13 दिसंबर 2011
संपादकीय
जिनका हक नहीं है, वे खुद होकर सरकारी रियायत का लालच छोड़ें
केंद्र सरकार के पेट्रोलियम राज्यमंत्री आर.पी.एन. सिंह ने संपन्न तबके से कहा है कि उसे खुद होकर रियायती रसोई गैस नहीं खरीदना चाहिए और पूरे दाम की गैस लेना चाहिए क्योंकि वह रियायत का हकदार नहीं है। आज के इस देश के माहौल में ऐसी महीन बातों के लिए हवा में कोई गुंजाइश नहीं बची है क्योंकि जनता यह मानकर चल रही है कि अगर कोई मंत्री है तो उसने सैकड़ों करोड़ों का घपला किया ही होगा और नौ सौ चूहे खाने के बाद अब बिल्ली प्रायश्चित करने चली है। हम इस सोच को मंत्री के नाम से अलग करके उस पर बात करना चाहते हैं। कोई बुरा व्यक्ति भी अगर कोई भली बात कहता है तो उस बात के भलेपन को तो आगे बढ़ाना ही चाहिए। हम ही यहां पर हर दिन कई किस्म की नसीहतें देते हैं, लेकिन जाहिर है कि बहुत सी कमजोरियों के साथ जीते हुए हम उनमें से हर किसी पर पूरी तरह अमल नहीं कर पाते होंगे। लेकिन हमारे जैसे कमजोर लोगों के नाम को अलग करके उस सोच को अपने-आपमें मजबूत मानकर उस पर बात करनी चाहिए।
देश की कोई भी रियायत नैतिक रूप से जरूरतमंद, और लगभग अनिवार्य रूप से गरीबों के लिए होती है और होनी चाहिए। ऐसे में सरकार का इंतजाम अगर अपनी अमल की सीमाओं के तहत यह फर्क नहीं कर पाता है कि गैरगरीबों को रियायत से दूर कैसे रखा जाए तो ऐसे ताकतवर तबके को खुद ही होकर रियायतों से बाहर हो जाना चाहिए। पिछले कुछ महीनों से, जब से पेट्रोलियम के दाम बढऩे का हल्ला हुआ है तब से हमने कई-कई बार यह लिखा है कि रियायत का एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों तक जाता है जहां तक सरकार कोई छन्नी लगाकर मलाईदार तबके को फायदे से दूर नहीं कर पाती। ऐसे में रियायत का एक बड़ा बेजा इस्तेमाल हो जाता है जो कि गरीबों से लबालब इस देश में गरीबों के हक को छीनकर ही दिया जाता है। यह सिलसिला तुरंत खत्म होना चाहिए और हमारा यह मानना है कि एक सीमा से अधिक तनख्वाह वाले लोग, एक आयवर्ग के लोग रियायतों से बाहर कर दिए जाने चाहिए। जिस बात से हमने शुरू किया है, वैसे नैतिकता अब कम बची है इसलिए पता नहीं ऐसे कितने लोग मिलेंगे जो कि उस पर खुद होकर अमल करें, इसलिए सरकार को इस रियायत को इन तबकों तक पहुंचने के लिए रोकने से ऐसी सरहद तय करनी चाहिए।
कल-परसों ही हमने पर्यावरण पर बोझ बनने वाले, बड़ी खपत वाले लोगों और देशों पर खपत के अनुपात में एक टैक्स लगाने की सलाह दी थी, रियायत से ऐसे लोगों को दूर रखना तो उसके भी पहले होना चाहिए। दरअसल आर्थिक मंदी की बहुत बड़ी मार जिस देश या जिस प्रदेश पर नहीं पड़ती है, वह देश और प्रदेश किफायत में जीना नहीं सीख पाते और बर्बादी से बचना नहीं सीख पाते। जब इंसानों के खाने को दाने नहीं बचते तो फिर लोग चूहों के पेट में जाते हुए गोदाम की फिक्र करते हैं। भारत में अभी किफायत को लेकर चौकन्नापन नहीं आ रहा है, और हम यही बात छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के बारे में भी कहना चाहते हैं जो कि अपनी अतिसंपन्नता के चलते हुए किफायत की तरफ से बेफिक्र सा है। राज्य की चर्चा होने पर हमें एक बात यह भी याद पड़ती है कि केंद्र सरकार की तरह-तरह की रियायत की योजनाएं आखिरकार राज्य सरकारों को ही अमल में लानी पड़ती है और अगर राज्य की मशीनरी लापरवाही बरतती है तो वह रियायत चोरों के पेट में बहुत रफ्तार से पहुंच जाती है। छत्तीसगढ़ में ही हम लगातार इस बात को देखते हैं कि किस तरह रियायती गैस सिलेंडरों का इस्तेमाल धड़ल्ले से होटलों और कारखानों में हो रहा है। केंद्र सरकार भारत के संघीय ढांचे के तहत खुद होकर इस रियायत को लोगों तक नहीं पहुंचा सकती। इसलिए अब एक यह सोच तैयार हो गई है कि कुछ किस्म की रियायत गरीबों के बैंक खातों में सीधे जमा कर दी जाए ताकि राज्यों में रियायत को पहुंचाने में हो रहे भ्रष्टाचार से बचा जा सके। अनाज की रियायत को लोगों तक नगद पहुंचाने के खिलाफ जानकार और संवेदनशील विशेषज्ञों के एक तबके का विरोध भी है कि ऐसे पैसों का पूरा इस्तेमाल परिवार के खाने के लिए नहीं हो पाएगा। ऐसी नौबत से कैसे बचा जाए, यह एक अलग सोच की बात है जिस पर केंद्र और राज्य के सभी जिम्मेदार लोगों को मेहनत करनी चाहिए, दूसरी तरफ हम उस बात को फिर उठाना चाहते हैं कि जो तबके रियायत के हकदार नहीं हैं, उन्हें खुद होकर ऐसी रियायत की लालच से बचना चाहिए।
संपादकीय
जिनका हक नहीं है, वे खुद होकर सरकारी रियायत का लालच छोड़ें
केंद्र सरकार के पेट्रोलियम राज्यमंत्री आर.पी.एन. सिंह ने संपन्न तबके से कहा है कि उसे खुद होकर रियायती रसोई गैस नहीं खरीदना चाहिए और पूरे दाम की गैस लेना चाहिए क्योंकि वह रियायत का हकदार नहीं है। आज के इस देश के माहौल में ऐसी महीन बातों के लिए हवा में कोई गुंजाइश नहीं बची है क्योंकि जनता यह मानकर चल रही है कि अगर कोई मंत्री है तो उसने सैकड़ों करोड़ों का घपला किया ही होगा और नौ सौ चूहे खाने के बाद अब बिल्ली प्रायश्चित करने चली है। हम इस सोच को मंत्री के नाम से अलग करके उस पर बात करना चाहते हैं। कोई बुरा व्यक्ति भी अगर कोई भली बात कहता है तो उस बात के भलेपन को तो आगे बढ़ाना ही चाहिए। हम ही यहां पर हर दिन कई किस्म की नसीहतें देते हैं, लेकिन जाहिर है कि बहुत सी कमजोरियों के साथ जीते हुए हम उनमें से हर किसी पर पूरी तरह अमल नहीं कर पाते होंगे। लेकिन हमारे जैसे कमजोर लोगों के नाम को अलग करके उस सोच को अपने-आपमें मजबूत मानकर उस पर बात करनी चाहिए।
देश की कोई भी रियायत नैतिक रूप से जरूरतमंद, और लगभग अनिवार्य रूप से गरीबों के लिए होती है और होनी चाहिए। ऐसे में सरकार का इंतजाम अगर अपनी अमल की सीमाओं के तहत यह फर्क नहीं कर पाता है कि गैरगरीबों को रियायत से दूर कैसे रखा जाए तो ऐसे ताकतवर तबके को खुद ही होकर रियायतों से बाहर हो जाना चाहिए। पिछले कुछ महीनों से, जब से पेट्रोलियम के दाम बढऩे का हल्ला हुआ है तब से हमने कई-कई बार यह लिखा है कि रियायत का एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों तक जाता है जहां तक सरकार कोई छन्नी लगाकर मलाईदार तबके को फायदे से दूर नहीं कर पाती। ऐसे में रियायत का एक बड़ा बेजा इस्तेमाल हो जाता है जो कि गरीबों से लबालब इस देश में गरीबों के हक को छीनकर ही दिया जाता है। यह सिलसिला तुरंत खत्म होना चाहिए और हमारा यह मानना है कि एक सीमा से अधिक तनख्वाह वाले लोग, एक आयवर्ग के लोग रियायतों से बाहर कर दिए जाने चाहिए। जिस बात से हमने शुरू किया है, वैसे नैतिकता अब कम बची है इसलिए पता नहीं ऐसे कितने लोग मिलेंगे जो कि उस पर खुद होकर अमल करें, इसलिए सरकार को इस रियायत को इन तबकों तक पहुंचने के लिए रोकने से ऐसी सरहद तय करनी चाहिए।
कल-परसों ही हमने पर्यावरण पर बोझ बनने वाले, बड़ी खपत वाले लोगों और देशों पर खपत के अनुपात में एक टैक्स लगाने की सलाह दी थी, रियायत से ऐसे लोगों को दूर रखना तो उसके भी पहले होना चाहिए। दरअसल आर्थिक मंदी की बहुत बड़ी मार जिस देश या जिस प्रदेश पर नहीं पड़ती है, वह देश और प्रदेश किफायत में जीना नहीं सीख पाते और बर्बादी से बचना नहीं सीख पाते। जब इंसानों के खाने को दाने नहीं बचते तो फिर लोग चूहों के पेट में जाते हुए गोदाम की फिक्र करते हैं। भारत में अभी किफायत को लेकर चौकन्नापन नहीं आ रहा है, और हम यही बात छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के बारे में भी कहना चाहते हैं जो कि अपनी अतिसंपन्नता के चलते हुए किफायत की तरफ से बेफिक्र सा है। राज्य की चर्चा होने पर हमें एक बात यह भी याद पड़ती है कि केंद्र सरकार की तरह-तरह की रियायत की योजनाएं आखिरकार राज्य सरकारों को ही अमल में लानी पड़ती है और अगर राज्य की मशीनरी लापरवाही बरतती है तो वह रियायत चोरों के पेट में बहुत रफ्तार से पहुंच जाती है। छत्तीसगढ़ में ही हम लगातार इस बात को देखते हैं कि किस तरह रियायती गैस सिलेंडरों का इस्तेमाल धड़ल्ले से होटलों और कारखानों में हो रहा है। केंद्र सरकार भारत के संघीय ढांचे के तहत खुद होकर इस रियायत को लोगों तक नहीं पहुंचा सकती। इसलिए अब एक यह सोच तैयार हो गई है कि कुछ किस्म की रियायत गरीबों के बैंक खातों में सीधे जमा कर दी जाए ताकि राज्यों में रियायत को पहुंचाने में हो रहे भ्रष्टाचार से बचा जा सके। अनाज की रियायत को लोगों तक नगद पहुंचाने के खिलाफ जानकार और संवेदनशील विशेषज्ञों के एक तबके का विरोध भी है कि ऐसे पैसों का पूरा इस्तेमाल परिवार के खाने के लिए नहीं हो पाएगा। ऐसी नौबत से कैसे बचा जाए, यह एक अलग सोच की बात है जिस पर केंद्र और राज्य के सभी जिम्मेदार लोगों को मेहनत करनी चाहिए, दूसरी तरफ हम उस बात को फिर उठाना चाहते हैं कि जो तबके रियायत के हकदार नहीं हैं, उन्हें खुद होकर ऐसी रियायत की लालच से बचना चाहिए।
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