शराब कारोबार, जरूरत से अधिक रोक-टोक से किसी दिन बंगाल जैसी नौबत न आए...



संपादकीय
15 दिसंबर
शराब कारोबार, जरूरत से अधिक रोक-टोक से किसी दिन बंगाल जैसी नौबत न आए...

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का पीछा बड़े-बड़े हादसे छोड़ ही नहीं रहे हैं। देश में सबसे अधिक मेहनत करने वाली मुख्यमंत्रियों में से एक और शायद सबसे अधिक सादगी से रहने वाली ममता को अस्पतालों में छोटे बच्चों की थोक में मौत झेलनी पड़ रही है, अस्पताल की आग देखनी पड़ रही है और अब नकली या जहरीली शराब से पूरे सौ लोग एक साथ मारे गए हैं। देश में हाल फिलहाल में शराब से होने वाली यह सबसे बड़ी मौत है। हम इस घटना से सबक लेते हुए छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बात करना चाहते हैं जहां पर राज्य सरकार पिछले करीब एक बरस में शराब कारोबारियों पर तगड़ा वार करके उनका धंधा मुश्किल कर दिया है, और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि शराब माफिया की मनमानी बंद कर दी है। जब तक कोई धंधा सरकार के दिए हुए लाइसेंस से चलता है, और जब तक उसमें कोई अपराध नहीं पकड़ाता है तब तक उसे माफिया कहने से हम सहमत इसलिए नहीं रहते क्योंकि उससे इस शब्द की गंभीरता खत्म हो जाती है। पूरी दुनिया का इतिहास गवाह है कि शराबबंदी जिस देश में या जिस प्रदेश में रही, वहां पर माफिया पनप गए और अमरीका में करीब आधी-पौन सदी पहले शराब पर रोक के चलते उस कारोबार भूमाफिया जिस तरह काबू में रखता था और पुलिस के साथ जिस तरह उसकी खुली मुठभेड़ होती थी, उस पर ढेरों फिल्में भी बनी हुई हैं। भारत में ही गुजरात का हाल देखें तो वहां लंबे समय से चली आ रही शराबबंदी के बाद भी हर तरह की शराब आसानी से मिलती है और फर्क सिर्फ यही है कि उस शराब के असली या नकली होने की कोई गारंटी नहीं होती और वह मनमाने दाम पर बिकती है जिस पर सरकार को कोई टैक्स तो नहीं मिलता लेकिन सरकार का अमला इस माफिया कारोबार के चलते इस कदर भ्रष्ट हो चुका है कि मुंह लगा हुआ यह खून शायद ही कभी छूट पाए।
हम छत्तीसगढ़ की चर्चा करना चाहते हैं। यहां सरकार ने पिछले एक-दो बरस में लगातार छोटे गांवों से शराब दुकानों को हटा दिया है और कई गांवों को 15-20 किलोमीटर दूर ही शराब दुकान पड़ती है। लोगों का शराब पीना इससे कम होगा ऐसा सरकार का मानना है, लेकिन जिनको इसकी आदत है, या जरूरत है, वे लोग किसी दूसरे की लाई हुई शराब या शराब माफिया की स्मगलिंग की शराब पर टिके रहेंगे। नतीजा यह है कि लोग शहरों में तो एक किलोमीटर पर शराब पा जा रहे हैं, गांवों में लोग 20 किलोमीटर तक जाने को बेबस किए जा रहे हैं और राज्य सरकार की यह घोषणा है कि आने वाले बरसों में वह और अधिक गांवों से शराब दुकानों को हटा देगी। शराब एक बुरी चीज है यह गांधी के समय से लेकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह  तक हर कोई कह रहा है। लेकिन शराब के जो दूसरे विकल्प नशे के आदी लोग ढूंढ लेंगे, और आज भी दबे-छुपे ढूंढ रहे हैं वे शराब से कई गुना अधिक खतरनाक हैं। तरह-तरह के नशे लोगों को खत्म कर सकते हैं। जिस अमरीका में शराब पूरी तरह खुली है, वहां पर भी अब डॉक्टरी सलाह से भांग और गांजा जैसे कम नुकसानदेह नशे को कानूनी दर्जा देकर तरह-तरह से लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है कि अगर किसी मजबूरी में उन्हें नशा करना ही है तो वे कम नुकसानदेह नशा करें, बजाय खतरनाक दवाईयों के। छत्तीसगढ़ की शराब नीति अगर बिना किसी विकल्प के, बिना किसी जागरूकता के और बिना व्यवहारिकता के सिर्फ सरकारी अमले के दम पर लागू की जाएगी तो चारों तरफ बिना शराबबंदी वाले राज्यों से शराब आना तो आज भी हो सकता है, और कल हो सकता है कि जहरीली शराब आकर बिके, और खतरनाक नशे के सामान आकर बिकें। हम हर बात पर सरकार के प्रतिबंध को जरूरी या सही नहीं मानते। लोगों के बीच में उनके अच्छे और बुरे के लिए एक जागरूकता पैदा करना अधिक जरूरी है, बजाय उन्हें एक खतरनाक जगह पर छोड़ देने के, जहां सरकार उनके दूसरे रास्तों पर कभी काबू नहीं कर पाएगी। आज तो चार-छै बोतलों को लेकर जाने वाले छोटे-छोटे शराब तस्करों को पकड़कर सरकार उनके खिलाफ बहुत कड़े कानून लागू कर रही है, जेल भेज रही है, लेकिन जेब की पुडिय़ा में रखकर जब लोग नशे का धंधा करेंगे तो उन्हें पकडऩा इतना आसान नहीं रहेगा।
छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश के समय से शराब के कारोबार को सरकार इस कदर अपने काबू में रखती है कि वह जब चाहे किसी कारोबारी को माफिया साबित कर सकती है और इस धंधे से सत्ता जब चाहे तब जितनी चाहे उतनी वसूली भी दशकों से करती चली आ रही है। जरूरत से अधिक नियम और रोक-टोक, मनमानी, पक्षपात और भ्रष्टाचार सबको बढ़ाते हैं। इस राज्य में शराब के कारोबार को तर्कसंगत तरीके से तय करने की जरूरत है, आज सरकार की नीति लोगों का भला करने की नीयत से चाहे बदली जा रही हो, किसी दिन यहां पश्चिम बंगाल के आज के हादसे जैसा हादसा हो सकता है।

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