ट्रेनी आईपीएस सहकर्मी के यौन शोषण की नौबत कैसे?
20 जुलाई 2026
देश में पुलिस अफसरों के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए सबसे बड़े संस्थान, सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी से एक भयानक समाचार आया है। वहां पर एक महिला आईपीएस अधिकारी प्रशिक्षण के लिए गई हुई थीं, और उनके साथ ही प्रशिक्षण पा रहे एक दूसरे आईपीएस ने उनके साथ कई तरह का गलत बर्ताव किया। अभी ये सारी बातें इस महिला द्वारा हैदराबाद के स्थानीय पुलिस थाने में की गई एफआईआर के आरोपों की शक्ल में हैं, और अभी मामला अदालत तक नहीं पहुंचा है, लेकिन पुलिस ने केस दर्ज करके जांच शुरू कर दी है। उदयकृष्ण रेड्डी नाम का यह आईपीएस एक दूसरी वजह से भी चर्चा में था कि उसने अपने कॅरियर की शुरूआत आंध्र के पुलिस सिपाही से की थी। फिर एक वरिष्ठ अफसर से अपमान की शिकायत करते हुए उसने नौकरी छोड़ दी थी, और यूपीएससी की तैयारी शुरू की। यूपीएससी में 350वीं रैंक पाकर उदयकृष्ण आईपीएस बना, और अभी नेशनल पुलिस एकेडमी में प्रशिक्षण पा रहा था। इसी दौरान साथी महिला आईपीएस ने यह रिपोर्ट लिखाई है।
30 बरस की इस महिला आईपीएस का कहना है कि उदयकृष्ण उन्हें वॉट्सऐप पर अश्लील और अभद्र मैसेज भी भेज रहा था, और एकेडमी के अन्य सहयोगियों के सामने उनके चरित्र पर कीचड़ भी उछाल रहा था। उनकी निजी जिंदगी को लेकर झूठी अफवाहें फैला रहा था, और एक अन्य ट्रेनी के साथ उनका नाम जोडक़र मानसिक दबाव बना रहा था। रिपोर्ट में लिखाया गया है कि उसने इस महिला अफसर का मोबाइल छीनकर, पासवर्ड पूछकर उनकी पर्सनल चैट खंगाली, और उसका एक निजी वीडियो भी चोरी-छिपे रिकॉर्ड करके ब्लैकमेल करने की नीयत से उसके पति को भेज दिया। महिला ने शिकायत की है कि अभी 9 जुलाई की रात उदयकृष्ण उसे जबरन खींचकर अपने कमरे में ले गया, वहां गर्दन पर चाकू अड़ा दिया, अश्लील हरकत की, और उस पर कंडोम के पैकेट फेंके। अगले दिन 10 जुलाई को भी उसने इस महिला के साथ हिंसा की। पुलिस में रिपोर्ट के साथ-साथ यह मामला सोशल मीडिया पर भी आया, और तेलंगाना की एक महिला नेता के.कविता की तेलंगाना रक्षा सेना नाम की पार्टी ने इसे संस्थागत विफलता बताया है।
यह मामला भयानक इसलिए लगता है कि यह दो आईपीएस अफसरों के बीच की घटना बताई जा रही है, जिनकी आगे की पूरी नौकरी ही जुर्म को रोकने, मुजरिमों को पकडऩे की रहने वाली हैं। आईपीएस होकर जो लोग अकादमी तक पहुंचते हैं, उनसे उम्मीद की जाती है कि देश के कानून की जानकारी और लोगों से कुछ अधिक होगी। इसके बाद भी अगर दो अफसरों के बीच यह नौबत आ रही है, तो यह बहुत भयानक है। हम महिला अफसर के साथ होने वाली ऐसी ज्यादती पर भी उसके तुरंत रिपोर्ट न लिखाने को समझ सकते हैं। कोई महिला चाहे आईपीएस हो गई हो, यौन शोषण और ब्लैकमेलिंग की रिपोर्ट लिखाना उसके लिए आसान नहीं रहता। पुलिस और अदालत का पूरा सिलसिला इस देश में मर्दों के दबदबे से लदा हुआ है, और महिला जुर्म का शिकार होने पर भी जुर्म के लिए जिम्मेदार मान ली जाती है, इसलिए उसे रिपोर्ट लिखाने में कुछ समय लग सकता है। कुछेक ऐसे मामले भी देश में होते हैं जिनमें कुछ महिलाएं झूठी रिपोर्ट भी लिखाती हैं, लेकिन हम उस तरह की कोई अटकल लगाने के बजाय उसे तय करने का काम अदालत पर छोडऩा बेहतर समझते हैं, और आज यहां पर लिखने के लिए हम महिला की कही बात को ही सही मानकर लिख रहे हैं।
एक तरफ तो इस पुरूष अफसर की कामयाबी यह थी कि पुलिस सिपाही से नौकरी शुरू करके वह देश की सबसे कठिन इम्तिहान देकर आईपीएस बना, और प्रशिक्षण के लिए इस अकादमी तक पहुंचा। यह कामयाबी दसियों हजार उम्मीदवारों में से किसी एक को ही मिलती है। लेकिन इसके बाद इस तरह के अप्रिय विवाद में फंस जाना, एक बड़ी निराशा की बात है। जिसने इतने अभावों से शुरू करके यहां तक की सफलता पाई, उससे तो उम्मीद यह की जाती है कि वह इस कामयाबी को संभालकर भी रखेगा। लेकिन अगर उसने ऐसा जुर्म किया है, और उसके सुबूत भी छोड़े हैं, तो यह मर्दाना जुल्म और जुर्म के साथ-साथ कमअक्ली की बात भी है। आज किसी को फोन पर एक गलत संदेश भेजने का मतलब अपने खिलाफ एक बहुत पुख्ता डिजिटल-साइबर सुबूत खड़ा करना होता है। आज की जांच इतनी तकनीकी-वैज्ञानिक हो चुकी है कि वह ऐसे किसी भी जुर्म को संदेह से परे स्थापित कर सकती है, सजा दिला सकती है। ऐसे में यह वक्त रोमांचक रिश्तों को बनाने का नहीं है, हर दिन तो खबरों में ढेर सारे ऐसे मामले आते हैं जिनमें बरसों के अंतरंग संबंधों के बाद भी बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई जाती है, इसलिए अखबारों के मामूली पाठक को भी कोई खतरनाक रिश्ते बनाने के पहले सावधानी बरतनी चाहिए। कोई अगर अपनी सहकर्मी महिला से लगातार कई दिनों तक इस दर्जे की हरकतें कर रहा है, तो यह कड़ी सजा के लायक मामला बनता है। इसके साथ-साथ यह आईपीएस जैसी बड़ी सरकारी सेवा के लिए भी एक शर्मिंदगी की बात है कि उसके अफसरों के बीच आपस में इस तरह की घटना हुई है। यह एक अलग बात है कि इंसानी मिजाज औरत-मर्द के बीच कई बार ऐसी हरकतें करवाता है, लेकिन ऐसा ही मिजाज अगर वर्दी में आगे जारी रहे, तो वह मातहत महिला कर्मचारियों का क्या हाल करेगा, यह देश में कई जगह देखा जा चुका है।
लोग देश की सबसे महत्वपूर्ण नौकरी पाने के बाद भी महज देहसुख के चक्कर में अगर इस तरह के जुर्म करते हैं, तो इनका जल्द से जल्द, ऐसी किसी पहली घटना में ही पकड़ा जाना बेहतर है। अगर इनकी हरकतें दबी-छुपी रह जाती हैं, तो ये सीरियल रेपिस्ट की तरह काम करने लगते हैं, और न सिर्फ आईपीएस, बल्कि दूसरी ताकतवर नौकरियों में भी कभी-कभार ऐसे कुछ अफसर चर्चा में आते रहते हैं। देश का कानून तो बड़ा कड़ा है, लेकिन सरकारों के भीतर जुल्म और जुर्म की शिकार महिला के साथ खड़े रहने की राजनीतिक इच्छाशक्ति सरकारों में कम रहती है। हमारा यह देखा हुआ है कि सत्ता की ताकत मिजाज को हमलावर और मर्दाना कर ही देती है। सबसे अधिक ताकत की जगहों पर बैठे हुए लोग आमतौर पर महिलाओं को हिकारत से देखने लगते हैं, और वे किसी भी विवाद में महिलाओं के चाल-चलन पर संदेह करते हुए उनके भीतर ही जुर्म की जिम्मेदारी तलाशने लगते हैं, तय करने लगते हैं। यह सिलसिला सरकारी नौकरियों की महिलाओं को अपने शोषण के खिलाफ खड़े होने और लडऩे का हौसला नहीं दे पाता। देश में जो महिला आयोग, या दूसरे किस्म के आयोग बने हुए हैं, वे अपनी राजनीतिक नियुक्तियों की वजह से कभी जुर्म के शिकार लोगों का साथ नहीं दे पाते, अगर मुजरिम पर राजनीतिक मेहरबानी रहती है। इसलिए देश में एक संवैधानिक बहस की भी जरूरत है कि अलग-अलग तबकों के संरक्षण के लिए बनी संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक दबाव से कैसे मुक्त रखा जाए। हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि संवैधानिक संस्थाओं में नियुक्तियां राज्य स्तर पर नहीं होनी चाहिए, और न ही राजनीतिक फैसले से होनी चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक नियुक्ति-समिति जैसी कोई संवैधानिक व्यवस्था जब तक नहीं होगी, तब तक ऐसे कोई भी आयोग अपना मकसद पूरा नहीं कर सकेंगे, और महिलाओं जैसे कमजोर तबके कभी बराबरी का हक नहीं पा सकेंगे। फिलहाल हम उम्मीद करते हैं कि पुलिस जांच, और अदालत में इस महिला आईपीएस की शिकायत खड़ी हो सकेगी, और सच होने पर वह सजा दिलवा सकेगी। देश भर में सरकारी और निजी संस्थानों में, कामकाज की जगहों पर महिलाओं के शोषण के खिलाफ एक कानूनी जागरूकता, और जिम्मेदारी की बहुत जरूरत है।
एक टेक्नॉलॉजी पुलिस के लिए नई समस्या, और एक टेक्नॉलॉजी है नया समाधान
19 जुलाई 2026
मुम्बई का एक वीडियो अभी हफ्ते भर पहले सोशल मीडिया, और खबरों में बुरी तरह छा गया, जब वहां के एक सरकारी अस्पताल पहुंचकर प्रदेश में सत्तारूढ़ शिंदे-शिवसेना के पार्षद रमेश म्हात्रे, और उनके साथियों ने तीन डॉक्टरों, नर्सों, और कर्मचारियों के साथ बुरी तरह मारपीट की। इस हमले में यह पार्षद ही सबसे बढ़-चढक़र हिंसक था। वीडियो में सब कुछ साफ था। पुलिस को डॉक्टरों और नर्सों की शिकायत पर मजबूरी में जुर्म दर्ज करना पड़ा, और पांच लोगों को गिरफ्तार करके अदालत में पेश करना पड़ा। अदालत ने इन्हें 24 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में भेजा था, लेकिन एक स्थानीय अदालत ने इस पार्षद को सेहत का हवाला देते हुए 50 हजार रूपए के मुचलके पर जमानत दे दी। इसके खिलाफ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और दूसरे डॉक्टर संगठनों ने जमकर विरोध किया। और मीडिया में यह विरोध चल ही रहा था कि बाम्बे हाईकोर्ट में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश, और एक दूसरे जज की बेंच ने शनिवार को खुद होकर एक विशेष सुनवाई की, और कहा कि वह समाचार पढक़र बहुत व्यथित और विचलित है। जजों ने कहा कि इस पार्षद, रमेश म्हात्रे के खिलाफ पहले भी आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत की दी जमानत को रद्द कर दिया, और आज इतवार की शाम पांच बजे तक पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने को कहा। अदालत ने डॉक्टर संगठनों की प्रस्तावित हड़ताल पर पुनर्विचार करने का अनुरोध भी किया।
न्यायपालिका के कई किस्म के पैमानों पर इस अदालती कार्रवाई को कुछ आसाधारण माना जा रहा है कि उसने सुओ मोटो (स्वत:) संज्ञान लेकर छुट्टी के दिन कोर्ट लगाया, और सत्तारूढ़ पार्टी के इस हिंसक पार्षद के खिलाफ एक कड़ा आदेश जारी किया। लेकिन यह बात बिल्कुल साफ है कि अदालत का यह रूख क्लोज सर्किट टीवी कैमरो की रिकॉर्डिंग से तय हो पाया। देश और दुनिया में आज बहुत सी ऐसी दूसरी घटनाएं सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की वजह से ही दर्ज हो पाती हैं, और उन पर कार्रवाई हो पाती है। अगर डॉक्टरों की यह शिकायत सिर्फ जुबानी होती, तो कुछ बयानों के मुकाबले हमलावरों के कुछ बयान तौलने में ही अदालत को बरसों लग गए रहते। इस तरह आज एक तकनीकी सहूलियत सत्ता जैसी बड़ी ताकत के सामने जुल्म के खिलाफ एक बचाव बनकर सामने आई है। और टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल जिस तरह खेल के मैदानों में भी हो रहा है, इस बार के विश्वकप में चिप लगे हुए फुटबॉल थे, और अगर फुटबॉल खिलाड़ी के बालों को भी छूते निकल गया, तो भी उसे उपकरण दर्ज कर रहे थे।
आज जब हमने इस विषय पर लिखना शुरू किया, तो हमारे दिमाग में सत्तारूढ़ गुंडों की हिंसा के खिलाफ लिखने की बात थी, लेकिन वह गुंडागर्दी तो देशभर में जगह-जगह होती ही रहती है। आज तो वह कटघरे तक इसलिए पहुंच पा रही है कि टेक्नॉलॉजी सुबूत जुटाते चल रही है। मतलब यह कि सैकड़ों बरस से लोकतंत्र में चली आ रही न्यायव्यवस्था की दशा और दिशा, इन दोनों को ही टेक्नॉलॉजी ने कुछ बरस के भीतर बदलकर रख दिया है। आज अमरीका जैसे विकसित देश में पुलिस अफसरों के लिए अनिवार्य किए गए यूनीफार्म-कैमरों से ही उनके खिलाफ सुबूत जुट जाते हैं। ऐसे बॉडी-कैम को लगाना बहुत किस्म के पुलिस-दस्तों के लिए अनिवार्य किया गया है। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने देश के हर थाने में निगरानी कैमरे लगाना अनिवार्य किया है, ताकि जनता, या आरोपियों के साथ किसी तरह की हिंसा के सुबूत दर्ज होते जाएं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में यह भी है कि थानों में 18 महीने की कैमरा-रिकॉर्डिंग संभालकर रखी जाए, जो कि राज्य सरकारों पर बड़ी भारी भी पड़ रही है, और कई लोगों का कहना है कि थाने के भीतर की किसी भी रिकॉर्डिंग को डेढ़ बरस बाद देखने का कोई काम भी नहीं पड़ता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट से बहस करने के बजाय राज्य सरकारें सीसीटीवी कैमरे लगा चुकी हैं, और अगले निर्देश के बाद उनमें बढ़ोत्तरी भी की जा रही है। केन्द्र सरकार भी इस योजना में राज्यों की मदद कर रही है। कुल मिलाकर जिन जगहों को हिरासत-हिंसा, हिरासत-हत्या जैसे खतरों की जगह माना जाता था, उन जगहों के सुबूत किसी घटना के हुए बिना भी दर्ज किए जा रहे हैं, जिस तरह कई विकसित देशों में पुलिस-पोशाक पर लगे कैमरे रिकॉर्ड करते हैं, और अपने कंट्रोलरूम को रिकॉर्डिंग का जीवंत प्रसारण भी करते हैं। लेकिन सिर्फ पुलिस या सरकार ही ऐसा करती हों, जरूरी नहीं है, अब लोग अपनी निजी कार में भी मामूली से खर्च से ऐसे कैमरे लगा सकते हैं जो चारों तरफ की रिकॉर्डिंग करते हैं, और सुबूत तो रहते ही हैं, जरूरत पडऩे पर वे किसी घटना के बीच से भी पुलिस को वीडियो भेज सकते हैं।
टेक्नॉलॉजी की सहूलियतों की चर्चा करते हुए अब हिन्दुस्तानी शहरों में भी गली-गली तक लगने वाले कैमरों की चर्चा जरूरी है, जो कि आज किसी भी घटना या वारदात के होने पर पुलिस को आसानी से मिल जाने वाला पुख्ता सुबूत रहते हैं। लोगों को किसी दुर्घटना, या वारदात के वक्त यह याद नहीं रहता कि वे किसी कैमरे की जद में हो सकते हैं, लेकिन जांच या कार्रवाई की नौबत आने पर पुलिस की नजर गवाहों के चेहरों से पहले भी, इमारतों और खम्भों पर लगे हुए कैमरों पर जाती है कि घटना-दुर्घटना किस कैमरे पर दर्ज हुई होगी। टेक्नॉलॉजी ने यह साबित किया है कि पुलिस की संख्या को कितना भी बढ़ाकर निगरानी और सुबूत, ये दोनों काम एक साथ नहीं किए जा सकते थे, लेकिन ये अब आसानी से हो रहे हैं। पहली नजर में लगता है कि 24 घंटों के ऐसे, मैं भी चौकीदार, किस्म के कैमरों के बाद अब इंसानी-पुलिस की जरूरत घट गई होगी, लेकिन पुलिस के अंदरुनी जानकार लोगों का कहना है कि कुछ दशक पहले जुर्म करने के लिए मुजरिम के जाना पड़ता था, आज लोग देश और दुनिया के किसी भी कोने में बैठे हुए फोन और इंटरनेट से बड़े-बड़े जुर्म करते हैं, और उनको पकडऩे के लिए पुलिस को कम से कम पूरे देश में तो जाना ही पड़ता है। इसलिए एक तरफ निगरानी टेक्नॉलॉजी ने पुलिस के काम को कुछ हल्का किया है, तो दूसरी तरफ जुर्म के हथियार बन गए फोन-कम्प्यूटर ने पुलिस की भाग-दौड़ पूरे देश तक फैला दी है। एक टेक्नॉलॉजी की वजह से जुर्म का जो बोझ पुलिस पर बढ़ा है, अगर उस बोझ को निगरानी कैमरे, मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स, मोबाइल फोन की लोकेशन जैसी चीजें हल्का न करतीं, तो पुलिस तो साइबर क्राइम के इस बोझतले दम ही तोड़ देती।
कैसा दिलचस्प नजारा है, टेक्नॉलॉजी का एक हिस्सा साइबर जुर्म को सैकड़ों और हजारों गुना बढ़ा रहा है, और दूसरी तरफ कुछ दूसरी टेक्नॉलॉजी कई किस्म के जुर्म में पुलिस के काम को बड़ा हल्का भी कर रही है। पुलिस फोर्स का अधिकांश हिस्सा जिस पीढ़ी का है, वह बहुत साइबर-साक्षर नहीं है, इसलिए यह नए किस्म की प्रौढ़ शिक्षा अपने आपमें एक अलग चुनौती है। अब हम आज के मुद्दे को बहुत अधिक जटिल करना नहीं चाहते, वरना पुलिस के कामकाज के इस चल रहे तकनीकी-कायाकल्प के साथ देश में अभी लागू हुए नए कानूनों को समझना, और उन पर अमल करना एक बहुत बड़ी चुनौती है, शायद सबसे ही बड़ी। अगर पुलिस जांच में नए कानूनों में बताई गई प्रक्रिया के पालन में जरा भी कमजोरी रहेगी, तो अदालत में वे मामले खड़े ही नहीं हो पाएंगे। इस तरह पुलिस नई तकनीक और नए कानून, इन दोनों के झंझावात से गुजर रही है!
लाखों बरस उम्र का दिमाग, अब कुछ बरसों में तीनतरफा सुनामी का शिकार
19 जुलाई 2026

दुनिया को अलग-अलग कई पहलुओं से देखा जा सकता है। अब विज्ञान के नजरिए से देखें तो कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक हवा में मौजूद पीएम-2.5 और पीएम-10 जैसे हवा में तैरते प्रदूषण के कण न केवल सांस के रास्ते बदन में घुसते हैं, बल्कि दिमाग तक पहुंचकर पार्किंसंस जैसे गंभीर स्नायुरोग का खतरा भी बढ़ा सकते हैं। इस वैज्ञानिक रिसर्च में पाया गया है कि किस आकार के प्रदूषण-कण कितने बढऩे से पार्किंसंस का खतरा कितना बढ़ता है। दिमाग और शरीर के नियंत्रण को बहुत बुरी तरह प्रभावित करने वाली पार्किसंस के मरीज बढ़ते चल रहे हैं, बुढ़ापे के साथ बढऩे वाली इस बीमारी की बढ़ोत्तरी की एक वजह यह भी हो सकती है कि इंसानों की औसत उम्र बढ़ रही है, और दुनिया की आबादी में बूढ़ों का अनुपात। लेकिन अगर प्रदूषण की वजह से इस बीमारी का खतरा बढऩा इस वैज्ञानिक शोध में स्थापित हुआ है, तो इसका मतलब यह होगा कि इसके मरीज संख्या में भी बढ़ेंगे, और कम बुढ़ापे से शुरू होकर लंबे बुढ़ापे तक यह बीमारी प्रभावित करेगी। हम इस पर एक लंबी रिपोर्ट अपने अखबार में दे रहे हैं, इसलिए यहां पर इतनी चर्चा काफी है।
अब एक दूसरी चर्चा की जाए। एक ब्रिटिश अमरीकी अध्ययन से यह पता लगा है कि एआई के अधिक इस्तेमाल से दिमाग के कमजोर होने का एक खतरा खड़ा हो रहा है। मानव शरीर का विकास यह बताता है कि जब शरीर के किसी हिस्से का इस्तेमाल घटने लगता है, तो कुछ सौ या हजार पीढिय़ों के बाद उन हिस्सों का विकास ही कम होने लगता है। लेकिन एआई के इस्तेमाल से बुद्धि के मंद होने का सिलसिला बिना अगली पीढिय़ों को देखे, इसी पीढ़ी में दिख रहा है, उन्हीं लोगों में दिख रहा है कि लाखों-बरसों के इतिहास में इंसानी दिमाग ने जिस जटिल तरीके से विकास पाया है, अब एआई का इस्तेमाल अचानक उस विकास के कुछ या काफी हिस्सों को गैरजरूरी साबित कर रहा है। इंसान का दिमाग वैसे तो बहुत लचीला है, लेकिन वह इतना लचीला भी नहीं है कि एक-दो बरस के भीतर उसे एकदम से गैरजरूरी साबित कर दिया जाए, और वह हीनभावना में न आए। अब तक दिमाग की खुदकुशी जैसी कोई बात तो सामने नहीं आई है, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि इंसानी दिमाग के कुछ सबसे जटिल कामकाज को अगर एआई औजारों को दे दिया जाता है, तो एकदम से बेकार और बेरोजगार सरीखे हो गए दिमाग से और क्या उम्मीद की जा सकती है? पिछले बरस अमरीका के विख्यात विश्वविद्यालय, एमआईटी के एक शोध का नतीजा था कि जो छात्र लेख लिखने के लिए जनरेटिव एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनकी आलोचनात्मक सोच की क्षमता घट रही है। एक और शोध ने यह पाया था कि एआई दिमाग के साथ जो कर रहा है उसे संज्ञानात्मक बोझ हटाना, या संज्ञानात्मक समर्पण करना कहा जा सकता है, एक ऐसी स्थिति जिसमें दिमाग काम करना कम, या बंद कर देता है।
अब इन दो अलग-अलग बातों को देखें, तो दिमाग पर पडऩे वाला एक असर तो शारीरिक है जो कि प्रदूषण से पैदा हो रहा है। लेकिन दूसरा असर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसी सहूलियत को इस्तेमाल करने से हो रहा है। एक तीसरा पहलू हमें और दिखता है, सोशल मीडिया के दिल-दिमाग पर असर का। आज अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प यह दावा कर रहे हैं कि पिछले चुनाव में चीन ने घुसपैठ करके, या खरीदकर दसियों लाख अमरीकी वोटरों की जानकारी चुरा ली थी, और चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की थी। लोगों को याद होगा कि टिक-टॉक जैसे नौजवान पीढ़ी के बीच एक सबसे लोकप्रिय मोबाइल एप्लीकेशन को भारत ने बरसों पहले बंद कर दिया, और अमरीका ने ट्रम्प की अगुवाई में इसके मालिकाना ढांचे को बदलने का काम किया है। दुनिया के कई देशों की आशंका है कि टिक-टॉक में लोग अपने जो वीडियो डालते हैं, या जो जानकारी देते हैं, उसका विश्लेषण करके चीन में बैठे इस एप्लीकेशन के सर्वर कई की जानकारियां निकाल सकते हैं, और फिर चुनिंदा लोगों, या तबकों को प्रभावित करने के लिए टिक-टॉक के एल्गोरिदम में ऐसा फेरबदल कर सकते हैं कि उन लोगों को कुछ चुनिंदा किस्म की सामग्री अधिक दिखे, या कुछ किस्म की सामग्री न दिखे।
अब इन तीन अलग-अलग मामलों की चर्चा करने के बाद हम तीनों को जोडक़र जब देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि प्रदूषण से प्रभावित दिमाग जब एआई के इस्तेमाल से मंद भी होने लगेगा, और उसके बाद दुनिया भर के एआई-सोशल मीडिया आधारित कारोबार, और सरकार लोगों के दिमाग पर कब्जा करने की कोशिश करेंगे, तो थकी हुई मंदबुद्धि को ब्रेनवॉश करना अधिक आसान होगा। यह निष्कर्ष किसी एक शोध का नहीं है, बल्कि अलग-अलग शोध के नतीजों को जोडक़र मैं खुद यह सोच रहा हूं कि जब दिमाग की मोमबत्ती को दोनों सिरों से जला दिया गया है, तो उसका दुगुनी रफ्तार से खत्म होना भी तय हो गया है। इसके साथ-साथ अब तो सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने ब्रेनवॉशिंग के लिए इस मोमबत्ती को बीच से भी जलाना शुरू कर दिया है। यह सिलसिला एक मोमबत्ती को पिघले मोम, और जलकर बने प्रदूषण में बड़ी तेजी से बदल देगा। ऐसा ही कुछ दिमाग के साथ भी हो रहा है।
प्रदूषण के नैनो प्लास्टिक कण बदन के खून में आकर दिमाग तक पहुंचने वाले खून में जाकर वहां थक्के जमा दे रहे हैं। बदन के भीतर गर्भस्थ भ्रूण के बदन के भीतर भी नैनो प्लास्टिक के कण मिल रहे हैं, इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि प्लास्टिक प्रदूषण कितने गहरे पैठ चुका है। अब बाकी प्रदूषण स्नायुतंत्र को प्रभावित करके लोगों को पार्किसंस जैसी बीमारी वक्त के पहले, औसत से अधिक, और अधिक लंबे वक्त तक दे रहा है। इंसान खुद एआई के इस्तेमाल से दिमाग के कई तरह के कामकाज को बेरोजगार कर रहे हैं। और कल तक के अक्लमंद से आज मंदअक्ल हो चुके इंसानों के दिमाग पर सोशल मीडिया, और दूसरे एप्लीकेशनों वाले कारोबार और सरकार का अलग-अलग, और मिलाजुला भी, हमला हो रहा है। क्या इतनी विकराल और विपरीत स्थितियों से जूझते हुए इंसान का दिमाग इनसे उबर जाएगा, या इनके सामने जवाब दे देगा? ये सब कुछ कठिन सवाल है क्योंकि लाखों बरस के विकासक्रम वाले इंसानी दिमाग पर मानो यह तीन-चारतरफा सुनामी आई हुई है।
क्या भारत के अंडमान, या दुनिया के अमेजान के जंगलों जैसे दूसरे अछूते समुदाय अगले दशकों में कुछ अधिक शोध का सामान बनेंगे, क्योंकि वे प्रदूषण और एआई, और सोशल मीडिया एल्गोरिद्म सबसे परे हैं, और प्रदूषित दिमागों के मुकाबले ऐसे अछूते दिमाग कैसे अलग होंगे, क्या इसका कोई तुलनात्मक अध्ययन मुमकिन हो सकेगा? फिर हमारी ये कल्पनाएं भी उसी सरहद के भीतर हैं, जिस सरहद के पार एआई इंसानों से बेकाबू होकर अपनी मर्जी से काम करने लगेगा, उस दिन इंसानी दिमाग पर वह कैसा हमला करेगा, उस पर कैसा कब्जा करेगा, यह सोचना अभी हमारे लिए भी मुमकिन नहीं है। फिलहाल प्रदूषण, एआई के अतिउपयोग, और सोशल मीडिया के चंगुल, इन सबसे जितना-जितना बच सकें, उतना बच देखें। आगे-आगे देखें, होता है क्या।
सोनम वांगचुक को बचाना तो ठीक है, लेकिन सरकार को साख भी बचाना चाहिए
18 जुलाई 2026
दिल्ली पुलिस ने आज सुबह जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे पर्यावरणविद् आंदोलनकारी सोनम वांगचुक को उठाकर ले जाकर अस्पताल में भर्ती करवाया। भूख हड़ताल के 21 दिन हो चुके थे, उनका वजन 9 किलो से अधिक गिर चुका था, शरीर का कुछ अपूरणीय नुकसान होते चल रहा था, और ऐसे में जान पर खतरा देखते हुए उन्हें यह भूख हड़ताल जारी रखने देना सरकार की जिम्मेदारियों के खिलाफ जाता। आमतौर पर एक सीमा के बाद जब जान पर खतरे की बात आती है, तो आंदोलनकारी-अनशनकारी की मर्जी के खिलाफ भी अस्पताल में उन्हें जिंदा रखने के लिए मेडिकल कोशिशें आम बात हैं। आज की पुलिस कार्रवाई को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दल, और सामाजिक कार्यकर्ता तरह-तरह से विरोध कर रहे हैं, उनके विरोध की वजहें अलग-अलग हैं, लेकिन उनमें से किसी ने भी सोनम वांगचुक की जिंदगी पर छाए हुए खतरे को लेकर उनकी जिंदगी बचाने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं की थी। इसलिए अब यह मलाल कुछ अटपटा है कि सरकार ने उन्हें जबरिया उठाकर अस्पताल भेजा है।
लोकतंत्र में आंदोलनकारियों, और सरकार, दोनों के पास कई लचीले रास्ते रहते हैं। भारत के इतिहास में बेमुद्दत, या आमरण अनशन पर बैठे लोगों में से अधिकतर लोगों को तो सरकार ने मान-मनौव्वल से बचा लिया, कई लोगों को बलपूर्वक ले जाकर अस्पताल में जिंदा रखा, मणिपुर की आंदोलनकारी इरोम शर्मिला का मामला तो दुनिया में सबसे अनोखा है जो शायद 16 बरस तक भूख हड़ताल पर रहीं, और जिंदा भी रहीं। गांधी से लेकर अभी कुछ बरस पहले गंगा बचाने के लिए भूख हड़ताल पर बैठे-बैठे गुजर गए एक बुजुर्ग प्राध्यापक तक बहुत से मामले रहे हैं, जिनमें केन्द्र सरकार, या अलग-अलग राज्य सरकारों का अलग-अलग रूख रहते आया है।
अनशन कर रहे आंदोलनकारियों से निपटने का कोई एक फॉर्मूला देश या दुनिया में नहीं है, फिर भी यह माना जाता है कि किसी लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी सरकार को अपने देश में किसी शांतिप्रिय आंदोलनकारी को अनशन पर नहीं मरने देना चाहिए। यहीं पर आकर एक सवाल खड़ा होता है कि नीट और दूसरे इम्तिहानों की गड़बड़ी के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में सोनम वांगचुक शरीक हुए थे, और अपने गृहप्रदेश लेह-लद्दाख को लेकर भी उनकी कुछ मांगें थीं। इस आंदोलन की सबसे बड़ी मांग केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की थी, जो कि इम्तिहानों की गड़बड़ी के जिम्मेदार मंत्रालय के मंत्री हैं। लेकिन यही मांग देश की अधिकतर विपक्षी पार्टियां भी कर रही थीं, और सरकार के लिए विपक्ष और किसी आंदोलन की मांग पर अपने मंत्री को हटाना सहूलियत की बात नहीं थी। इम्तिहानों की गड़बडिय़ों के बाद सरकार खुद होकर किसी फेरबदल में इस मंत्री का विभाग बदल देती, तो वह एक अलग बात होती, लेकिन एक बार राजनीतिक और सार्वजनिक मांग हो जाने के बाद उसके सामने झुककर मंत्री का इस्तीफा लेना सरकार के लिए एक शर्मिंदगी भी होती, और फिर ऐसे में इस्तीफों की मांग का एक सिलसिला भी शुरू हो सकता था, इसलिए भी सरकारें ऐसे लोकतांत्रिक लचीलेपन से परहेज करती हैं।
लेकिन इस मामले में सरकार ने आंदोलनकारियों से बातचीत का कोई भी रूख नहीं दिखाया। जबकि नीट परीक्षा की गड़बड़ी के चलते देश में करीब दो दर्जन बच्चे खुदकुशी कर चुके हैं, कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाने वाले कुछ मां-बाप भी सदमे में मर चुके हैं। ऐसे में भी इस आंदोलन को लेकर सरकार में लचीलापन शून्य था। कॉकरोच जनता पार्टी एक प्रतीकात्मक नाम है, वह कोई राजनीतिक दल तो है नहीं कि उससे बातचीत करने से सरकार कमजोर दिखती। हम तो लोकतंत्र में हमेशा ही बातचीत के हिमायती रहे हैं, और हमारा यह भी मानना है कि आतंकवादी हों, उग्रवादी हों, नक्सली हों, या कोई और, बातचीत की पहल लोकतांत्रिक सरकार को ही करनी चाहिए, क्योंकि संविधान ने उसी पर अधिक जिम्मेदारी डाली है, और उसे ही सारे अधिकार भी हैं। एक व्यापक जनहित के मुद्दों को लेकर अगर कोई भी लोकतांत्रिक-शांतिपूर्ण आंदोलन करते हैं, तो उसे अनदेखा करना तो बिल्कुल ही नहीं होना चाहिए, जो कि इस मामले में हुआ है। सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी के पास, या उनकी विचारधारा के लोगों के पास बातचीत शुरू करने के कई माध्यम हमेशा ही रहते हैं। छत्तीसगढ़ में ही दशकों से चली आ रही नक्सल हिंसा को केन्द्र और राज्य की भाजपा सरकारों ने बंदूकों के साथ-साथ बातचीत से भी निपटाया, सिर्फ बंदूकें सब कुछ नहीं सुलझा पाईं। इसलिए हमारा यह मानना है कि कॉकरोच और सोनम वांगचुक के इस आंदोलन को सुलझाने का एक सकारात्मक रूख सरकार को दिखाना चाहिए था। किसी बातचीत के बाद सुलह के किनारे पर पहुंचा जा सके, या नहीं, यह तो एक अलग बात रहती है, लेकिन सरकार एक शांतिपूर्ण आंदोलन से बात भी न करे, एक जायज मुद्दे के आंदोलन से बात भी न करे, यह तो जायज बात नहीं है।
केन्द्र सरकार चाहे सिर्फ दिखावे के लिए, अगर बातचीत का लचीला रूख दिखाती, तो उससे उसका सम्मान ही बढ़ता। देश भर में इम्तिहानों की गड़बड़ी के भयानक जुर्म को लेकर जनता के बीच जो नाराजगी है, उसे सरकार को कम नहीं आंकना चाहिए। उस गड़बड़ी के लिए यही अकेला आंदोलन देश में चल रहा था। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक, अमरीका में पढ़ रहे नौजवान भारतीय छात्र की कोई लंबी छवि नहीं है, इसलिए सरकार उसे एक बार अनदेखा भी करती, तो भी चल जाता, लेकिन सोनम वांगचुक तो देश के एक स्थापित सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनके ऐसे अनशन पर भी सरकार ने बातचीत का कोई दिखावा तक अगर नहीं किया है, तो उसने अपनी छवि बचाने का एक मौका खो दिया है। अखबारों को ऐसी सुर्खियां तो मिल सकती हैं कि सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के 20वें दिन भी दस किलो वजन खो देने पर भी जान का खतरा आ जाने पर भी सरकार के माथे पर शिकन नहीं आई। लेकिन लोकतंत्र का इतिहास ऐसी बातों को सम्मान के साथ दर्ज नहीं करता है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ बरस पहले जब किसान आंदोलन हुआ था, तब भी सरकार की तरफ से कुछ लोग आंदोलनकारियों से बात करते थे, और आखिर में चट्टान की तरह खड़े हुए उस आंदोलन के सामने सरकार को झुकना पड़ा था, और तीन किसान कानून वापिस लेने पड़े थे। एक सरकार अगर अपने एक मंत्री के इस्तीफे की मांग वाले आंदोलन से नहीं जूझ पा रही है, तो इससे सरकार की मजबूती साबित नहीं होती, सरकार की कमजोरी ही साबित होती है। सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से उठाकर अस्पताल में भर्ती करा देने से मुद्दा खत्म नहीं हुआ है, और लोकतांत्रिक आंदोलन किसी जादुई जंतर-मंतर से खत्म नहीं होते हैं। सरकार की बुनियादी जिम्मेदारियों में यह भी शामिल रहता है कि वह देश-प्रदेश की लोकतांत्रिक-बेचैनी से जूझना जाने।
सहपाठियों को काटने वाले लडक़े की मानसिक उलझन भी पता लगानी चाहिए...
17 जुलाई 2026
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक सरकारी स्कूल से बड़ी अजीब सी खबर आई है। वहां 11वीं के एक छात्र ने एक ही दिन में अपने 11 सहपाठियों को दांतों से काट दिया। कहीं इस लडक़े पर रैबीज जैसा कोई असर न हो, इस आशंका में डॉक्टरों ने इन सभी 11 छात्रों को एंटी-रैबीज वैक्सीन भी लगाई है, और काटने वाले लडक़े को अस्पताल में निगरानी में रखा गया है। उस पर अभी तो रैबीज जैसे कोई दूसरे लक्षण नहीं दिख रहे हैं, लेकिन परिवार और शिक्षकों को याद पड़ रहा है कि इसे तीन बरस पहले कुत्ते ने काटा था। कल क्लास में कुछ बच्चों से बहस के बाद इस लडक़े ने 6 बच्चों को काटने की बात डॉक्टर को बताई। और यह भी बताया कि इसके बाद जब मैदान में कबड्डी खेल रहा था, तो कुछ बच्चों ने उनकी बात मानने से इंकार कर दिया, इससे गुस्सा होकर उसने 5 बच्चों को दांतों से काट लिया था। ‘पत्रिका’ अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक धमतरी के कुरूद ब्लॉक में एक दूसरे गांव में कुछ महीने पहले 35 बच्चों ने अपने हाथ की कलाई काट ली थी।
हम उम्मीद करते हैं कि अभी 11 बच्चों को काटने वाले लडक़े ने रैबीज के किसी असर में ऐसा नहीं किया होगा, और सभी लोग खतरे के बाहर होंगे, लेकिन यह बात बहुत फिक्र की है। यह बात इलाज करने वाले डॉक्टरों से परे की, मानसिक परामर्श के जरूरत की बात है। आज स्कूलों में बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। हम आंकड़ों में अधिक जाना नहीं चाहते, लेकिन दो ही दिन पहले की गुजरात की एक रिपोर्ट है कि स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों में से करीब आधे ही (54 फीसदी) 12वीं तक पढ़ते हैं, बाकी बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। यह हालत देश के एक आर्थिक रूप से संपन्न, उद्योग-व्यापार के हिसाब से विकसित राज्य की है। जो राज्य बहुत पिछड़े हुए हैं, अधिक अशिक्षा के शिकार हैं, वहां हालत और भी खराब हो सकती है।
लेकिन हम अभी पूरे देश, और बाकी प्रदेशों के आंकड़ों पर जाना नहीं चाहते क्योंकि उससे आज की बात भटक जाएगी। सोचने की जरूरत यह है कि स्कूलों में जा चुके बच्चों में से जो आधे बच्चे 12वीं तक नहीं पहुंचते हैं, वे जाते कहां हैं? वे शायद आवारागर्दी करने लगते होंगे, फुटपाथी जिंदगी जीने लगते होंगे, वे छोटे-मोटे जुर्म में फंस जाते होंगे, या बिना किसी महत्वाकांक्षा के वे मजदूरी करने लगते होंगे। ये समाज की उस मूलधारा से अलग निकल जाते होंगे, जिसे यह देश अपना भविष्य मानता है। देश आबादी के आयु वर्ग के आंकड़ों को देख-देखकर गर्व करता है कि उसके पास आने वाले कुछ दशकों तक नौजवान आबादी का बेहतर अनुपात रहेगा। लेकिन अगर इस अनुपात में आधा हिस्सा स्कूल छोड़े हुए बच्चों का रहेगा, तो क्या वह भी सचमुच गर्व के लायक बात रह जाएगी? दूसरी बात यह कि स्कूल छोड़ी हुई आधी आबादी जिस तरह के छोटे-मोटे, या सबसे संगीन जुर्म करने में लगी हुई है, वह भी बहुत बड़ी फिक्र की बात है।
हम अपने इस कॉलम में बार-बार इस बात पर जोर डालते हैं कि सभी विश्वविद्यालयों में मनोवैज्ञानिक परामर्श का कोर्स बड़े पैमाने पर बढ़ाना चाहिए। जिस तरह स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को बीएड करना अनिवार्य रहता है, उस तरह की अनिवार्यता के बिना भी मनोवैज्ञानिक परामर्श के डिग्री कोर्स को एक अतिरिक्त योग्यता मानना चाहिए। और इसके लिए सरकार अपनी स्कूलों में (सबसे अधिक ड्रॉप आउट बच्चे सरकारी स्कूलों के ही रहते हैं) ऐसे परामर्शदाता-शिक्षकों को एक वेतनवृद्धि भी दे सकती है, अगर वे स्कूली बच्चों, और उनके परिवार के बाकी लोगों की उलझन सुलझाने, और उन्हें परामर्श देने का काम करें। हम मनोवैज्ञानिक परामर्श का एक नया ढांचा शुरू करने के बजाय बच्चों के स्तर पर इस मदद को मुहैया कराने के लिए स्कूली शिक्षकों के बीच से ही ऐसे रूख और रूझान वाले शिक्षक-शिक्षिकाओं को छांटकर, उन्हें ऐसा कोर्स करने के लिए संवैतनिक अवकाश देकर परामर्श का एक ढांचा विकसित करने का सुझाव दे रहे हैं। मानसिक उलझन से मुक्त बच्चे ही देश का बेहतर भविष्य बना सकते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ही लाखों स्कूली शिक्षक हैं। आबादी के साथ ऐसा ही अनुपात पूरे देश में होगा, कुछ राज्यों में इससे बेहतर भी होगा। स्कूलों में अलग-अलग विषयों के शिक्षक होते हैं, खेल शिक्षक भी होते हैं, और इन्हीं शिक्षकों में से जो मनोवैज्ञानिक-परामर्श की पढ़ाई करना चाहें, उन्हें अलग-अलग जिलों की तैनाती के हिसाब से छांटकर प्रदेश को दो बरस में एक बेहतर जगह बनाया जा सकता है।
आज भारत जैसे देश इस समस्या से भी जूझ रहे हैं कि इसके विश्वविद्यालयों के कोर्स का जिंदगी की जमीनी जरूरतों से लेना-देना बहुत कम रह गया है। कुछ ही दिन पहले हमने यहीं पर चीन के विश्वविद्यालयों पर लिखा था कि किस तरह वहां दस-बारह हजार के करीब कोर्स बंद किए गए हैं, और हजारों नए कोर्स चालू भी किए गए हैं जिनकी आज समाज और कारोबार को जरूरत है। हमारा मानना है कि हर प्रदेश को अपने विश्वविद्यालयों से फॉसिल (जीवाश्म) बन चुके पाठ्यक्रम बंद करना चाहिए, और उनकी जगह ऐसे नए पाठ्यक्रम शुरू करना चाहिए जिनकी जरूरत सरकारी ढांचे के भीतर दसियों हजार की संख्या में हो, और सरकार से परे भी समाज को भी जैसे परामर्शदाताओं की जरूरत हो। आज बच्चे, और बड़े, सभी उम्र के लोग तरह-तरह के नैतिक या अनैतिक समझे जाने वाले कामों में लगे दिखते हैं, वैध और अवैध समझे जाने वाले संबंधों में उलझे रहते हैं। इसके अलावा परिवारों के भीतर, दोस्ती में, या हर उम्र के प्रेमसंबंधों में बड़े-बड़े जुर्म हो रहे हैं, और देश में कोई ऐसे जुर्म नहीं रह गए हैं, जिनसे नाबालिग जुड़े हुए न हों। इसलिए स्कूली स्तर पर मानसिक परामर्शदाता अगर उपलब्ध हो सकें, तो उससे गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों का अधिक भला होगा, और इन्हीं तबकों के बच्चे अधिक समस्याग्रस्त भी रहते हैं, और परामर्श की सुविधा से वंचित भी रहते हैं। यह काम सरकार को ही अपने विश्वविद्यालयों को लगाकर, और अपने शिक्षकों की फौज का उत्साह बढ़ाकर करना होगा। परामर्श-पाठ्यक्रमों की जितनी क्षमता होगी, उससे बहुत अधिक शिक्षक-शिक्षिकाएं उनमें दिलचस्पी लेने वाले रहेंगे, ऐसा हमारा भरोसा है। आज समस्याग्रस्त जितने भी बच्चे हैं, वे कुल मिलाकर तो सरकार के लिए ही समस्या बनते हैं, वे जुर्म में फंसते हैं तो भी, और अगर वे अनुत्पादक रह जाते हैं तो भी। इसलिए सरकार को नई पीढ़ी को पटरी से उतरने से बचाने के लिए मार्गदर्शकों की तरह परामर्शदाताओं को तैयार करना चाहिए, और इसके लिए हमें स्कूली शिक्षा-व्यवस्था से बेहतर और कोई जगह नहीं दिख रही है। अभी जिस बच्चे के दूसरे बच्चों को काटने की घटना से हमें यह लिखने की जरूरत लगी, हो सकता है कि वह बच्चा भी किसी मानसिक उलझन का शिकार हो, और अगर स्कूल में परामर्श हासिल रहता, तो वह इस दर्जे की हिंसा में न उलझा रहता।




