भूख और लूट

17 दिसंबर 2011
संपादकीय
भूख और लूट
देश में इनकमटैक्स का जो बकाया है उसका नब्बे फीसदी हिस्सा कुल एक दर्जन लोगों से वसूला जाना है। इनमें बड़े-बड़े जालसाज, शेयर बाजार के धोखेबाज शामिल हैं और देश के सीएजी की रिपोर्ट में इन आंकड़ों के साथ यह भी कहा गया है कि इस वसूली के कोई आसार नहीं हैं। सरकार को 1.96 लाख करोड़ रुपये टैक्स वसूल करना है, और यह लगभग पूरे का पूरा सिर्फ दर्जन भर लोगों का डुबाया हुआ है। यह किस तरह का लोकतंत्र है जिसमें कुछ लोग इस कदर ताकतवर हो जाते हैं कि वे अपनी पूरी जिंदगी देश की दौलत को, सरकार को, जनता के हक को लूटने में लगाए रखते हैं और सरकार, कानून, और बाकी की संवैधानिक संस्थाएं मानो स्टेडियम की कुर्सी पर बैठे हुए एक सर्कस का मजा लेती रहती हैं। ऐसे देश में कुछ लोग अगर बंदूक उठाकर ऐसे लोकतंत्र के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, तो उसमें गलत चाहे जितना हो, हैरानी का क्या है? आज ही सुबह अरब दुनिया के लोकतांत्रिक आंदोलनों में लगे हुए किसी एक ने लिखा- ''अपने तमाम आक्रोश के बावजूद आज मेरी हालत पिंजरे में बंद एक चूहे जैसी है।ÓÓ
हमें लगता है कि अरब देशों से लेकर हिंदुस्तान तक साधारण इंसान की हालत अपने तमाम आक्रोश के बावजूद पिंजरे में बंद चूहे जैसी ही है। जिन देशों में आज क्रांति होते दिख रही है वहां का सच भी आगे चलकर इतिहास में क्या दर्ज होगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन भारत में आज बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे घोर अलोकतांत्रिक लोगों के तानाशाह और बदनीयत, पक्षपाती राजनीति वाले आंदोलनों से लोग अगर जुड़े हैं तो यह उनकी एक भड़ास का ही नतीजा है। पिंजरे में बंद चूहों को अगर एक जगह जुटने का मौका मिलता है, और वे एक जगह जुट जाते हैं तो फिर वे बंधनों को किस तरह काट सकते हैं, इसको लेकर दुनिया के हर देश में छोटे-छोटे बच्चों के लिए भी कहानियां प्रचलित हैं। हम तो बिना गलती शायद ही 1.96 लाख करोड़ की संख्या लिख पाएं, लेकिन आज सुबह जब सामने यह खबर तभी अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की यह खबर भी सामने है कि राजधानी के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में छह महीने पहले मरे दो बरस के एक बच्चे के मां-बाप पर अब पुलिस ने मामला दर्ज किया है कि उन्होंने लापरवाही से, भूख से उस बच्चे की मौत की नौबत लाई थी। यह पूरा सिलसिला भयानक है और जब इस देश में ऐसी मौतों की नौबत आ रही है तभी इस देश में तथाकथित लोकतांत्रिक सत्ता जिस तरह गिरोहबंदी और साजिश से जनता के हक पर डाका डाल रही है, उसके खिलाफ जंगलों से परे के शहर पता नहीं कब तक नक्सलियों वाले होने से बचे रहेंगे। पाठकों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले ही हमने इसी जगह कर्नाटक के सोना खदान वाले जिले रायचूर के बारे में लिखा था जहां पर छह बरस से कम उम्र के छब्बीस सौ बच्चे पिछले दो बरस में ही कुपोषण का शिकार होकर मरे हैं। ये आंकड़े राज्य के ही महिला एवं बाल कल्याण विभाग के दिए हुए थे। यही पर एक दूसरी खबर अभी हमारे हाथों में है कि छत्तीसगढ़ से छोटे-छोटे बच्चों को इसी कर्नाटक में ले जाकर बेचकर या भाड़े पर देकर, उनको नशा कराकर किस तरह उनसे जबरिया भीख मंगवाई जाती थी और अभी किस तरह से वे वहां से आजाद किए जा रहे हैं। कल सबसे पहले हमने ही इस बारे में रिपोर्ट छापी और आज वहां दो दर्जन से अधिक बच्चों की तो छत्तीसगढ़ी होने की शिनाख्त हो चुकी है। यह अपराध का एक अलग मामला है लेकिन हम दूसरी तरफ यह देखते हैं कि इतने छोटे बच्चों को अगर कोई खरीदकर या भाड़े पर लेकर जा रहा है और उन पर ऐसी ज्यादती कर रहा है, तो इसके पीछे देश की गरीबी भी जिम्मेदार है, और यह गरीबी इस देश के हर्षद मेहताओं जैसे लुटेरों की भी खड़ी की हुई है। जब भारत की सरकार इतनी बड़ी रकम ऐसे लोगों से नहीं वसूल कर पा रही है तो वह कैसे लोगों का हक लुटेरों को दे रही है यह बात जाहिर है। जब कर्नाटक के कुपोषण के शिकार बच्चे, छत्तीसगढ़ से बिककर दूसरे प्रदेशों में जाकर भीख मांगने में लगाए गए बच्चे, ऐसी जिंदगी जी रहे हैं, और ऐसी मौत मर रहे हैं तब इस देश का नब्बे फीसदी आयकर बकाया अगर कुल एक दर्जन लोगों के पास डूब रहा है, तो हमारे पास यह मानने की कोई वजह नहीं है कि इन एक दर्जन लुटेरों के साथ सत्ता की भागीदारी नहीं है। सत्ता की हिस्सेदारी के बिना इतनी बड़ी लूट नहीं हो सकती, और ऐसी सत्ता के खिलाफ देश के बाकी हिस्सों में भी खड़े होने में नक्सलियों, या दूसरे हथियारबंद लोगों को और कितना वक्त लगेगा?

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