20 दिसंबर 2011
संपादकीय
सदन के भीतर से सुषमा का राष्ट्र के नाम संदेश
भारतीय जनता पार्टी ने रूस में हिंदू धर्म ग्रंथ भगवत गीता पर एक शहर की अदालत द्वारा लगाई गई रोक के खिलाफ विरोध दर्ज करने के लिए आज संसद में यह मांग की कि भारत इस किताब को राष्ट्रीय गं्रथ घोषित करे।
आज जब हिंदुओं की भावनाएं रूस में इस कार्रवाई से आहत हैं तो ऐसी बात भाजपा को एक लोकप्रियता दिला सकती है, लेकिन हकीकत तो यह है कि ऐसा कहने के साथ-साथ भाजपा इस बात को अच्छी तरह जानती है कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य ऐसा कोई काम नहीं कर सकता। उत्तरप्रदेश के चुनावों को लेकर कोई मुसलमानों को मोहने का काम कर रहा है तो कोई दलितों को। भाजपा का यह ताजा नारा उत्तरप्रदेश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को प्रभावित करने की एक कोशिश हो सकती है लेकिन इसके पीछे एक राजनीतिक ईमानदारी नहीं है। लोकतंत्र की सीमाओं और भारत के ढांचे को ध्यान में रखते हुए कोई भी जानकार ऐसी कोई मांग नहीं कर सकता जो कि किसी एक धर्म को दूसरे धर्म पर चढ़कर बैठ जाने की इजाजत दिलाए। हम कांगे्रस या वामपंथियों की तो बात ही नहीं करते, भाजपा अपनी एक पुरानी साथी, अकाली दल से इस मुद्दे पर कोई समर्थन पा सकेगी? पल भर के लिए हम यह कल्पना भी करें कि ऐसा कोई प्रस्ताव संसद में औपचारिक रूप से मतदान के लिए आएगा, तो क्या अकाली दल अपने धर्म के गुरू माने जाने वाले गुरू ग्रंथसाहब को छोड़कर भगवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग का साथ देगा? फिर इस देश में बहुत से और धर्म भी हैं जिनके हक बराबरी के हैं। और रविशंकर प्रसाद से लेकर अरूण जेटली तक इतने बड़े-बड़े कानून के जानकार भाजपा में हैं कि वे अच्छी तरह यह जानते हैं कि भारत के पूरी तरह हिंदू राष्ट्र बन जाने के पहले तक सुषमा स्वराज की यह मांग सिर्फ संसद के बाहर के हिंदू बहुसंख्यक मतदाताओं में से सिर्फ उन्हीं लोगों को ध्यान में रखकर उठाई गई है जो संविधान से ऊपर धर्म को मानते हैं और जो बाबरी मस्जिद गिराने को सही मानते हैं।
हमें सुषमा स्वराज की इस मांग पर अफसोस इसलिए हो रहा है कि आज जब भारत का लोकतंत्र अपने पूरे अस्तित्व में सबसे अधिक मुद्दों से एक साथ जूझ रहा है, जब उसके सामने असल मुद्दों की भरमार है, जब अदालत से लेकर सीएजी तक और संसद से लेकर चुनाव आयोग तक सभी ने तरह-तरह के ऐसे पहलू सभी के सामने खड़े कर दिए हैं, जिनमें से अधिकतर में कांगे्रस और यूपीए कटघरे में है, तब एक भावनात्मक मुद्दे को इस तरह सामने रखकर यूपीए के लिए फजीहत खड़ी करने की कोशिश हम अपरिपक्व भी मानते हैं और ईमानदारी से परे भी। देश की संसद को भावनाओं में हिलाने की जरूरत इसलिए नहीं है क्योंकि यह संसद वैसे भी तरह-तरह के अपराधों के मामलों की चर्चा से घिरी हुई है और वही इन दिनों भारतीय लोकतंत्र के लिए काफी है। जब एक गैरजरूरी और नाजायज मांग उठाई जाती है तो उससे देश का और लोगों का ध्यान असल मुद्दों की तरफ से हट जाता है। हम संसद से लेकर विधानसभाओं तक कुछ सांसदों और विधायकों की ऐसी हरकत देखते हैं कि जब कोई बहुत महत्वपूर्ण चर्चा चलती रहती है तो वे खड़े होकर कोई ऐसा शिगूफा छोडऩे लगते हैं कि माहौल की संजीदगी पूरी तरह खत्म हो जाए।
भाजपा एनडीए के अपने साथियों के साथ मिलकर भी न तो राम मंदिर को किसी किनारे पहुंचा पा रही और न ही राम मंदिर की खुली मांग को लेकर अकेले किसी चुनाव में जाने की उसकी हिम्मत है। दरअसल उसे इस बात की अच्छी तरह समझ है कि इस देश के किसी भी आम चुनाव को मंदिर के मुद्दे पर जनमत संग्रह में तब्दील नहीं किया जा सकता। इसलिए इस किस्म की धार्मिक चर्चाओं को समय-समय पर छेड़कर वह अपने समर्थक मतदाताओं में से एक तबके को खुश रखने का काम करती है। लेकिन हमें ऐसी किसी भी चर्चा के समय छत्तीसगढ़ के भाजपाई मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान इस अखबार के एक सवाल के जवाब में कही बात याद आती है। उनसे जब पूछा गया था कि वे मंदिर, मस्जिद, धर्मांतरण जैसे किसी भी भावनात्मक मुद्दे को चुनाव में क्यों नहीं उठा रहे तो उनका कहना था कि विकास के काम और जनकल्याण के अलावा उन्हें किसी और मुद्दे की जरूरत नहीं है। और उनका अंदाज सही भी साबित हुआ। पूरे देश में हम आज किसी तरह से धार्मिक धु्रवीकरण की जरूरत नहीं देखते और संभावना भी नहीं देखते। ऐसे में संसद की गंभीरता को खत्म करते हुए अगर सुषमा स्वराज एक ऐसी पूरी तरह अव्यवहारिक और अलोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मांग करती हैं तो हर कोई इस बात को समझ सकता है कि वे सदन को यह बात नहीं सुना रहीं, वे जनता के एक तबके को सुना रही हैं।
संपादकीय
सदन के भीतर से सुषमा का राष्ट्र के नाम संदेश
भारतीय जनता पार्टी ने रूस में हिंदू धर्म ग्रंथ भगवत गीता पर एक शहर की अदालत द्वारा लगाई गई रोक के खिलाफ विरोध दर्ज करने के लिए आज संसद में यह मांग की कि भारत इस किताब को राष्ट्रीय गं्रथ घोषित करे।
आज जब हिंदुओं की भावनाएं रूस में इस कार्रवाई से आहत हैं तो ऐसी बात भाजपा को एक लोकप्रियता दिला सकती है, लेकिन हकीकत तो यह है कि ऐसा कहने के साथ-साथ भाजपा इस बात को अच्छी तरह जानती है कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य ऐसा कोई काम नहीं कर सकता। उत्तरप्रदेश के चुनावों को लेकर कोई मुसलमानों को मोहने का काम कर रहा है तो कोई दलितों को। भाजपा का यह ताजा नारा उत्तरप्रदेश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को प्रभावित करने की एक कोशिश हो सकती है लेकिन इसके पीछे एक राजनीतिक ईमानदारी नहीं है। लोकतंत्र की सीमाओं और भारत के ढांचे को ध्यान में रखते हुए कोई भी जानकार ऐसी कोई मांग नहीं कर सकता जो कि किसी एक धर्म को दूसरे धर्म पर चढ़कर बैठ जाने की इजाजत दिलाए। हम कांगे्रस या वामपंथियों की तो बात ही नहीं करते, भाजपा अपनी एक पुरानी साथी, अकाली दल से इस मुद्दे पर कोई समर्थन पा सकेगी? पल भर के लिए हम यह कल्पना भी करें कि ऐसा कोई प्रस्ताव संसद में औपचारिक रूप से मतदान के लिए आएगा, तो क्या अकाली दल अपने धर्म के गुरू माने जाने वाले गुरू ग्रंथसाहब को छोड़कर भगवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग का साथ देगा? फिर इस देश में बहुत से और धर्म भी हैं जिनके हक बराबरी के हैं। और रविशंकर प्रसाद से लेकर अरूण जेटली तक इतने बड़े-बड़े कानून के जानकार भाजपा में हैं कि वे अच्छी तरह यह जानते हैं कि भारत के पूरी तरह हिंदू राष्ट्र बन जाने के पहले तक सुषमा स्वराज की यह मांग सिर्फ संसद के बाहर के हिंदू बहुसंख्यक मतदाताओं में से सिर्फ उन्हीं लोगों को ध्यान में रखकर उठाई गई है जो संविधान से ऊपर धर्म को मानते हैं और जो बाबरी मस्जिद गिराने को सही मानते हैं।
हमें सुषमा स्वराज की इस मांग पर अफसोस इसलिए हो रहा है कि आज जब भारत का लोकतंत्र अपने पूरे अस्तित्व में सबसे अधिक मुद्दों से एक साथ जूझ रहा है, जब उसके सामने असल मुद्दों की भरमार है, जब अदालत से लेकर सीएजी तक और संसद से लेकर चुनाव आयोग तक सभी ने तरह-तरह के ऐसे पहलू सभी के सामने खड़े कर दिए हैं, जिनमें से अधिकतर में कांगे्रस और यूपीए कटघरे में है, तब एक भावनात्मक मुद्दे को इस तरह सामने रखकर यूपीए के लिए फजीहत खड़ी करने की कोशिश हम अपरिपक्व भी मानते हैं और ईमानदारी से परे भी। देश की संसद को भावनाओं में हिलाने की जरूरत इसलिए नहीं है क्योंकि यह संसद वैसे भी तरह-तरह के अपराधों के मामलों की चर्चा से घिरी हुई है और वही इन दिनों भारतीय लोकतंत्र के लिए काफी है। जब एक गैरजरूरी और नाजायज मांग उठाई जाती है तो उससे देश का और लोगों का ध्यान असल मुद्दों की तरफ से हट जाता है। हम संसद से लेकर विधानसभाओं तक कुछ सांसदों और विधायकों की ऐसी हरकत देखते हैं कि जब कोई बहुत महत्वपूर्ण चर्चा चलती रहती है तो वे खड़े होकर कोई ऐसा शिगूफा छोडऩे लगते हैं कि माहौल की संजीदगी पूरी तरह खत्म हो जाए।
भाजपा एनडीए के अपने साथियों के साथ मिलकर भी न तो राम मंदिर को किसी किनारे पहुंचा पा रही और न ही राम मंदिर की खुली मांग को लेकर अकेले किसी चुनाव में जाने की उसकी हिम्मत है। दरअसल उसे इस बात की अच्छी तरह समझ है कि इस देश के किसी भी आम चुनाव को मंदिर के मुद्दे पर जनमत संग्रह में तब्दील नहीं किया जा सकता। इसलिए इस किस्म की धार्मिक चर्चाओं को समय-समय पर छेड़कर वह अपने समर्थक मतदाताओं में से एक तबके को खुश रखने का काम करती है। लेकिन हमें ऐसी किसी भी चर्चा के समय छत्तीसगढ़ के भाजपाई मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान इस अखबार के एक सवाल के जवाब में कही बात याद आती है। उनसे जब पूछा गया था कि वे मंदिर, मस्जिद, धर्मांतरण जैसे किसी भी भावनात्मक मुद्दे को चुनाव में क्यों नहीं उठा रहे तो उनका कहना था कि विकास के काम और जनकल्याण के अलावा उन्हें किसी और मुद्दे की जरूरत नहीं है। और उनका अंदाज सही भी साबित हुआ। पूरे देश में हम आज किसी तरह से धार्मिक धु्रवीकरण की जरूरत नहीं देखते और संभावना भी नहीं देखते। ऐसे में संसद की गंभीरता को खत्म करते हुए अगर सुषमा स्वराज एक ऐसी पूरी तरह अव्यवहारिक और अलोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मांग करती हैं तो हर कोई इस बात को समझ सकता है कि वे सदन को यह बात नहीं सुना रहीं, वे जनता के एक तबके को सुना रही हैं।
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