अक्ल की जगह कैमरा-माईक

18 दिसंबर 2011
संपादकीय
अक्ल की जगह कैमरा-माईक
राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बहुत सी बातें मीडिया में रोज ऐसी आती हैं जिन्हें देख-सुनकर, पढ़कर आम समझ रखने वाले लोग भी यह अंदाज लगा पाते हैं कि मामले में कितना वजन है। फिर जिन लोगों का भरोसा एक प्राकृतिक न्याय पर रहता है और जो लोग तर्कसंगत और न्यायसंगत बात करने और सुनने जितनी समझ रखते हैं वे लाईनों के बीच का भी न लिखा हुआ पढ़ लेते हैं जो कि आमतौर पर बयान देने वालों की नीयत रहती है और छापने या दिखाने वालों की हड़बड़ी रहती है। हमें अधिक हैरानी इस बात पर होती है कि बड़े-बड़े दिग्गज अखबारनवीस या टेलीविजन पत्रकार लोगों की कही हुई भारी सनसनीखेज बातों को उसी अंदाज में लिखकर या रिकॉर्ड करके अपने पाठकों और दर्शकों के सामने पेश कर देते हैं जिस अंदाज में डिक्टेशन लेने वाले एक स्टेनोग्राफर से उम्मीद की जाती है। अगर काम ऐसे ही करना है तो रिपोर्टर की महंगी तनख्वाह के बजाय बहुत कम तनख्वाह पर स्टेनोग्राफर मिल सकते हैं जो कि डिक्टेशन लेने में चूक भी नहीं करेंगे। एक वक्त जब टीवी के कैमरे नहीं रहते थे, तो अखबारों के लोग भी अधिक मेहनत करते थे क्योंकि उन्हें शब्दों से ही सब कुछ पेश करना होता था। अब वह गंभीरता कम होते-होते खत्म सी हो गई है और आज ऐसा सोचने और इस मुद्दे पर लिखने के हमारे पास कुछ ठोस कारण हैं।
आज हम यहां अन्ना हजारे से बात की शुरूआत कर रहे हैं लेकिन हम उनके बारे में कुछ लिखना नहीं चाह रहे, हम मीडिया के बारे में लिखना चाह रहे हैं। पिछले कई महीनों से लगातार अन्ना हजारे यह बात कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो ठीक हैं लेकिन उन पर काबू रखने वाला रिमोट कंट्रोल खराब है। अभी कई हफ्तों से वे राहुल गांधी के बारे में कह रहे हैं कि लोकपाल बिल में फेरबदल राहुल गांधी की दखल से करके उसे कमजोर किया गया है। यह कहते हुए वे सोनिया के घर के बाहर धरने की बात भी कह रहे हैं। कुछ महीने पहले वे कर्नाटक की राजधानी बेंगलूरू गए थे और वहां उस वक्त तक जेल न गए हुए भाजपाई मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को पूरी तरह अनदेखा करते हुए जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट को पूरी तरह अनदेखा करते हुए सिर्फ यूपीए और कांगे्रस पर हमला करते हुए वे लौट आए थे। जस्टिस हेगड़े अन्ना के साथ के ही लोकपाल मसौदा कमेटी के सदस्य थे और उनकी जांच रिपोर्ट के आधार पर इस मुख्यमंत्री को हटना पड़ा था और जेल जाना पड़ा था। हम अन्ना हजारे के बारे में आज कुछ भी कहना नहीं चाहते लेकिन किसी व्यक्ति, खासकर जो व्यक्ति आदर्श की कुतुबमीनार को एफिल टॉवर की ऊंचाई तक ले जाना चाह रहा हो, उससे कुछ सवाल करने की जिम्मेदारी मीडिया की बनती है या नहीं? वे अगर बिना किसी बुनियाद के किसी को रिमोट कंट्रोल कहते हैं, किसी को लोकपाल में दखल देने वाला कहते हैं, कल यह कहते हैं कि लोकपाल होता तो यह चिदंबरम जेल में होता, तो ऐसी बातों पर उनकी रिकॉर्डिंग करने वाले मीडिया के लोग उनसे उनके इन आरोपों की बुनियाद क्यों नहीं पूछते? हमें देश के किसी भी चैनल पर और किसी भी अखबार में बेंगलूरू में अन्ना हजारे से पूछे गए ऐसे किसी सवाल को देखना या पढऩा नसीब नहीं हुआ। एक व्यक्ति अगर आत्ममुग्ध, आत्मकेंद्रित, अहंकारी और महत्वोन्मादी होकर रात-दिन बेबुनियाद आरोप लगा रहा है तो हमें यह लगता है कि लोकतंत्र के इस नए अंदाज के सामने क्या मीडिया अपने-आपको भी पेश करना चाहेगा? काम के बाद मीडिया के जो लोग शराब पीते हैं, क्या वे लोग अपने-आपको अन्ना के कोड़ों के सामने खड़ा करेंगे? क्या जिन लोगों के चैनल धर्म के अलावा कुछ दूसरी बातें भी दिखाते हैं, उन सबको अन्नाराज के गांव में बंद हो जाना पसंद होगा?
लोगों की आशंकाएं या उनकी बदनीयत अगर ज्यों की त्यों खबर बन रही है क्योंकि वह टीवी समाचारों की जरूरत के मुताबिक पांच-दस सेकंड के एक टुकड़े में आपत्तिजनक और सनसनीखेज बात कह देती है, तो क्या ऐसे तमाम नारे बिना किसी सवाल के सीधे-सीधे खबर हैं? अन्ना की सारी बातें नारों की शक्ल में हैं और नारों के लिए तुकबंदी काफी होती है, किसी किस्म की सच्चाई की जरूरत नहीं पड़ती। यह सिलसिला हम इसलिए शर्मनाक मानते हैं कि आज मीडिया में दिमाग की जगह कैमरों और माइक्रोफोन ने ले ली है। एक वक्त था जब अखबारनवीसी में लोग सवाल तैयार करके जाते थे और लोगों को अपने सवालों से परेशान करके, पाठक के मन में उठने वाले सारे सवालों के जवाब लेकर आना अपने पेशे की जिम्मेदारी समझते थे। उस वक्त की हमें एक याद है कि अविभाजित मध्यप्रदेश के एक सबसे बड़े पत्रकार, और प्रकाशक भी, स्व. मायाराम सुरजन से तत्कालीन मुख्यमंत्री ने यह शिकायत की थी कि उनके एक संवाददाता प्रेस कांफे्रंस में उन्हें परेशान करने वाले सवाल करते हैं। इस पर उन्होंने शिकायत से जुड़ी हुई खबरों को देखा था और मुख्यमंत्री को रूबरू कहा था- 'हमारे अखबार के संवाददाताओं को कहा जाता है कि वे सवाल तैयार करके जाएं और उन्हें पूछकर आएं, इसलिए मुझे इन सवालों में कोई गलती नजर नहीं आ रही है।Ó यह कहते हुए उन्होंने इतना जरूर कहा था कि अगर संवाददाता के बोलने के लहजे में कोई गड़बड़ी थी तो वे उसे यह दुरूस्त करने के लिए जरूर कहेंगे। लेकिन वह दौर उनके जैसे पत्रकारों के साथ खत्म हो गया है और आज न वैसे सवाल पूछने वाले संवाददाता बहुत अधिक रहते और न ही पाठक को उसकी उम्मीद के, जरूरत के सवालों के जवाब मिलते। यह सिलसिला कैसे सुधरेगा, कैसे मीडिया अपनी इस बहुत साधारण सी तकनीकी काबिलीयत का इस्तेमाल करेगा, पता नहीं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें