01 दिसंबर 2011
संपादकीय
लालबत्ती की लालसा 21वीं सदी का मनुवाद
सांसदों ने मांग की है कि उन्हें लालबत्ती का विशेषाधिकार दिया जाए। इसके लिए लोकसभा में प्रस्ताव आ चुका है और कोई हैरानी नहीं है कि देश के कानून निर्माता अपने सिरों पर सुर्खाब के पर की तरह यह सजावट चिपका लें। यह सोच अपने-आपमें एक बड़ा सुबूत है कि सांसद जनता से किस कदर दूर हो चुके हैं और कितना और अधिक दूर होना चाहते हैं। देश के बहुत से राज्यों में मंत्रियों को लेकर लालबत्तियों की मारामारी चलती है और मंत्री का दर्जा पाए हुए लोग भी लालबत्ती के लिए भिड़े रहते हैं। इसके बाद छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जिला पंचायत अध्यक्ष और महापौर जैसे काम संभालने वाले लोगों को भी लालबत्ती दी गई है। अफसरों की पीली बत्तियां जोगी राज में हटाई गई थीं लेकिन बाद में वे फिर आ गईं। अफसरों और जजों की बात तो समझ में आती है कि उनका अपने कुर्सी पर बने रहना जनभावनाओं पर टिका हुआ नहीं होता और वे कामकाजी उम्र पूरी होने तक कुर्सी पर रहते ही हैं। दूसरी तरफ जिन सांसदों को हर पांच बरस में जनता के सामने जाना है, वे भी लालबत्ती और सायरन से सड़क पर आसपास चलती जनता को धकेलकर दूर फेंक देना चाहते हैं ताकि उनकी रफ्तार तेज रहे और आम जनता से उनका दर्जा बिल्कुल अलग दिखे।
लोकतंत्र के भीतर इस तरह की सोच पर हमें तरस आता है और शर्म भी आती है कि देश की जनता ऐसे प्रतिनिधियों को ढोने के लिए बेबस है जो कि अपने-आपको जनता से बिल्कुल ही अलग, बिल्कुल ही ऊपर देखना चाहते हैं। यह सोच हमें मनुवादी जिंदगी जीते भारत के उस हिस्से की लगती है जहां पर कि अपने-आपको ऊंची जाति का मानने वाले लोग कुछ दूसरों को नीची जाति का मानते हुए उन पर जुल्म करते हैं, उनके दूल्हों को घोड़ों पर नहीं चढऩे देते, उन्हें जूते पहनकर नहीं चलने देते और गांवों में उनको ऐसी जगहों पर ही बस्तियां बनाने देते हैं जहां पर तथाकथित ऊंची जात के गुरूर वाले लोगों की बस्तियों से निकली नालियों का पानी बहकर पहुंचता हो। आज निर्वाचित सांसद अगर यह चाहते हैं कि देश की आम जनता की बस्तियां इतनी ढलान पर बसी हुई हों कि संसद की नालियों का पानी उनकी तरफ जाए, तो यह 21वीं सदी का नवमनुवाद छोड़ और कुछ नहीं है।
यह बात हमारी समझ से पूरी तरह परे है कि एक सांसद को जनता से इस कदर कटने की जरूरत क्या है, वह जनता के मन में अपने लिए नफरत खड़ी करने से बिना डरे कैसे रहता है, और लोकतंत्र के भीतर सत्ता-सवर्णों का एक नया दर्जा कैसे बनाया जा सकता है? यह एक भयानक हालत है जिसके पीछे सत्ता की अंधी ताकत से उपजी बददिमागी है और जो देश के भीतर राजा और प्रजा जैसे दो अलोकतांत्रिक और सामंती फर्क वाले दर्जे खड़े कर रही है। हमें उन जजों और अफसरों पर भी तरस आता है जो कि लालबत्ती जलाकर या सायरन बजाते हुए या पायलट गाड़ी सामने-सामने चलवाकर जनता के बीच से आते-जाते हैं। हम इसे सुविधा नहीं एक आतंक मानते हैं और उसका कोई तर्क हमें नहीं दिखता सिवाय इसके कि सत्ता पर काबिज लोग धीरे-धीरे करके अपने लिए सुविधाएं और खास अधिकार जुटाते चलते हैं। इस पर रोक न लगे इसलिए ऐसे तमाम हक सत्ता पर बैठे लोग, संसद को चला रहे लोग जजों को भी देते चलते हैं, वरना बड़ी अदालत का एक जज क्यों सायरन बजाते हुए कहीं आए-जाए? सड़क पर हड़बड़ी की जरूरत तो आग बुझाने जाती दमकल, मरीज को या घायल को लेकर जाती एम्बुलेंस, किसी अपराध को रोकने या अपराधी को तलाशने के लिए जाती पुलिस को ही पड़ सकती है। जजों, मंत्रियों, अफसरों, सांसदों या संवैधानिक पदों पर बैठे हुए दूसरे लोगों की जिंदगी में ऐसी कौन सी हड़बड़ी है जो कि रोज मजदूरी करने आते-जाते, सड़क से गुजरते किसी बूढ़े या कमजोर इंसान के हक को कुलचते हुए भी जरूरी है? साइकिल पर जाते हुए मजदूरों की जिंदगी की जरूरत, लालबत्ती और सायरन से लैस जिंदगियों से कम क्यों आंकी जाती है? एक मंत्री के लिए मंत्रालय या बंगले पहुंचना, रफ्तार से पहुंचना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी स्कूल जाती एक बच्ची का समय पर पहुंचना है। आम लोगों को रोककर खास लोगों को लालबत्ती, सायरन, पायलट गाड़ी के सहारे पहले आगे निकालना, चौराहों पर लालबत्ती से छूट देना पूरी तरह सामंतवाद है और इसकी कोई जगह लोकतंत्र में नहीं होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने एक मिसाल पेश की है, वे अपनी छोटी सी निजी कार में चलती हैं और हर चौराहे की लालबत्ती पर रूकते हुए जाती हैं। यही वजह है कि वे जनता से जुड़ी हुई हैं और भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप से बचकर, सीमित खर्च में वे चुनाव में ऐसी ऐतिहासिक जीत पा सकी हैं। हम उस दिन को शर्मनाक मानेंगे जब वामपंथियों के रहते हुए, ममता के सांसदों के रहते हुए संसद में लालबत्तियां बंटेंंगी और 21वीं सदी के मनुवाद में एक अध्याय और जुड़ेगा।
संपादकीय
लालबत्ती की लालसा 21वीं सदी का मनुवाद
सांसदों ने मांग की है कि उन्हें लालबत्ती का विशेषाधिकार दिया जाए। इसके लिए लोकसभा में प्रस्ताव आ चुका है और कोई हैरानी नहीं है कि देश के कानून निर्माता अपने सिरों पर सुर्खाब के पर की तरह यह सजावट चिपका लें। यह सोच अपने-आपमें एक बड़ा सुबूत है कि सांसद जनता से किस कदर दूर हो चुके हैं और कितना और अधिक दूर होना चाहते हैं। देश के बहुत से राज्यों में मंत्रियों को लेकर लालबत्तियों की मारामारी चलती है और मंत्री का दर्जा पाए हुए लोग भी लालबत्ती के लिए भिड़े रहते हैं। इसके बाद छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जिला पंचायत अध्यक्ष और महापौर जैसे काम संभालने वाले लोगों को भी लालबत्ती दी गई है। अफसरों की पीली बत्तियां जोगी राज में हटाई गई थीं लेकिन बाद में वे फिर आ गईं। अफसरों और जजों की बात तो समझ में आती है कि उनका अपने कुर्सी पर बने रहना जनभावनाओं पर टिका हुआ नहीं होता और वे कामकाजी उम्र पूरी होने तक कुर्सी पर रहते ही हैं। दूसरी तरफ जिन सांसदों को हर पांच बरस में जनता के सामने जाना है, वे भी लालबत्ती और सायरन से सड़क पर आसपास चलती जनता को धकेलकर दूर फेंक देना चाहते हैं ताकि उनकी रफ्तार तेज रहे और आम जनता से उनका दर्जा बिल्कुल अलग दिखे।
लोकतंत्र के भीतर इस तरह की सोच पर हमें तरस आता है और शर्म भी आती है कि देश की जनता ऐसे प्रतिनिधियों को ढोने के लिए बेबस है जो कि अपने-आपको जनता से बिल्कुल ही अलग, बिल्कुल ही ऊपर देखना चाहते हैं। यह सोच हमें मनुवादी जिंदगी जीते भारत के उस हिस्से की लगती है जहां पर कि अपने-आपको ऊंची जाति का मानने वाले लोग कुछ दूसरों को नीची जाति का मानते हुए उन पर जुल्म करते हैं, उनके दूल्हों को घोड़ों पर नहीं चढऩे देते, उन्हें जूते पहनकर नहीं चलने देते और गांवों में उनको ऐसी जगहों पर ही बस्तियां बनाने देते हैं जहां पर तथाकथित ऊंची जात के गुरूर वाले लोगों की बस्तियों से निकली नालियों का पानी बहकर पहुंचता हो। आज निर्वाचित सांसद अगर यह चाहते हैं कि देश की आम जनता की बस्तियां इतनी ढलान पर बसी हुई हों कि संसद की नालियों का पानी उनकी तरफ जाए, तो यह 21वीं सदी का नवमनुवाद छोड़ और कुछ नहीं है।
यह बात हमारी समझ से पूरी तरह परे है कि एक सांसद को जनता से इस कदर कटने की जरूरत क्या है, वह जनता के मन में अपने लिए नफरत खड़ी करने से बिना डरे कैसे रहता है, और लोकतंत्र के भीतर सत्ता-सवर्णों का एक नया दर्जा कैसे बनाया जा सकता है? यह एक भयानक हालत है जिसके पीछे सत्ता की अंधी ताकत से उपजी बददिमागी है और जो देश के भीतर राजा और प्रजा जैसे दो अलोकतांत्रिक और सामंती फर्क वाले दर्जे खड़े कर रही है। हमें उन जजों और अफसरों पर भी तरस आता है जो कि लालबत्ती जलाकर या सायरन बजाते हुए या पायलट गाड़ी सामने-सामने चलवाकर जनता के बीच से आते-जाते हैं। हम इसे सुविधा नहीं एक आतंक मानते हैं और उसका कोई तर्क हमें नहीं दिखता सिवाय इसके कि सत्ता पर काबिज लोग धीरे-धीरे करके अपने लिए सुविधाएं और खास अधिकार जुटाते चलते हैं। इस पर रोक न लगे इसलिए ऐसे तमाम हक सत्ता पर बैठे लोग, संसद को चला रहे लोग जजों को भी देते चलते हैं, वरना बड़ी अदालत का एक जज क्यों सायरन बजाते हुए कहीं आए-जाए? सड़क पर हड़बड़ी की जरूरत तो आग बुझाने जाती दमकल, मरीज को या घायल को लेकर जाती एम्बुलेंस, किसी अपराध को रोकने या अपराधी को तलाशने के लिए जाती पुलिस को ही पड़ सकती है। जजों, मंत्रियों, अफसरों, सांसदों या संवैधानिक पदों पर बैठे हुए दूसरे लोगों की जिंदगी में ऐसी कौन सी हड़बड़ी है जो कि रोज मजदूरी करने आते-जाते, सड़क से गुजरते किसी बूढ़े या कमजोर इंसान के हक को कुलचते हुए भी जरूरी है? साइकिल पर जाते हुए मजदूरों की जिंदगी की जरूरत, लालबत्ती और सायरन से लैस जिंदगियों से कम क्यों आंकी जाती है? एक मंत्री के लिए मंत्रालय या बंगले पहुंचना, रफ्तार से पहुंचना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी स्कूल जाती एक बच्ची का समय पर पहुंचना है। आम लोगों को रोककर खास लोगों को लालबत्ती, सायरन, पायलट गाड़ी के सहारे पहले आगे निकालना, चौराहों पर लालबत्ती से छूट देना पूरी तरह सामंतवाद है और इसकी कोई जगह लोकतंत्र में नहीं होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने एक मिसाल पेश की है, वे अपनी छोटी सी निजी कार में चलती हैं और हर चौराहे की लालबत्ती पर रूकते हुए जाती हैं। यही वजह है कि वे जनता से जुड़ी हुई हैं और भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप से बचकर, सीमित खर्च में वे चुनाव में ऐसी ऐतिहासिक जीत पा सकी हैं। हम उस दिन को शर्मनाक मानेंगे जब वामपंथियों के रहते हुए, ममता के सांसदों के रहते हुए संसद में लालबत्तियां बंटेंंगी और 21वीं सदी के मनुवाद में एक अध्याय और जुड़ेगा।
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