद को चला रहे लोग जजों को भी देते चलते हैं, वरना बड़ी अदालत का एक जज क्यों सायरन बजाते हुए कहीं आए-जाए?
सड़क पर हड़बड़ी की जरूरत तो आग बुझाने जाती दमकल, मरीज को या घायल को लेकर जाती एम्बुलेंस, किसी अपराध को रोकने या अपराधी को तलाशने के लिए जाती पुलिस को ही पड़ सकती है। जजों, मंत्रियों, अफसरों, सांसदों या संवैधानिक पदों पर बैठे हुए दूसरे लोगों की जिंदगी में ऐसी कौन सी हड़बड़ी है जो कि रोज मजदूरी करने आते-जाते, सड़क से गुजरते किसी बूढ़े या कमजोर इंसान के हक को कुलचते हुए भी जरूरी है? साइकिल पर जाते हुए मजदूरों की जिंदगी की जरूरत, लालबत्ती और सायरन से लैस जिंदगियों से कम क्यों आंकी जाती है? एक मंत्री के लिए मंत्रालय या बंगले पहुंचना, रफ्तार से पहुंचना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी स्कूल जाती एक बच्ची का समय पर पहुंचना है। आम लोगों को रोककर खास लोगों को लालबत्ती, सायरन, पायलट गाड़ी के सहारे पहले आगे निकालना, चौराहों पर लालबत्ती से छूट देना पूरी तरह सामंतवाद है और इसकी कोई जगह लोकतंत्र में नहीं होनी चाहिए।
आज हमको इस बात पर बहुत अफसोस है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी सामंती सोच से ऊपर नहीं उठ पाया, और एक पाखंडी शब्द-संवैधानिक पद, उछालते हुए उसने देश के हाईकोर्ट तक के जजों को, मंत्रियों और राज्यपालों को, और हर प्रदेश की राजधानी में औसतन दर्जनों लोगों को लालबत्तियां दे दी हैं। यह बहुत ही खराब फैसला है, और देश के मुख्य न्यायाधीश को यह जवाब देना चाहिए कि उनका काम सड़क किनारे फेरी लगाने वाले इंसान से अधिक महत्वपूर्ण कैसे है? फेरी वाले की जिंदगी में उसका अपना काम उतना ही मायने रखता है, उससे अधिक मायने रखता है, जितना मायने एक राष्ट्रपति के लिए उसका काम रखता है, या मुख्य न्यायाधीश के लिए उसका काम रखता है।
यहां पर हम छत्तीसगढ़ सरकार को आज तीसरे कार्यकाल के मौके पर यह याद दिलाना चाहते हैं कि भाजपा के पीछे जिस आरएसएस का हाथ रहा है, और जिसकी मेहनत के बिना भाजपा छत्तीसगढ़ में यह चुनाव नहीं जीती होती, उसकी सोच एक सादगी की सोच है। इस पूरे देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सादगी की सोच रही है। और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सामने आज यह चुनौती और संभावना दोनों एक साथ हैं कि वे किफायत का एक नया सिलसिला शुरू करें, अपनी सरकार के बददिमाग लोगों की सामंती सोच को खत्म करके उनको इन पांच बरसों में जनता के पांच कदम करीब लाने की कोशिश उनको करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसी अदालत से खारिज होने के लायक है, और सिर पर लाल कलगी का हक सिर्फ मुर्गों को होना चाहिए।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को, भाजपा को, और प्रदेश के मंत्रियों को यह भी याद दिलाने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ भाजपा के सबसे बड़े नेता, गुजर चुके लखीराम अग्रवाल ने 2003 में भाजपा सरकार बनने के वक्त सार्वजनिक रूप से कहा था कि भाजपा सरकार को लालबत्तियां खत्म कर देनी चाहिए। हम इस प्रदेश में राज्यपाल शेखर दत्त से भी यह उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की बनाई लिस्ट के अधिकारों का इस्तेमाल करने के बजाय, उनको आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का इस्तेमाल करना चाहिए, और लालबत्ती-सायरन का अलोकतांत्रिक-सामंती आतंक खत्म करना चाहिए। संविधान या किसी अदालत ने अगर कोई अलोकतांत्रिक अधिकार दिए हैं, तो भी लोकतांत्रिक सोच वाले लोग उन अधिकारों के इस्तेमाल के बिना भी रह सकते हैं, और जनता की नजर में अधिक इज्जत के हकदार बन सकते हैं।
आज छत्तीसगढ़ सरकार को यह भी याद रखना चाहिए कि उसकी यह जीत स्थायी नहीं है, और भाजपा और कांग्रेस के बीच वोटों का फासला कुल पौन फीसदी है, एक फीसदी भी नहीं। और इस देश की राजधानी में अभी-अभी यह साबित हुआ है कि किस तरह एक झाड़ू, लंबी-चौड़ी जीत को, दसियों फीसदी वोटों को झड़ाकर फेंक सकती है। छत्तीसगढ़ की सरकार, यहां के संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग उस लालबत्ती, सायरन, और खास दर्जे की हवस को छोड़ें, जो कि सिर्फ कुर्सी के चलते हासिल हैं, और ऐसे इंसान बनने की कोशिश करें, जो कुर्सी के बाद भी इज्जत के हकदार रहते हैं। जनता के मन में हर सायरन, हर लालबत्ती, और हर बार चौराहों पर रोके जाने पर लोकतंत्र के इन बड़े चेहरों के लिए जो हिकारत और नफरत उठ खड़ी होती है, उसका असर जरूर होता होगा।
राज्य का आज का मंत्रिमंडल, आम चुनाव का मुद्दा रहेगा...
10 दिसंबर 2013
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार बनने के बारे में कल इसी जगह हमने लिखा था, और आज इस बन रही सरकार के आगे के बारे में कुछ लिखने का इरादा है। दो दिन बाद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपने तीसरे कार्यकाल की शपथ लेने जा रहे हैं, और शायद इसके कुछ घंटों के भीतर ही उनका मंत्रिमंडल तय हो जाएगा जो कि आने वाले लोकसभा चुनाव तक तो किसी तरह का फेरबदल शायद नहीं देखेगा। इस मंत्रिमंडल के लोगों के कामकाज तो दिखते-दिखते ही लोगों को दिखेंगे, लेकिन मंत्रिमंडल पहले ही दिन दिख जाएगा, इसके चेहरे दिख जाएंगे, और इन चेहरों के साथ जुड़े हुए विभाग भी दिख जाएंगे। इस मोड़ पर तीसरी बार के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी पहचान, चाहें तो, छोड़ सकते हैं, लेकिन वे चाहेंगे या नहीं, यह तो आने वाले दो-तीन दिन बताएंगे।
इस मौके पर मुख्यमंत्री से परे उनकी पार्टी को, और छत्तीसगढ़ की जनता को यह सोचने की जरूरत है कि दो दिन पहले चार राज्यों में जो चुनावी नतीजे आए हैं, वे क्या साबित करते हैं। इन चारों राज्यों में कांग्रेस को खारिज करते हुए वोटरों ने शायद दो बातों पर वोट डाला है, एक तो यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ, और दूसरा कांग्रेस के कुछ नेताओं के सार्वजनिक घमंड के खिलाफ। जब कोई पार्टी अपने देश-प्रदेश के वोटरों को ऐसा बेबस मानकर चलती है कि सत्तारूढ़ पार्टी से नाराजगी होने पर विपक्ष को वोट देना उसकी मजबूरी है, तो लोग ऐसे रूख के खिलाफ छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में वोट दे चुके हैं, और दूसरी तरफ राजस्थान और दिल्ली में लोगों ने कांग्रेस की राज्य सरकार या केन्द्र की कांग्रेस-अगुवाई वाली यूपीए सरकार, या दोनों के खिलाफ अपना वोट डाला है। इसकी चर्चा आज यहां जरूरी इसलिए है कि छत्तीसगढ़ का अगला मंत्रिमंडल यह सोचकर बनाना चाहिए कि जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा पूरे देश में अगला चुनाव लडऩे जा रही है, उस भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने के लिए छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा के पास मुंह बचा रहे। छत्तीसगढ़ में मंत्रियों के नाम, और उनको मिलने वाले काम, इस विधानसभा चुनाव में चाहे कांग्रेस एक बड़ा मुद्दा न बना सकी हो, लेकिन आने वाले आम चुनाव में भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी की लड़ाई में उनकी पार्टी को जगह-जगह बेहतर चेहरों की जरूरत होगी, जिनके मुंह से भ्रष्टाचार के खिलाफ निकली हुई बातों पर लोगों का भरोसा हो सके।
भारतीय लोकतंत्र में सारे राजनीतिक भ्रष्टाचार के बावजूद एक बात साफ है, कि इसमें इतनी पारदर्शिता भी है कि लोग सरकार के भ्रष्टाचार को छपे हुए रेटकार्ड की तरह पढऩे के लायक हो गए हैं। और जिन लोगों को ऐसा लगता है कि जनता के बीच भ्रष्टाचार के लिए बर्दाश्त इतना हो चुका है कि वह घोषित रूप से भ्रष्ट लोगों को भी चुनने में पीछे नहीं रहती, उन लोगों को यह भी देखना चाहिए कि किस तरह करोड़ों खर्च करके, और सौ किस्म की तिकड़में करके, ऐसे लोग जीत को खरीद पाते हैं। बहुत से मौकों पर ऐसे लोग खुद तो अंधाधुंध खर्च और मैनेजमेंट से अपना चुनाव जीत लेते हैं, लेकिन पार्टी को जगह-जगह हारने पर मजबूर भी कर देते हैं, पूरे देश या प्रदेश में अपनी कमाई की चर्चा से पार्टी के वोट खराब करते हैं, और आखिर में पार्टी के भीतर दिखाने के लिए उनके पास अपनी निजी जीत का सर्टिफिकेट होता है। इसलिए आज न सिर्फ छत्तीसगढ़ के मंत्रिमंडल को, बल्कि देश और प्रदेश के हर मंत्रिमंडल को यह समझकर बनाने की जरूरत है कि देश की जनता आज हाथ में झाड़ू लेकर खड़ी है। और यह झाड़ू आज अगर सिर्फ दिल्ली में है, तो दूसरे प्रदेशों तक इसका पहुंचना महज एक वक्त की बात हो सकती है।
और भाजपा के प्रधानमंत्री-प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी जिस तरह के भ्रष्टाचार को अपनी लड़ाई का एक बड़ा मुद्दा बनाकर आगे बढ़ रहे हैं, उनकी पार्टी की राज्य सरकारों कों मौके की इस नजाकत को समझना जरूरी है। और इस मौके पर छत्तीसगढ़ में भाजपा को यह भी याद रखने की जरूरत है, कि उसकी सरकार के इस दूसरे कार्यकाल में ऐसी कौन सी बातें थीं, जिनकी वजह से उसे राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसी कामयाबी नहीं मिल सकी। और सच तो यह है कि दिल्ली में अगर त्रिकोणीय संघर्ष नहीं होता, तो वहां भी भाजपा का रिकॉर्ड मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसा बना हुआ दिख ही रहा था। ऐसे में बिना किसी त्रिकोणीय संघर्ष अगर इन चार राज्यों में भाजपा की जीत का वजन कम है, तो वह छत्तीसगढ़ में ही है। यह तो ठीक है कि सत्ता पर तीसरी बार वापिसी कम नहीं होती, लेकिन साथ-साथ कुछ महीने बाद के लोकसभा चुनावों में इस पार्टी को यूपीए के भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई लडऩी है, उसके लिए अपने चेहरे को आज से ही बचाकर भी उसे चलना चाहिए।
दूसरी बात यह कि जिस तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने भारतीय चुनावी लोकतंत्र, और सरकार चलाने के तौर-तरीकों को एक चुनाव में ही चूर-चूर कर दिया है, उससे बाकी पार्टियों को भी सबक लेने की जरूरत है। सत्ता का जो परंपरागत तौर-तरीकों से बंटवारा होता है, उस अंदाज को भी डॉ. रमन सिंह को बदलना चाहिए। आम आदमी पार्टी पांच बरस पहले के चुनाव में कहीं नहीं थी। और पांच बरस बाद इस किस्म की कोई पार्टी छत्तीसगढ़ में नहीं होगी, इसकी क्या गारंटी है? देश का मीडिया अब केजरीवाल जैसे एक अकेले फटेहाल को हीरो बनाने में अपनी रोजी-रोटी भी ढूंढ लेता है, और वैसे एक इंसान को मदद करने के लिए पूरी दुनिया से काबिल और कामयाब पेशेवर लोग अपनी नौकरियां छोड़कर आ जाते हैं, और इतना चंदा भेजते हैं कि अघाकर केजरीवाल को मना करना पड़ता है कि अब और चंदा न भेजें। इस छत्तीसगढ़ में आज कांग्रेस और भाजपा के बीच सीटों का फर्क चाहे दस हो, वोटों का फर्क तो एक फीसदी भी नहीं रह गया है। यहां पर कांग्रेस या भाजपा जो भी हों, उनके वोटों को छीनने के लिए एक विश्वसनीय विकल्प अगले पांच बरसों में खड़ा नहीं हो सकता, इसकी क्या गारंटी है? और ऐसे में वैसे झाड़ू के सामने एक फीसदी से भी छोटा यह फर्क कहां फिंकाएगा, पता भी नहीं चलेगा।
डॉ. रमन सिंह को यह भी याद रखने की जरूरत है कि कुछ महीनों के बाद के लोकसभा चुनाव में जब उनकी पार्टी, नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए उनसे लोकसभा सीटों की उम्मीद करेगी, तो उनके पास आज मौजूद ग्यारह में से दस सीटों से अधिक और हो भी क्या सकता है? यह याद रखने की बात है कि जिस बस्तर में बारह में से ग्यारह सीटें भाजपा के पास थीं, आज वहां पर उसके पास कुल चार रह गई हैं। और अगर इन विधानसभा सीटों को लोकसभा सीटों के साथ जोड़कर देखा जाए, तो अंकगणित के मुताबिक, आज की भाजपा की दस लोकसभा सीटें घटकर छह ही रह जाएंगी। ऐसे में डॉ. रमन सिंह, और उनकी पार्टी को, अपने आज के मंत्रिमंडल के नाम, और मंत्रियों के काम, इन दोनों को लेकर सावधानी से फैसला करना चाहिए।
छत्तीसगढ़ के नतीजे, तिलक का चावल, और उसके पीछे का चेहरा भी
9 दिसंबर 2013
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
कल के चुनावी नतीजों पर अलग-अलग कुछ टुकड़ों में बात करनी होगी। इसमें से छत्तीसगढ़ पर आज बात करना इसलिए जरूरी है क्योंकि यही एक राज्य ऐसा था जहां पर कांग्रेस के सत्ता में आने की कोई संभावना थी, और वह अगले पांच बरस के लिए खत्म हो गई। दूसरे जिन राज्यों में जहां भाजपा एक आंधी की तरह सीटें पा चुकी है, वहां पर कांग्रेस की कोई संभावना थी भी नहीं। जहां तक हमारा सवाल है, तो राजनीतिक विश्लेषकों के बीच शक की गहरी धुंध में भी हमने इस अखबार में और बाहर भी छत्तीसगढ़ के इसी नतीजे का अंदाज बताया था। लेकिन कल दोपहर छत्तीसगढ़ में वोटों की गिनती के बीच जिस तरह के चढ़ाव-उतार और कांटे की टक्कर दिख रही थी, वह शाम होने के पहले ही किस तरह, और क्यों भाजपा की तरफ आकर थम गई, उस पर सोचना-विचारना भाजपा और कांग्रेस के लिए तो जरूरी है ही, छत्तीसगढ़ की सरकार और जनता के लिए भी जरूरी है, और सबसे अधिक, छत्तीसगढ़ के लोकतंत्र के लिए जरूरी है।
सीटों के आधार पर इस राज्य में जितने तरह के विश्लेषण हुए, उनमें से इतनी अधिक सीटें हैरान करते हुए जीत से हार, और हार से जीत में तब्दील हो गई, कि पूरे प्रदेश में किसी एक पार्टी की जीत का अंदाज गलत साबित होना अधिक आसान था। और हुआ भी वही। लेकिन हमारा विश्लेषण जिन मुद्दों पर टिका हुआ था, वे सीटों से परे के थे, और हमारा अंदाज भी सीटों की गिनती से परे का था, और किसी एक पार्टी को, भाजपा को, बहुमत देने वाला था। इन मुद्दों में दो बातें सबसे अधिक असर डालने वाली हमको कल भी लगती थीं, और आज भी लगती हैं। एक तो यह कि आबादी के सबसे गरीब पचास फीसदी हिस्से के लिए पिछले दस बरसों में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने एक निजी एजेंडा की तरह एक के बाद एक जो कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, वे अपने पूरे आकार में, और अमल में, अभूतपूर्व थीं। सबसे गरीब, के सबसे करीब, इसको उन्होंने एक नारा तो नहीं बनाया, लेकिन कुछ मौकों पर इसे कहा, और आम वोटरों के बीच उनकी यही पहचान इन दस बरसों में बनते-बनते अब पुख्ता हो गई है। हमारा एक मोटा अंदाज यह है कि जो वोट पड़ते हैं, उनमें शायद तीन चौथाई वोट, आबादी के इसी आधे गरीब हिस्से के रहते हैं। इसलिए रमन सिंह को इस तबके का सहारा पूरे प्रदेश में इतना रहा, कि उनके पार्टी के मंत्रियों, विधायकों, और नेताओं से नाराज मतदाताओं के बीच भी गरीबी की रेखा के नीचे वाली आधी आबादी का बोलबाला रहा। इतने गरीब लोगों के पास अलग से कोई जुबान नहीं होती, और उसे जब वोट की मशीन की आवाज के मार्फत अपनी आवाज उठाने का मौका मिलता है, तो किसी भी दूसरे आय वर्ग के मुकाबले इसके वोट अनुपात से बहुत अधिक होते हैं। इस तबके के लिए रमन सिंह ने सिर्फ चावल की रियायत दी हो ऐसा भी नहीं है। ये रियायतें बहुत तरह की थीं, लेकिन शहरी-संपन्न मीडिया ने इस पूरे के प्रतीक के रूप में महज चावल को चर्चा में रखा, और इससे कांग्रेस के नेताओं को यह धोखा भी हुआ कि देश के किसी राज्य में चावल की हांडी एक बार से ज्यादा कामयाब नहीं हुई है। दरअसल छत्तीसगढ़ में नीचे की आधी आबादी के लिए रियायतें चावल से परे भी बहुत सी थीं। और रमन सिंह के अनगिनत उम्मीदवारों के खिलाफ भारी नाराजगी के बावजूद अगर इस राज्य में आज भाजपा की सरकार बनी है, तो वह कमल छाप पर नहीं, रमन छाप पर बनी है।
दूसरा मुद्दा इस जीत के पीछे का जो है वह रमन सिंह के चेहरे का है। आज की राजनीति में जितने तरह की बुरी और गलत बातें, जितने तरह के जुर्म और भ्रष्टाचार, जितने तरह का घमंड, और बदमिजाजी-बदजुबानी, बहुत आम बातें हो चुकी हैं, रमन सिंह की पहचान इनसे पूरी तरह परे की है। इनका चेहरा छत्तीसगढ़ में भाजपा के सारे प्रचार पर लगभग अकेला ही छाया हुआ था, और यह फैसला उनकी पार्टी का रहा हो, या उनका खुद का, यही उनकी पार्टी के काम आया। एक तरफ कांग्रेस पार्टी चुनाव के पहले के कई महीनों से लेकर, वोटों की गिनती के बाद तक इसी अंतद्र्वद्व में लगी हुई थी, और लगी हुई है, कि छत्तीसगढ़ में इस पार्टी का चेहरा कौन है? और जो चेहरे बारी-बारी से, खुद के सोचे-समझे या मीडिया के अपने फैसले से जनता के सामने रमन सिंह के मुकाबले पेश किए जाते रहे, उन चेहरों से रमन सिंह की तुलना में कोई पहेली नहीं बची थी, जनता के सामने फैसला साफ था। इस बात का असर कम या अधिक कितना हुआ है, इसको नापने का कोई पैमाना कभी नहीं बन पाएगा, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह तुलना पूरे वक्त जुबानी चर्चा में भी रही, और मीडिया में भी। यह चर्चा अभी हम कांग्रेस के संदर्भ में नहीं कर रहे, क्योंकि उसके बारे में आने वाले दिनों में इसी जगह अलग से लिखा जाना है, लेकिन भाजपा की जीत के पीछे की जो वजहें हमको चुनाव हफ्तों पहले से साफ दिखने लगी थीं, उनमें से यह भी एक थी। सीटों का विश्लेषण करने जो लोग बैठेंगे, उनको जगह-जगह, अलग-अलग सीटों पर हमारे इन दो तर्कों के खिलाफ देने के लिए मिसालें बहुत सी मिल जाएंगी। लेकिन हम यहां सीटों का विश्लेषण नहीं कर रहे, और जब कोई सीटों से ऊपर उठकर एक व्यापक नजरिए से, आसमान में तैरते पंछी की आंखों से धरती को देखने की तरह, इस राज्य में इन नतीजों के पीछे की बुनियादी बातों को देखेंगे, तो उनको ऐसे मुद्दे दिखेंगे, जो कि सीटों को करीब से देखते हुए नहीं दिख पाएंगे।
लेकिन कांग्रेस की चर्चा आज यहां न करते हुए भी भाजपा की जीत के मायने निकालते हुए इस जीत की कुछ वाहवाही केन्द्र की यूपीए सरकार को भी देनी पड़ेगी। हमने बार-बार यह लिखा था, और जगह-जगह कहा भी था कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी को देश की यूपीए सरकार के दस बरस के बुरे कामों, और भ्रष्टाचार, महंगाई और अहंकार, इन सबका दाम चुकाना होगा। रमन सिंह की यह जीत उनकी खूबियों के किसी टापू की तरह अलग से नहीं देखी जा सकती। उनके अपने मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ छत्तीसगढ़ की जनता के मन में परले दर्जे की जो नाराजगी थी, उसके मुकाबले छत्तीसगढ़ में भाजपा को दिल्ली की यूपीए का सहारा मिला। राजनीतिक विश्लेषण में सत्ता से नाराजगी का जो अंग्रेजी शब्द एंटी-इंकम्बेंसी इस्तेमाल किया जाता है, वह छत्तीसगढ़ में, और हमारा अंदाज है कि बाकी तीन राज्यों में भी, यूपीए सरकार के खिलाफ खूब चला, और उसका दाम कांग्रेस के उम्मीदवारों को चुकाना पड़ा। इसीलिए कांग्रेस की हार उम्मीद से दुगुनी रही।
इस विधानसभा चुनाव से छत्तीसगढ़ में भाजपा और खासकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के लिए एक बहुत बड़ा सबक भी निकलकर आया है। दस बरस के अच्छे कामकाज के बाद भी अगर इन चुनावों में उनको कांग्रेस की टक्कर के ही अच्छे और बुरे तौर-तरीके इस्तेमाल करके चुनाव जीतना पड़ा है, जब उनको अपनी निजी सरकारी कामयाबी, और निजी राजनीतिक-व्यक्तिगत साख दांव पर लगाकर अपने डूबे हुए लोगों को उबारना पड़ा है, तो पांच बरस बाद फिर ऐसी नौबत न आए, इसके लिए उनको बहुत गहरे आत्ममंथन और आत्मचिंतन की जरूरत है, सुधार की भी। आत्मविश्लेषण सिर्फ हारने वाले के लिए जरूरी नहीं होता, हार से बचने वाले, या उतनी ही जीत पर थम जाने वाले के लिए भी जरूरी होता है। छत्तीसगढ़ में आने वाले दिन पहले दस बरसों के मुकाबले भाजपा के लिए अधिक आत्मविश्वास और आत्मसंतुष्टि के हो सकते हैं, और ऐसे ही दिन अधिक खतरनाक भी होते हैं।
फिलहाल आज का दिन अधिक नसीहत का मौका नहीं है, और यह दिन मुख्यमंत्री के लिए एक ऐसे संकल्प का दिन होना चाहिए कि बीते दस बरसों की कमियां और खामियां वे आने वाले पांच बरसों में दूर कर ही लेंगे। और भारतीय चुनावी लोकतंत्र में 1825 दिनों के कार्यकाल का पहला दिन शायद आज-कल में डॉ. रमन सिंह के लिए शुरू हो जाएगा, और पहले दिन से ही उन्हें 1825वें दिन बेचैनी और धुंध न रहने देने के लिए मेहनत से काम शुरू कर देना चाहिए।
आज छत्तीसगढ़ की चुनावी नतीजे को लेकर अगर कोई हमसे एक लाईन में पूछे कि यह चावल का असर था, या चेहरे का, तो हमारा कहना यही होगा कि यह माथे पर लगे तिलक के चावल, और उसके पीछे के चेहरे का मिलाजुला असर था।
अखबार छपते-छपते कुछ बातें चारों राज्यों में जनता खुलकर पूरी तरह कांग्रेस के खिलाफ
8 दिसंबर 2013
संपादकीय
देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से उत्तर-पूर्व के मिजोरम को छोड़कर बाकी चार के नतीजे अभी आ रहे हैं, और छत्तीसगढ़ सहित बाकी तीनों राज्यों में भी भाजपा की सरकार साफ दिख रही हंै। मिजोरम में मतगणना कल होने वाली है, क्योंकि वहां शायद इतवार को पूरा प्रदेश छुट्टी मनाता है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह सरकार की तगड़ी वापिसी हो रही है, और इस तीसरी पारी में वहां भाजपा के वोट, भाजपा की सीटें सब कुछ बढ़ते दिख रहे हैं। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार को एकदम जड़ से उखाड़कर फेंककर भाजपा वहां सत्ता पर आ चुकी है, और कांग्रेस की हार वहां पर देखने लायक है। तीसरा राज्य है दिल्ली जहां पर शीला दीक्षित की अगुवाई में कांग्रेस ने तीन कार्यकाल पूरे किए थे, लेकिन इस बार कांग्रेस विरोधी वोटों के आप पार्टी में जाने के बाद भी भाजपा वहां अपने खुद के दम पर बहुमत के करीब पहुंच चुकी है। छत्तीसगढ़ में ऐसी कांटे की टक्कर सीटों के रूझान में दिख रही थी, कि यहां दोपहर तक कहना फिलहाल थोड़ा मुश्किल लग रहा था, लेकिन अभी शाम 4 बजे उतार-चढ़ाव का हिसाब निकालें, तो भाजपा की सरकार तीसरी बार बनते दिख रही है।
छत्तीसगढ़ को छोड़कर हम बाकी तीन राज्यों पर अगर एक नजर डालें तो जो एक बात उभरकर आती है, वह है कांग्रेस के खिलाफ जनता का तगड़ा वोट है। इन तीन में से दो राज्य कांग्रेस के हाथ से पूरी तरह और बुरी तरह निकल गए हैं। जिन लोगों को दिल्ली में भाजपा की जीत का आंकड़ा कम लगता है, उन लोगों को यह देखना चाहिए कि यूपीए और कांग्रेस के खिलाफ सबसे ऊंचा झंडा लेकर चल रहे, सबसे अधिक जोरों का नारा लगा रहे अरविंद केजरीवाल कांग्रेस से नाराज वोटों को भाजपा की तरफ जाने से रोकते हुए खुद ले गए। अब अगर कांग्रेस विरोधी वोटों का यह बंटवारा नहीं होता, तो भाजपा की जीत और बहुत बड़ी होती, और कांग्रेस की हार और बहुत बड़ी दिखती। राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा एकदम आमने-सामने रहे, इसलिए वहां पर कांग्रेस की शिकस्त अधिक साफ दिख रही है।
इन चुनावों को बहुत से लोग 2014 के लोकसभा संसदीय चुनाव के पहले का सेमीफाइनल मानकर चल रहे थे, लेकिन मतदान के पहले के जो ओपीनियन पोल सामने आए थे उनके रूझान को देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने इन चुनावों को राष्ट्रीय स्तर के किसी महत्व का मानने से इंकार कर दिया था, और इस तरह उसने अपने राष्ट्रीय नेताओं को किसी शर्मिंदगी से दूर रखने की बचाव-तैयारी पहले ही कर ली थी। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही अपने प्रधानमंत्री-प्रत्याशियों को इन चुनावों में झोंका था, उनकी प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी थीं।
अब तक मिले नतीजों के मुताबिक दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस के हाथ से सरकारें जा चुकी हैं, लेकिन भाजपा की सरकार का तीसरा कार्यकाल मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह की अगुवाई में जितने बड़े दम-खम के साथ आ चुका है, उससे एक बात साफ होती है कि इन सभी चारों राज्यों में जनता ने सत्ता के खिलाफ एकमुश्त वोट नहीं दिया है, और मध्यप्रदेश में दो पारियों के बाद भी भाजपा की सीटें बढ़ी हैं, और वोट बढ़ गए हैं। सरकारें अगर गई हैं तो कांग्रेस की दिल्ली और राजस्थान की सरकारें गई हैं, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की वापिसी हो रही है, तीसरी बार इस पार्टी की सरकारें बनने जा रही हैं।
कांग्रेस को यह सुझाने के लिए हमारी जरूरत नहीं है कि इन नतीजों को उसे लेकर बैठना चाहिए, और पूरे देश के बारे में, अपनी पार्टी के बारे में, अपनी सरकारों के बारे में ईमानदारी और कड़ाई से आत्ममंथन करना चाहिए। इसी पल हम यह भी सुझाना चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा, इन दोनों को ही इसी के टक्कर का आत्ममंथन करना होगा कि दस बरस सत्ता या विपक्ष में रहने के बाद आज उनकी नौबत ऐसी टक्कर की क्यों है? क्यों भारतीय जनता पार्टी इससे बेहतर नहीं कर सकती थी, जबकि उसके मुख्यमंत्री अपनी सरकार के साथ इतनी सीटों से बेहतर प्रदर्शन के लायक काम करते दिख रहे थे। और कांग्रेस को भी यह सोचना चाहिए कि भाजपा के इतने मंत्रियों और विधायकों की बदहाली के बावजूद कांग्रेस उसका फायदा क्यों नहीं उठा सकी।
नतीजे अभी चढ़-उतर रहे हैं, इसलिए इस बारे में और अधिक कुछ कहना ठीक नहीं है, लेकिन आखिरी में एक नजर में तस्वीर यह बनती है कि इन चारों प्रमुख राज्यों में कांग्रेस का दीवाला सा निकला दिख रहा है, और भाजपा में दो राज्य तो उससे छीन लिए हैं, दो राज्यों में वह अपनी सरकार कायम रखने में कामयाब दिख रही है। तो कांग्रेस को रायपुर से लेकर भोपाल तक, और जयपुर से लेकर दिल्ली तक आत्ममंथन की जरूरत है।
आम लोग आम नहीं रह गए, खास लोगों के चूसने के बाद, फेंकी गई गुठली भर रह गए
7 दिसंबर 2013
संपादकीय
पिछले कुछ दिनों में कई मामलों में हिन्दुस्तान में ऐसे हालात दिख रहे हैं कि गरीब और कमजोर तबका इस लोकतंत्र में जितना लुट रहा है, ताकतवर तबका उतना ही लूट रहा है। इन मामलों में तरूण तेजपाल की जमानत को लेकर अदालत का रूख और उसका तौर-तरीका, यौन शोषण के आरोप के शिकार भूतपूर्व जज गांगुली और उनके मामले में सुप्रीम कोर्ट का रूख, अपने खुद के लिए गांगुली का रूख, और फिल्म कलाकार संजय दत्त को दावतों में फिरती बीवी के इलाज के लिए फिर महीने भर की पैरोल पर रिहाई। संजय दत्त बरसों की कैद के बीच अपने पहले नब्बे दिनों में छप्पन दिन जेल के बाहर रहने जा रहा है।
गांगुली के मामले में जब एक प्रशिक्षु वकील ने सार्वजनिक इंटरनेट पर खुलकर अपने शोषण का जिक्र किया तो सुप्रीम कोर्ट के पास अपनी इज्जत बचाने के लिए इस मामले की जांच के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था। उसने जांच की, और गांगुली को कसूरवार पाया, लेकिन अपनी जांच रिपोर्ट की आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर खुद कोई कार्रवाई करने से इंकार कर दिया और शोषण करने वाले उस वक्त के जज, और उस वक्त की इस प्रशिक्षु युवती को जांच रिपोर्ट थमा दी। क्या देश की सबसे बड़ी अदालत का उसकी नजरों में आने वाली जुर्म के लिए हमेशा यही नजरिया रहता है? केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने इस पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि अगर जज के रिटायर हो जाने पर सुप्रीम कोर्ट उस पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा, और जांच में पाए गए कुसूर पर भी चुप बैठा है, तो फिर ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने जांच ही क्यों करवाई? उस जांच का क्या मतलब है जो देश की सबसे बड़ी अदालत ने की, और जिस पर वह कोई कार्रवाई करना जरूरी नहीं समझता। सिब्बल के बिल्कुल विरोधी और भाजपा के सुप्रीम कोर्ट के वकील, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली ने भी सुप्रीम कोर्ट के रूख के खिलाफ कहा है।
फिल्म अभिनेता संजय दत्त का मामला बरसों से जैसी अदालती रियायतों के साथ चल रहा था, उसे देखकर देश के बाकी विचाराधीन कैदी सिर्फ जलन से सुलग सकते थे। अब जिस तरह से संजय दत्त को रिहाई पर रिहाई, या पैरोल पर पैरोल मिल रही है, वह अपने आपमें देश में आम और खास के बीच का खासा फासला साबित कर रही है। इन सबको देखकर याद पड़ता है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल आरोपों में जेल में डाली गई सोनी सोरी नाम की महिला को जब पति के अंतिम संस्कार के लिए भी कुछ घंटों के लिए जेल से बाहर निकलने की इजाजत नहीं दी गई, तो फिर वैसे बेबस और गरीब अपने लिए इंसाफ पाने को अगर नक्सलियों की तरफ देखते भी होंगे, तो क्या उसे सचमुच लोकतंत्र का विरोध कहा जा सकता है?
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ महीने पहले संजय दत्त के मामले में इसी जगह लिखा था- ''....सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म अभिनेता संजय दत्त की चर्चित अर्जी पर उन्हें आगे की सजा काटने के लिए जेल पहुंचने में चार हफ्ते की मोहलत दी है, ताकि वे अपनी चल रही फिल्मों को पूरा कर सकें। यह फैसला कुछ अलग किस्म का है, क्योंकि संजय ने अपनी अधूरी फिल्मों में लगी लागत और उनमें लगे और लोगों के कामकाज को भी गिनाया था और छह महीने बाद जेल पहुंचने की छूट मांगी थी। इस पर उन्हें एक महीने काम करने का मौका दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश या फैसला कुछ अटपटा लगता है। किसी व्यक्ति के कामकाज को लेकर, कारोबार को लेकर उसे इस तरह की छूट अगर दी जाती है, तो इसकी मिसाल देते हुए देश में जेल जाने वाले हर कामकाजी को अर्जी देने का एक रास्ता मिल जाएगा कि उनको भी अपने घर के काम निपटाने हैं। ऐसा कौन सा मुजरिम हो सकता है जिस पर कारोबार, घर या पेशे की जिम्मेदारियां बची हुई न हों? संजय दत्त के ही केस में जिन और लोगों को सजा सुनाई गई थी, और जिनकी सजा संजय दत्त की तरह ही जारी रखी गई है, ऐसे तीन बुजुर्ग लोगों की ऐसी ही अर्जियां सुप्रीम कोर्ट ने कल खारिज कर दी थीं। इन तीनों का कहना था कि उनकी दया की अर्जी राष्ट्रपति के पास अभी रखी हुई है, और उस पर फैसला होने तक उन्हें भी जेल न पहुंचने की रियायत दी जाए। अदालत ने इसे नहीं माना, और संजय दत्त की अर्जी को माना कि उनकी फिल्मों में पौन तीन सौ करोड़ लगे हुए हैं, इसलिए उन्हें इन्हें पूरा करने की इजाजत दी जाए। अब सवाल यह उठता है कि जिस पर ज्यादा पैसे लगे हुए हैं, उसके लिए कानून अलग कैसे हो? किसी बहुत बारीक कानूनी नुक्ते को लेकर हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने बाकी तीनों अर्जियों के मुकाबले संजय की अर्जी को कुछ अलग पाया होगा, लेकिन इससे एक बहुत बड़ा नुकसान यह हुआ है कि हमारे जैसे साधारण समझ के लोगों को एकदम से यह लगने लगा कि अरबपतियों के लिए कानून का नजरिया कुछ अलग है। सच और जनधारणा, इनमें बड़ा फर्क होता है। और इंसाफ न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। जब एक ही नाव पर सवार चार लोग सुप्रीम कोर्ट से किसी किस्म की रहम की अपील कर रहे हैं, तो उसी वक्त उनमें से एक को छूट और बाकी को जेल, इससे जनता के बीच पैसों की ताकत को लेकर एक सोच तो बनेगी ही। इसी मामले की अधिक जानकारियों को अगर देखें तो यह बात साफ है कि एक दूसरी महिला, 75 साल की जैबुन्निसा 8 महीने जेल में गुजार चुकी हैं। उसे भी संजय दत्त की तरह 5 साल की सजा सुनाई गई है, वह बीमार है, ऑपरेशन के बाद बुरी हालत से गुजर रही है, गरीब है, और संजय दत्त के बाहर रहते-रहते उसे तुरंत जेल पहुंचना है...ÓÓ
तो एक तरफ संजय दत्त के साथ शोहरत और पैसों की ताकत थी, दूसरी तरफ तरूण तेजपाल को मीडिया की ताकत हासिल थी, और गांगुली के मामले में सुप्रीम कोर्ट का रूख बताता है कि उनको भूतपूर्व जज के नाते भी एक ऐसी ताकत हासिल है कि देश की सबसे बड़ी अदालत भी जायज और जरूरी कार्रवाई करने के बजाय खुलकर मुंह चुरा रही है। ऐसे माहौल में देश के लोगों के मन में ताकतवर लोगों के लिए अगर नफरत और अधिक बढ़ती है, तो उसमें हमको कोई हैरानी नहीं है, और अगर ऐसे देश में एक सामाजिक न्याय के लिए हिंसा और खून-खराबे का रास्ता नक्सली चुनते हैं, तो उस पर भी कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। जब इस देश के खास लोग बात-बात पर आम लोगों के लिए फिक्र दिखाते हैं, तो लगता यही है कि आम लोग आम नहीं रह गए हैं, वे खास लोगों द्वारा चूस-चूस कर फेंक दी गई गुठली हो गए हैं।
महानता का पैमाना, उनके मुकाबले अपने आपको बड़े छोटे कद का पाकर, गर्दन ऊपर उठाए देख रहा है
6 दिसंबर 2013
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
सुनील कुमार
जिस दक्षिण अफ्रीका से गांधी ने सामाजिक आजादी की पहला लड़ाई शुरू की थी, उसी दक्षिण अफ्रीका का गांधी आज चल बसा। किसी को किसी का नाम लेना खतरे का काम होता है, और लोग ऐसी तुलना के बीच से, तुलना के लायक जो बातें नहीं हैं, उनको उठाकर तुरंत ही तर्क को खाक कर देते हैं, लेकिन फिर भी हिन्दुस्तानियों के समझने के लिए नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के लिए गांधी थे, और गांधी से बढ़कर भी बहुत कुछ थे। उनका संघर्ष दुनिया के इतिहास में शायद सबसे कड़ा था, और उस आग में तपकर, दशकों तक, आधी सदी तक तपकर मंडेला जिस मुस्कुराहट के साथ बाहर निकले थे, वह दुनिया के लिए सीखने की एक बात है। दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए जिस इंसान ने 27 बरस की कैद एक कोठरी में गुजारी, और जब वे बाहर निकले, तो हर किसी के लिए उनके दिल, चेहरे, होठों, और नजरों में सिर्फ नरमी और मुस्कुराहट थी। यह एक बात उनको गांधी जैसा भी बताती है, और गांधी से बढ़कर भी बताती है।
कुछ महीने पहले इसी पन्ने पर हमने भारत में किसी भी प्रेरणास्रोत के पूरी तरह अकाल की चर्चा करते हुए उस सिलसिले में मंडेला को याद किया था। और उनकी बीमारी के दौरान लिखा था- ''...दक्षिण अफ्रीका को देखकर रश्क होता है। वहां नेल्सन मंडेला की सेहत ठीक होने के लिए पूरा देश, और बाहर की दुनिया भी दुआ कर रही है। अफ्रीका में शायद ही कोई ऐसा हो जो मंडेला के लिए फिक्र ना कर रहा हो। और यह तब, जब वे किसी कुर्सी पर नहीं हैं, उनके कुनबे का कोई कुर्सी पर नहीं है, और सरकार में उनका कोई दखल नहीं है। उन्हें चुनावों में किसी को टिकिट नहीं देनी है, ना ही औद्योगिक नीतियों में फेरबदल करके अरबों के फेरबदल करने हैं, ना हथियारों की बड़ी खरीद में उनके कोई भूमिका है, लेकिन 95 साल के इस बुजुर्ग नेता के बीमार पड़ते ही उनके देश के राष्ट्रपति अपना विदेश दौरा रद्द कर देते हैं। सही मायनों में वे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपिता हैं, जैसे कि एक वक्त हिंदुस्तान में गोडसे-गैंग के अलावा बाकी लोगों के लिए गाँधी थे। मंडेला को देखकर रश्क इसलिए होता है कि इतने बड़े हिंदुस्तान में एक भी इंसान या भगवान ऐसा नहीं है जिस पर लोगों को इतना और ऐसा भरोसा हो। ...हिन्दुस्तान में अब लोगों को लगता है कि भरोसा करें तो किस पर करें? लेकिन अफ्रीका में ऐसा नहीं है। वहां घर बैठे हुए भी बरसों से मंडेला की बात का इतना वजन था कि दुनिया भर की संस्थाएं उनके मुंह से अपने बारे में एक अच्छी बात कहलवाने के लिए मरी जाती थीं, क्योंकि उनकी एक तारीफ घर बैठे दान की बौछार करवा देती थीं। एक पत्रकार ने कहा है कि नेल्सन मंडेला के चेहरे को देखें तो उस पर 27 साल जेल काटने की कड़वाहट का कोई निशान तक नहीं दिखता, बस एक मुस्कान फैली हुई है।...ÓÓ
नेल्सन मंडेला के जाने के बाद यह दुनिया के बाकी ताकतवर, मशहूर, और सार्वजनिक जीवन के लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती है कि वे अपने काम से अपने नाम को इस ऊंचाई के पैमाने पर कहां तक ले जा सकते हैं। लेकिन यह बात भी समझने की जरूरत है कि जो लोग ऐसे पैमाने पर अपने आपको नापने की परवाह में लगे रहते हैं, वे कभी भी ऐसी ऊंचाई पर पहुंच नहीं पाते। दुनिया में आज बहुत से लोग ऐसे हैं जो कि उनके मौजूदा ओहदों की वजह से ही इतिहास में दर्ज होंगे। लेकिन ऐसे लोग शायद ही कोई बचे हैं, जिनके ओहदे उनके नाम की वजह से इज्जत पा रहे हों। एक शानदार जिंदगी को याद करके आज दुनिया को इस पर खुश होने की जरूरत है कि हाड़-मांस के बने हुए इंसानों के बीच कोई एक इस ऊंचाई तक पहुंच सकता है कि महानता का पैमाना उसके मुकाबले अपने आपको बड़े ही छोटे कद का पाकर, गर्दन ऊपर उठाए देखने लगे। दुनिया में रोजाना बहुत से लोग अधिकतम वजन उठाने, सबसे तेज दौडऩे, सबसे अधिक खींचने के रिकॉर्ड कायम करने में लगे रहते हैं। दुनिया के इतिहास का महानता का गिनीज रिकॉर्ड नेल्सन मंडेला और गांधी जैसे एक-दो लोगों के नाम दर्ज रहेगा, तब तक जब तक कि कोई बिना अपने नाम का रिकॉर्ड बनाने की कोशिश किए सिर्फ बेहतर काम से रिकॉर्ड बनते चले जाने दे। महानता कभी सायास नहीं आती, यह सिर्फ उन्हीं लोगों की जिंदगी में अनायास आती है, जो इसकी न चाह रखते, न परवाह करते। यह सोचकर जो लोग मील के पत्थर देखे बिना, दुनिया के भले की मंजिल का अंदाज लगाए बिना, सिर्फ चलते चले जाएंगे, उनको गांधी और मंडेला सरीखे लोग अपने से अधिक कामयाब होने की दुआ भी देते रहेंगे।
मोदी की कही बात पर टूट पडऩे के साथ-साथ यह सोचना भी जरूरी...
5 दिसंबर 2013
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर के जम्मू में एक आमसभा में जब यह भाषण दिया कि कश्मीर की धारा 370 पर विचार-विमर्श होना चाहिए, तो देश में बहुत से तबके भड़क गए। यह बहस होने लगी कि कश्मीर के मामलों में, उसके एक बहुत गंभीर और नाजुक पहलू पर इस तरह राजनीतिक आमसभा में बयान देना और विवाद छेडऩा ठीक था या नहीं था। इस पर भी बहस होने लगी कि भाजपा की यह पुरानी घोषित नीति है कि धारा 370 को खत्म करना चाहिए, और अब अगर मोदी उस पर बहस की जरूरत बता रहे हैं, तो यह भाजपा के पुराने चले आ रहे रूख में नरमी है, या गरमी है? लोगों को यह भी समझ नहीं आ रहा है कि भाजपा ने अपनी घोषित नीति और रणनीति के बाद भी मोदी के विचार-विमर्श की जरूरत के इस बयान को अपने पुराने फैसले को कमजोर करने वाला क्यों नहीं माना? और लोगों को यह भी समझ नहीं आ रहा है कि भाजपा की अगर खुद की घोषणा के बाद उनका प्रधानमंत्री-प्रत्याशी अगर उस घोषणा को बहस और विचार-विमर्श के लिए खोलना चाह रहा है, तो यह अच्छा है या बुरा है?
हम सिर्फ इसी एक मुद्दे की बात नहीं कर रहे, लेकिन आज हकीकत यह है कि भारत की राजनीति में नेताओं के बीच और पार्टियों के बीच कड़वाहट इतनी अधिक हो चुकी है, कि मुद्दे धरे रह जाते हैं, और उन्हें बोलने वाले मुंह हमले का शिकार होने लगते हैं। मोदी के साथ दिक्कत यह है कि मुसलमानों के लिए उनका रूख इतिहास में इतने बड़े हर्फों में दर्ज हो चुका है कि जब कभी वे मुसलमानों से जुड़ी कोई भी बात करेंगे, तो ऐसी बात के वर्तमान और भविष्य को मोदी के इतिहास से जोड़े बिना कभी नहीं देखा जाएगा। यही वजह है कि जब मोदी जम्मू की आमसभा में जाकर वहां से जुड़े हुए एक मुद्दे पर भाजपा के पुराने रूख को नर्म सा करते हुए उस पर चर्चा की बात करते हैं, बहस की बात करते हैं, तो भी सारे भाजपा विरोधी उन पर टूट पड़ते हैं। लोकतंत्र की यह नौबत ठीक नहीं है। जब लोग इंसाफपसंद न रह जाएं, तर्कसंगत न रह जाएं, जब नाजुक और जरूरी मुद्दों पर बातचीत का भी माहौल न रह जाए, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान किसी नेता या पार्टी को नहीं होता, लोकतंत्र को होता है। चाहे गांधी की हत्या हो, चाहे बाबरी मस्जिद को गिराना हो, चाहे सिक्ख विरोधी दंगे हों, चाहे गुजरात के दंगे हों, चाहे कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को निकालने का मुद्दा हो, चाहे कश्मीर की धारा 370 हो, किसी भी मुद्दे पर किसी को भी बातचीत, विचार-विमर्श, और बहस से क्यों कतराना चाहिए? जब बातचीत नहीं होती तो लोग एक-दूसरे को बाहुबल से चित्त कर देने का ही रास्ता देखते हैं। यह नौबत ठीक नहीं है।
चाहे कुछ राज्यों के चुनाव ही सामने क्यों न हों, चाहे भाजपा की अगुवाई वाली अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने धारा 370 के खिलाफ अपने 6 बरस में कुछ न किया हो, किसी भी मुद्दे पर बातचीत तो कभी भी हो सकती है। और हम जहां कुछ मामलों में किसी बात को कहने वाले मुंह को अनदेखा करके सिर्फ बात को देखने को बेहतर समझते हैं, वहीं पर कुछ दूसरी बातों को बोलने वालों से जोड़कर न देखने को भी बेहतर समझते हैं। मोदी की कही बात को लेकर मोदी पर टूट पडऩे की जरूरत इस मुद्दे पर नहीं है। कश्मीर से जुड़े हुए बहुत से मामले तो ऐसे हैं जिन पर भारत का पाकिस्तान से बात करना अभी बचा है। ऐसे में अपने देश के भीतर अगर बातचीत से भी कश्मीर की बेहतरी का रास्ता नहीं निकाला जा सकता, तो इससे सबसे बड़ा नुकसान खुद कश्मीर का है। और इस बात को अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा कि किस तरह कश्मीर से वहां के पंडितों को बाहर निकाला गया, और वे अपने ही देश में शरणार्थी बनकर पड़े हुए हैं। ऐसे 70 हजार परिवार आज अगर अपनी जमीन पर लौट नहीं पा रहे हैं, तो फिर इस देश की सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रदेश की सरकार दोनों को अपनी इस कमजोरी के बारे में सोचना चाहिए। यह बात हमको अधिक अहमियत वाली आज इसलिए भी लग रही है कि चार दिन पहले ही इन 70 हजार परिवारों के लिए 20-20 लाख रूपए मुआवजे की घोषणा हुई है। उनको घर छोड़े 25 बरस होने को हैं, और कश्मीर से जुड़ी बातें इनसे भी जुड़ी हुई ही रहेंगी। दूसरी तरफ कश्मीर में गरीबी और फटेहाली का बुरा हाल है, जबकि उस राज्य की संभावनाएं असीमित हैं। इसलिए मोदी की कही किसी बात को सिर्फ चुनावी नारा कहना ठीक नहीं है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में मतदान के पहले यह बात नहीं कही है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के दौरे पर जाकर यह बात कही है, तो उसे प्रसंगहीन मानना ठीक नहीं है। कश्मीर से जुड़े हुए सारे नाजुक मामलों पर देश, और उस प्रदेश, साथ-साथ सभी संप्रदायों के व्यापक हित को देखते हुए जरूरी बात होनी ही चाहिए। ऐसी बात न होने का नुकसान कश्मीर की आम जनता भुगत रही है।
फरार अरबपति मुजरिमों को भूखों के पैसों से क्यों तलाशें?
4 दिसंबर 2013
संपादकीय
दो महीने से फरार कुख्यात नारायण साईं की गिरफ्तारी की खबर से आज का दिन शुरू हुआ। इसी तरह देश के बहुत से ताकतवर आरोपी और अभियुक्त, अपने आपको मुजरिम साबित करते हुए फरार रहते हैं, और देश की पुलिस उनको ढूंढते रहती है। जिस गुजरात की पुलिस नारायण साईं की तलाश में कई प्रदेशों की पुलिस के साथ रात-दिन लगी हुई थीं, उन प्रदेशों में वहां के अपराधों की छानबीन के लिए भी पुलिस कम पड़ती है, जेलों से विचाराधीन कैदियों को अदालतों तक ले जाने के लिए पुलिस कम पड़ती है, और जनता के पैसों से चल रही पुलिस ऐसे करोड़पति-अरबपति अभियुक्तों को ढूंढने में अपना लंबा वक्त लगाती है। यहां पर हमको लगता है कि कोई भी पैसे वाला ऐसा अभियुक्त हो, जिसकी तलाश घोषित हो जाने के बाद वह पेश न हो रहा हो, और फरार चल रहा हो, उसकी गिरफ्तारी के साथ-साथ उस पर होने वाले पुलिस के सारे खर्च पर जुर्माना जोड़कर उस अभियुक्त की दौलत से उसे पहले ही निकालने का कानून बना देना चाहिए। अदालतों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि ऐसे लोगों के बैंक खातों से लेकर उनकी जमीन-जायदाद तक से इस पूरे खर्च का कई गुना वसूल किया जाए।
देश में ताकतवर और कमजोर लोगों के लिए दो अलग-अलग किस्म के कानून चल रहे हैं। कागजों पर तो इनको एक जैसा रखा गया है, लेकिन अमल में इसी एक कानून की दो अलग-अलग शक्लें दिखती हैं। गोवा में कुछ ही दिन पहले तहलका के मालिक तरूण तेजपाल की जमानत को लेकर जिस तरह अदालतें कुछ-कुछ घंटों की मोहलत दे रही थीं, उससे लग रहा था कि उन अदालतों के पास मानो और कोई काम ही न हो। वे मानो बैठकर कुछ घंटों बाद पुलिस के वकील या तेजपाल के वकील के आने की राह देख रही हों। दूसरी तरफ जब कोई गरीब अदालत के चक्कर में फंसते हैं, तो वे संभावित अधिकतम सजा से अधिक वक्त सुनवाई के दौरान ही जेल में विचाराधीन कैदी बनकर गुजार देते हैं। ताकतवर और कमजोर के हकों में इस लोकतंत्र के भीतर खाई सा यह जो फर्क है, उसी की वजह से लोगों के मन में लोकतंत्र और इंसाफ के लिए हिकारत भरी हुई है।
आज अगर यह देखें कि जनता के बीच बनी हुई एक संस्था क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड किस तरह अपनी जरा-जरा सी बात को लेकर अदालतों का वक्त बर्बाद करती है, किस तरह सहारा कारोबार समूह पिछले कई महीनों से सुप्रीम कोर्ट की लगातार की फटकार के बाद भी अदालत के हुक्म को पूरा करने से बचते चले आ रहा है, और अखबारों में पूरे-पूरे पेज के ईश्तहार देकर अदालत को चुनौती ही दे रहा है! देश के ताकतवर तबके को जब कटघरे में जाना पड़ता है, तो जनता को ऐसा लगता है कि उस ताकत के वकील तो उसके साथ खड़े ही रहते हैं, बहुत से मामलों में अदालत की जज भी शायद उस ताकत के साथ खड़े रहते हों। सत्ता, पैसों, या किसी और तरह के असर की ताकत वालों के सजा पाने की गुंजाइश हिन्दुस्तान में कम ही रहती हैं, तब तक, जब तक कि उनके खिलाफ मामला इतना तगड़ा न हो जाए कि उसे भारत की सारी न्याय प्रक्रिया मिलकर भी कमजोर न कर सके।
आज यहां पर हमारा सुझाव यही है कि जांच एजेंसियों से लेकर अदालतों तक का जितना खर्च दौलतमंद अभियुक्तों और मुजरिमों पर होता है, उनकी फरारी के आधार पर, और बाकी का उनको सजा हो जाने पर, उस खर्च को कई गुना जुर्माने के साथ उनसे वसूल करना चाहिए। गुजरात के कुपोषण के शिकार बच्चों के हक के पैसों से महीनों तक अगर नारायण साईं नाम के आदमी को ढूंढने में पुलिस लगी है, तो इस पैसे से सैकड़ों गुना अधिक वसूली उसकी दौलत से अभी हो जानी चाहिए, किसी भी अदालती फैसले के भी पहले। और उसके बाद अगर सजा होती है तो और बकाया ऐसे लोगों की दौलत से वसूल किया जाना चाहिए।
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