19 जुलाई 2026
मुम्बई का एक वीडियो अभी हफ्ते भर पहले सोशल मीडिया, और खबरों में बुरी तरह छा गया, जब वहां के एक सरकारी अस्पताल पहुंचकर प्रदेश में सत्तारूढ़ शिंदे-शिवसेना के पार्षद रमेश म्हात्रे, और उनके साथियों ने तीन डॉक्टरों, नर्सों, और कर्मचारियों के साथ बुरी तरह मारपीट की। इस हमले में यह पार्षद ही सबसे बढ़-चढक़र हिंसक था। वीडियो में सब कुछ साफ था। पुलिस को डॉक्टरों और नर्सों की शिकायत पर मजबूरी में जुर्म दर्ज करना पड़ा, और पांच लोगों को गिरफ्तार करके अदालत में पेश करना पड़ा। अदालत ने इन्हें 24 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में भेजा था, लेकिन एक स्थानीय अदालत ने इस पार्षद को सेहत का हवाला देते हुए 50 हजार रूपए के मुचलके पर जमानत दे दी। इसके खिलाफ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और दूसरे डॉक्टर संगठनों ने जमकर विरोध किया। और मीडिया में यह विरोध चल ही रहा था कि बाम्बे हाईकोर्ट में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश, और एक दूसरे जज की बेंच ने शनिवार को खुद होकर एक विशेष सुनवाई की, और कहा कि वह समाचार पढक़र बहुत व्यथित और विचलित है। जजों ने कहा कि इस पार्षद, रमेश म्हात्रे के खिलाफ पहले भी आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत की दी जमानत को रद्द कर दिया, और आज इतवार की शाम पांच बजे तक पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने को कहा। अदालत ने डॉक्टर संगठनों की प्रस्तावित हड़ताल पर पुनर्विचार करने का अनुरोध भी किया।
न्यायपालिका के कई किस्म के पैमानों पर इस अदालती कार्रवाई को कुछ आसाधारण माना जा रहा है कि उसने सुओ मोटो (स्वत:) संज्ञान लेकर छुट्टी के दिन कोर्ट लगाया, और सत्तारूढ़ पार्टी के इस हिंसक पार्षद के खिलाफ एक कड़ा आदेश जारी किया। लेकिन यह बात बिल्कुल साफ है कि अदालत का यह रूख क्लोज सर्किट टीवी कैमरो की रिकॉर्डिंग से तय हो पाया। देश और दुनिया में आज बहुत सी ऐसी दूसरी घटनाएं सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की वजह से ही दर्ज हो पाती हैं, और उन पर कार्रवाई हो पाती है। अगर डॉक्टरों की यह शिकायत सिर्फ जुबानी होती, तो कुछ बयानों के मुकाबले हमलावरों के कुछ बयान तौलने में ही अदालत को बरसों लग गए रहते। इस तरह आज एक तकनीकी सहूलियत सत्ता जैसी बड़ी ताकत के सामने जुल्म के खिलाफ एक बचाव बनकर सामने आई है। और टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल जिस तरह खेल के मैदानों में भी हो रहा है, इस बार के विश्वकप में चिप लगे हुए फुटबॉल थे, और अगर फुटबॉल खिलाड़ी के बालों को भी छूते निकल गया, तो भी उसे उपकरण दर्ज कर रहे थे।
आज जब हमने इस विषय पर लिखना शुरू किया, तो हमारे दिमाग में सत्तारूढ़ गुंडों की हिंसा के खिलाफ लिखने की बात थी, लेकिन वह गुंडागर्दी तो देशभर में जगह-जगह होती ही रहती है। आज तो वह कटघरे तक इसलिए पहुंच पा रही है कि टेक्नॉलॉजी सुबूत जुटाते चल रही है। मतलब यह कि सैकड़ों बरस से लोकतंत्र में चली आ रही न्यायव्यवस्था की दशा और दिशा, इन दोनों को ही टेक्नॉलॉजी ने कुछ बरस के भीतर बदलकर रख दिया है। आज अमरीका जैसे विकसित देश में पुलिस अफसरों के लिए अनिवार्य किए गए यूनीफार्म-कैमरों से ही उनके खिलाफ सुबूत जुट जाते हैं। ऐसे बॉडी-कैम को लगाना बहुत किस्म के पुलिस-दस्तों के लिए अनिवार्य किया गया है। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने देश के हर थाने में निगरानी कैमरे लगाना अनिवार्य किया है, ताकि जनता, या आरोपियों के साथ किसी तरह की हिंसा के सुबूत दर्ज होते जाएं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में यह भी है कि थानों में 18 महीने की कैमरा-रिकॉर्डिंग संभालकर रखी जाए, जो कि राज्य सरकारों पर बड़ी भारी भी पड़ रही है, और कई लोगों का कहना है कि थाने के भीतर की किसी भी रिकॉर्डिंग को डेढ़ बरस बाद देखने का कोई काम भी नहीं पड़ता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट से बहस करने के बजाय राज्य सरकारें सीसीटीवी कैमरे लगा चुकी हैं, और अगले निर्देश के बाद उनमें बढ़ोत्तरी भी की जा रही है। केन्द्र सरकार भी इस योजना में राज्यों की मदद कर रही है। कुल मिलाकर जिन जगहों को हिरासत-हिंसा, हिरासत-हत्या जैसे खतरों की जगह माना जाता था, उन जगहों के सुबूत किसी घटना के हुए बिना भी दर्ज किए जा रहे हैं, जिस तरह कई विकसित देशों में पुलिस-पोशाक पर लगे कैमरे रिकॉर्ड करते हैं, और अपने कंट्रोलरूम को रिकॉर्डिंग का जीवंत प्रसारण भी करते हैं। लेकिन सिर्फ पुलिस या सरकार ही ऐसा करती हों, जरूरी नहीं है, अब लोग अपनी निजी कार में भी मामूली से खर्च से ऐसे कैमरे लगा सकते हैं जो चारों तरफ की रिकॉर्डिंग करते हैं, और सुबूत तो रहते ही हैं, जरूरत पडऩे पर वे किसी घटना के बीच से भी पुलिस को वीडियो भेज सकते हैं।
टेक्नॉलॉजी की सहूलियतों की चर्चा करते हुए अब हिन्दुस्तानी शहरों में भी गली-गली तक लगने वाले कैमरों की चर्चा जरूरी है, जो कि आज किसी भी घटना या वारदात के होने पर पुलिस को आसानी से मिल जाने वाला पुख्ता सुबूत रहते हैं। लोगों को किसी दुर्घटना, या वारदात के वक्त यह याद नहीं रहता कि वे किसी कैमरे की जद में हो सकते हैं, लेकिन जांच या कार्रवाई की नौबत आने पर पुलिस की नजर गवाहों के चेहरों से पहले भी, इमारतों और खम्भों पर लगे हुए कैमरों पर जाती है कि घटना-दुर्घटना किस कैमरे पर दर्ज हुई होगी। टेक्नॉलॉजी ने यह साबित किया है कि पुलिस की संख्या को कितना भी बढ़ाकर निगरानी और सुबूत, ये दोनों काम एक साथ नहीं किए जा सकते थे, लेकिन ये अब आसानी से हो रहे हैं। पहली नजर में लगता है कि 24 घंटों के ऐसे, मैं भी चौकीदार, किस्म के कैमरों के बाद अब इंसानी-पुलिस की जरूरत घट गई होगी, लेकिन पुलिस के अंदरुनी जानकार लोगों का कहना है कि कुछ दशक पहले जुर्म करने के लिए मुजरिम के जाना पड़ता था, आज लोग देश और दुनिया के किसी भी कोने में बैठे हुए फोन और इंटरनेट से बड़े-बड़े जुर्म करते हैं, और उनको पकडऩे के लिए पुलिस को कम से कम पूरे देश में तो जाना ही पड़ता है। इसलिए एक तरफ निगरानी टेक्नॉलॉजी ने पुलिस के काम को कुछ हल्का किया है, तो दूसरी तरफ जुर्म के हथियार बन गए फोन-कम्प्यूटर ने पुलिस की भाग-दौड़ पूरे देश तक फैला दी है। एक टेक्नॉलॉजी की वजह से जुर्म का जो बोझ पुलिस पर बढ़ा है, अगर उस बोझ को निगरानी कैमरे, मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स, मोबाइल फोन की लोकेशन जैसी चीजें हल्का न करतीं, तो पुलिस तो साइबर क्राइम के इस बोझतले दम ही तोड़ देती।
कैसा दिलचस्प नजारा है, टेक्नॉलॉजी का एक हिस्सा साइबर जुर्म को सैकड़ों और हजारों गुना बढ़ा रहा है, और दूसरी तरफ कुछ दूसरी टेक्नॉलॉजी कई किस्म के जुर्म में पुलिस के काम को बड़ा हल्का भी कर रही है। पुलिस फोर्स का अधिकांश हिस्सा जिस पीढ़ी का है, वह बहुत साइबर-साक्षर नहीं है, इसलिए यह नए किस्म की प्रौढ़ शिक्षा अपने आपमें एक अलग चुनौती है। अब हम आज के मुद्दे को बहुत अधिक जटिल करना नहीं चाहते, वरना पुलिस के कामकाज के इस चल रहे तकनीकी-कायाकल्प के साथ देश में अभी लागू हुए नए कानूनों को समझना, और उन पर अमल करना एक बहुत बड़ी चुनौती है, शायद सबसे ही बड़ी। अगर पुलिस जांच में नए कानूनों में बताई गई प्रक्रिया के पालन में जरा भी कमजोरी रहेगी, तो अदालत में वे मामले खड़े ही नहीं हो पाएंगे। इस तरह पुलिस नई तकनीक और नए कानून, इन दोनों के झंझावात से गुजर रही है!
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