27 दिसंबर 2011
विशेष संपादकीय
पार्टी व्हिप में बंधे सांसद और संविधान सभा वाला इतिहास
भारतीय संसद में अगले कुछ दिनों में लोकपाल और कुछ दूसरे मुद्दों पर जो बात होनी है, उसे लेकर आज चाहे कोई पार्टी यह कहे कि वह अपने पत्ते संसद में खोलेगी, संसद की यह आने वाली बहस कितनी अहमियत की होगी इसे लेकर एक बड़ा शक पैदा होता है। सत्ता और विपक्ष ये दो खेमे अपनी-अपनी गिनती की ताकत का इस्तेमाल करते हुए वहां पर अपने सांसदों के लिए फतवे जारी करेंगे ताकि वोटों की, आम हो चली, खरीद-फरोख्त न हो और पार्टियों की नीतियों के मुताबिक वोट डलें। न सिर्फ वोट बल्कि वोट से पहले की बहस भी पार्टी की नीतियों के आधार पर ही सांसद वहां पर करते हैं और भारत के संसदीय लोकतंत्र में मतदाता का चुनाव कुछ हद तक नाकामयाब हो जाता है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि लोग पार्टी के निशान पर एक प्रत्याशी को वोट देते हैं। यह वोट पार्टी को दिया हुआ भी होता है, और प्रत्याशी को दिया हुआ भी। संसद या विधानसभाओं में जब पार्टी व्हिप जारी होता है और लोग पार्टी के कहे मुताबिक किसी मुद्दे पर किसी एक तरफ वोट डालते हैं तो मतदाताओं का प्रत्याशी का चुनाव वहां बेमायने हो जाता है और सिर्फ पार्टी का फैसला मतदान में वोट डालता है।
दलबदल के अपने अलग नुकसान थे और एक वक्त हरियाणा जैसे राज्य में जब आयाराम-गयाराम की भाषा राजनीति में शुरू हुई तो दलबदल कानून बनाने की जरूरत भी लोगों को लगी। लेकिन जैसा कि हर कानून के साथ होता है, इस नए कानून के तहत पार्टी व्हिप के मुताबिक वोट डालते हुए सांसद अपने दिल और दिमाग, अपने मतदाताओं से अगर कोई सलाह-मशविरा किया हो तो, ऐसी किसी बात का ख्याल नहीं रख पाते। नतीजा यह होता है कि एक बार चुनाव हो जाने के बाद पांच बरस तक जनता की राय पूरी तरह से पार्टी के कब्जे में चली जाती है और अलग-अलग सांसदों की संभावित अलग-अलग सोच की गुंजाइश खत्म हो जाती है। संसद के भीतर होने वाली बहस में शब्दों और छोटी-मोटी बातों के फर्क को छोड़ दें तो मोटे तौर पर पहले से यह अंदाज रहता है कि कौन से सांसद क्या कहेंगे। अपनी-अपनी पार्टी की घोषित नीति, या छुपाकर रखे गए पत्तों के तहत वे चाल चलते हैं और यह बाजी पहले से अंदाज लगा लेने के लायक ही रहती है। अब सवाल यह उठता है कि इस देश की संसद में बैठे हुए लोगों की अपनी-अपनी सोच क्या उनकी पार्टी की नीति से परे, कम से कम बहस के लिए सामने नहीं आनी चाहिए? जिन लोगों ने भारत के संविधान को बनाने के लिए बनी संविधान सभा की कार्रवाई पढ़ी है वे जानते हैं कि पार्टियों की खेमेबाजी से परे कितने तरह की बातें वहां पर होती थीं और घोर ब्राम्हणवादियों से लेकर डॉ. भीमराव अंबेडकर पर, इस्लामी कट्टरपंथी सोच के लोगों से लेकर नेहरू जैसे उदार विचारों वाले नेताओं तक, कितने ही लोगों ने वहां पर खुलकर बातें नहीं की थीं? उसी का नतीजा था कि संविधान सभा की वह बहस आज भी पढऩे लायक है और आज अगर संसद की बहस को कोई सुने तो बोलने के अंदाज और लालू-लतीफों से परे कोई फलसफा वहां ऐसा सुनने नहीं मिलता जो कि पार्टी के प्रवक्ता संसद से बाहर बोल न चुके हों।
अभी पिछले हफ्ते ही संसद में किसी एक सदस्य ने बहस के दौरान ही यह कहा था कि लोकपाल पर पार्टियां व्हिप जारी करने के बजाय सदस्यों को अपनी अंतरात्मा की आवाज से वोट देने को देकर तो देखे, तो पता चल जाएगा कि लोकपाल को कोई नहीं चाहता। यह बात इस हिसाब से भी सही है कि जिस संसद में एक से अधिक बार कई लोग अपनी आत्मा और अपनी आवाज को कोठे पर बेचने के अंदाज में बेचते हुए रंगे हाथों पकड़ाए हुए हैं, संसद से निकाले जा चुके हैं, जेल जा चुके हैं, और संसद के विशेषाधिकार के चलते अपराध साबित हो जाने के बाद भी बचे हुए हैं, उस संसद में किसकी अंतरात्मा की आवाज पर कितना दाम चस्पा होगा इसका अंदाज कैसे लगेगा? तो इस संसद और इसके सांसदों का हाल यह है कि अगर व्हिप जारी न हो तो कांगे्रस जैसी पार्टी जितनी जरूरत हो उतनी अंतरात्माएं खरीद लेंगी, और अगर व्हिप जारी होगा तो वहां सिर्फ पार्टियों की आवाज गूंजेगी। इनके बीच का कौन सा रास्ता आसान हो सकता है यह हम नहीं जानते। लेकिन आज इस मुद्दे को छेडऩे का हमारा मकसद यह है कि संसद के बाहर जितने किस्म की बकवास लोकपाल और भ्रष्टाचार को लेकर चल रही है उससे परे इस संसद को एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी के तहत खुलकर बहस करनी चाहिए, खुलकर विचार करना चाहिए, और अगर इस संसद के, इस सरकार के अनचाहे ही एक लोकपाल बनाना अब बेबसी हो गई है तो उस लोकपाल पर बात उसी तरह होनी चाहिए जिस तरह इस संसद के पुरखे के रूप में संविधान सभा ने एक वक्त बात की थी। पार्टियों की अपनी-अपनी नीतियों और रणनीतियों का दौर लोकपाल और उससे जुड़ी बहसों के शुरू होने तक खत्म हो जाना चाहिए और उसके बाद लोकतांत्रिक ढांचे की संभावनाओं और सीमाओं के भीतर खूबियों और खामियों की चर्चा खुलकर होनी चाहिए। हम इस विधेयक को लेकर संसद के बाहर चल रही किसी टोपीधारी बदनीयत हड़बड़ी और जिद्द की बात भी संसद के ध्यान में लाने की बात नहीं करते। संसद को अपने-आपको इस बहस के शुरू होने के बाद बाहर की दुनिया से अब तक पाए गए असर को काफी मानते हुए आगे की चर्चा इस विधेयक पर करनी चाहिए वरना यह संसद संसदीय जिम्मेदारी के बजाय चुनावी-राजनीतिक मतलबपरस्ती का अखाड़ा बन जाएगी।
बहुत से ऐसे मौके होते हैं जब लोग या पार्टियां अपनी जीत के बजाय देश की जीत को अधिक महत्व दे सकते हैं। खेल में कई बार यह कहा जाता है कि कुछ महान खिलाड़ी अपने रिकॉर्ड की परवाह किए बिना अपनी टीम के भले के हिसाब से खेलते हैं। कुछ उसी किस्म की जरूरत हमें आज संसद में लग रही है कि इस विधेयक के पास होने या न होने से परे, अधिक महत्वपूर्ण यह है कि लोग देश के सामने एक खरी लोकतांत्रिक बहस रखें, क्योंकि देश की जनता संसद के पक्ष और विपक्ष में से किसी को ईमानदार या बेईमान जैसा दर्जा नहीं देती और देश का माहौल यह है कि संसद का एक बड़ा हिस्सा बेईमान है। इस बात को हम चाहे जनधारणा से अधिक वजनदार न भी मानें, संसद के लिए यह जरूरी है कि वह एक खोई हुई इज्जत को दुबारा पाने की कोशिश करे, और अब भी अगर उसके भीतर बैठे सांसदों, उनकी पार्टियों के मन में देश की भलाई है, तो उन्हें राजनीतिक नफे-नुकसान से परे लोकपाल बिल या भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए दूसरे मुद्दों पर संसद में बात करनी चाहिए। इस मौके पर जो लोग ओछी राजनीति करेंगे, या जो पार्टियां देश के बजाय अपनी राजनीति को अधिक महत्व देंगी वे भी रोजाना अपनी गैरजिम्मेदारी उजागर करती रहेंगी।
देश अब संसद के भीतर कही जाने वाली बातों की राह देख रहा है।
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