17 जुलाई 2026
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक सरकारी स्कूल से बड़ी अजीब सी खबर आई है। वहां 11वीं के एक छात्र ने एक ही दिन में अपने 11 सहपाठियों को दांतों से काट दिया। कहीं इस लडक़े पर रैबीज जैसा कोई असर न हो, इस आशंका में डॉक्टरों ने इन सभी 11 छात्रों को एंटी-रैबीज वैक्सीन भी लगाई है, और काटने वाले लडक़े को अस्पताल में निगरानी में रखा गया है। उस पर अभी तो रैबीज जैसे कोई दूसरे लक्षण नहीं दिख रहे हैं, लेकिन परिवार और शिक्षकों को याद पड़ रहा है कि इसे तीन बरस पहले कुत्ते ने काटा था। कल क्लास में कुछ बच्चों से बहस के बाद इस लडक़े ने 6 बच्चों को काटने की बात डॉक्टर को बताई। और यह भी बताया कि इसके बाद जब मैदान में कबड्डी खेल रहा था, तो कुछ बच्चों ने उनकी बात मानने से इंकार कर दिया, इससे गुस्सा होकर उसने 5 बच्चों को दांतों से काट लिया था। ‘पत्रिका’ अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक धमतरी के कुरूद ब्लॉक में एक दूसरे गांव में कुछ महीने पहले 35 बच्चों ने अपने हाथ की कलाई काट ली थी।
हम उम्मीद करते हैं कि अभी 11 बच्चों को काटने वाले लडक़े ने रैबीज के किसी असर में ऐसा नहीं किया होगा, और सभी लोग खतरे के बाहर होंगे, लेकिन यह बात बहुत फिक्र की है। यह बात इलाज करने वाले डॉक्टरों से परे की, मानसिक परामर्श के जरूरत की बात है। आज स्कूलों में बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। हम आंकड़ों में अधिक जाना नहीं चाहते, लेकिन दो ही दिन पहले की गुजरात की एक रिपोर्ट है कि स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों में से करीब आधे ही (54 फीसदी) 12वीं तक पढ़ते हैं, बाकी बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। यह हालत देश के एक आर्थिक रूप से संपन्न, उद्योग-व्यापार के हिसाब से विकसित राज्य की है। जो राज्य बहुत पिछड़े हुए हैं, अधिक अशिक्षा के शिकार हैं, वहां हालत और भी खराब हो सकती है।
लेकिन हम अभी पूरे देश, और बाकी प्रदेशों के आंकड़ों पर जाना नहीं चाहते क्योंकि उससे आज की बात भटक जाएगी। सोचने की जरूरत यह है कि स्कूलों में जा चुके बच्चों में से जो आधे बच्चे 12वीं तक नहीं पहुंचते हैं, वे जाते कहां हैं? वे शायद आवारागर्दी करने लगते होंगे, फुटपाथी जिंदगी जीने लगते होंगे, वे छोटे-मोटे जुर्म में फंस जाते होंगे, या बिना किसी महत्वाकांक्षा के वे मजदूरी करने लगते होंगे। ये समाज की उस मूलधारा से अलग निकल जाते होंगे, जिसे यह देश अपना भविष्य मानता है। देश आबादी के आयु वर्ग के आंकड़ों को देख-देखकर गर्व करता है कि उसके पास आने वाले कुछ दशकों तक नौजवान आबादी का बेहतर अनुपात रहेगा। लेकिन अगर इस अनुपात में आधा हिस्सा स्कूल छोड़े हुए बच्चों का रहेगा, तो क्या वह भी सचमुच गर्व के लायक बात रह जाएगी? दूसरी बात यह कि स्कूल छोड़ी हुई आधी आबादी जिस तरह के छोटे-मोटे, या सबसे संगीन जुर्म करने में लगी हुई है, वह भी बहुत बड़ी फिक्र की बात है।
हम अपने इस कॉलम में बार-बार इस बात पर जोर डालते हैं कि सभी विश्वविद्यालयों में मनोवैज्ञानिक परामर्श का कोर्स बड़े पैमाने पर बढ़ाना चाहिए। जिस तरह स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को बीएड करना अनिवार्य रहता है, उस तरह की अनिवार्यता के बिना भी मनोवैज्ञानिक परामर्श के डिग्री कोर्स को एक अतिरिक्त योग्यता मानना चाहिए। और इसके लिए सरकार अपनी स्कूलों में (सबसे अधिक ड्रॉप आउट बच्चे सरकारी स्कूलों के ही रहते हैं) ऐसे परामर्शदाता-शिक्षकों को एक वेतनवृद्धि भी दे सकती है, अगर वे स्कूली बच्चों, और उनके परिवार के बाकी लोगों की उलझन सुलझाने, और उन्हें परामर्श देने का काम करें। हम मनोवैज्ञानिक परामर्श का एक नया ढांचा शुरू करने के बजाय बच्चों के स्तर पर इस मदद को मुहैया कराने के लिए स्कूली शिक्षकों के बीच से ही ऐसे रूख और रूझान वाले शिक्षक-शिक्षिकाओं को छांटकर, उन्हें ऐसा कोर्स करने के लिए संवैतनिक अवकाश देकर परामर्श का एक ढांचा विकसित करने का सुझाव दे रहे हैं। मानसिक उलझन से मुक्त बच्चे ही देश का बेहतर भविष्य बना सकते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ही लाखों स्कूली शिक्षक हैं। आबादी के साथ ऐसा ही अनुपात पूरे देश में होगा, कुछ राज्यों में इससे बेहतर भी होगा। स्कूलों में अलग-अलग विषयों के शिक्षक होते हैं, खेल शिक्षक भी होते हैं, और इन्हीं शिक्षकों में से जो मनोवैज्ञानिक-परामर्श की पढ़ाई करना चाहें, उन्हें अलग-अलग जिलों की तैनाती के हिसाब से छांटकर प्रदेश को दो बरस में एक बेहतर जगह बनाया जा सकता है।
आज भारत जैसे देश इस समस्या से भी जूझ रहे हैं कि इसके विश्वविद्यालयों के कोर्स का जिंदगी की जमीनी जरूरतों से लेना-देना बहुत कम रह गया है। कुछ ही दिन पहले हमने यहीं पर चीन के विश्वविद्यालयों पर लिखा था कि किस तरह वहां दस-बारह हजार के करीब कोर्स बंद किए गए हैं, और हजारों नए कोर्स चालू भी किए गए हैं जिनकी आज समाज और कारोबार को जरूरत है। हमारा मानना है कि हर प्रदेश को अपने विश्वविद्यालयों से फॉसिल (जीवाश्म) बन चुके पाठ्यक्रम बंद करना चाहिए, और उनकी जगह ऐसे नए पाठ्यक्रम शुरू करना चाहिए जिनकी जरूरत सरकारी ढांचे के भीतर दसियों हजार की संख्या में हो, और सरकार से परे भी समाज को भी जैसे परामर्शदाताओं की जरूरत हो। आज बच्चे, और बड़े, सभी उम्र के लोग तरह-तरह के नैतिक या अनैतिक समझे जाने वाले कामों में लगे दिखते हैं, वैध और अवैध समझे जाने वाले संबंधों में उलझे रहते हैं। इसके अलावा परिवारों के भीतर, दोस्ती में, या हर उम्र के प्रेमसंबंधों में बड़े-बड़े जुर्म हो रहे हैं, और देश में कोई ऐसे जुर्म नहीं रह गए हैं, जिनसे नाबालिग जुड़े हुए न हों। इसलिए स्कूली स्तर पर मानसिक परामर्शदाता अगर उपलब्ध हो सकें, तो उससे गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों का अधिक भला होगा, और इन्हीं तबकों के बच्चे अधिक समस्याग्रस्त भी रहते हैं, और परामर्श की सुविधा से वंचित भी रहते हैं। यह काम सरकार को ही अपने विश्वविद्यालयों को लगाकर, और अपने शिक्षकों की फौज का उत्साह बढ़ाकर करना होगा। परामर्श-पाठ्यक्रमों की जितनी क्षमता होगी, उससे बहुत अधिक शिक्षक-शिक्षिकाएं उनमें दिलचस्पी लेने वाले रहेंगे, ऐसा हमारा भरोसा है। आज समस्याग्रस्त जितने भी बच्चे हैं, वे कुल मिलाकर तो सरकार के लिए ही समस्या बनते हैं, वे जुर्म में फंसते हैं तो भी, और अगर वे अनुत्पादक रह जाते हैं तो भी। इसलिए सरकार को नई पीढ़ी को पटरी से उतरने से बचाने के लिए मार्गदर्शकों की तरह परामर्शदाताओं को तैयार करना चाहिए, और इसके लिए हमें स्कूली शिक्षा-व्यवस्था से बेहतर और कोई जगह नहीं दिख रही है। अभी जिस बच्चे के दूसरे बच्चों को काटने की घटना से हमें यह लिखने की जरूरत लगी, हो सकता है कि वह बच्चा भी किसी मानसिक उलझन का शिकार हो, और अगर स्कूल में परामर्श हासिल रहता, तो वह इस दर्जे की हिंसा में न उलझा रहता।
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