21 दिसंबर 2011
संपादकीय
यूपीए का मुंह कभी अमरीका जाकर खुलता है कभी रूस...
केंद्र की यूपीए सरकार जिन बहुत बड़ी-बड़ी लपटों से अभी घिरी हुई है, उनकी चर्चा हम न भी करें, तो भी इन लपटों के बाद का आग का जो घेरा इस सरकार के इर्दगिर्द बन गया है, उससे निपटना भी इसके लिए भारी है। एक तरफ कश्मीर में सेना को मिले हुए विशेष अधिकार हटाने की मांग चल रही है और ऐसी ही मांग को लेकर मणिपुर में आर्थिक नाकेबंदी जाने कितने महीनों से वहां की अर्थव्यवस्था और जिंदगी को तबाह किए हुए है। उत्तरप्रदेश के चार टुकड़े करने के मायावती के चुनावी-राजनीतिक दांव का कोई जवाब कांगे्रस के पास राजनीतिक स्तर पर नहीं है और वह अपने बाबुओं के मार्फत उत्तरप्रदेश को यह गिना रही है कि उसका प्रस्ताव किस तरह तर्कों और तथ्यों के बिना भेज दिया गया है। तर्कों और तथ्यों को लेकर अगर बात की जाए तो यूपीए और कांगे्रस के पास गिनाने के लिए हासिल कुछ भी नहीं है। सरकार का एक बड़ा हिस्सा अदालत के कटघरे में खड़ा है और बाकी हिस्सा जनता की अदालत के कटघरे में। नतीजा यह है कि साख पूरी तरह खो चुका यूपीए आज देश की लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवस्था को अन्ना हजारे के हमले से बचाने की ताकत भी खो चुका है। नतीजा यह भी है कि एक तानाशाह की शक्ल ले चुके अन्ना हजारे को यह देश गांधीवादी मान रहा है। दरअसल किसी भी मोर्चे पर दोनों तरफ की साख की तुलना की जाती है और ऐसे में अन्ना हजारे की खामियां लोगों को दिख नहीं रहीं क्योंकि यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी खूबियां खो चुकी हैं।
हम फिर ठोस बात पर लौटें तो आंध्र में तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की अपनी अधकचरी घोषणा को कांगे्रस किसी किनारे तक नहीं पहुंचा पा रही और अगर चिदंबरम का कोई राजनीतिक ताबूत बनेगा तो उसमें पहली कील उनकी तेलंगाना बनाने की घोषणा रहेगी। इस राज्य में कांगे्रस के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि उसके पिछले मुख्यमंत्री वाइएसआर के गुजर जाने के बाद उनका बेटा किस तरह सैकड़ों या हजारों करोड़ की दौलत के साथ सीबीआई की जांच के घेरे है। आज कांगे्रस से बागी होकर उसके खिलाफ खड़े हुए जगन मोहन रेड्डी का किसी मामले में फंसना चाहे कांगे्रस को राजनीतिक रूप से सुहा रहा हो, लेकिन इस बात का क्या जवाब है कि उसके मुख्यमंत्री का कुनबा हजारों करोड़ का मालिक बन जाता है। देश के दक्षिण के दो राज्य तमिलनाडु और केरल एक बांध को लेकर आमने-सामने है और संघीय ढांचे के भीतर ऐसे किसी टकराव पर केंद्र सरकार की ही जिम्मेदारी बनती है। केरल में कांगे्रस की अपनी सरकार है और तमिलनाडु में कांगे्रस से पूरी तरह तिरछे-तिरछे चल रही, बागी तेवरों वाली जयललिता की सरकार है। ऐसे मेें कांगे्रस की अगुवाई वाला यूपीए किस तरह बीच बचाव कर पाएगा, यह बहुत मुश्किल बात है। और तमिलनाडु में, जहां पर कि कांगे्रस ने अपने एक प्रधानमंत्री की जिंदगी खोई थी, जहां पर श्रीलंका के साथ किसी भी तरह के तनाव को लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव आए दिन खड़े हो जाता है, वहां पर कांगे्रस जयललिता की विरोधी डीएमके को भी केंद्र के घोटालों के चलते लगभग खो चुकी है। मजबूरियां करूणानिधी को सोनिया के साथ जोड़कर चल रही हैं, लेकिन दिलों में दरार पड़ चुकी है।
इस तरह की कई दिक्कतें यूपीए के सामने खड़ी हैं और एक बड़ी चीज यह है कि इसके तीन सबसे बड़े कांगे्रसी नेताओं, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी में राजनीतिक मुद्दों का सीधा-सीधा सामना करने और सामने खड़े हुए सवालों का जवाब देने का माद्दा नहीं दिखता है। मतलब यह कि वे पहले से तय की हुई बातें कर सकते हैं, पहले से तैयार किए गए किसी अभियान में एक कटआऊट की तरह खड़े होकर भाषण दे सकते हैं, लेकिन इससे अधिक इन तीनों से कोई भी सोच देश को सीधे-सीधे नहीं मिल पा रही है। और कांगे्रस पार्टी, यूपीए सरकार की तरफ से कभी प्रवक्ता, कभी मंत्री और कभी इन दोनों से ऊपर के दिग्विजय सिंह इस किस्म की बातें कर देते हैं कि उनसे झगड़े-टंटे बोने का काम अधिक हो रहा है और इस फसल को काटने की हालत सोनिया गांधी की नहीं दिख रही है। हम सस्ती और फूहड़ राजनीति करने वालों के सत्ता पर काबिज होने के खिलाफ हैं, लेकिन जहां जनहित के मुद्दे, देशहित के मुद्दे सामने खड़े हों वहां पर सुरक्षा घेरे में कैद मौनी बाबा, बीबी को भी हम लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं मानते। हमें हैरानी इस बात की भी है कि भारत में जिस परमाणु बिजलीघर के खिलाफ लोग आंदोलन कर रहे हैं उस आंदोलन पर मनमोहन सिंह को अपना पहला कड़ा बयान देने की नौबत मास्को जाकर मिली। इस देश की बातों पर यहां का प्रधानमंत्री कभी अमरीका जाकर मुंह खोले और कभी रूस जाकर, यह एक शर्मनाक नौबत है।
संपादकीय
यूपीए का मुंह कभी अमरीका जाकर खुलता है कभी रूस...
केंद्र की यूपीए सरकार जिन बहुत बड़ी-बड़ी लपटों से अभी घिरी हुई है, उनकी चर्चा हम न भी करें, तो भी इन लपटों के बाद का आग का जो घेरा इस सरकार के इर्दगिर्द बन गया है, उससे निपटना भी इसके लिए भारी है। एक तरफ कश्मीर में सेना को मिले हुए विशेष अधिकार हटाने की मांग चल रही है और ऐसी ही मांग को लेकर मणिपुर में आर्थिक नाकेबंदी जाने कितने महीनों से वहां की अर्थव्यवस्था और जिंदगी को तबाह किए हुए है। उत्तरप्रदेश के चार टुकड़े करने के मायावती के चुनावी-राजनीतिक दांव का कोई जवाब कांगे्रस के पास राजनीतिक स्तर पर नहीं है और वह अपने बाबुओं के मार्फत उत्तरप्रदेश को यह गिना रही है कि उसका प्रस्ताव किस तरह तर्कों और तथ्यों के बिना भेज दिया गया है। तर्कों और तथ्यों को लेकर अगर बात की जाए तो यूपीए और कांगे्रस के पास गिनाने के लिए हासिल कुछ भी नहीं है। सरकार का एक बड़ा हिस्सा अदालत के कटघरे में खड़ा है और बाकी हिस्सा जनता की अदालत के कटघरे में। नतीजा यह है कि साख पूरी तरह खो चुका यूपीए आज देश की लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवस्था को अन्ना हजारे के हमले से बचाने की ताकत भी खो चुका है। नतीजा यह भी है कि एक तानाशाह की शक्ल ले चुके अन्ना हजारे को यह देश गांधीवादी मान रहा है। दरअसल किसी भी मोर्चे पर दोनों तरफ की साख की तुलना की जाती है और ऐसे में अन्ना हजारे की खामियां लोगों को दिख नहीं रहीं क्योंकि यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी खूबियां खो चुकी हैं।
हम फिर ठोस बात पर लौटें तो आंध्र में तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की अपनी अधकचरी घोषणा को कांगे्रस किसी किनारे तक नहीं पहुंचा पा रही और अगर चिदंबरम का कोई राजनीतिक ताबूत बनेगा तो उसमें पहली कील उनकी तेलंगाना बनाने की घोषणा रहेगी। इस राज्य में कांगे्रस के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि उसके पिछले मुख्यमंत्री वाइएसआर के गुजर जाने के बाद उनका बेटा किस तरह सैकड़ों या हजारों करोड़ की दौलत के साथ सीबीआई की जांच के घेरे है। आज कांगे्रस से बागी होकर उसके खिलाफ खड़े हुए जगन मोहन रेड्डी का किसी मामले में फंसना चाहे कांगे्रस को राजनीतिक रूप से सुहा रहा हो, लेकिन इस बात का क्या जवाब है कि उसके मुख्यमंत्री का कुनबा हजारों करोड़ का मालिक बन जाता है। देश के दक्षिण के दो राज्य तमिलनाडु और केरल एक बांध को लेकर आमने-सामने है और संघीय ढांचे के भीतर ऐसे किसी टकराव पर केंद्र सरकार की ही जिम्मेदारी बनती है। केरल में कांगे्रस की अपनी सरकार है और तमिलनाडु में कांगे्रस से पूरी तरह तिरछे-तिरछे चल रही, बागी तेवरों वाली जयललिता की सरकार है। ऐसे मेें कांगे्रस की अगुवाई वाला यूपीए किस तरह बीच बचाव कर पाएगा, यह बहुत मुश्किल बात है। और तमिलनाडु में, जहां पर कि कांगे्रस ने अपने एक प्रधानमंत्री की जिंदगी खोई थी, जहां पर श्रीलंका के साथ किसी भी तरह के तनाव को लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव आए दिन खड़े हो जाता है, वहां पर कांगे्रस जयललिता की विरोधी डीएमके को भी केंद्र के घोटालों के चलते लगभग खो चुकी है। मजबूरियां करूणानिधी को सोनिया के साथ जोड़कर चल रही हैं, लेकिन दिलों में दरार पड़ चुकी है।
इस तरह की कई दिक्कतें यूपीए के सामने खड़ी हैं और एक बड़ी चीज यह है कि इसके तीन सबसे बड़े कांगे्रसी नेताओं, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी में राजनीतिक मुद्दों का सीधा-सीधा सामना करने और सामने खड़े हुए सवालों का जवाब देने का माद्दा नहीं दिखता है। मतलब यह कि वे पहले से तय की हुई बातें कर सकते हैं, पहले से तैयार किए गए किसी अभियान में एक कटआऊट की तरह खड़े होकर भाषण दे सकते हैं, लेकिन इससे अधिक इन तीनों से कोई भी सोच देश को सीधे-सीधे नहीं मिल पा रही है। और कांगे्रस पार्टी, यूपीए सरकार की तरफ से कभी प्रवक्ता, कभी मंत्री और कभी इन दोनों से ऊपर के दिग्विजय सिंह इस किस्म की बातें कर देते हैं कि उनसे झगड़े-टंटे बोने का काम अधिक हो रहा है और इस फसल को काटने की हालत सोनिया गांधी की नहीं दिख रही है। हम सस्ती और फूहड़ राजनीति करने वालों के सत्ता पर काबिज होने के खिलाफ हैं, लेकिन जहां जनहित के मुद्दे, देशहित के मुद्दे सामने खड़े हों वहां पर सुरक्षा घेरे में कैद मौनी बाबा, बीबी को भी हम लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं मानते। हमें हैरानी इस बात की भी है कि भारत में जिस परमाणु बिजलीघर के खिलाफ लोग आंदोलन कर रहे हैं उस आंदोलन पर मनमोहन सिंह को अपना पहला कड़ा बयान देने की नौबत मास्को जाकर मिली। इस देश की बातों पर यहां का प्रधानमंत्री कभी अमरीका जाकर मुंह खोले और कभी रूस जाकर, यह एक शर्मनाक नौबत है।
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