सोनम वांगचुक को बचाना तो ठीक है, लेकिन सरकार को साख भी बचाना चाहिए

 18 जुलाई 2026  

 

दिल्ली पुलिस ने आज सुबह जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे पर्यावरणविद् आंदोलनकारी सोनम वांगचुक को उठाकर ले जाकर अस्पताल में भर्ती करवाया। भूख हड़ताल के 21 दिन हो चुके थे, उनका वजन 9 किलो से अधिक गिर चुका था, शरीर का कुछ अपूरणीय नुकसान होते चल रहा था, और ऐसे में जान पर खतरा देखते हुए उन्हें यह भूख हड़ताल जारी रखने देना सरकार की जिम्मेदारियों के खिलाफ जाता। आमतौर पर एक सीमा के बाद जब जान पर खतरे की बात आती है, तो आंदोलनकारी-अनशनकारी की मर्जी के खिलाफ भी अस्पताल में उन्हें जिंदा रखने के लिए मेडिकल कोशिशें आम बात हैं। आज की पुलिस कार्रवाई को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दल, और सामाजिक कार्यकर्ता तरह-तरह से विरोध कर रहे हैं, उनके विरोध की वजहें अलग-अलग हैं, लेकिन उनमें से किसी ने भी सोनम वांगचुक की जिंदगी पर छाए हुए खतरे को लेकर उनकी जिंदगी बचाने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं की थी। इसलिए अब यह मलाल कुछ अटपटा है कि सरकार ने उन्हें जबरिया उठाकर अस्पताल भेजा है। 

लोकतंत्र में आंदोलनकारियों, और सरकार, दोनों के पास कई लचीले रास्ते रहते हैं। भारत के इतिहास में बेमुद्दत, या आमरण अनशन पर बैठे लोगों में से अधिकतर लोगों को तो सरकार ने मान-मनौव्वल से बचा लिया, कई लोगों को बलपूर्वक ले जाकर अस्पताल में जिंदा रखा, मणिपुर की आंदोलनकारी इरोम शर्मिला का मामला तो दुनिया में सबसे अनोखा है जो शायद 16 बरस तक भूख हड़ताल पर रहीं, और जिंदा भी रहीं। गांधी से लेकर अभी कुछ बरस पहले गंगा बचाने के लिए भूख हड़ताल पर बैठे-बैठे गुजर गए एक बुजुर्ग प्राध्यापक तक बहुत से मामले रहे हैं, जिनमें केन्द्र सरकार, या अलग-अलग राज्य सरकारों का अलग-अलग रूख रहते आया है। 

अनशन कर रहे आंदोलनकारियों से निपटने का कोई एक फॉर्मूला देश या दुनिया में नहीं है, फिर भी यह माना जाता है कि किसी लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी सरकार को अपने देश में किसी शांतिप्रिय आंदोलनकारी को अनशन पर नहीं मरने देना चाहिए। यहीं पर आकर एक सवाल खड़ा होता है कि नीट और दूसरे इम्तिहानों की गड़बड़ी के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में सोनम वांगचुक शरीक हुए थे, और अपने गृहप्रदेश लेह-लद्दाख को लेकर भी उनकी कुछ मांगें थीं। इस आंदोलन की सबसे बड़ी मांग केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की थी, जो कि इम्तिहानों की गड़बड़ी के जिम्मेदार मंत्रालय के मंत्री हैं। लेकिन यही मांग देश की अधिकतर विपक्षी पार्टियां भी कर रही थीं, और सरकार के लिए विपक्ष और किसी आंदोलन की मांग पर अपने मंत्री को हटाना सहूलियत की बात नहीं थी। इम्तिहानों की गड़बडिय़ों के बाद सरकार खुद होकर किसी फेरबदल में इस मंत्री का विभाग बदल देती, तो वह एक अलग बात होती, लेकिन एक बार राजनीतिक और सार्वजनिक मांग हो जाने के बाद उसके सामने झुककर मंत्री का इस्तीफा लेना सरकार के लिए एक शर्मिंदगी भी होती, और फिर ऐसे में इस्तीफों की मांग का एक सिलसिला भी शुरू हो सकता था, इसलिए भी सरकारें ऐसे लोकतांत्रिक लचीलेपन से परहेज करती हैं। 

लेकिन इस मामले में सरकार ने आंदोलनकारियों से बातचीत का कोई भी रूख नहीं दिखाया। जबकि नीट परीक्षा की गड़बड़ी के चलते देश में करीब दो दर्जन बच्चे खुदकुशी कर चुके हैं, कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाने वाले कुछ मां-बाप भी सदमे में मर चुके हैं। ऐसे में भी इस आंदोलन को लेकर सरकार में लचीलापन शून्य था। कॉकरोच जनता पार्टी एक प्रतीकात्मक नाम है, वह कोई राजनीतिक दल तो है नहीं कि उससे बातचीत करने से सरकार कमजोर दिखती। हम तो लोकतंत्र में हमेशा ही बातचीत के हिमायती रहे हैं, और हमारा यह भी मानना है कि आतंकवादी हों, उग्रवादी हों, नक्सली हों, या कोई और, बातचीत की पहल लोकतांत्रिक सरकार को ही करनी चाहिए, क्योंकि संविधान ने उसी पर अधिक जिम्मेदारी डाली है, और उसे ही सारे अधिकार भी हैं। एक व्यापक जनहित के मुद्दों को लेकर अगर कोई भी लोकतांत्रिक-शांतिपूर्ण आंदोलन करते हैं, तो उसे अनदेखा करना तो बिल्कुल ही नहीं होना चाहिए, जो कि इस मामले में हुआ है। सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी के पास, या उनकी विचारधारा के लोगों के पास बातचीत शुरू करने के कई माध्यम हमेशा ही रहते हैं। छत्तीसगढ़ में ही दशकों से चली आ रही नक्सल हिंसा को केन्द्र और राज्य की भाजपा सरकारों ने बंदूकों के साथ-साथ बातचीत से भी निपटाया, सिर्फ बंदूकें सब कुछ नहीं सुलझा पाईं। इसलिए हमारा यह मानना है कि कॉकरोच और सोनम वांगचुक के इस आंदोलन को सुलझाने का एक सकारात्मक रूख सरकार को दिखाना चाहिए था। किसी बातचीत के बाद सुलह के किनारे पर पहुंचा जा सके, या नहीं, यह तो एक अलग बात रहती है, लेकिन सरकार एक शांतिपूर्ण आंदोलन से बात भी न करे, एक जायज मुद्दे के आंदोलन से बात भी न करे, यह तो जायज बात नहीं है। 

केन्द्र सरकार चाहे सिर्फ दिखावे के लिए, अगर बातचीत का लचीला रूख दिखाती, तो उससे उसका सम्मान ही बढ़ता। देश भर में इम्तिहानों की गड़बड़ी के भयानक जुर्म को लेकर जनता के बीच जो नाराजगी है, उसे सरकार को कम नहीं आंकना चाहिए। उस गड़बड़ी के लिए यही अकेला आंदोलन देश में चल रहा था। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक, अमरीका में पढ़ रहे नौजवान भारतीय छात्र की कोई लंबी छवि नहीं है, इसलिए सरकार उसे एक बार अनदेखा भी करती, तो भी चल जाता, लेकिन सोनम वांगचुक तो देश के एक स्थापित सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनके ऐसे अनशन पर भी सरकार ने बातचीत का कोई दिखावा तक अगर नहीं किया है, तो उसने अपनी छवि बचाने का एक मौका खो दिया है। अखबारों को ऐसी सुर्खियां तो मिल सकती हैं कि सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के 20वें दिन भी दस किलो वजन खो देने पर भी जान का खतरा आ जाने पर भी सरकार के माथे पर शिकन नहीं आई। लेकिन लोकतंत्र का इतिहास ऐसी बातों को सम्मान के साथ दर्ज नहीं करता है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ बरस पहले जब किसान आंदोलन हुआ था, तब भी सरकार की तरफ से कुछ लोग आंदोलनकारियों से बात करते थे, और आखिर में चट्टान की तरह खड़े हुए उस आंदोलन के सामने सरकार को झुकना पड़ा था, और तीन किसान कानून वापिस लेने पड़े थे। एक सरकार अगर अपने एक मंत्री के इस्तीफे की मांग वाले आंदोलन से नहीं जूझ पा रही है, तो इससे सरकार की मजबूती साबित नहीं होती, सरकार की कमजोरी ही साबित होती है। सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से उठाकर अस्पताल में भर्ती करा देने से मुद्दा खत्म नहीं हुआ है, और लोकतांत्रिक आंदोलन किसी जादुई जंतर-मंतर से खत्म नहीं होते हैं। सरकार की बुनियादी जिम्मेदारियों में यह भी शामिल रहता है कि वह देश-प्रदेश की लोकतांत्रिक-बेचैनी से जूझना जाने।

(Daily Chhattisgarh)   

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