19 जुलाई 2026

दुनिया को अलग-अलग कई पहलुओं से देखा जा सकता है। अब विज्ञान के नजरिए से देखें तो कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक हवा में मौजूद पीएम-2.5 और पीएम-10 जैसे हवा में तैरते प्रदूषण के कण न केवल सांस के रास्ते बदन में घुसते हैं, बल्कि दिमाग तक पहुंचकर पार्किंसंस जैसे गंभीर स्नायुरोग का खतरा भी बढ़ा सकते हैं। इस वैज्ञानिक रिसर्च में पाया गया है कि किस आकार के प्रदूषण-कण कितने बढऩे से पार्किंसंस का खतरा कितना बढ़ता है। दिमाग और शरीर के नियंत्रण को बहुत बुरी तरह प्रभावित करने वाली पार्किसंस के मरीज बढ़ते चल रहे हैं, बुढ़ापे के साथ बढऩे वाली इस बीमारी की बढ़ोत्तरी की एक वजह यह भी हो सकती है कि इंसानों की औसत उम्र बढ़ रही है, और दुनिया की आबादी में बूढ़ों का अनुपात। लेकिन अगर प्रदूषण की वजह से इस बीमारी का खतरा बढऩा इस वैज्ञानिक शोध में स्थापित हुआ है, तो इसका मतलब यह होगा कि इसके मरीज संख्या में भी बढ़ेंगे, और कम बुढ़ापे से शुरू होकर लंबे बुढ़ापे तक यह बीमारी प्रभावित करेगी। हम इस पर एक लंबी रिपोर्ट अपने अखबार में दे रहे हैं, इसलिए यहां पर इतनी चर्चा काफी है।
अब एक दूसरी चर्चा की जाए। एक ब्रिटिश अमरीकी अध्ययन से यह पता लगा है कि एआई के अधिक इस्तेमाल से दिमाग के कमजोर होने का एक खतरा खड़ा हो रहा है। मानव शरीर का विकास यह बताता है कि जब शरीर के किसी हिस्से का इस्तेमाल घटने लगता है, तो कुछ सौ या हजार पीढिय़ों के बाद उन हिस्सों का विकास ही कम होने लगता है। लेकिन एआई के इस्तेमाल से बुद्धि के मंद होने का सिलसिला बिना अगली पीढिय़ों को देखे, इसी पीढ़ी में दिख रहा है, उन्हीं लोगों में दिख रहा है कि लाखों-बरसों के इतिहास में इंसानी दिमाग ने जिस जटिल तरीके से विकास पाया है, अब एआई का इस्तेमाल अचानक उस विकास के कुछ या काफी हिस्सों को गैरजरूरी साबित कर रहा है। इंसान का दिमाग वैसे तो बहुत लचीला है, लेकिन वह इतना लचीला भी नहीं है कि एक-दो बरस के भीतर उसे एकदम से गैरजरूरी साबित कर दिया जाए, और वह हीनभावना में न आए। अब तक दिमाग की खुदकुशी जैसी कोई बात तो सामने नहीं आई है, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि इंसानी दिमाग के कुछ सबसे जटिल कामकाज को अगर एआई औजारों को दे दिया जाता है, तो एकदम से बेकार और बेरोजगार सरीखे हो गए दिमाग से और क्या उम्मीद की जा सकती है? पिछले बरस अमरीका के विख्यात विश्वविद्यालय, एमआईटी के एक शोध का नतीजा था कि जो छात्र लेख लिखने के लिए जनरेटिव एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनकी आलोचनात्मक सोच की क्षमता घट रही है। एक और शोध ने यह पाया था कि एआई दिमाग के साथ जो कर रहा है उसे संज्ञानात्मक बोझ हटाना, या संज्ञानात्मक समर्पण करना कहा जा सकता है, एक ऐसी स्थिति जिसमें दिमाग काम करना कम, या बंद कर देता है।
अब इन दो अलग-अलग बातों को देखें, तो दिमाग पर पडऩे वाला एक असर तो शारीरिक है जो कि प्रदूषण से पैदा हो रहा है। लेकिन दूसरा असर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसी सहूलियत को इस्तेमाल करने से हो रहा है। एक तीसरा पहलू हमें और दिखता है, सोशल मीडिया के दिल-दिमाग पर असर का। आज अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प यह दावा कर रहे हैं कि पिछले चुनाव में चीन ने घुसपैठ करके, या खरीदकर दसियों लाख अमरीकी वोटरों की जानकारी चुरा ली थी, और चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की थी। लोगों को याद होगा कि टिक-टॉक जैसे नौजवान पीढ़ी के बीच एक सबसे लोकप्रिय मोबाइल एप्लीकेशन को भारत ने बरसों पहले बंद कर दिया, और अमरीका ने ट्रम्प की अगुवाई में इसके मालिकाना ढांचे को बदलने का काम किया है। दुनिया के कई देशों की आशंका है कि टिक-टॉक में लोग अपने जो वीडियो डालते हैं, या जो जानकारी देते हैं, उसका विश्लेषण करके चीन में बैठे इस एप्लीकेशन के सर्वर कई की जानकारियां निकाल सकते हैं, और फिर चुनिंदा लोगों, या तबकों को प्रभावित करने के लिए टिक-टॉक के एल्गोरिदम में ऐसा फेरबदल कर सकते हैं कि उन लोगों को कुछ चुनिंदा किस्म की सामग्री अधिक दिखे, या कुछ किस्म की सामग्री न दिखे।
अब इन तीन अलग-अलग मामलों की चर्चा करने के बाद हम तीनों को जोडक़र जब देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि प्रदूषण से प्रभावित दिमाग जब एआई के इस्तेमाल से मंद भी होने लगेगा, और उसके बाद दुनिया भर के एआई-सोशल मीडिया आधारित कारोबार, और सरकार लोगों के दिमाग पर कब्जा करने की कोशिश करेंगे, तो थकी हुई मंदबुद्धि को ब्रेनवॉश करना अधिक आसान होगा। यह निष्कर्ष किसी एक शोध का नहीं है, बल्कि अलग-अलग शोध के नतीजों को जोडक़र मैं खुद यह सोच रहा हूं कि जब दिमाग की मोमबत्ती को दोनों सिरों से जला दिया गया है, तो उसका दुगुनी रफ्तार से खत्म होना भी तय हो गया है। इसके साथ-साथ अब तो सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने ब्रेनवॉशिंग के लिए इस मोमबत्ती को बीच से भी जलाना शुरू कर दिया है। यह सिलसिला एक मोमबत्ती को पिघले मोम, और जलकर बने प्रदूषण में बड़ी तेजी से बदल देगा। ऐसा ही कुछ दिमाग के साथ भी हो रहा है।
प्रदूषण के नैनो प्लास्टिक कण बदन के खून में आकर दिमाग तक पहुंचने वाले खून में जाकर वहां थक्के जमा दे रहे हैं। बदन के भीतर गर्भस्थ भ्रूण के बदन के भीतर भी नैनो प्लास्टिक के कण मिल रहे हैं, इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि प्लास्टिक प्रदूषण कितने गहरे पैठ चुका है। अब बाकी प्रदूषण स्नायुतंत्र को प्रभावित करके लोगों को पार्किसंस जैसी बीमारी वक्त के पहले, औसत से अधिक, और अधिक लंबे वक्त तक दे रहा है। इंसान खुद एआई के इस्तेमाल से दिमाग के कई तरह के कामकाज को बेरोजगार कर रहे हैं। और कल तक के अक्लमंद से आज मंदअक्ल हो चुके इंसानों के दिमाग पर सोशल मीडिया, और दूसरे एप्लीकेशनों वाले कारोबार और सरकार का अलग-अलग, और मिलाजुला भी, हमला हो रहा है। क्या इतनी विकराल और विपरीत स्थितियों से जूझते हुए इंसान का दिमाग इनसे उबर जाएगा, या इनके सामने जवाब दे देगा? ये सब कुछ कठिन सवाल है क्योंकि लाखों बरस के विकासक्रम वाले इंसानी दिमाग पर मानो यह तीन-चारतरफा सुनामी आई हुई है।
क्या भारत के अंडमान, या दुनिया के अमेजान के जंगलों जैसे दूसरे अछूते समुदाय अगले दशकों में कुछ अधिक शोध का सामान बनेंगे, क्योंकि वे प्रदूषण और एआई, और सोशल मीडिया एल्गोरिद्म सबसे परे हैं, और प्रदूषित दिमागों के मुकाबले ऐसे अछूते दिमाग कैसे अलग होंगे, क्या इसका कोई तुलनात्मक अध्ययन मुमकिन हो सकेगा? फिर हमारी ये कल्पनाएं भी उसी सरहद के भीतर हैं, जिस सरहद के पार एआई इंसानों से बेकाबू होकर अपनी मर्जी से काम करने लगेगा, उस दिन इंसानी दिमाग पर वह कैसा हमला करेगा, उस पर कैसा कब्जा करेगा, यह सोचना अभी हमारे लिए भी मुमकिन नहीं है। फिलहाल प्रदूषण, एआई के अतिउपयोग, और सोशल मीडिया के चंगुल, इन सबसे जितना-जितना बच सकें, उतना बच देखें। आगे-आगे देखें, होता है क्या।
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