उनकी बेशर्मी जीतेगी या हमारा बर्दाश्त?

14 दिसंबर 2011
संपादकीय
उनकी बेशर्मी जीतेगी या हमारा बर्दाश्त?
राजस्थान के भंवरी देवी मामले को लेकर हमने एक पहलू पर अभी कल-परसों ही लिखा है कि लोगों को खुफिया कैमरों और माइक्रोफोन के इस जमाने में किस तरह चौकन्ना रहना चाहिए। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू और है। कांगे्रस सरकार का एक ताकतवर मंत्री इस महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता के लापता होने, और शायद मारे जाने, के मामले में गिरफ्तार है और आज सुबह सीबीआई ने कांगे्रस के एक विधायक के घर छापा मारा है जिसके बारे में इस गायब महिला के पति ने सीबीआई को ऐसा बयान दिया है कि यह विधायक उसकी पत्नी के एक बच्चे का पिता है। आज के भारत के सामाजिक पैमानों के मुताबिक यह मामला कुछ अधिक ही कालिख से घिरा हुआ होते जा रहा है। और यह सिलसिला कोई एक दिन में तो खड़ा हुआ नहीं होगा, लंबे समय से किसी बदचलन की हरकतें ब्लैकमेलिंग से लेकर हत्या तक की ऐसी नौबत तब पहुंची होंगी।
अब सवाल यह उठता है कि कांगे्रस को या कोई और राजनीतिक दल, जब पार्टियां गांव-कस्बों तक अपने लोग होने का दावा करती हैं, करोड़ों में सदस्यता बताती हैं तो अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के ऐसे चाल-चलन उनकी नजरों में पहले क्यों नहीं आते? जब घड़ा इतना भर चुका होता है कि उसके सिर पर फूटने से पूरा बदन गंदगी से लथपथ हो जाता है, तब भी अदालत के कटघरे तक पहुंचने के पहले पार्टियां अपने कुकर्मियों को बर्दाश्त करते रहती हैं और उन्हें अपने सिर पर बिठाकर रखती हैं। जिस देश में नैतिकता के पैमानों को चौराहों पर टांगकर रखा जाता है, वहां पर राजनीतिक दलों के सामने चोरी, डकैती, बलात्कार, भ्रष्टाचार जैसे तमाम मामलों में गले-गले तक डूबे हुए नेताओं को सजा के पहले तक सजाकर रखने की क्या बेबसी होती है? किसी को पद से हटा देने, चुनाव में टिकट न देने, पार्टी में कोई कुर्सी न देने को सजा तो नहीं कहा जा सकता? तो ऐसे दागी लोगों को अदालत से बरी हो जाने तक पार्टी हाशिए पर क्यों नहीं रख सकती? यह पूरा सिलसिला बताता है कि पार्टियों की सोच जब बहुत घटिया होती है तो ही वे अपने अपराधियों को ढोती हैं। एक अपराधी को अपराधी साबित होने में अदालत में दस-बीस-पचीस बरस लग सकते हैं। लेकिन अपराधों से अच्छी तरह वाकिफ और तजुर्बेकार पार्टियां तो पल भर में अपने मवालियों को पहचान सकती हैं और पार्टी के दफ्तर में बैठकर तुरंत ही अंदाज लगा सकती हैं कि वे कितने बड़े मुजरिम हैं। इसके बाद वे अगर ऐसे लोगों को राजनीति और सावर्जनिक जीवन की मूलधारा से अलग करके उन्हें व्यक्तिगत रूप से बच जाने का एक स्वाभाविक मौका दें तो उसमें कोई बात नाजायज नहीं होगी। लेकिन पार्टियों का हाल यह है कि वे अपने बदन के ट्यूमर की तरह अपने कुकर्मियों को ढोते चलती हैं। सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का तकाजा अब न नेताओं को छूता है और न उनकी पार्टियों को। एक-दूसरे के देखा-देखी अब पार्टियां खुलकर दूसरी पार्टी के मवालियों की मिसालें देती हैं और यह सवाल करती हैं कि मेरा मुजरिम तुम्हारे मुजरिम से अधिक बुरा कैसे?
अभी कल ही हमने इसी पेज पर अमरीका में बसे अपने एक छत्तीसगढ़ी पाठक का भेजा पत्र छापा है जो कि इंटरनेट पर रोज इस अखबार को देखकर अक्सर अपनी राय भेजते हैं। इस अखबार के एक संपादकीय के बारे में उन्होंने लिखा है-''कोई डेढ़ सौ अपराधी और दागी लोग भारतीय संसद और विभिन्न विधानसभाओं में जनता के प्रतिनिधि बनकर घुस आये हैं। और जैसा कि आपने लिखा है इनमें से कई लोग तो सत्ता का मजा भी ले रहे हैं। चारा-घोटाला कांड में जेल की सजा काटकर भी लालू प्रसाद यादव पांच साल तक रेल मंत्री रहे इससे दुखद और हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है। गंभीरता से सोच कर देखें तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सबसे पहली गलती तो दागी लालू को रेल मंत्री बनाकर ही की थी। राजा ने तो बाद में बाजा बजाया, प्रजा को चौपट किया और उसे चूना लगाया। अमरीका में उन्हें भी (लालू को) 14 साल से कम की सजा न होती और यहां की सुप्रीमकोर्ट उनके चुनाव लडऩे पर हमेशा के लिए रोक लगा देती। जैसा कि आपने लिखा है कि यदि रावण के किए की सजा राम उसे बीस बरसों बाद देते / सीता को स्वतंत्र कराते तो उनका क्या हाल होता।ÓÓ
भारत की सत्ता की राजनीति में कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता जब किसी न किसी पार्टी के बारे में हमें ऐसा न लगे कि इस पार्टी के नेताओं को दिखता नहीं है या वे जुर्म के फायदों में भागीदार हैं? सच तो यह है कि खबरों को रोज देखकर दिल बैठने लगता है और लोकतंत्र पर से भरोसा खत्म होने लगता है। अब इस दौड़ में पहले लोकतंत्र की जिम्मेदार संस्थाएं पूरी तरह खत्म हो जाती हैं या उसके पहले हमारा हौसला, हमारे जैसे लोगों का हौसला उसी तरह खत्म हो जाता है जिस तरह बरसों पहले से नक्सलियों का हो चुका है?

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